दूर दरसन निकट भया, घर भीतर दे गार ।
ताते तो सुनहा भला, भूँके बैठ द्वार ।२०६१ ।
भावार्थ : -- पहले दूरदर्सन दूरदर्शी था अच्छी अच्छी बातें बताता था अब तो यह अश्लिल दर्शन हो कर घर के भीतर ही दुर्वादन करता है, इससे तो कुत्ता ही भला है जो घर के बहार बैठ कर तो भूँकता है ॥
देस निबासी भूख मरे, फरें-फुरै संकास ।
पाप चरन की बढ़नि कू, सासक कहत बिकास ।२०६२।
भावार्थ : -- देश निवासी तो भूखे मर रहे हैं और पड़ोसी हैं कि के देश के संसाधनों से फल-फूल रहा है । पापाचार भ्रष्टाचार जैसे दुरचरणों की वृद्धि को अधिनायक तंत्र का शासक विकास कहता हैं ॥
बिदुजन जोइ बात कहें , होत हेतु कल्यान ।
नौ बात अनुहार करत, एक तू अपनी मान ।२०६३।
भावार्थ : -- विद्वान जो बातें कहते हैं यद्यपि वह कल्याण के लिए ही होती हैं । किन्तु उनक अक्षरश: पालन नहीं करना चाहिए, उनकी कही दस बातों में से नौ का अनुकरण कर एक बात अपनी माननी चाहिए । कारण की कोई भी पूर्णत: विद्वान नहीं होता ॥ जो विद्वान के हित की बात हो उसे तो कदापि नहीं मानना चाहिए ।
संविधान में दस बातें लिखी हैं रचेता के हित की पांच बातें त्याग कर, दस में शेष पांच बातों में से चार का ही अनुकरण करना चाहिए एक बात अपनी माननी चाहिए ।।
यही बात चिकित्सक आदि के विषय में भी लागु होती है ।
पालतू पशु की हत्या संविधान में अपराध नहीं हैं किन्तु हम मार्ग चलते किसी पशु की हत्या करते हैं क्या ? नहीं। क्यों कि हमारा ज्ञान कहता है यह एक अपराध है..,
मत देना हमारा अधिकार है कोई अड़ोसी-पड़ोसी को खड़ा कर दे तो भी दे दें.....?
सेवक साहुकार जहाँ चोरक चौकीदार ।
तहाँ रच्छा कौन करे, कौन करे बैपार ।२०६४ ।
भावार्थ : - जहाँ सेवक साहुकार बने फिर रहे हों । चोर चौकीदारी कर रहा हो । वहां की सुरक्षा कौन करे, कौन व्यापार करे, ऐसे में व्यवस्था को तो चौपट होना निश्चित ही है ॥
एक द्वीप जलपान किए दूजे खादन खाए ।
देस प्रधान जान ऊपर हाथ हिलावत पाए ।२०६५।
भावार्थ : -- एक द्वीप में जलपान का तो दूसरे में भोजन में भोजन का कार्यक्रम होता है । देश प्रधान हाथ हिलाते हुवे सदा वायुयान में ही दिखते हैं ॥
बसन सों बर साधन सों, बहु मुख बरे अभाति ।
अंतर तम ओहार दिए, बाहिर जग किए काँति ।२०६६।
भावार्थ : -- उत्तम वेशभूषा एवं उत्तम साधनों के संग बहुंत से मुख आभा मंडल का वरण करते है । वस्तुत: यह आभामंडल बाह्य जगत को चकाचौंध कर अपने अंतर के अज्ञान रूपी अँधेरे को छिपाने के लिए होता है ॥
अत: ऐसे आभामंडल से प्रभावित नहीं होना चाहिए ।
सज्जन व्यक्ति अपने आभा मंडल वरन नहीं करते यदि कोई आभा निर्मित भी होती है तो वे उसे तत्काल भंजित कर देते हैं इस हेतु कि उनकी वाणी ओज से युक्त रहे ॥
को नयक पीठ पदक को पोथी पत्ताकार ।
भारत महुँ दरसन मिले पाखन बहुंत प्रकार ।२०६७ ।
