नीचकी पद पैहत भए सबहि जगत बिद्वान ।
जेसेउ नीचे निपते, पूछे नाहि सुवान ।२०२१ ।
भावार्थ : -- ऊँचा पदक प्राप्त होते ही सभी जगत विद्वान हो जाते हैं । जैसे ही वह उस पदक से नीचे उतरते हैं उन्हें कुत्ते भी नहीं पूछते ॥
संत सुधिजन की बानी, कही गई उपदेस ।
बिदुजन सर्वत्र पूजिनिअ, राजन अपने देस ।२०२२।
भावार्थ : -- संतो सुधीजनों की वाणी यह उपदेश कर गई है कि विद्वान सर्वत्र पूज्यनीय है राजा अपने देश में ही पूज्यनीय है, और भिखारी केवल अपने घर में पूज्यनीय है ॥
जहँ लज्जा तहँ लावना , जहँ सद्गुन तहँ रूप ।
जोई चाल चरित गढ़े, सोई भेस अनूप ।२०२३।
भावार्थ : -- जहां लज्जा होती है वहीँ सौंदर्य होता है । जहाँ सद्गुण होते हैं वहीं रूप होता है ॥ जो शील एवं सदाचार-वृत्ति का निर्माण करती हो वेशभूषा वही उत्तम होती है ॥
अनुरति बिनु अनुराग नहि, बिरति बिनु बैराग ।
लवनाई बिनु लाग नहिं, अलगाई बिनु आग ।२०२४ ।
भावार्थ : - आसक्ति बिना अनुराग नहीं होता विरक्ति बिना वैराग नहीं होता । सुंदरता बिना चित्त कहीं प्रवृत्त नहीं होता , लगाए बिना आग नहीं लगती ॥
प्रियतमा हो प्रान समा, प्रीतम प्रान अधार ।
दूनौ के सील सौमुख, बिरथा सब सिंगार ।२०२५।
भावार्थ : -- प्रियतमा यदि प्राण प्रिया हों ( प्रेतात्मा नहीं रे ) प्रियतम प्राणाधार हों । दोनों के मध्य संकोच का भाव उपस्थित हो तो उस श्रृंगार सम्मुख सभी श्रृंगार व्यर्थ हैं ॥
परसासन सब काजु किए, सासन किए किछु नाह ।
ऐसी दुरब्यसनी को, राखन के का लाह ।२०२६ ।
भावार्थ : -- जब समस्त कार्य प्रशासन ही निष्पादित कर रहा हो, शासन कुछ नहीं कर रहा हो । तब ऐसे दुर्व्यसनी शासन को रखने से क्या लाभ, यह तो अपव्यय है ॥
नेम निबंधन रचे बहु, पालन करे न कोइ ।
नेम बंध्या आपुना, आपहि ताड़क होइ ।२०२७।
भवार्थ : - नियम निबंधन तो भतेरे रचे पड़े हैं पालनहार भी तो कोई हो । स्वयं नियम बनाते हैं स्वयं ही उसे तोड़ते हैं॥
राजू : -- लो समय काटने के लिए और कुछ काम नहीं है का..... नहीं है तो हम बता दें.....
दंड पासक कंठ गहे, करे बहुंत संग्राम ।
देस निबासि कहत फिरें, माया मिली न राम । २०२८।
भावार्थ : -- फांसी को गले में लटकाए सेनानियों ने स्वतंत्रता के लिए बहुंत संग्राम किया..... मर मर गए भई.....अब तो देश वासी कहते फिर रहे हैं प्राण भी गए और स्वाधीनता भी नहीं मिली.....फोकट का रोना रह गया.....
देस निबासी गरब किए, जन्मे हीरा लाल ।
कलुखित जोनिज होइ के, होए कोयरी काल ।२०२९ ।
भावार्थ : - देश वासियों गर्व करते फिरे देखो म्हारे देस नै कैसे हीरे लाल जन्में हैं । फिर क्या हुवा वर्ण संकर हो कर के काला कोयला सिद्ध हुवे ॥
जन जन माँसाहारि भए, सड़े देस मैं नाज ।
एहि अहैं स्वाधीनता, तिन्हनि कहत सुराज ।२०३०।
भावार्थ : -- देशवासी मांसादी हो गए हैं, अनाज है की सड़ रहा है | क्या यही है स्वाधीनता ? इसको स्वराज बोलते हैं.....? ऐसी स्वाधीनता के लिए गोली खाने से अच्छा है अपने घर में बैठे रहें.....
