रविवार, 30 नवंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २०७ ॥ -----

उद्योग  धिंग धंध भए धनपत डाकू रूप । 
अपणा कर कनिआ भई, कोसज अंधा कूप ।२०७१ । 
भावार्थ : --  उधोग धंधे गंदे हो गए..... अब वो चम्बल वाला समय गया.....उद्योग पति ही वे वाले डाकू बन गए  जी । अबके डाकू दिन में चार बार नहाते हैं चौआलीस कपडे बदलते हैं । तेरा टिकस बोले तो टेक्स प्यारी सी तेरी  कन्या हो गई वित्त मंत्रालय अँधा कुआँ.....धक्के थोड़े ही दे देओगो .....इसे भलाई के काम में लगइयो जिससे यह किसी भले के पास जाए, आतंकवादियों के पास न जाए ॥

रहे देस पराए खाए खर्चें देस पराए । 
धनिमानी किए कमाई , मिलहि देस कू नाए ।२०७२। 
भावार्थ : - धनवान व् लब्ध प्रतिष्ठित वर्ग की कमाई देश को नही मिलती । वे विदेशी ओढ़ते हैं प्राय: विदेश में ही खाते हैं विदेशी वस्तुओं पर ही खर्च करते हैं उनका खुरदरा मूल्य व् अप्रत्यक्ष कर विदेशों को जाता है । वे जिसमें उड़ते हैं वो ईंधन भी विदेश से आता है ॥ निम्न वर्ग अन्न उपजाता है श्रम करता है पूरा का पूरा अप्रत्यक्ष कर अपने देश को  देता है । मध्यम वर्ग ही किसी जन संचालन  तंत्र का कौशल होता है यह न केवल प्रत्यक्ष अपितु अप्रत्यक्ष कर भी अपने देश को देता है ॥ 

श्रेष्ठि वर्ग जितना कर नहीं देते उससे कहीं अधिक् तो देश का खा जाते हैं..... घपले घोटाले करते हैं सो अलग..... भारत-देश के निवासीयों का आर्थिक इस उच्चतम वर्ग नामक विषैले कीटाणु के कारण है...... 

काल कलुषित कारज कर, ऊँचे भवन रचाए । 
ऐसी ऊंचाई संग, कवन भला हो पाए ।२०७३। 
भावार्थ : -- काले कुकरम कर कर के लोग ऊँचे ऊँचे विलास भवन बनाते हैं ।ऐसी ऊंचाई से किसका भला हुवा है ।। 

बर बानि धर ग्यानि बन उड़त फिरएं बैमान । 
न त कोहु कर ग्यान दैं, न काहु देवें दान ।२०७४। 
भावार्थ : -उत्तम वेषभूसा धारण किये जो ज्ञानी बनकर विमानों में उड़ते फिरते हैं । वे किसी को ज्ञान नहीं देते  रहतें न ही वे किसी को दान देते हैं अपितु लोग उन्हें ज्ञान-दान देते हैं । ऐसे किसी का दिया हुवा मिला हो तो बता दो ॥ 

ज्ञानी होना एक बात है ज्ञान देना दूसरी बात.....

दान किसको बोलते हैं.....? 

भरा उदर निद्रा दरसे, निद्रा सपन दरसाए  । 
जगती छुधा कला करे, रोटी कहँ सों आए ।२०७५ । 
भावार्थ : - भरे हुवे उदर को निद्रा ही दिखती है निद्रा स्वर्ग के सपने दिखाती है ॥ जागृत क्षुधा जब कल्पना करती है कि रोटी कहाँ से आए तब रोटी की रचना होती है ॥ 

 "स्वप्नकालिक चेतना से सृजन नहीं होता, यह जागृत मन का व्यापार-विशेष है....."

