जेतक माहि भाग बँधे, तेतक ही फल खाएँ ।
भाजक अंस सेष रहे, भाजन के कर दाएँ ।२००१।
भावार्थ : -- जितने में भाग बंधा हो उतना ही खाना चाहिए । यदि भाजक अंश शेष रह जाए तो उसे उसके अधिकारी को दे देना चाहिए ॥
जीवन सरलित संचरै, तेतक सम्पद जोए ।
भव भूमि के भंडारी, सुख सांति सब खोए ।२००२ ।
भावार्थ : -- जीवन सरलता पूर्वक संचालित हो इतनी ही सम्पदा जोड़नी चाहिए । क्योंकि भव भूतियों का भंडारी सुख-शांति से रिक्त होता है ॥
सूत ऐतक कृत कार कि तन मन देइ ढकाए ।
अधिकाधिक का लोभना, दोउ देइ उघराए ।२००३ ।
भावार्थ : - इतना ही सूत्र होना चाहिए जो तन और मन को ढाँप सके । अधिकधिक की लालसा दोनों को निर्वस्त्र कर देती है ॥
टिप्पणी : -- चित्त की निर्वस्त्रता वाणी प्रकट कर देती है......
अंतर भाउ राग जने, अभाउ जने द्वेष ।
द्वेष जब कुभाउ जने, रहे न पुनि कछु सेष ।२००४ ।
भावार्थ : -- भाव से भरा चित्त अनुराग को जन्म देता है । अभाव ग्रस्त चित्त विद्वेष को जन्म देता है । विद्वेष से जब दुर्भावनाएँ जन्म लेती हैं तब फिर कुछ भी शेष नहीं रहता, केवल एक रिक्तता रह जाती है ॥
भू भवन धन सम्पद सन , जोड़े लाखों लाख ।
अंत काल के सहुँ आए, होए चिता मैं राख ।२००५।
भावार्थ : -- भूमि फिर भवन फिर सम्पद-साधन फिर करोडो संचय किया । अंत में जब मृत्य के सम्मुख हुवे तब वह रिक्तता भी चिता में जल के राख हो गई ॥
सुख सम्पद सँजोउ के ऐसो कारज कार ।
भाव भरे हरिदै संग, भरे रहे परिवार ।२००६।
भावार्थ : -- तो.....मोरल ऑफ़ द स्टोरी.....सुख की सम्पदा का संचयन करते हुवे ऐसे सत्कार्य करने चाहिए । जिससे की हृदय भाव से भरा रहे और घर कुटुम्जनों से ।।
साजन सन मारग भया , अजहुँत बहुंत कठोर ।
चल देखे तो भेंट किए, पग पग डाकू चोर ।२००७ ।
भावार्थ : -- सज्जनों विद्यमान समय में सत्य का पथ बहुंत ही कठोर हो गया है । एक आध महीने चल के देखो तो सही पग पग पर डाकू चोर न मिले तो कहना ॥
कहूँ गड़बड़ कहुँ गड़बड़ियाँ अरु कहुँ गड्डम गोल ।
कुपंथि कर सों देस के, बिगड़े सकल भूगोल ।२००८।
भावार्थ -- कहीं अव्यवस्था है कहीं अवस्थापक हैं कहीं पर भारी गड़बड़ झाला है घोटाला है हवाला है कहीं पे केवल ला ला है । इन कुपंथियों के हाथों देश का पूरा भूगोल ही बिगड़ गया ।।
चौहट हाट लगाए के माँग रहे उत्कोच ।
सासन संग परसासन, पाइहु सब ते पोच ।२००९।
भावार्थ :-- जो बीच चौराहे पर पण ठानते हुवे घूस माँगते हैं घोटाले करते हैं । विद्यमान समय में वह शासन व् प्रशासन, श्रमिक-जगत, व्यापार-जगत, आदि की तुलना में सबसे अधिक भ्रष्ट है ॥
टिप्पणी १ : -- एक तृतीय वर्ग कर्मचारी के पास प्रवास पत्र मिल जाएगा । किन्तु दस लाख की पूंजी वाले एक व्यापारी के पास गरीबी रेखा का पत्र भी मिल जाए तो बड़ी बात होगी ॥
टिप्पणी २ : -- पूर्व समय में व्यपारी-वर्ग सबसे अधिक भ्रष्ट कहा जाता था.....
