चिंदी के जो दान किए चोरे थान के थान ।
कहता दाता दातारा, नहि को मोहि समान ।२०४१।
भावार्थ : -- थान की थान चोर के जो चिंदी दान करता है वह दाता कहता फिर रहा है मेरे जैसा दातार तो कोई दुनिया में नहीं है ॥
सकल हरिआरि खाए के, चार कनक दिए दान ।
कहता दाता दातारा, नहि को मोहि समान ।२०४२ ।
भावार्थ : -- सारी हरियाली खा के जो चार दाने दान देता है । वह दाता कहता फिर रहा है मेरे जैसा दातार तो कोई दुनिया में नहीं है ॥
पँखी केहु छत छीन के, बैठे ऊँचे थान ।
कहता दाता दातारा, नहि को मोहि समान ।२०४३।
भावार्थ : -- पक्षियों तक के घरौंदे छीन के जो ऊँचे स्थान बैठा । वह दाता कहता फिर रहा है मेरे जैसा दातार तो कोई दुनिया में नहीं है ॥
जनिमन करे करम धरम , पितुजन भाग बँधाए ।
जो सत्कर्म पितुजन किए , जनिमन भाजक नाए ।२०४४।
भावार्थ : -- संतति द्वारा किए सत्कर्म पितृजनों को प्राप्त होते है । पितृजन द्वारा सत्कर्म पर संतति का अधिकार नहीं होता ॥
दुखियारे संसार मेँ, सुख की सबको चाह ।
बिषय भोग के लाह सों, चाहिये केहु नाह ।२०४५ ।
भावार्थ : --दुख के आयतन संसार में सुख की तो सभी चाह करते हैं । किन्तु भोगों की लालसा सम्मुख हो तो सुख किसी को नहीं चाहिए ॥
अर्थात : ---भोगों की लालसा सुख पर भारी पड़ जाती है.....
सुखी जगत को दुखिआ कहत, सुख को सब जन रोए ।
भोग बिषय परिहार के, जीवन सुखमय होए ।२०४६ ।
भावार्थ : - समस्त लौकिक सुखों से युक्त इस संसार को दुखयातन कहकर सुख की सभी जन आस करते रहते हैं । किन्तु भोगों का त्याग किए बिना जीवन सुखमय नहीं होता ॥
बदलो बदलो कह फिरै, बदलन की लगि हाए ।
सोइ संसद सोइ सदन, बदला तो किछु नाए । २०४७ ।
भावार्थ : -- बदलो बदलो कहते फिरे, बदलने की ऐसी हाय लगी कि लेन लगा लगा के बदले ॥ किन्तु भाई मेरे वही संसद है,वही दो सदन हैं, न्यूनाधिक वही सदस्य हैं, वही भाषण है,वही वचन है,वही भ्रष्टाचरण है । बोलो क्या बदला.....बोलोओओओओ.....कुछ नहीं बदला.....ऐसे नहीं बदलेंगे ये लोग.....
मैं पापी बहुंत बुरा न, मो सम कोउ असंत ।
आए बाँध सो ले जाए, जो हो साँचा संत ।२०४८।
भावार्थ : - ये जो मैं है वह पापी बहुंत ही बुरा है उस मैं में मैं भी सम्मिलित हूँ , मेरे जैसा असंत कोई नहीं । जो सच्चा संत है सदाचारी है कतई भला है, वह आए , बांध के ले जाए । जो सज्जन है सदाचारी है वो दंड दे ।
देखे तो सही ऐसे सच्चे संत सज्जन भले मंस दिखते कैसे हैं.....