भावार्थ : -- कोई नय कोविद का पाखंड किए ऊँचे आसान पर विराजित है कोई ग्रंथकार का पाखंड किए हों कोई पत्रकार का पाखंड किए हैं । भारत ही ऐसा देश है जहां विविध प्रकार के पाखंड देखने को मिलते हैं ।
पाखंड इस हेतु किया जाता है कोई व्यक्ति जो वस्तुत: नहीं है किन्तु वह व्यक्ति बनकर उसके व्यक्तित्व से लाभ लेना है ॥
बेटा आपुनि आप कू, समुझ बाप का बाप ।
आँख देखाए धुकियाए , अनरगल किए अलाप ।२०६८ ।
भावार्थ : - यह कलयुग का दुष्प्रभाव है कि बेटा अपनेआप को बाप का भी बाप समझकर आँख दिखा के धक्का देता है और अनर्गल अलाप भी करता है ॥
को झाड़ फूँक को जूत मार भगावै भूत ।
भयउ झोला छाप अजहुँ पत्तरकार बहूँत ।२०६९ ।
भावार्थ : -- कोई झफ फूँक के तो कोई जूते मार के भूतों को भगा रहा है ऐसे भगेंगे भूत.....? | अब तो झोला छाप डाक्टरों और जर्नलिस्टों की लिस्ट बहुंत ही लम्बी हो चली है ॥
इनके झांसे में नहीं आना चाहिए .....
जन जन का धन कोष है, लूट सके तो लूट ।
चौपट राजा राज किए डाके की है छूट ।२०७० ।
भावार्थ : -- ये जनता जनार्दन का खजाना है जितना चाहे लूट लो । नीति नयम का अभाव है चौपट राजा राज कर रहे हैं डाके की पूरी पूरी छूट है ॥
ताते तो सुनहा भला, भूँके बैठ द्वार ।२०६१ ।
भावार्थ : -- पहले दूरदर्सन दूरदर्शी था अच्छी अच्छी बातें बताता था अब तो यह अश्लिल दर्शन हो कर घर के भीतर ही दुर्वादन करता है, इससे तो कुत्ता ही भला है जो घर के बहार बैठ कर तो भूँकता है ॥
देस निबासी भूख मरे, फरें-फुरै संकास ।
पाप चरन की बढ़नि कू, सासक कहत बिकास ।२०६२।
भावार्थ : -- देश निवासी तो भूखे मर रहे हैं और पड़ोसी हैं कि के देश के संसाधनों से फल-फूल रहा है । पापाचार भ्रष्टाचार जैसे दुरचरणों की वृद्धि को अधिनायक तंत्र का शासक विकास कहता हैं ॥
बिदुजन जोइ बात कहें , होत हेतु कल्यान ।
नौ बात अनुहार करत, एक तू अपनी मान ।२०६३।
भावार्थ : -- विद्वान जो बातें कहते हैं यद्यपि वह कल्याण के लिए ही होती हैं । किन्तु उनक अक्षरश: पालन नहीं करना चाहिए, उनकी कही दस बातों में से नौ का अनुकरण कर एक बात अपनी माननी चाहिए । कारण की कोई भी पूर्णत: विद्वान नहीं होता ॥ जो विद्वान के हित की बात हो उसे तो कदापि नहीं मानना चाहिए ।
संविधान में दस बातें लिखी हैं रचेता के हित की पांच बातें त्याग कर, दस में शेष पांच बातों में से चार का ही अनुकरण करना चाहिए एक बात अपनी माननी चाहिए ।।
यही बात चिकित्सक आदि के विषय में भी लागु होती है ।
पालतू पशु की हत्या संविधान में अपराध नहीं हैं किन्तु हम मार्ग चलते किसी पशु की हत्या करते हैं क्या ? नहीं। क्यों कि हमारा ज्ञान कहता है यह एक अपराध है..,
मत देना हमारा अधिकार है कोई अड़ोसी-पड़ोसी को खड़ा कर दे तो भी दे दें.....?