गहरी नींद गहल कोउ, देखे सपन सलोन । 
जागत जगत जगती की, करे कल्पना कौन ।२०७६ । 
भावार्थ : -- कोई गहरी निद्रा में निमग्न होकर सुन्दर स्वप्न दर्श रहा है ( चराचर-जगत  )  । वो कौन है जो चैतन्य स्वरूप होकर इस संसार की कल्पना कर रहा है ( ईश्वर ) ॥ 

भारत माता  के रहे  सुबरन मय इतिहास । 
सासको के कुकरम नै किए सब सत्यानास ।२०७७ । 
भावार्थ : -- भारतीयों की जननी स्वरूप इस भारतभूमि का एक स्वर्णमयी इतिहास रहा । किन्तु शासकों के कुकर्मों ने सब सत्यानाश कर दिया सारे सोने  का पत्थर कर दिया ॥ ये सारे किले-काले उन्ही पत्थरों से ही बने हैं ॥ 

चोरक पाछु पाछु चले, ताकें चोरि चकारि । 
सिद्ध पुरुख इतरा कहे, हमरे अनुहर भारि ।२०७८। 
भावार्थ : - चोरी चकारी की ताक में चोर पीछे पीछे चल रहे हैं । सिद्ध पुरुष इतरा इतराता कह रहा कह रहा है  मेरे तो कितने ही अनुशरण कर्त्ता हैं ।

जन जन देस कोष चरन अरपत कह महराज । 
महराज की छूट, करें उलटे सीधे काज ।२०७९ ।
भावार्थ : - हमारा संविधान कहता है कि : - सारी जनता देश का भंडार महाराज के चरणों में अर्पित कर नतमस्तक होकर कहें महाराज !.....महाराज को पूरी पूरी छूट है कि वो उस कोष का कुछ भी करे चाहे तो अपने घर ले जाए चाहे विदेश में रखवा दे ।।

अधुना हमरी  भुइ  भई बहुतहि सुख संदोहु । 
आए दुहे अरु ले जाए, औने पौने जोहु ।२०८०। 
भावार्थ : -- इस समय ( विभाजन के पश्चात से ) हमारी  यह भारत  भूमि सरलता पूर्वक दोही जाने वाली हो गई है । कोई भी औना पौंना आता है इसे दुहता है और ले जाता है ॥ शासन को जो मुंह भराई दे दे उसी के खूंटे बँध जाती है ॥

पीतरजन के कृत करम किए जो आतम सात । 
नौ बिगड़े तो बिगड़े, बिगड़े न कोइ जात ।२०८१। 
भावार्थ : - उपनाम मात -पितासहित  पितृजनों के सतकर्मों को आत्म सात किए होता है यह आपको आपकी जड़ों तक ले जाता है । इसलिए अपना नाम बिगड़ जाए पर जात बिगड़नी न पाए । ऐसे कर्म करने चाहिए की अपना नाम उप नाम बन जाए जैसे मायाराम, गंगाराम, बनारसीराम.....








----- मिनिस्टर राजू १५२ -----

राजू : -- मास्टर जी ! प्रधान सेवक चाय वाले कह रिया था कोई दो दो रूपए में बिकने वाली पुलिस पर 'धार्मिक गाथा' लिखो..,

" राजू उस चाय वाला नै चाय के धंधो का ही बेरा सै.....अठन्नी म बी कोणी बिक बा गाथा.....कबाड़ी बाला भी सूंग क गेर जाओगो.....उणा बोलिए किसी घटिया साहित्यकार न रतन- भूषण दे दे.....बिका वो घणिये लिख क धर देओगो.....  

शनिवार, 29 नवंबर 2014

----- मिनिस्टर राजू १५१ -----

राजू : -- मास्टर जी ! इस गुंडा पार्टी को सत्ता में आए  कुछेक महीने भी नहीं हुवे और इसने  बीस हजार करोड़ का 'ऋण घोटाला' हो कर दिया.....'मिडिया' को पता भी नहीं चला.. ?

 " राजू ! ये मीडिआ जो है न वो झोला छाप पत्रकारों की टोली भर है इसे केवल अपने पेट का पता रहता है....."    

