जोइ पालन जानि सोइ, जानै आयसु दान ।
अज्ञप्ति करन ते पहिले, आज्ञा पालन जान ।२०९१ ।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- जो आज्ञा का पालन करना जानते हैं वही आज्ञा देना जान सकते हैं ॥ पहले आदेशों का पालन करना सीखना चाहिए ततपश्चात कोई आदेश अथवा निर्देश देना चाहिए ॥
तो अब से जनता जनार्दन जो आदेश दे उसका पालन करो फिर किसी को कोई आदेश दो .....
जग मैं अपने आप कू, समुझैं सबहि महान ।
प्रतिपालन कू छाँड़ के, कूदे नेम गठान ।२०९२ ।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- संसार में सभी स्वयं को महान समझते हुवे नियमों का प्रतिपालन त्याग कर नियम गढ़ने के लिए कूदे जा रहे हैं सारे नेता बनना चाहते हैं ॥
आज्ञा पालन के बिना एकसूत्रता सम्भव नहीं होती.....
सेवक सरिस सेवक तो, जग मह बहुतक आहि ।
स्वामी सरिस स्वामी, अगजग लग को नाहि ।२०९३ ।
----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ : -- ऐसे सेवकों के समान सेवक तो संसार में बहुंत मिल जाएंगे । किन्तु भारत की जनता जनार्दन के जैसा स्वामी संसार भर में कहीं नहीं हैं ।
छनु भंगुरा प्रपंच है, जीवन कवन अधार ।
खाट पड़े जिन् पछताहु तिन कृत पहिले कार ।२०९४ ।
------ ॥ विदुर नीति ॥ -----
येन खट्वां समारूढ: परितप्येत कर्मणा ।
आदावेव न तत् कुर्यादध्रुवे जीविते सति ॥ २९ ॥
भावार्थ : -- जगत का प्रपंच क्षणभंगुर है तो उसके सम्मुख इस जीवन का क्या ठिकाना।अत: वे कार्य पहले कर लेने चाहिए जिन्हें न करने पर बाद में खट्वा में पड़कर पश्चाताप करना पड़े ॥
चित्त के संगत चित्त मिले रहस रहस के संग ।
बुद्धि संगत बुद्धि मिले, मितता होत न भंग ।२०९५।
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- यदि चित्त के संग चित्त, रहस्यों के संग रहस्य, बुद्धि के संग बुद्धि का सुसंयोग हो तो मैत्री कभी भंग नहीं होती ।
बुद्धि बिद्या धर्म बय, जोइ बड़ापन पाए ।
कृताकृत के पूछ करै, कबहु न मोह सताए ।२०९६।
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- जो बुद्धि,धर्म, विद्या व् अवस्था में बड़े से आदर सहित कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य से संबंधित प्रश्न करता है वह कभी मोह में नहीं पड़ता ॥
जीवन नदि दया तरंग सत्कृत तीरथ थान ।
धृतिकूल असनात सदा, होत पबित पुनबान ।२०९७।
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- भारत ! यह जीवात्मा एक नदी है सत्य स्वरूप परमात्मा से इसका उद्गम हुवा है धर्य ही इसके दो तट हैं जिसमें दया की तरंगे उठती हैं, पुण्य-कर्ता मनुष्य इसमें स्नान करके पवित्र होता है क्योंकि लोभ रहित आत्मा सदा पवित्र ही होती है ॥
फल भव मोचन सों पाए चरन भगवान ।
एहि बिधि धन के एकै फल,धर्म हेतु अनुठान ।२१५५।
----- ॥ श्रीमद भगवद् पुराण १ । २ । ९-१० । ॥ -----
भावार्थ : -- धर्म का फल ही संसार के बंधनों से मुक्ति व् ईश्वर की प्राप्ति । इससे कुछ सांसारिक विभूतियां उपार्जित कर ली तो यह धर्म की सफलता नहीं है । इसी प्रकार धन का एकमात्र फल है -- धर्म का अनुष्ठान; वह न करके इससे यदि विलास सामग्रियाँ एकत्र कर लीं तो वह कोई सफलता नहीं ॥