जेसेउ नीचे निपते, पूछे नाहि सुवान ।२०२१ ।
भावार्थ : -- ऊँचा पदक प्राप्त होते ही सभी जगत विद्वान हो जाते हैं । जैसे ही वह उस पदक से नीचे उतरते हैं उन्हें कुत्ते भी नहीं पूछते ॥
संत सुधिजन की बानी, कही गई उपदेस ।
बिदुजन सर्वत्र पूजिनिअ, राजन अपने देस ।२०२२।
भावार्थ : -- संतो सुधीजनों की वाणी यह उपदेश कर गई है कि विद्वान सर्वत्र पूज्यनीय है राजा अपने देश में ही पूज्यनीय है, और भिखारी केवल अपने घर में पूज्यनीय है ॥
जहँ लज्जा तहँ लावना , जहँ सद्गुन तहँ रूप ।
जोई चाल चरित गढ़े, सोई भेस अनूप ।२०२३।
भावार्थ : -- जहां लज्जा होती है वहीँ सौंदर्य होता है । जहाँ सद्गुण होते हैं वहीं रूप होता है ॥ जो शील एवं सदाचार-वृत्ति का निर्माण करती हो वेशभूषा वही उत्तम होती है ॥
अनुरति बिनु अनुराग नहि, बिरति बिनु बैराग ।
लवनाई बिनु लाग नहिं, अलगाई बिनु आग ।२०२४ ।
भावार्थ : - आसक्ति बिना अनुराग नहीं होता विरक्ति बिना वैराग नहीं होता । सुंदरता बिना चित्त कहीं प्रवृत्त नहीं होता , लगाए बिना आग नहीं लगती ॥
प्रियतमा हो प्रान समा, प्रीतम प्रान अधार ।
दूनौ के सील सौमुख, बिरथा सब सिंगार ।२०२५।
भावार्थ : -- प्रियतमा यदि प्राण प्रिया हों ( प्रेतात्मा नहीं रे ) प्रियतम प्राणाधार हों । दोनों के मध्य संकोच का भाव उपस्थित हो तो उस श्रृंगार सम्मुख सभी श्रृंगार व्यर्थ हैं ॥
परसासन सब काजु किए, सासन किए किछु नाह ।
ऐसी दुरब्यसनी को, राखन के का लाह ।२०२६ ।
भावार्थ : -- जब समस्त कार्य प्रशासन ही निष्पादित कर रहा हो, शासन कुछ नहीं कर रहा हो । तब ऐसे दुर्व्यसनी शासन को रखने से क्या लाभ, यह तो अपव्यय है ॥
नेम निबंधन रचे बहु, पालन करे न कोइ ।
नेम बंध्या आपुना, आपहि ताड़क होइ ।२०२७।
भवार्थ : - नियम निबंधन तो भतेरे रचे पड़े हैं पालनहार भी तो कोई हो । स्वयं नियम बनाते हैं स्वयं ही उसे तोड़ते हैं॥
राजू : -- लो समय काटने के लिए और कुछ काम नहीं है का..... नहीं है तो हम बता दें.....
दंड पासक कंठ गहे, करे बहुंत संग्राम ।
देस निबासि कहत फिरें, माया मिली न राम । २०२८।
भावार्थ : -- फांसी को गले में लटकाए सेनानियों ने स्वतंत्रता के लिए बहुंत संग्राम किया..... मर मर गए भई.....अब तो देश वासी कहते फिर रहे हैं प्राण भी गए और स्वाधीनता भी नहीं मिली.....फोकट का रोना रह गया.....
देस निबासी गरब किए, जन्मे हीरा लाल ।
कलुखित जोनिज होइ के, होए कोयरी काल ।२०२९ ।
भावार्थ : - देश वासियों गर्व करते फिरे देखो म्हारे देस नै कैसे हीरे लाल जन्में हैं । फिर क्या हुवा वर्ण संकर हो कर के काला कोयला सिद्ध हुवे ॥
जन जन माँसाहारि भए, सड़े देस मैं नाज ।
एहि अहैं स्वाधीनता, तिन्हनि कहत सुराज ।२०३०।
भावार्थ : -- देशवासी मांसादी हो गए हैं, अनाज है की सड़ रहा है | क्या यही है स्वाधीनता ? इसको स्वराज बोलते हैं.....? ऐसी स्वाधीनता के लिए गोली खाने से अच्छा है अपने घर में बैठे रहें.....
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