बुधवार, 26 नवंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २०६॥ -----

दूर दरसन निकट भया, घर भीतर दे गार । 
ताते तो सुनहा भला,  भूँके बैठ द्वार ।२०६१ । 
भावार्थ : -- पहले दूरदर्सन दूरदर्शी था अच्छी अच्छी बातें बताता था अब तो यह अश्लिल दर्शन हो कर घर के भीतर ही दुर्वादन करता है, इससे तो कुत्ता ही भला है जो घर के बहार बैठ कर तो भूँकता है ॥

देस निबासी भूख मरे, फरें-फुरै संकास । 
पाप चरन की बढ़नि कू, सासक कहत बिकास ।२०६२। 
भावार्थ : -- देश निवासी तो भूखे मर रहे हैं और पड़ोसी हैं कि  के देश के संसाधनों से फल-फूल रहा है । पापाचार भ्रष्टाचार जैसे दुरचरणों की वृद्धि को अधिनायक तंत्र का शासक विकास कहता हैं ॥

बिदुजन जोइ बात कहें , होत हेतु कल्यान ।
नौ बात अनुहार करत, एक तू अपनी मान ।२०६३। 
भावार्थ : -- विद्वान जो बातें कहते हैं यद्यपि वह कल्याण के लिए ही होती हैं । किन्तु उनक अक्षरश: पालन नहीं करना चाहिए, उनकी कही दस बातों में से नौ का अनुकरण कर एक बात अपनी माननी चाहिए ।  कारण  की कोई भी पूर्णत: विद्वान नहीं होता ॥ जो विद्वान के हित  की बात हो उसे तो कदापि नहीं मानना चाहिए ।

संविधान में दस बातें लिखी हैं रचेता  के हित की पांच बातें त्याग कर,  दस में शेष पांच बातों में से चार का ही अनुकरण करना चाहिए एक बात अपनी माननी चाहिए ।।

यही बात चिकित्सक आदि के विषय में भी लागु होती है ।

पालतू पशु की हत्या संविधान में अपराध नहीं हैं किन्तु हम मार्ग चलते किसी पशु की हत्या करते हैं क्या ? नहीं। क्यों कि हमारा ज्ञान कहता है यह एक अपराध है..,

 मत देना हमारा अधिकार है कोई अड़ोसी-पड़ोसी को खड़ा कर दे तो भी दे दें.....?

सेवक साहुकार जहाँ चोरक चौकीदार । 
तहाँ रच्छा कौन करे, कौन करे बैपार ।२०६४ । 
भावार्थ : - जहाँ सेवक साहुकार बने फिर रहे हों । चोर चौकीदारी कर रहा हो । वहां की सुरक्षा कौन करे,  कौन व्यापार करे, ऐसे में व्यवस्था को तो चौपट होना निश्चित ही है ॥

एक द्वीप जलपान किए दूजे खादन खाए । 
देस प्रधान जान ऊपर हाथ हिलावत पाए ।२०६५। 
भावार्थ : -- एक द्वीप में जलपान का तो  दूसरे में भोजन में भोजन का कार्यक्रम होता है  ।  देश प्रधान  हाथ हिलाते हुवे सदा वायुयान में ही दिखते हैं ॥

बसन सों बर साधन सों, बहु मुख बरे अभाति । 
अंतर तम ओहार दिए, बाहिर जग किए काँति ।२०६६। 
भावार्थ : -- उत्तम वेशभूषा एवं उत्तम साधनों के संग बहुंत से  मुख आभा मंडल का वरण  करते  है । वस्तुत: यह आभामंडल बाह्य जगत को चकाचौंध कर अपने अंतर के अज्ञान रूपी अँधेरे को छिपाने के लिए होता है  ॥

अत: ऐसे आभामंडल से प्रभावित नहीं होना चाहिए ।

 सज्जन व्यक्ति अपने आभा मंडल वरन नहीं करते यदि कोई आभा निर्मित भी होती है तो वे उसे तत्काल भंजित कर देते हैं  इस हेतु कि उनकी वाणी ओज से युक्त रहे ॥

को नयक पीठ पदक को पोथी पत्ताकार । 
भारत महुँ दरसन मिले  पाखन बहुंत प्रकार ।२०६७ । 
भावार्थ : -- कोई नय कोविद का पाखंड किए ऊँचे आसान पर विराजित है कोई ग्रंथकार का पाखंड किए हों कोई पत्रकार का पाखंड किए हैं । भारत ही ऐसा देश है जहां विविध प्रकार के पाखंड देखने को मिलते हैं । 