जाकी हार न चाहिबे, वाके हुँत कल्यान ।
खल हो कि भल सकल बचन, बिन पूछे दे कान ।२१५६।
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- मनुष्य को चाहिए कि वह जिसकी पराजय नहीं चाहता है, उसको बिना पूछे कल्याणकारी अथवा अनिष्ठाशंसी भली-बुरी जो भी बात हो उससे कह दे ॥
काल कलुषित सम्पद सों ढकै नहीं को पाप ।
ऐसो ढकनी उभारै अबर अबर संताप ।२१५७।
----- ॥ विदुर-नीति ॥ -----
भावार्थ : -- अनुचित मार्ग से प्राप्त हुवे धन के द्वारा कोई दोष नहीं छिपता । ऐसे छिपाव के प्रयास से अन्यान्य दोष प्रकट हो जाते हैं ॥
जितेन्द्रिय के सासक गुरु, खलमन को जन पाल ।
छिपे छिपे जो पाप किए, तिनके सासक काल ।२१५८।
----- ॥ विदुर -नीति ॥ -----
भावार्थ : -- जिंतेंद्रिय पुरुष का शासक गुरु होता है । दुष्टों का शासक राजा होता है सेवक नहीं ॥ जो गुप्त रीति से दोष कारित करते हैं उनका शासक यमराज होता है ॥
स्वाध्ययन सत्योधन धरम करम करताए ।
संतापित तापस चरन बिहनै सुख बरधाए ॥ ३२६० ॥
----- ॥ विदूर नीति ॥ -----
भावार्थ : - आवृत्ति पूर्वक अध्ययन, न्यायोचित युद्ध, पुण्यकर्म व् संतप्त तपस्या से अंत में सुख की वृद्धि होती है ॥
अज्ञप्ति करन ते पहिले, आज्ञा पालन जान ।२०९१ ।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- जो आज्ञा का पालन करना जानते हैं वही आज्ञा देना जान सकते हैं ॥ पहले आदेशों का पालन करना सीखना चाहिए ततपश्चात कोई आदेश अथवा निर्देश देना चाहिए ॥
तो अब से जनता जनार्दन जो आदेश दे उसका पालन करो फिर किसी को कोई आदेश दो .....
जग मैं अपने आप कू, समुझैं सबहि महान ।
प्रतिपालन कू छाँड़ के, कूदे नेम गठान ।२०९२ ।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- संसार में सभी स्वयं को महान समझते हुवे नियमों का प्रतिपालन त्याग कर नियम गढ़ने के लिए कूदे जा रहे हैं सारे नेता बनना चाहते हैं ॥
आज्ञा पालन के बिना एकसूत्रता सम्भव नहीं होती.....
सेवक सरिस सेवक तो, जग मह बहुतक आहि ।
स्वामी सरिस स्वामी, अगजग लग को नाहि ।२०९३ ।
----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ : -- ऐसे सेवकों के समान सेवक तो संसार में बहुंत मिल जाएंगे । किन्तु भारत की जनता जनार्दन के जैसा स्वामी संसार भर में कहीं नहीं हैं ।
छनु भंगुरा प्रपंच है, जीवन कवन अधार ।
खाट पड़े जिन् पछताहु तिन कृत पहिले कार ।२०९४ ।
------ ॥ विदुर नीति ॥ -----
येन खट्वां समारूढ: परितप्येत कर्मणा ।
आदावेव न तत् कुर्यादध्रुवे जीविते सति ॥ २९ ॥
भावार्थ : -- जगत का प्रपंच क्षणभंगुर है तो उसके सम्मुख इस जीवन का क्या ठिकाना।अत: वे कार्य पहले कर लेने चाहिए जिन्हें न करने पर बाद में खट्वा में पड़कर पश्चाताप करना पड़े ॥
चित्त के संगत चित्त मिले रहस रहस के संग ।
बुद्धि संगत बुद्धि मिले, मितता होत न भंग ।२०९५।
