ताडन की अधिकारी सो, नारी कोई कोइ ।
ढोर गँवारु नीच पुरुष, अजहुँ त घर घर होइ ।२०११।
भावार्थ : - ताड़न की अधिकारी कोई विरलई ही होगी किन्तु समय ऐसा ला दिया गया कि अब तो ढोर, गँवार और नीच पुरुष घर घर में मिलने लगे हैं ॥
अजहुँ पुरुख जाति पहिले, खींचे आपनि रेख ।
मर्यादा निर्धार के, फिर नारी की लेख ।२०१२।
भावार्थ : -- अब तो पुरुष जाति पहले अपनी लक्ष्मण-रेखा खेंचे । ततपश्चात नारी की लेख कर उसकी मर्यादा निर्धरित करे ॥
अधुनै काल अस दूषित, होइ प्रुख की जाति ।
धर्म चरण न जानपनी, घनि परबंचनताति ।२०१३।
भावार्थ : -- इस आधुनिक काल में पुरुष-जाति ऐसी दूषित हो गई है कि वह न दया न दान न सत्य जानती है समझदारी तो किसी में रही ही नही, उसकी बुद्धि में मूर्खता का भाव और ठगी का धंधा बहुंत अधिक समां गया है ॥
कन्याओं को साड़ी पहने देखा होगा....क्या किसी युवा पुरुष को धोती पहने देखा है.....? हम नारी के वेश की चर्चा तो बहुंत करते हैं, पुरुष को भूल जाते हैं.....
अपनी कही कथनी मैं, आवै बहुंत सुवाद ।
दूजन के मुख की कही लगिहै सब बकवाद ।२०१४।
भावार्थ : -- अपनी कही बातों में तो बहुंत स्वाद आता है । दूसरों के मुख की कही हुई सारी बातें बकवास लगती हैं ॥
कबहुँ त इत की हाँक दिए, कबहुँ उत की हाँकि ।
तब बासुकि बिष तरे जब, जिह भयउ दुइ फाँकि ।२०१५ ।
भावार्थ : -- कभी तो इधर की हाँक देती है कभी उधर की हाँक देती है ।जिह्वा में तब विषधारी का विष उतर आता है जब वो दो फाड़ हो जाती है ॥
जिबिहा घर की भेदिआ, भेद रही सब खोल ।
अधर ताखड़ी भार धर, तोल मोल के बोल ।२०१६।
भावार्थ : -- जिह्वा घर की भेदी होती है वह सारे भेद खोल रही है । अधरों की ताखड़ी में बाट- बटखड़े रखकर पहले मोल कर फिर तोल कर तब फिर बोलना चाहिए ॥
सम्मति के दातार नै, कैसे कर मत दाए ।
बरन संकर बाढ़ बढ़इ, गो कुल बढ़ ना पाए ।२०१७।
भावार्थ : -- सम्मति के दातार कैसे हाथों में अपना मत दे दिया । यह मत वर्ण संकर की तो बाढ़ बढ़ाए चला जा रहा है, गोकुल की रोक रहा ही ॥
जाति धरम संकरज कू, जीवन समझ न आए ।
मरे परिजन फेंके की, दाहैं की गढ़ियाएँ ।२०१८।
भावार्थ : -- जाति व् धर्म संकर के जातक को जीवन समझ नहीं आता । कैसे ? ऐसे : -- परिजन मर गया.....उसका क्या करें..... फेंके की दाग दें की गढ़िया दें.....चलो गढ़िया दिया किन्तु कितनी बार गढ़ियाएं.....कहाँ कहाँ गढ़ियाएं.....