पाखंड इस हेतु किया जाता है कोई व्यक्ति जो वस्तुत: नहीं है किन्तु वह व्यक्ति बनकर उसके व्यक्तित्व से लाभ लेना है ॥  

बेटा आपुनि आप कू, समुझ बाप का बाप । 
आँख देखाए धुकियाए , अनरगल किए अलाप ।२०६८ ।    
भावार्थ  : - यह कलयुग का दुष्प्रभाव है कि बेटा  अपनेआप  को बाप का भी बाप समझकर आँख दिखा के धक्का देता है और अनर्गल अलाप भी करता है ॥ 

को झाड़ फूँक को जूत मार भगावै भूत । 
भयउ झोला छाप अजहुँ पत्तरकार बहूँत ।२०६९ । 
भावार्थ : -- कोई झफ फूँक के तो कोई जूते मार के भूतों को भगा रहा है ऐसे भगेंगे भूत.....? | अब तो झोला छाप डाक्टरों और जर्नलिस्टों की लिस्ट बहुंत ही लम्बी हो चली है  ॥

 इनके झांसे में नहीं आना चाहिए .....

जन जन का धन कोष है, लूट सके तो लूट । 
चौपट राजा राज किए  डाके की है छूट ।२०७० । 
भावार्थ : -- ये जनता जनार्दन  का खजाना है जितना चाहे लूट लो । नीति नयम का अभाव है चौपट राजा राज कर रहे हैं डाके की पूरी पूरी छूट है ॥ 


















रविवार, 23 नवंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २०५ ॥ -----

सासन तेरा प्रबंधन, हे रे हेर न पाए । 
बिधि मिले न बिधान मिले, मिले न कतहुँ न्याय ।२०५१ । 
भावार्थ : - रे शासन तेरा प्रबंधन ढूंडने से भी नहीं मिलता । कहीं विधि नहीं मिलती, कहीं विधान नहीं मिलता, कहीं न्याय नहीं मिलता ॥ 

दूषन दोष दुराचरन, सासकहि रहे पोस । 
नागरजन अधुना  उठे, भरोस सोहि भरोस ।२०५२ । 
भावार्थ : --  शासक ही अपराधों का पोषण कर रहे हैं । हे नागरिकों अधुनातन विश्वास शब्द से ही विश्वास उठ गया ॥ 

जय 'माल' कू कंठ बरे, हार देइ परिहार । 
राजा जी आयसु करें संसद सदन पधार ।२०५३। 
भावार्थ : -- यदि जीत को जनता का आदेश कहते हैं तो हार को क्या कहतें हैं ? हार को अस्वीकार  कर  जो प्रधान सेवक संसद-सदन में पधार कर आदेश करते हैं वे कृपया बताएं ॥ 

जोइ पालन जानि सोइ, जानै आयसु दान । 
अज्ञप्ति करन ते पहिले, आज्ञा पालन जान  ।। 
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- जो आज्ञा का पालन करना जानते हैं वही आज्ञा देना जान सकते हैं ॥ पहले आदेशों का पालन करना सीखना चाहिए तत्पश्चात कोई आदेश देना चाहिए ॥ 

तो अब से जनता जनार्दन जो आदेश दे उसका पालन करो फिर किसी को कोई आदेश दो .....

न तो मानए बिग्यान न तो मानए ग्यान । 
जोइ तासु रचैता कहि  मानि सोइ सविधान ।२०५४ । 
भावार्थ : -- न तो विज्ञान की मानता है न ज्ञान की मानता है । संविधान केवल अपने निर्माता की कही मानता है ॥ 

 साजन सोए संग रहे, जो कहि किए किछु नाए ।
जो कहि बहु दोष किए सो  बसती कहाँ बसाएँ ।२०५५ । 
भावार्थ : - सज्जनों वे लोग भी संग रहते हैं जो यह कहते हैं कि हमने तो कुछ भी नहीं किया ॥ जो यह कहते हैं कि हमने न जाने क्या क्या अपराध किया वो कहाँ बसें ॥ 

