सासन तेरा प्रबंधन, हे रे हेर न पाए ।
बिधि मिले न बिधान मिले, मिले न कतहुँ न्याय ।२०५१ ।
भावार्थ : - रे शासन तेरा प्रबंधन ढूंडने से भी नहीं मिलता । कहीं विधि नहीं मिलती, कहीं विधान नहीं मिलता, कहीं न्याय नहीं मिलता ॥
दूषन दोष दुराचरन, सासकहि रहे पोस ।
नागरजन अधुना उठे, भरोस सोहि भरोस ।२०५२ ।
भावार्थ : -- शासक ही अपराधों का पोषण कर रहे हैं । हे नागरिकों अधुनातन विश्वास शब्द से ही विश्वास उठ गया ॥
जय 'माल' कू कंठ बरे, हार देइ परिहार ।
राजा जी आयसु करें संसद सदन पधार ।२०५३।
भावार्थ : -- यदि जीत को जनता का आदेश कहते हैं तो हार को क्या कहतें हैं ? हार को अस्वीकार कर जो प्रधान सेवक संसद-सदन में पधार कर आदेश करते हैं वे कृपया बताएं ॥
जोइ पालन जानि सोइ, जानै आयसु दान ।
अज्ञप्ति करन ते पहिले, आज्ञा पालन जान ।।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- जो आज्ञा का पालन करना जानते हैं वही आज्ञा देना जान सकते हैं ॥ पहले आदेशों का पालन करना सीखना चाहिए तत्पश्चात कोई आदेश देना चाहिए ॥
तो अब से जनता जनार्दन जो आदेश दे उसका पालन करो फिर किसी को कोई आदेश दो .....
न तो मानए बिग्यान न तो मानए ग्यान ।
जोइ तासु रचैता कहि मानि सोइ सविधान ।२०५४ ।
भावार्थ : -- न तो विज्ञान की मानता है न ज्ञान की मानता है । संविधान केवल अपने निर्माता की कही मानता है ॥
साजन सोए संग रहे, जो कहि किए किछु नाए ।
जो कहि बहु दोष किए सो बसती कहाँ बसाएँ ।२०५५ ।
भावार्थ : - सज्जनों वे लोग भी संग रहते हैं जो यह कहते हैं कि हमने तो कुछ भी नहीं किया ॥ जो यह कहते हैं कि हमने न जाने क्या क्या अपराध किया वो कहाँ बसें ॥
दण्डनीअ कर दंड लिए, सिंहासन आसीन ।
देउ कुल हीन देस मेँ , भयउ भयउ भयहीन ।२०५६ ।
भावार्थ : -- दंडनीय हाथ डंडा लिए सिंहासन पर विराजित हैं । न्यायालयों से रहित देश में भय भी भयहीन हो गया है अर्थात सब निर्भय हो गए हैं ॥
भला जो देखन मैं चला, भला न कोऊ पाए ।
अब कै को जननी जने कै धरती उपजाए ।२०५७ ।
भावार्थ : -- भला देखन 'मैं ' चला पर कोई भला नहीं मिला । अब या तो कोई लाल की माई जने या फिर धरती उगाए ॥
अधुने काल भारत जस , भयऊ दंडस्तान ।
देस निबासी दास भए, संबिधान की मान ।२०५८ ।
भावार्थ : -- आधुनिक युग में भारत सेना द्वारा शासित स्थान जैसा हो गया है । देश निवासी संविधान की मान मान के दास जैसे हो गए हैं ॥
भारत भूमि दरस रही, कलजुग के पाखंड ।
दंड देउ कुल भए बकुल, दंड जोग दएँ दंड ।२०५९ ।
भावार्थ : -- भारत की भूमि कलयुग के ऐसे पाखंड देख रही है जो कदाचित ही किसी ने देखा हो । क्या देखती की देश न्याय, आलय से रहित हो गया है व् जिसे दंड देना न्यायसंगत हो वही दण्डपालक बने फिर रहे हैं ॥
दंड देउ कुल किए जहाँ,सासन संग सँजोग ।
चुनाउ अजोग कहि तहाँ, का भरोस के जोग ।२०६० ।
भावार्थ : -- जहाँ नययय आए..... हाँ न्याय -पालिक- कार्यपालिका आदि आदि गठ बंधन किए हुवे हों । क्या वहाँ के चुनाव आयोग की कही, उसके दिए आँकड़े भरोसे के योग्य हैं ?
