शनिवार, 1 नवंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १९९ ॥ -----

चाहे जी रखे चाहे राखे सौ सौ साँच । 
तापरझूठे बोल की बड़ी कसूती आँच ।१९९१। 
भावार्थ : --   चाहे वह  प्राण रक्षा हेतु ही क्यों न बोले गए हो अथवा सौ सौ सत्य की रक्षा हेतु क्यों न बोले गए  हो असत्य वचन अकल्याण कारी ही सिद्ध होते है ॥ 

कर्म कर अरु कर्म करी, मंदिरु रहे बुहार । 
पुजेरी जी बन ठन के, जता रहे अधिकार ।१९९२ । 
भावार्थ : -- मंदिर को किसे बुहारना चाहिए ? पुजारी को..... बुहार कौन रहा है कर्म चारी और कर्म चारिणी  । अर्थात मंदिरों को दास और दासी से स्वच्छ करवाया जा रहा है और उसके आवक पर बने ठने पुजारी जी अपना अधिकार किए हैं ।। 

हे बिरह मन पहलै तू, सोध आपनी जात । 
ऊँचे पीठ बिराज पुनि, कर दूजन की बात ।१९९३ । 
भावार्थ : - रे बिरहा-मन प्रथमस् तू अपनी जात परिष्कृत कर । ऊँचे आसन पर विराजित होकर फिर दूसरे की बात कर ॥ 

जलद उपजत जलधि संग, अन्न खेत खलिहान । 
ज्ञान उपजत जगत दरस  पुस्त पीठ के पान ।१९९४ । 
भावार्थ  : -- मेघ सागर से उत्पन्न होते हैं अन्न खेत खलिहानों में उत्पन्न होता है । ज्ञान संसार के दर्शन एवं पुस्तक के पृष्ठ-पत्र से उत्पन्न होता है ॥ 

चाहे अर्वाचीन हो, चाहे हो प्राचीन । 
जो जगत परिपीडन दए, सो बिचार है दीन ।१९९५ । 
भावार्थ : -- अर्वाचीन हो चाहे प्राचीन जो विचार सृष्टि एवं सृजन को पीड़ा देता हो वह विचार दरिद्र एवं निकृष्ट है ॥ 

संचालित जनतंत्र कू , चला सकए सब कोए । 
ठाड़ि कू जो चला सके, सत चालक हैं सोए ।१९९६। 
भावार्थ : -- चलती हुई गाडी अथवा चलते हुवे जन तंत्र को तो कोई भी संचालित कर सकता हैं । जो डिब्बा- गाड़ी अथवा स्थिर तंत्र को चला दे वही  कुशल संचालक होता है ॥   

प्लक साफ़ करके साइलेंसर बदल के इंजन ऑयल दे के खड़खड़ बजाते धक्कापेल करते हुवे पंद्रह किलोमीटर का एवरेज देकर अंग्रजों की फटफटिया तो कोई भी चला सकता हैं । इंजन का काम करे इ एवरेज कितना होना चाहिए नब्बे से ऊपर की एवरेज दे.....फिर चला के दिखाए तो जाने.....

एक बुड़बग कहता था हमरी गाड़ी पंद्रह की एवरेज दे रही..... 

सासन सोइ सुसासन, सासक हो जहँ लोग । 
संचालक सेवक हो अरु, दूर रहे भव भोग ।१९९७ । 
भावार्थ : -- शासन वही सुशासन है जहाँ शासक जन सामान्य हो । शासन संचालक सेवक हो, और वे लौकिक सुखों के उपभोग से परहेज करें ॥ 

बिषय भोग की माधुरी, लगे बहुंत ही मीठि । 
वा संग होत आँधरी, ज्ञान गमन की डीठि ।१९९८ । 
भावार्थ : -- विषय भोगों के मिष्टान्न लगते तो बहुंत मीठे हैं । लाल-धोले प्रासादों  में रहना किसे अच्छा नहीं लगता । लेकिन,  किन्तु,  परन्तु ऐसी मिठास से विषयों को जानने व् समझने की दृष्टि अथवा ज्ञान को ग्रहण करने वाली मन की शक्ति क्षीण हो जाती है ॥ 

अधुनातन समऊ कहत, बिषय भोग को ताज । 
पुराण पुनि उपजोग कर, परिहर नउ नउ साज ।१९९९ । 
भावार्थ : -- देश काल एवं परिस्थियाँ सदैव एक जैसी नहीं रहती । इनका उचित  आकलन विवेकी ही कर सकते हैं । विद्यमान समय यह कह रहा है कि हे मानव ! तू नई नई वस्तुओं के उपभोग का परित्याग कर जहां तक हो सके  पुराने वस्तुओं का पुनश्च उपयोग कर इसी में संसार का  कल्याण निहित है ॥ 