भारत के सविधान मैं, बहुतक चोर दुआरि ।
तहँ सो पैठ हारिहु भए, संसद के अधिकारि ।२०४९ ।
भावार्थ : -- रचयिता ने भारतीय संविधान में बहुंत से चोर दरवाजे बनाए हैं । दूसरों की क्या कहें वहां से घूस के हारे हुवे भी संसद के योग्य हो जाते है एवं बड़े बड़े नियम बनाते हैं ॥
जैसे : - चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए
चोर द्वारि = चोरों के आने-जाने का द्वार
कहे कथन हित आपना, पल मैं होत बिहान ।
पर सुभासित बचन रहे, सदैव आयुष्मान ।२०५० ।
भावार्थ : -- स्वहितार्थ व् स्वार्थ पूर्ति हेतु कहे गए कथन क्षणभंगुर होते हैं । विश्व के कल्याण हेतु कहे गए सुभाषित वचन चिरंजीवी रहते हैं ॥
कहता दाता दातारा, नहि को मोहि समान ।२०४१।
भावार्थ : -- थान की थान चोर के जो चिंदी दान करता है वह दाता कहता फिर रहा है मेरे जैसा दातार तो कोई दुनिया में नहीं है ॥
सकल हरिआरि खाए के, चार कनक दिए दान ।
कहता दाता दातारा, नहि को मोहि समान ।२०४२ ।
भावार्थ : -- सारी हरियाली खा के जो चार दाने दान देता है । वह दाता कहता फिर रहा है मेरे जैसा दातार तो कोई दुनिया में नहीं है ॥
पँखी केहु छत छीन के, बैठे ऊँचे थान ।
कहता दाता दातारा, नहि को मोहि समान ।२०४३।
भावार्थ : -- पक्षियों तक के घरौंदे छीन के जो ऊँचे स्थान बैठा । वह दाता कहता फिर रहा है मेरे जैसा दातार तो कोई दुनिया में नहीं है ॥
जनिमन करे करम धरम , पितुजन भाग बँधाए ।
जो सत्कर्म पितुजन किए , जनिमन भाजक नाए ।२०४४।
भावार्थ : -- संतति द्वारा किए सत्कर्म पितृजनों को प्राप्त होते है । पितृजन द्वारा सत्कर्म पर संतति का अधिकार नहीं होता ॥
दुखियारे संसार मेँ, सुख की सबको चाह ।
बिषय भोग के लाह सों, चाहिये केहु नाह ।२०४५ ।
भावार्थ : --दुख के आयतन संसार में सुख की तो सभी चाह करते हैं । किन्तु भोगों की लालसा सम्मुख हो तो सुख किसी को नहीं चाहिए ॥
अर्थात : ---भोगों की लालसा सुख पर भारी पड़ जाती है.....
सुखी जगत को दुखिआ कहत, सुख को सब जन रोए ।
भोग बिषय परिहार के, जीवन सुखमय होए ।२०४६ ।
भावार्थ : - समस्त लौकिक सुखों से युक्त इस संसार को दुखयातन कहकर सुख की सभी जन आस करते रहते हैं । किन्तु भोगों का त्याग किए बिना जीवन सुखमय नहीं होता ॥
बदलो बदलो कह फिरै, बदलन की लगि हाए ।
सोइ संसद सोइ सदन, बदला तो किछु नाए । २०४७ ।
भावार्थ : -- बदलो बदलो कहते फिरे, बदलने की ऐसी हाय लगी कि लेन लगा लगा के बदले ॥ किन्तु भाई मेरे वही संसद है,वही दो सदन हैं, न्यूनाधिक वही सदस्य हैं, वही भाषण है,वही वचन है,वही भ्रष्टाचरण है । बोलो क्या बदला.....बोलोओओओओ.....कुछ नहीं बदला.....ऐसे नहीं बदलेंगे ये लोग.....
मैं पापी बहुंत बुरा न, मो सम कोउ असंत ।
आए बाँध सो ले जाए, जो हो साँचा संत ।२०४८।
भावार्थ : - ये जो मैं है वह पापी बहुंत ही बुरा है उस मैं में मैं भी सम्मिलित हूँ , मेरे जैसा असंत कोई नहीं । जो सच्चा संत है सदाचारी है कतई भला है, वह आए , बांध के ले जाए । जो सज्जन है सदाचारी है वो दंड दे ।
देखे तो सही ऐसे सच्चे संत सज्जन भले मंस दिखते कैसे हैं.....
भारत के सविधान मैं, बहुतक चोर दुआरि ।
तहँ सो पैठ हारिहु भए, संसद के अधिकारि ।२०४९ ।
भावार्थ : -- रचयिता ने भारतीय संविधान में बहुंत से चोर दरवाजे बनाए हैं । दूसरों की क्या कहें वहां से घूस के हारे हुवे भी संसद के योग्य हो जाते है एवं बड़े बड़े नियम बनाते हैं ॥
जैसे : - चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए
चोर द्वारि = चोरों के आने-जाने का द्वार
कहे कथन हित आपना, पल मैं होत बिहान ।
पर सुभासित बचन रहे, सदैव आयुष्मान ।२०५० ।
भावार्थ : -- स्वहितार्थ व् स्वार्थ पूर्ति हेतु कहे गए कथन क्षणभंगुर होते हैं । विश्व के कल्याण हेतु कहे गए सुभाषित वचन चिरंजीवी रहते हैं ॥
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