बिधि मिले न बिधान मिले, मिले न कतहुँ न्याय ।२०५१ ।
भावार्थ : - रे शासन तेरा प्रबंधन ढूंडने से भी नहीं मिलता । कहीं विधि नहीं मिलती, कहीं विधान नहीं मिलता, कहीं न्याय नहीं मिलता ॥
दूषन दोष दुराचरन, सासकहि रहे पोस ।
नागरजन अधुना उठे, भरोस सोहि भरोस ।२०५२ ।
भावार्थ : -- शासक ही अपराधों का पोषण कर रहे हैं । हे नागरिकों अधुनातन विश्वास शब्द से ही विश्वास उठ गया ॥
जय 'माल' कू कंठ बरे, हार देइ परिहार ।
राजा जी आयसु करें संसद सदन पधार ।२०५३।
भावार्थ : -- यदि जीत को जनता का आदेश कहते हैं तो हार को क्या कहतें हैं ? हार को अस्वीकार कर जो प्रधान सेवक संसद-सदन में पधार कर आदेश करते हैं वे कृपया बताएं ॥
जोइ पालन जानि सोइ, जानै आयसु दान ।
अज्ञप्ति करन ते पहिले, आज्ञा पालन जान ।।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- जो आज्ञा का पालन करना जानते हैं वही आज्ञा देना जान सकते हैं ॥ पहले आदेशों का पालन करना सीखना चाहिए तत्पश्चात कोई आदेश देना चाहिए ॥
तो अब से जनता जनार्दन जो आदेश दे उसका पालन करो फिर किसी को कोई आदेश दो .....
न तो मानए बिग्यान न तो मानए ग्यान ।
जोइ तासु रचैता कहि मानि सोइ सविधान ।२०५४ ।
भावार्थ : -- न तो विज्ञान की मानता है न ज्ञान की मानता है । संविधान केवल अपने निर्माता की कही मानता है ॥
साजन सोए संग रहे, जो कहि किए किछु नाए ।
जो कहि बहु दोष किए सो बसती कहाँ बसाएँ ।२०५५ ।
भावार्थ : - सज्जनों वे लोग भी संग रहते हैं जो यह कहते हैं कि हमने तो कुछ भी नहीं किया ॥ जो यह कहते हैं कि हमने न जाने क्या क्या अपराध किया वो कहाँ बसें ॥
दण्डनीअ कर दंड लिए, सिंहासन आसीन ।
देउ कुल हीन देस मेँ , भयउ भयउ भयहीन ।२०५६ ।
भावार्थ : -- दंडनीय हाथ डंडा लिए सिंहासन पर विराजित हैं । न्यायालयों से रहित देश में भय भी भयहीन हो गया है अर्थात सब निर्भय हो गए हैं ॥
भला जो देखन मैं चला, भला न कोऊ पाए ।
अब कै को जननी जने कै धरती उपजाए ।२०५७ ।
भावार्थ : -- भला देखन 'मैं ' चला पर कोई भला नहीं मिला । अब या तो कोई लाल की माई जने या फिर धरती उगाए ॥
अधुने काल भारत जस , भयऊ दंडस्तान ।
देस निबासी दास भए, संबिधान की मान ।२०५८ ।
भावार्थ : -- आधुनिक युग में भारत सेना द्वारा शासित स्थान जैसा हो गया है । देश निवासी संविधान की मान मान के दास जैसे हो गए हैं ॥
भारत भूमि दरस रही, कलजुग के पाखंड ।
दंड देउ कुल भए बकुल, दंड जोग दएँ दंड ।२०५९ ।
भावार्थ : -- भारत की भूमि कलयुग के ऐसे पाखंड देख रही है जो कदाचित ही किसी ने देखा हो । क्या देखती की देश न्याय, आलय से रहित हो गया है व् जिसे दंड देना न्यायसंगत हो वही दण्डपालक बने फिर रहे हैं ॥
दंड देउ कुल किए जहाँ,सासन संग सँजोग ।
चुनाउ अजोग कहि तहाँ, का भरोस के जोग ।२०६० ।
भावार्थ : -- जहाँ नययय आए..... हाँ न्याय -पालिक- कार्यपालिका आदि आदि गठ बंधन किए हुवे हों । क्या वहाँ के चुनाव आयोग की कही, उसके दिए आँकड़े भरोसे के योग्य हैं ?
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