देखो नोखे लाल की नोखी नोखी बात ।
होत जात किछुहू नहीं, काज करे दिनुरात ।२०३१ ।
भावार्थ : -- अनोखो लाल की अनोखी अनोखी बातों को तो देखो ( अनोखेलाल की बातें सुनी नहीं जाती.....देखि जाती हैं ) होता जाता कुछ भी नहीं, काम दिनरात करते हैं ॥
रानी जी के राज कू , काज तुला लिए तोल ।
करना धरना कुछ नहीं, बड़े बड़े हैं बोल ।२०३२।
भावार्थ : -- पहले राजाओं का राज देखा अब रानियों का देख,
दलगत चुनाव प्रणाली के गुण दोषों पर विचार कर यह निष्कर्ष निकला कि करना धरना इन्हें कुछ नहीं किया धरा को बिगाड़ना ॥
निष्कर्ष यह की भरतीय सविंधान में विहित दलगत चुनाव प्रणाली समस्यों के समाधान करने में अक्षम सिद्ध हो रही हैं.....
करे भंडारि भंडिरे, कभु दाहिन कभु बाम ।
दरसन हारु को लागे, करता बहुंतहि काम ।२०३३ ।
भावार्थ : -- ब्योपारी बड़ा चल्लाक है इधर के बर्तन उधर करता रहता है । देखने वाले को क्या लगता है रे बहुत काम करता है ॥
कथनी के ढेरी लगे, करनी पड़े अकाल ।
समस्या सुरसा मुख सम रूप गहे बिकराल ।२०३४ ।
भावार्थ : -- कथनी का ढेर लग गया है, करनी का अकाल पड़ा हुवा है । रावण-राज में समस्याओं ने सुरसा मुख के जैसे विकराल रूप धारण कर लिया है ॥
कहुँ धूतकृति कुनीति कहुँ भ्रष्टाचरन अथाह ।
समस्या मुँह बाए खड़ी, समाधान की चाह ।२०३५ ।
भावार्थ : -- कहीं झुठाई है तो कहीं दुर्नीतियां हैं कहीं अथाह भ्रष्टाचरण है । कहीं समाधान की चाह में समस्याएँ मुंह बाए खड़ी हैं, शील सदाचरण है की दिखाई नहीं देता ॥
सासन सन न्यायायन , करेँ देस पर राज ।
ब्यापत आपद सब कहुँ, चौहट कर ब्याज ।२०३६ ।
भवार्थ : -- रावण राज कैसे हैं ? ऐसे है : -- शासन-प्रबंधन व् न्यायपालिका एक होकर सत्ता का सुख भी भोग रहे हैं एवं जन-धन की हानिकर संकट को चारों ओर व्यापत करते हुवे निर्भीक होकर कदाचरण भी कर रहे हैं,जो रावण-राज का सूचक है ॥
२०१४ का महाजनादेश का अध्ययन किया जाए तो निष्कर्ष यही निकलता है कि भारतीय जान मानस इस दलगत चुनाव प्रणाली से विरक्त हो चला है यह जैसे दलगत व्यवस्था हेतु अंतरिमादेश प्रतीत होता है.....
अजहुँ त कालहि काल है, मति कर करनि अकाल ।
करता करतब का करिए, होइहि सहुँ जब काल । २०३७ ।
भावार्थ : - अभी तो समय ही समय है रे कर्त्ता ! करनी का अकाल मत कर । तब कार्य- कुशलता क्या करेगी जब तुम्हारा अंत तुम्हारे सम्मुख होगा ॥
जिअहि दस पाँच बरस बस,होइहि पलक बिहान ।
कलप अंत अनुमान किए, करें सकल अभिमान ।२०३८ ।
भावार्थ : -- केवल दस पांच बरसों का ही जीना है, लोग कल्पनाओं की सीमाओं के परे तक जीने का अनुमान कर अपने आप पर घमंड करते हैं जीवन का अंत तो पलभर में ही हो जाता है, अत: कभी समय मत मांगो ॥ ॥
बिलास भवन निबास के, होत बड़प्पन नाए ।
जासु निलयन भवन बड़े, बड़ा सोए कहलाए ।२०३९।
भावार्थ : -- विलास भवनों इन निवास करने से बड़प्पन नहीं होता । जिसका हृदय भवन बड़ा हो बड़ा वही कहलाता है ॥
होत जात किछुहू नहीं, काज करे दिनुरात ।२०३१ ।
भावार्थ : -- अनोखो लाल की अनोखी अनोखी बातों को तो देखो ( अनोखेलाल की बातें सुनी नहीं जाती.....देखि जाती हैं ) होता जाता कुछ भी नहीं, काम दिनरात करते हैं ॥
रानी जी के राज कू , काज तुला लिए तोल ।
करना धरना कुछ नहीं, बड़े बड़े हैं बोल ।२०३२।
भावार्थ : -- पहले राजाओं का राज देखा अब रानियों का देख,
दलगत चुनाव प्रणाली के गुण दोषों पर विचार कर यह निष्कर्ष निकला कि करना धरना इन्हें कुछ नहीं किया धरा को बिगाड़ना ॥
निष्कर्ष यह की भरतीय सविंधान में विहित दलगत चुनाव प्रणाली समस्यों के समाधान करने में अक्षम सिद्ध हो रही हैं.....
