गुरुवार, 20 नवंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २०४ ॥ -----

चिंदी के जो दान किए चोरे थान के थान । 
कहता दाता  दातारा, नहि को मोहि समान ।२०४१। 
भावार्थ : --  थान की थान  चोर के जो चिंदी  दान करता है  वह दाता कहता फिर रहा है मेरे जैसा दातार तो कोई दुनिया में नहीं है ॥ 

सकल हरिआरि खाए के, चार कनक दिए दान । 
कहता दाता  दातारा, नहि को मोहि समान ।२०४२ । 
भावार्थ : -- सारी हरियाली खा के जो चार दाने दान देता है । वह दाता कहता फिर रहा है मेरे जैसा दातार तो कोई दुनिया में नहीं है ॥  

पँखी केहु छत छीन के, बैठे ऊँचे थान ।  
कहता दाता  दातारा, नहि को मोहि समान ।२०४३। 
भावार्थ : -- पक्षियों तक के घरौंदे छीन के जो ऊँचे स्थान बैठा  ।  वह दाता कहता फिर रहा है मेरे जैसा दातार तो कोई दुनिया में नहीं है ॥  

जनिमन करे करम धरम , पितुजन भाग बँधाए । 
जो सत्कर्म पितुजन किए  , जनिमन भाजक नाए ।२०४४।  
भावार्थ : -- संतति  द्वारा किए सत्कर्म पितृजनों को प्राप्त होते है । पितृजन द्वारा  सत्कर्म पर संतति का अधिकार नहीं होता ॥ 

दुखियारे संसार मेँ, सुख की सबको चाह । 
बिषय भोग के लाह सों, चाहिये केहु नाह ।२०४५ । 
भावार्थ : --दुख के आयतन संसार में सुख की तो सभी चाह करते हैं । किन्तु भोगों  की लालसा सम्मुख हो तो सुख किसी को नहीं चाहिए ॥ 

अर्थात : ---भोगों की लालसा सुख पर भारी पड़ जाती है.....

सुखी जगत को दुखिआ कहत, सुख को सब जन रोए । 
भोग बिषय परिहार के, जीवन सुखमय होए ।२०४६ । 
भावार्थ : - समस्त लौकिक सुखों से युक्त इस संसार को दुखयातन कहकर सुख की सभी जन आस करते रहते हैं । किन्तु भोगों का त्याग किए बिना जीवन सुखमय नहीं होता ॥ 

बदलो बदलो कह फिरै, बदलन की लगि हाए । 
सोइ संसद सोइ सदन, बदला तो किछु नाए । २०४७ । 
भावार्थ : -- बदलो बदलो कहते फिरे, बदलने की ऐसी हाय लगी कि  लेन लगा  लगा के बदले ॥ किन्तु भाई मेरे वही संसद है,वही दो सदन हैं, न्यूनाधिक वही सदस्य हैं, वही भाषण है,वही वचन है,वही भ्रष्टाचरण है । बोलो क्या बदला.....बोलोओओओओ.....कुछ नहीं बदला.....ऐसे नहीं बदलेंगे ये लोग.....    

मैं पापी बहुंत बुरा न, मो सम कोउ असंत । 
आए बाँध सो ले जाए, जो हो साँचा संत ।२०४८। 
भावार्थ : - ये जो मैं है वह पापी  बहुंत ही बुरा है उस मैं में मैं भी सम्मिलित हूँ , मेरे जैसा असंत कोई नहीं । जो सच्चा संत है सदाचारी है कतई भला है, वह आए , बांध के ले जाए । जो सज्जन है सदाचारी है वो दंड दे । 

देखे तो सही ऐसे सच्चे संत सज्जन भले मंस दिखते कैसे हैं..... 

भारत के सविधान मैं, बहुतक चोर दुआरि । 
तहँ सो पैठ हारिहु भए, संसद के अधिकारि ।२०४९ । 
भावार्थ : -- रचयिता ने भारतीय संविधान में बहुंत से चोर दरवाजे बनाए हैं । दूसरों की क्या कहें वहां से घूस के हारे हुवे भी संसद के योग्य हो जाते है एवं बड़े बड़े नियम बनाते हैं ॥ 

जैसे : - चमड़ी जाए पर दमड़ी  न जाए  
चोर द्वारि = चोरों के आने-जाने का द्वार 

कहे कथन हित आपना, पल मैं होत बिहान । 
पर सुभासित बचन रहे, सदैव आयुष्मान ।२०५० । 
भावार्थ : -- स्वहितार्थ व् स्वार्थ पूर्ति हेतु कहे गए कथन क्षणभंगुर होते हैं ।  विश्व के कल्याण हेतु कहे गए सुभाषित वचन चिरंजीवी रहते हैं ॥ 

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