दण्डनीअ कर दंड लिए, सिंहासन आसीन । 
 देउ कुल हीन देस मेँ , भयउ भयउ भयहीन ।२०५६ । 
भावार्थ : -- दंडनीय हाथ डंडा लिए सिंहासन पर विराजित हैं । न्यायालयों से रहित देश में भय भी भयहीन हो गया है अर्थात सब निर्भय हो गए हैं ॥ 

भला जो  देखन मैं चला, भला न कोऊ पाए । 

अब कै को जननी जने  कै धरती उपजाए ।२०५७ । 
भावार्थ : -- भला देखन 'मैं ' चला पर कोई भला नहीं  मिला । अब या तो कोई लाल की माई जने या फिर धरती उगाए ॥ 

अधुने काल भारत जस , भयऊ दंडस्तान । 
देस निबासी दास भए, संबिधान की मान ।२०५८ । 
भावार्थ : -- आधुनिक युग में भारत सेना द्वारा शासित स्थान जैसा हो गया है । देश निवासी संविधान की मान मान के दास जैसे हो गए हैं ॥ 

भारत भूमि दरस रही, कलजुग के पाखंड । 
दंड देउ कुल भए बकुल, दंड जोग दएँ दंड ।२०५९ । 
भावार्थ : -- भारत की भूमि कलयुग के ऐसे पाखंड देख रही है जो कदाचित ही किसी ने देखा हो । क्या देखती की देश न्याय, आलय से रहित हो गया है व् जिसे दंड देना न्यायसंगत हो वही दण्डपालक बने फिर रहे हैं ॥

दंड देउ कुल किए जहाँ,सासन संग सँजोग । 
चुनाउ अजोग कहि तहाँ, का भरोस के जोग ।२०६० । 
भावार्थ : -- जहाँ नययय आए..... हाँ न्याय -पालिक- कार्यपालिका आदि आदि गठ बंधन किए हुवे हों । क्या वहाँ के चुनाव  आयोग की कही, उसके दिए आँकड़े भरोसे के योग्य हैं ? 









गुरुवार, 20 नवंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २०४ ॥ -----

चिंदी के जो दान किए चोरे थान के थान । 
कहता दाता  दातारा, नहि को मोहि समान ।२०४१। 
भावार्थ : --  थान की थान  चोर के जो चिंदी  दान करता है  वह दाता कहता फिर रहा है मेरे जैसा दातार तो कोई दुनिया में नहीं है ॥ 

सकल हरिआरि खाए के, चार कनक दिए दान । 
कहता दाता  दातारा, नहि को मोहि समान ।२०४२ । 
भावार्थ : -- सारी हरियाली खा के जो चार दाने दान देता है । वह दाता कहता फिर रहा है मेरे जैसा दातार तो कोई दुनिया में नहीं है ॥  

पँखी केहु छत छीन के, बैठे ऊँचे थान ।  
कहता दाता  दातारा, नहि को मोहि समान ।२०४३। 
भावार्थ : -- पक्षियों तक के घरौंदे छीन के जो ऊँचे स्थान बैठा  ।  वह दाता कहता फिर रहा है मेरे जैसा दातार तो कोई दुनिया में नहीं है ॥  

जनिमन करे करम धरम , पितुजन भाग बँधाए । 
जो सत्कर्म पितुजन किए  , जनिमन भाजक नाए ।२०४४।  
भावार्थ : -- संतति  द्वारा किए सत्कर्म पितृजनों को प्राप्त होते है । पितृजन द्वारा  सत्कर्म पर संतति का अधिकार नहीं होता ॥ 

दुखियारे संसार मेँ, सुख की सबको चाह । 
बिषय भोग के लाह सों, चाहिये केहु नाह ।२०४५ । 
भावार्थ : --दुख के आयतन संसार में सुख की तो सभी चाह करते हैं । किन्तु भोगों  की लालसा सम्मुख हो तो सुख किसी को नहीं चाहिए ॥ 

अर्थात : ---भोगों की लालसा सुख पर भारी पड़ जाती है.....