सेवक साहुकार जहाँ चोरक चौकीदार ।
तहाँ रच्छा कौन करे, कौन करे बैपार ।२०६४ ।
भावार्थ : - जहाँ सेवक साहुकार बने फिर रहे हों । चोर चौकीदारी कर रहा हो । वहां की सुरक्षा कौन करे, कौन व्यापार करे, ऐसे में व्यवस्था को तो चौपट होना निश्चित ही है ॥
एक द्वीप जलपान किए दूजे खादन खाए ।
देस प्रधान जान ऊपर हाथ हिलावत पाए ।२०६५।
भावार्थ : -- एक द्वीप में जलपान का तो दूसरे में भोजन में भोजन का कार्यक्रम होता है । देश प्रधान हाथ हिलाते हुवे सदा वायुयान में ही दिखते हैं ॥
बसन सों बर साधन सों, बहु मुख बरे अभाति ।
अंतर तम ओहार दिए, बाहिर जग किए काँति ।२०६६।
भावार्थ : -- उत्तम वेशभूषा एवं उत्तम साधनों के संग बहुंत से मुख आभा मंडल का वरण करते है । वस्तुत: यह आभामंडल बाह्य जगत को चकाचौंध कर अपने अंतर के अज्ञान रूपी अँधेरे को छिपाने के लिए होता है ॥
अत: ऐसे आभामंडल से प्रभावित नहीं होना चाहिए ।
सज्जन व्यक्ति अपने आभा मंडल वरन नहीं करते यदि कोई आभा निर्मित भी होती है तो वे उसे तत्काल भंजित कर देते हैं इस हेतु कि उनकी वाणी ओज से युक्त रहे ॥
को नयक पीठ पदक को पोथी पत्ताकार ।
भारत महुँ दरसन मिले पाखन बहुंत प्रकार ।२०६७ ।
भावार्थ : -- कोई नय कोविद का पाखंड किए ऊँचे आसान पर विराजित है कोई ग्रंथकार का पाखंड किए हों कोई पत्रकार का पाखंड किए हैं । भारत ही ऐसा देश है जहां विविध प्रकार के पाखंड देखने को मिलते हैं ।
पाखंड इस हेतु किया जाता है कोई व्यक्ति जो वस्तुत: नहीं है किन्तु वह व्यक्ति बनकर उसके व्यक्तित्व से लाभ लेना है ॥
बेटा आपुनि आप कू, समुझ बाप का बाप ।
आँख देखाए धुकियाए , अनरगल किए अलाप ।२०६८ ।
भावार्थ : - यह कलयुग का दुष्प्रभाव है कि बेटा अपनेआप को बाप का भी बाप समझकर आँख दिखा के धक्का देता है और अनर्गल अलाप भी करता है ॥
को झाड़ फूँक को जूत मार भगावै भूत ।
भयउ झोला छाप अजहुँ पत्तरकार बहूँत ।२०६९ ।
भावार्थ : -- कोई झफ फूँक के तो कोई जूते मार के भूतों को भगा रहा है ऐसे भगेंगे भूत.....? | अब तो झोला छाप डाक्टरों और जर्नलिस्टों की लिस्ट बहुंत ही लम्बी हो चली है ॥
इनके झांसे में नहीं आना चाहिए .....
जन जन का धन कोष है, लूट सके तो लूट ।
चौपट राजा राज किए डाके की है छूट ।२०७० ।
भावार्थ : -- ये जनता जनार्दन का खजाना है जितना चाहे लूट लो । नीति नयम का अभाव है चौपट राजा राज कर रहे हैं डाके की पूरी पूरी छूट है ॥
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