जीवन मरनि सिखलावै, धरम चरन की लीक ।
यहु साधु पथ जो साधै,नित कृत कारज नीक ।२०१९ ।
भावार्थ : -- धर्म के आचार -व्यवहार हमें जीवन-मरण चर्या की शिक्षा देते हैं । यह वह सन्मार्ग हैं जो हमारे जीवनचक्र को लोकरीतियों से सुंदरता पूर्वक संचालित करते है ॥ धर्म यह शिक्षा देता है कि जीवन-मरणि पर हम क्या करें । जाति यह शिक्षा कि किस रीती से कैसे करें ॥
जाति धरम सब भूर के, नाउ धरे जो अंक ।
मात पिता हुँत मरे सम, कुल हुँत होत कलंक ।२०२० ।
भावार्थ : -- जो जातक जाति- धर्म विस्मृत कर अपने नाम के स्थान पर अंक रख लेते हैं । वह माता पिता के लिए मरे हुवे के तुल्य व् कुल के लिए कलंक होते हैं क्योंकि नाम, उपनाम माता-पिता सहित पितृगण व् वंशवृक्ष का द्योतक होता है ॥
ढोर गँवारु नीच पुरुष, अजहुँ त घर घर होइ ।२०११।
भावार्थ : - ताड़न की अधिकारी कोई विरलई ही होगी किन्तु समय ऐसा ला दिया गया कि अब तो ढोर, गँवार और नीच पुरुष घर घर में मिलने लगे हैं ॥
अजहुँ पुरुख जाति पहिले, खींचे आपनि रेख ।
मर्यादा निर्धार के, फिर नारी की लेख ।२०१२।
भावार्थ : -- अब तो पुरुष जाति पहले अपनी लक्ष्मण-रेखा खेंचे । ततपश्चात नारी की लेख कर उसकी मर्यादा निर्धरित करे ॥
अधुनै काल अस दूषित, होइ प्रुख की जाति ।
धर्म चरण न जानपनी, घनि परबंचनताति ।२०१३।
भावार्थ : -- इस आधुनिक काल में पुरुष-जाति ऐसी दूषित हो गई है कि वह न दया न दान न सत्य जानती है समझदारी तो किसी में रही ही नही, उसकी बुद्धि में मूर्खता का भाव और ठगी का धंधा बहुंत अधिक समां गया है ॥
कन्याओं को साड़ी पहने देखा होगा....क्या किसी युवा पुरुष को धोती पहने देखा है.....? हम नारी के वेश की चर्चा तो बहुंत करते हैं, पुरुष को भूल जाते हैं.....
अपनी कही कथनी मैं, आवै बहुंत सुवाद ।
दूजन के मुख की कही लगिहै सब बकवाद ।२०१४।
भावार्थ : -- अपनी कही बातों में तो बहुंत स्वाद आता है । दूसरों के मुख की कही हुई सारी बातें बकवास लगती हैं ॥
कबहुँ त इत की हाँक दिए, कबहुँ उत की हाँकि ।
तब बासुकि बिष तरे जब, जिह भयउ दुइ फाँकि ।२०१५ ।
भावार्थ : -- कभी तो इधर की हाँक देती है कभी उधर की हाँक देती है ।जिह्वा में तब विषधारी का विष उतर आता है जब वो दो फाड़ हो जाती है ॥
जिबिहा घर की भेदिआ, भेद रही सब खोल ।
अधर ताखड़ी भार धर, तोल मोल के बोल ।२०१६।
भावार्थ : -- जिह्वा घर की भेदी होती है वह सारे भेद खोल रही है । अधरों की ताखड़ी में बाट- बटखड़े रखकर पहले मोल कर फिर तोल कर तब फिर बोलना चाहिए ॥
सम्मति के दातार नै, कैसे कर मत दाए ।
बरन संकर बाढ़ बढ़इ, गो कुल बढ़ ना पाए ।२०१७।
भावार्थ : -- सम्मति के दातार कैसे हाथों में अपना मत दे दिया । यह मत वर्ण संकर की तो बाढ़ बढ़ाए चला जा रहा है, गोकुल की रोक रहा ही ॥
जाति धरम संकरज कू, जीवन समझ न आए ।
मरे परिजन फेंके की, दाहैं की गढ़ियाएँ ।२०१८।
भावार्थ : -- जाति व् धर्म संकर के जातक को जीवन समझ नहीं आता । कैसे ? ऐसे : -- परिजन मर गया.....उसका क्या करें..... फेंके की दाग दें की गढ़िया दें.....चलो गढ़िया दिया किन्तु कितनी बार गढ़ियाएं.....कहाँ कहाँ गढ़ियाएं.....
जीवन मरनि सिखलावै, धरम चरन की लीक ।
यहु साधु पथ जो साधै,नित कृत कारज नीक ।२०१९ ।
भावार्थ : -- धर्म के आचार -व्यवहार हमें जीवन-मरण चर्या की शिक्षा देते हैं । यह वह सन्मार्ग हैं जो हमारे जीवनचक्र को लोकरीतियों से सुंदरता पूर्वक संचालित करते है ॥ धर्म यह शिक्षा देता है कि जीवन-मरणि पर हम क्या करें । जाति यह शिक्षा कि किस रीती से कैसे करें ॥
जाति धरम सब भूर के, नाउ धरे जो अंक ।
मात पिता हुँत मरे सम, कुल हुँत होत कलंक ।२०२० ।
भावार्थ : -- जो जातक जाति- धर्म विस्मृत कर अपने नाम के स्थान पर अंक रख लेते हैं । वह माता पिता के लिए मरे हुवे के तुल्य व् कुल के लिए कलंक होते हैं क्योंकि नाम, उपनाम माता-पिता सहित पितृगण व् वंशवृक्ष का द्योतक होता है ॥
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