करे भंडारि भंडिरे, कभु दाहिन कभु बाम ।
दरसन हारु को लागे, करता बहुंतहि काम ।२०३३ ।
भावार्थ : -- ब्योपारी बड़ा चल्लाक है इधर के बर्तन उधर करता रहता है । देखने वाले को क्या लगता है रे बहुत काम करता है ॥
कथनी के ढेरी लगे, करनी पड़े अकाल ।
समस्या सुरसा मुख सम रूप गहे बिकराल ।२०३४ ।
भावार्थ : -- कथनी का ढेर लग गया है, करनी का अकाल पड़ा हुवा है । रावण-राज में समस्याओं ने सुरसा मुख के जैसे विकराल रूप धारण कर लिया है ॥
कहुँ धूतकृति कुनीति कहुँ भ्रष्टाचरन अथाह ।
समस्या मुँह बाए खड़ी, समाधान की चाह ।२०३५ ।
भावार्थ : -- कहीं झुठाई है तो कहीं दुर्नीतियां हैं कहीं अथाह भ्रष्टाचरण है । कहीं समाधान की चाह में समस्याएँ मुंह बाए खड़ी हैं, शील सदाचरण है की दिखाई नहीं देता ॥
सासन सन न्यायायन , करेँ देस पर राज ।
ब्यापत आपद सब कहुँ, चौहट कर ब्याज ।२०३६ ।
भवार्थ : -- रावण राज कैसे हैं ? ऐसे है : -- शासन-प्रबंधन व् न्यायपालिका एक होकर सत्ता का सुख भी भोग रहे हैं एवं जन-धन की हानिकर संकट को चारों ओर व्यापत करते हुवे निर्भीक होकर कदाचरण भी कर रहे हैं,जो रावण-राज का सूचक है ॥
२०१४ का महाजनादेश का अध्ययन किया जाए तो निष्कर्ष यही निकलता है कि भारतीय जान मानस इस दलगत चुनाव प्रणाली से विरक्त हो चला है यह जैसे दलगत व्यवस्था हेतु अंतरिमादेश प्रतीत होता है.....
अजहुँ त कालहि काल है, मति कर करनि अकाल ।
करता करतब का करिए, होइहि सहुँ जब काल । २०३७ ।
भावार्थ : - अभी तो समय ही समय है रे कर्त्ता ! करनी का अकाल मत कर । तब कार्य- कुशलता क्या करेगी जब तुम्हारा अंत तुम्हारे सम्मुख होगा ॥
जिअहि दस पाँच बरस बस,होइहि पलक बिहान ।
कलप अंत अनुमान किए, करें सकल अभिमान ।२०३८ ।
भावार्थ : -- केवल दस पांच बरसों का ही जीना है, लोग कल्पनाओं की सीमाओं के परे तक जीने का अनुमान कर अपने आप पर घमंड करते हैं जीवन का अंत तो पलभर में ही हो जाता है, अत: कभी समय मत मांगो ॥ ॥
बिलास भवन निबास के, होत बड़प्पन नाए ।
जासु निलयन भवन बड़े, बड़ा सोए कहलाए ।२०३९।
भावार्थ : -- विलास भवनों इन निवास करने से बड़प्पन नहीं होता । जिसका हृदय भवन बड़ा हो बड़ा वही कहलाता है ॥
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