लोक तंत्र के नाउ धर करे कूट की नीति । 
राजा भयउ अधिनायक, बरे राज की रीति ।२००० । 
भावार्थ : -- लोक तंत्र का केवल नाम भर है यह वह जन सञ्चालन तंत्र है जहाँ कूट कपट की नीति निर्धारित होती हैं  नेता यहां राजा होते  हैं मतदान एक पाखंड  हैं । यहां पीछे से राजतंत्र की रीतियाँ का ही वरण किया जाता हैं  

यथा : --   यथेष्टाचरण  का वरण कर येन केन प्रकारेण सिंहासन हथियाओ  और जनता पर राज करो ॥ 

 " लोकतंत्र में कूट नीतियों का कोई स्थान नहीं होता , जहाँ ऐसी नीतियां निर्धारित होती हैं वहां लोकतंत्र नहीं है....:" 

स्वतंत्रता संग्राम इस हेतु किया गया कि एक  लोकवादी राष्ट्र की स्थापना हो ।  जो व्यक्ति वादी राष्ट्र  में परिवर्तित हो गया 

कैसे ? ऐसे: -- 

अपना हित साधन हेतु किए जो कालि कमाइ । 
सो तो ऐसी भावना, जो जन हित बिसराए ।। 
----- ॥ लक्ष्मी नारायण मिश्र  ॥ -----

भावार्थ : -- "अनुचित रूप से धन कमाने की प्रवृत्ति लोक हित के विरोध में व्यक्ति हित की  साधना है "

















2 टिप्‍पणियां:

  1. शरीरदि हुं छुं अने तेना संबंधी मारा छे. आ विपर्यय छे. तेने दूर करवा नीचे मुजब निदि ध्यासन करवु. (१) हुं अंतर आत्माथी अभिन्न ब्रह्म छुं. (२) हुं मायाना अधिष्ठानरुप ब्रह्म छुं. (३) हुं पांच कोषथी पर ब्रह्म छुं. (४) हुं वास्ना रहित असंग आत्मा छुं (५) हुं चिदाकाश ब्रह्म छुं (६) हुं नित्य तृत्प परमानंदरुप छुं. (७)हुं अद्वितीय आनंदरुप ब्रह्म छुं. (८) हुं निरुपाधिक अविकारी छुं. (९) हुं कृतकॄत्य कॄतार्थ छुं. "एक निदिध्यासन ज्ञान वडवा अनल जैसे ! प्रगट समुद्र मांही, माया जल खात हैं!!" निदिध्यासन ज्ञान नित्य अध्ययनवाळुं होय तो संसारमां रहेतां, गमे तेवा वावाझोडा आवे, प्रतिकुळ प्रसंगो आवेतो पण पोतानी समाधान करवानी शक्ति जती रहेती नथी. निदिध्यासन एट्ले सजातिय प्रवाह राखवो अने विजातिय प्रवाह त्यागवो अने भक्तिज्ञानने अनुकुळ पोतानो जिवन गोठववु एज निदिध्यासननो स्वरुप छे वास्तविक तत्व ब्रह्म छे जेमनु तेम ते विकृति संस्कृति प्रकृति पर छे। निदिध्यासनका मतलब है खुदको खुदहि अभ्यास कराते रहना आत्मध्यान, आत्मकल्याण और आत्मज्ञान करने हेतु। सजातिय प्रवाह वह है जो अपनी सांसोमे ध्यान लगाके उसके साथ हि जुडे रहना सदाके लिये, प्राणायम करना जबतक सांसोमे सुरता लगे और जब सुरता लगजाती है तो फिर छातीमें भक्ति और प्रेमके अनुकुल जिवन जीनेका अवसर परमअात्मा देदेते है। भक्ति परिपकव होनेके बाद अपने आपहि ज्ञान कि बारी आजाती है याने ज्ञान हो जाता है करना नहि पदता। इसके पिछेकी अवस्था में अपनी कोइ हस्ती नहि रह जाती सिर्फ और सिर्फ ईश्वरकाही अस्तित्व रह जाता है जो पहलेसेहि था जिसे वास्तविक तत्व कहते है ब्रह्म जो "मैं हुं" है जिसके उपर कुछभी नहि। 

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    1. अर्थात : -- अभी तक जितने आए छुपछुपा के खाए । यदि तुम शपथ ग्रहण समारोहों जैसे तुच्छ आयोजनों में सौ सौ करोड़ का अपव्यय करते हुवे झुल्ला में बैठ के खुलमखुल्ला भी खाओगे तो तुम्हारी फटफटिया पांच का एवरेज देने लगेगी,

      पांच माने की कितना.....? जितना बिना चढ़े ढुलका के देती है न उतना.....

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----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...