शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २०० ॥ -----

जेतक माहि भाग बँधे, तेतक ही फल खाएँ । 
भाजक अंस सेष रहे, भाजन के कर दाएँ ।२००१। 
भावार्थ : -- जितने में भाग बंधा हो उतना ही खाना चाहिए । यदि भाजक अंश शेष रह जाए तो उसे उसके   अधिकारी को दे देना चाहिए ॥ 

 जीवन सरलित संचरै, तेतक सम्पद जोए । 
भव भूमि के भंडारी, सुख सांति सब खोए ।२००२ । 
भावार्थ : -- जीवन सरलता पूर्वक संचालित हो इतनी ही सम्पदा जोड़नी चाहिए । क्योंकि भव भूतियों  का भंडारी सुख-शांति से रिक्त  होता है ॥ 

सूत ऐतक कृत कार कि तन मन देइ ढकाए । 
अधिकाधिक का लोभना, दोउ देइ उघराए ।२००३ । 
भावार्थ : -  इतना ही सूत्र होना  चाहिए जो तन और मन  को ढाँप सके । अधिकधिक की लालसा दोनों को निर्वस्त्र कर देती है ॥ 

टिप्पणी : -- चित्त की निर्वस्त्रता वाणी प्रकट कर देती है......

अंतर भाउ राग जने, अभाउ जने द्वेष । 
द्वेष जब कुभाउ जने, रहे न पुनि कछु सेष ।२००४ । 
भावार्थ : -- भाव से भरा चित्त अनुराग को जन्म देता है । अभाव ग्रस्त चित्त विद्वेष  को जन्म देता है । विद्वेष से जब दुर्भावनाएँ जन्म लेती हैं तब फिर कुछ भी शेष नहीं रहता, केवल एक रिक्तता रह जाती है ॥ 

भू भवन धन सम्पद सन , जोड़े लाखों लाख । 
अंत काल के सहुँ आए, होए चिता मैं राख ।२००५। 
भावार्थ : -- भूमि फिर भवन फिर सम्पद-साधन फिर करोडो संचय किया । अंत में जब मृत्य के सम्मुख हुवे तब वह रिक्तता भी चिता में जल के राख हो गई ॥ 

सुख सम्पद सँजोउ के ऐसो कारज कार । 
भाव भरे हरिदै संग, भरे रहे परिवार ।२००६। 
भावार्थ : -- तो.....मोरल ऑफ़ द स्टोरी.....सुख की सम्पदा का संचयन करते हुवे ऐसे सत्कार्य करने चाहिए । जिससे की हृदय  भाव से भरा रहे और घर कुटुम्जनों से ।। 

साजन सन मारग भया , अजहुँत  बहुंत कठोर । 
चल देखे तो भेंट किए, पग पग डाकू चोर ।२००७ । 
भावार्थ : -- सज्जनों विद्यमान समय में  सत्य का पथ बहुंत ही कठोर हो गया है । एक आध महीने चल के देखो तो सही पग पग पर डाकू चोर न मिले तो कहना ॥ 

कहूँ गड़बड़ कहुँ गड़बड़ियाँ अरु कहुँ गड्डम गोल । 
कुपंथि कर सों देस के, बिगड़े सकल भूगोल ।२००८। 
भावार्थ -- कहीं अव्यवस्था है कहीं अवस्थापक  हैं कहीं पर भारी गड़बड़ झाला है घोटाला है हवाला है कहीं पे केवल ला ला है । इन कुपंथियों के हाथों देश का पूरा भूगोल ही बिगड़ गया ।। 

चौहट हाट लगाए के माँग रहे उत्कोच । 
सासन संग परसासन, पाइहु सब ते पोच ।२००९। 
भावार्थ :-- जो बीच चौराहे पर पण ठानते हुवे घूस माँगते हैं घोटाले करते हैं । विद्यमान समय में वह शासन व् प्रशासन, श्रमिक-जगत, व्यापार-जगत, आदि की तुलना में सबसे अधिक भ्रष्ट है ॥

टिप्पणी १  : --  एक तृतीय वर्ग कर्मचारी के पास प्रवास पत्र मिल जाएगा । किन्तु दस लाख की  पूंजी वाले एक व्यापारी के पास गरीबी रेखा का पत्र भी मिल जाए तो बड़ी बात होगी ॥

टिप्पणी २ : -- पूर्व समय में व्यपारी-वर्ग सबसे अधिक भ्रष्ट कहा जाता था.....

भूखे गेही छांड़ के करत तुषित प्रतिबेस । 
तेहि गेह माहि अवसिहि उपजहि भीत कलेस ।२०१०। 
भावार्थ : --  जिस घर में क्षुधा पीड़ित कुटुंब को त्याग कर पड़ोसियों को तृप्त किय जाता हो । उस घर में अंत: क्लेश का उत्पन्न होना निश्चित है ॥







कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...