रविवार, 23 नवंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २०५ ॥ -----

सासन तेरा प्रबंधन, हे रे हेर न पाए । 
बिधि मिले न बिधान मिले, मिले न कतहुँ न्याय ।२०५१ । 
भावार्थ : - रे शासन तेरा प्रबंधन ढूंडने से भी नहीं मिलता । कहीं विधि नहीं मिलती, कहीं विधान नहीं मिलता, कहीं न्याय नहीं मिलता ॥ 

दूषन दोष दुराचरन, सासकहि रहे पोस । 
नागरजन अधुना  उठे, भरोस सोहि भरोस ।२०५२ । 
भावार्थ : --  शासक ही अपराधों का पोषण कर रहे हैं । हे नागरिकों अधुनातन विश्वास शब्द से ही विश्वास उठ गया ॥ 

जय 'माल' कू कंठ बरे, हार देइ परिहार । 
राजा जी आयसु करें संसद सदन पधार ।२०५३। 
भावार्थ : -- यदि जीत को जनता का आदेश कहते हैं तो हार को क्या कहतें हैं ? हार को अस्वीकार  कर  जो प्रधान सेवक संसद-सदन में पधार कर आदेश करते हैं वे कृपया बताएं ॥ 

जोइ पालन जानि सोइ, जानै आयसु दान । 
अज्ञप्ति करन ते पहिले, आज्ञा पालन जान  ।। 
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- जो आज्ञा का पालन करना जानते हैं वही आज्ञा देना जान सकते हैं ॥ पहले आदेशों का पालन करना सीखना चाहिए तत्पश्चात कोई आदेश देना चाहिए ॥ 

तो अब से जनता जनार्दन जो आदेश दे उसका पालन करो फिर किसी को कोई आदेश दो .....

न तो मानए बिग्यान न तो मानए ग्यान । 
जोइ तासु रचैता कहि  मानि सोइ सविधान ।२०५४ । 
भावार्थ : -- न तो विज्ञान की मानता है न ज्ञान की मानता है । संविधान केवल अपने निर्माता की कही मानता है ॥ 

 साजन सोए संग रहे, जो कहि किए किछु नाए ।
जो कहि बहु दोष किए सो  बसती कहाँ बसाएँ ।२०५५ । 
भावार्थ : - सज्जनों वे लोग भी संग रहते हैं जो यह कहते हैं कि हमने तो कुछ भी नहीं किया ॥ जो यह कहते हैं कि हमने न जाने क्या क्या अपराध किया वो कहाँ बसें ॥ 

दण्डनीअ कर दंड लिए, सिंहासन आसीन । 
 देउ कुल हीन देस मेँ , भयउ भयउ भयहीन ।२०५६ । 
भावार्थ : -- दंडनीय हाथ डंडा लिए सिंहासन पर विराजित हैं । न्यायालयों से रहित देश में भय भी भयहीन हो गया है अर्थात सब निर्भय हो गए हैं ॥ 

भला जो  देखन मैं चला, भला न कोऊ पाए । 

अब कै को जननी जने  कै धरती उपजाए ।२०५७ । 
भावार्थ : -- भला देखन 'मैं ' चला पर कोई भला नहीं  मिला । अब या तो कोई लाल की माई जने या फिर धरती उगाए ॥ 

अधुने काल भारत जस , भयऊ दंडस्तान । 
देस निबासी दास भए, संबिधान की मान ।२०५८ । 
भावार्थ : -- आधुनिक युग में भारत सेना द्वारा शासित स्थान जैसा हो गया है । देश निवासी संविधान की मान मान के दास जैसे हो गए हैं ॥ 

भारत भूमि दरस रही, कलजुग के पाखंड । 
दंड देउ कुल भए बकुल, दंड जोग दएँ दंड ।२०५९ । 
भावार्थ : -- भारत की भूमि कलयुग के ऐसे पाखंड देख रही है जो कदाचित ही किसी ने देखा हो । क्या देखती की देश न्याय, आलय से रहित हो गया है व् जिसे दंड देना न्यायसंगत हो वही दण्डपालक बने फिर रहे हैं ॥

दंड देउ कुल किए जहाँ,सासन संग सँजोग । 
चुनाउ अजोग कहि तहाँ, का भरोस के जोग ।२०६० । 
भावार्थ : -- जहाँ नययय आए..... हाँ न्याय -पालिक- कार्यपालिका आदि आदि गठ बंधन किए हुवे हों । क्या वहाँ के चुनाव  आयोग की कही, उसके दिए आँकड़े भरोसे के योग्य हैं ? 









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