भूखे गेही छांड़ के करत तुषित प्रतिबेस ।
तेहि गेह माहि अवसिहि उपजहि भीत कलेस ।२०१०।
भावार्थ : -- जिस घर में क्षुधा पीड़ित कुटुंब को त्याग कर पड़ोसियों को तृप्त किय जाता हो । उस घर में अंत: क्लेश का उत्पन्न होना निश्चित है ॥
भाजक अंस सेष रहे, भाजन के कर दाएँ ।२००१।
भावार्थ : -- जितने में भाग बंधा हो उतना ही खाना चाहिए । यदि भाजक अंश शेष रह जाए तो उसे उसके अधिकारी को दे देना चाहिए ॥
जीवन सरलित संचरै, तेतक सम्पद जोए ।
भव भूमि के भंडारी, सुख सांति सब खोए ।२००२ ।
भावार्थ : -- जीवन सरलता पूर्वक संचालित हो इतनी ही सम्पदा जोड़नी चाहिए । क्योंकि भव भूतियों का भंडारी सुख-शांति से रिक्त होता है ॥
सूत ऐतक कृत कार कि तन मन देइ ढकाए ।
अधिकाधिक का लोभना, दोउ देइ उघराए ।२००३ ।
भावार्थ : - इतना ही सूत्र होना चाहिए जो तन और मन को ढाँप सके । अधिकधिक की लालसा दोनों को निर्वस्त्र कर देती है ॥
टिप्पणी : -- चित्त की निर्वस्त्रता वाणी प्रकट कर देती है......
अंतर भाउ राग जने, अभाउ जने द्वेष ।
द्वेष जब कुभाउ जने, रहे न पुनि कछु सेष ।२००४ ।
भावार्थ : -- भाव से भरा चित्त अनुराग को जन्म देता है । अभाव ग्रस्त चित्त विद्वेष को जन्म देता है । विद्वेष से जब दुर्भावनाएँ जन्म लेती हैं तब फिर कुछ भी शेष नहीं रहता, केवल एक रिक्तता रह जाती है ॥
भू भवन धन सम्पद सन , जोड़े लाखों लाख ।
अंत काल के सहुँ आए, होए चिता मैं राख ।२००५।
भावार्थ : -- भूमि फिर भवन फिर सम्पद-साधन फिर करोडो संचय किया । अंत में जब मृत्य के सम्मुख हुवे तब वह रिक्तता भी चिता में जल के राख हो गई ॥
सुख सम्पद सँजोउ के ऐसो कारज कार ।
भाव भरे हरिदै संग, भरे रहे परिवार ।२००६।
भावार्थ : -- तो.....मोरल ऑफ़ द स्टोरी.....सुख की सम्पदा का संचयन करते हुवे ऐसे सत्कार्य करने चाहिए । जिससे की हृदय भाव से भरा रहे और घर कुटुम्जनों से ।।
साजन सन मारग भया , अजहुँत बहुंत कठोर ।
चल देखे तो भेंट किए, पग पग डाकू चोर ।२००७ ।
भावार्थ : -- सज्जनों विद्यमान समय में सत्य का पथ बहुंत ही कठोर हो गया है । एक आध महीने चल के देखो तो सही पग पग पर डाकू चोर न मिले तो कहना ॥
कहूँ गड़बड़ कहुँ गड़बड़ियाँ अरु कहुँ गड्डम गोल ।
कुपंथि कर सों देस के, बिगड़े सकल भूगोल ।२००८।
भावार्थ -- कहीं अव्यवस्था है कहीं अवस्थापक हैं कहीं पर भारी गड़बड़ झाला है घोटाला है हवाला है कहीं पे केवल ला ला है । इन कुपंथियों के हाथों देश का पूरा भूगोल ही बिगड़ गया ।।
चौहट हाट लगाए के माँग रहे उत्कोच ।
सासन संग परसासन, पाइहु सब ते पोच ।२००९।
भावार्थ :-- जो बीच चौराहे पर पण ठानते हुवे घूस माँगते हैं घोटाले करते हैं । विद्यमान समय में वह शासन व् प्रशासन, श्रमिक-जगत, व्यापार-जगत, आदि की तुलना में सबसे अधिक भ्रष्ट है ॥
टिप्पणी १ : -- एक तृतीय वर्ग कर्मचारी के पास प्रवास पत्र मिल जाएगा । किन्तु दस लाख की पूंजी वाले एक व्यापारी के पास गरीबी रेखा का पत्र भी मिल जाए तो बड़ी बात होगी ॥
टिप्पणी २ : -- पूर्व समय में व्यपारी-वर्ग सबसे अधिक भ्रष्ट कहा जाता था.....
भूखे गेही छांड़ के करत तुषित प्रतिबेस ।
तेहि गेह माहि अवसिहि उपजहि भीत कलेस ।२०१०।
भावार्थ : -- जिस घर में क्षुधा पीड़ित कुटुंब को त्याग कर पड़ोसियों को तृप्त किय जाता हो । उस घर में अंत: क्लेश का उत्पन्न होना निश्चित है ॥
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