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- यदि चित्त के संग चित्त, रहस्यों के संग रहस्य, बुद्धि के संग बुद्धि का सुसंयोग हो तो मैत्री कभी भंग नहीं होती ।
बुद्धि बिद्या धर्म बय, जोइ बड़ापन पाए ।
कृताकृत के पूछ करै, कबहु न मोह सताए ।२०९६।
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- जो बुद्धि,धर्म, विद्या व् अवस्था में बड़े से आदर सहित कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य से संबंधित प्रश्न करता है वह कभी मोह में नहीं पड़ता ॥
जीवन नदि दया तरंग सत्कृत तीरथ थान ।
धृतिकूल असनात सदा, होत पबित पुनबान ।२०९७।
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- भारत ! यह जीवात्मा एक नदी है सत्य स्वरूप परमात्मा से इसका उद्गम हुवा है धर्य ही इसके दो तट हैं जिसमें दया की तरंगे उठती हैं, पुण्य-कर्ता मनुष्य इसमें स्नान करके पवित्र होता है क्योंकि लोभ रहित आत्मा सदा पवित्र ही होती है ॥
फल भव मोचन सों पाए चरन भगवान ।
एहि बिधि धन के एकै फल,धर्म हेतु अनुठान ।२१५५।
----- ॥ श्रीमद भगवद् पुराण १ । २ । ९-१० । ॥ -----
भावार्थ : -- धर्म का फल ही संसार के बंधनों से मुक्ति व् ईश्वर की प्राप्ति । इससे कुछ सांसारिक विभूतियां उपार्जित कर ली तो यह धर्म की सफलता नहीं है । इसी प्रकार धन का एकमात्र फल है -- धर्म का अनुष्ठान; वह न करके इससे यदि विलास सामग्रियाँ एकत्र कर लीं तो वह कोई सफलता नहीं ॥
जाकी हार न चाहिबे, वाके हुँत कल्यान ।
खल हो कि भल सकल बचन, बिन पूछे दे कान ।२१५६।
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- मनुष्य को चाहिए कि वह जिसकी पराजय नहीं चाहता है, उसको बिना पूछे कल्याणकारी अथवा अनिष्ठाशंसी भली-बुरी जो भी बात हो उससे कह दे ॥
काल कलुषित सम्पद सों ढकै नहीं को पाप ।
ऐसो ढकनी उभारै अबर अबर संताप ।२१५७।
----- ॥ विदुर-नीति ॥ -----
भावार्थ : -- अनुचित मार्ग से प्राप्त हुवे धन के द्वारा कोई दोष नहीं छिपता । ऐसे छिपाव के प्रयास से अन्यान्य दोष प्रकट हो जाते हैं ॥
जितेन्द्रिय के सासक गुरु, खलमन को जन पाल ।
छिपे छिपे जो पाप किए, तिनके सासक काल ।२१५८।
----- ॥ विदुर -नीति ॥ -----
भावार्थ : -- जिंतेंद्रिय पुरुष का शासक गुरु होता है । दुष्टों का शासक राजा होता है सेवक नहीं ॥ जो गुप्त रीति से दोष कारित करते हैं उनका शासक यमराज होता है ॥
को वस्तु नहि आपनी,जहँ न होत को राए ।
मीन सरिस सब लोग तहँ लेइ परस्पर खाएँ ।२१५९।
-----॥ महर्षि वाल्मीकि ॥ -----
भावार्थ : -- जहाँ कोई राजा नहीं होता वहां कोई भी वस्तु अपनी नहीं होती, जहां कोई वस्तु अपनी न हो वहां शासन व्यवस्था नहीं होती । मछली की भांति वहां सब लोग एक दूसरे को खाने में लगे रहते हैं ॥ स्वाध्ययन सत्योधन धरम करम करताए ।
संतापित तापस चरन बिहनै सुख बरधाए ॥ ३२६० ॥
----- ॥ विदूर नीति ॥ -----
भावार्थ : - आवृत्ति पूर्वक अध्ययन, न्यायोचित युद्ध, पुण्यकर्म व् संतप्त तपस्या से अंत में सुख की वृद्धि होती है ॥
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