सुखी जगत को दुखिआ कहत, सुख को सब जन रोए । 
भोग बिषय परिहार के, जीवन सुखमय होए ।२०४६ । 
भावार्थ : - समस्त लौकिक सुखों से युक्त इस संसार को दुखयातन कहकर सुख की सभी जन आस करते रहते हैं । किन्तु भोगों का त्याग किए बिना जीवन सुखमय नहीं होता ॥ 

बदलो बदलो कह फिरै, बदलन की लगि हाए । 
सोइ संसद सोइ सदन, बदला तो किछु नाए । २०४७ । 
भावार्थ : -- बदलो बदलो कहते फिरे, बदलने की ऐसी हाय लगी कि  लेन लगा  लगा के बदले ॥ किन्तु भाई मेरे वही संसद है,वही दो सदन हैं, न्यूनाधिक वही सदस्य हैं, वही भाषण है,वही वचन है,वही भ्रष्टाचरण है । बोलो क्या बदला.....बोलोओओओओ.....कुछ नहीं बदला.....ऐसे नहीं बदलेंगे ये लोग.....    

मैं पापी बहुंत बुरा न, मो सम कोउ असंत । 
आए बाँध सो ले जाए, जो हो साँचा संत ।२०४८। 
भावार्थ : - ये जो मैं है वह पापी  बहुंत ही बुरा है उस मैं में मैं भी सम्मिलित हूँ , मेरे जैसा असंत कोई नहीं । जो सच्चा संत है सदाचारी है कतई भला है, वह आए , बांध के ले जाए । जो सज्जन है सदाचारी है वो दंड दे । 

देखे तो सही ऐसे सच्चे संत सज्जन भले मंस दिखते कैसे हैं..... 

भारत के सविधान मैं, बहुतक चोर दुआरि । 
तहँ सो पैठ हारिहु भए, संसद के अधिकारि ।२०४९ । 
भावार्थ : -- रचयिता ने भारतीय संविधान में बहुंत से चोर दरवाजे बनाए हैं । दूसरों की क्या कहें वहां से घूस के हारे हुवे भी संसद के योग्य हो जाते है एवं बड़े बड़े नियम बनाते हैं ॥ 

जैसे : - चमड़ी जाए पर दमड़ी  न जाए  
चोर द्वारि = चोरों के आने-जाने का द्वार 

कहे कथन हित आपना, पल मैं होत बिहान । 
पर सुभासित बचन रहे, सदैव आयुष्मान ।२०५० । 
भावार्थ : -- स्वहितार्थ व् स्वार्थ पूर्ति हेतु कहे गए कथन क्षणभंगुर होते हैं ।  विश्व के कल्याण हेतु कहे गए सुभाषित वचन चिरंजीवी रहते हैं ॥ 

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २०३॥ -----

देखो नोखे लाल की नोखी नोखी बात । 
होत जात किछुहू नहीं, काज करे दिनुरात ।२०३१ । 
भावार्थ : -- अनोखो लाल की अनोखी अनोखी बातों को तो देखो ( अनोखेलाल की बातें सुनी नहीं जाती.....देखि जाती हैं ) होता जाता कुछ भी नहीं, काम दिनरात करते हैं ॥ 


रानी जी के राज कू , काज तुला लिए तोल । 
करना धरना कुछ नहीं, बड़े बड़े हैं बोल ।२०३२। 
भावार्थ  : --  पहले राजाओं का राज देखा अब रानियों का देख, 

दलगत चुनाव प्रणाली के गुण दोषों  पर विचार कर यह  निष्कर्ष निकला कि करना धरना इन्हें कुछ नहीं किया धरा को बिगाड़ना  ॥

निष्कर्ष यह की भरतीय सविंधान में विहित दलगत चुनाव प्रणाली समस्यों के समाधान करने में अक्षम सिद्ध हो रही हैं.....

करे भंडारि भंडिरे, कभु दाहिन कभु बाम । 
दरसन हारु को लागे, करता बहुंतहि काम ।२०३३ । 
भावार्थ : -- ब्योपारी बड़ा चल्लाक है इधर के बर्तन उधर करता रहता है । देखने वाले को क्या लगता है रे बहुत काम करता है ॥   

कथनी के ढेरी लगे, करनी पड़े अकाल । 
समस्या सुरसा मुख सम रूप गहे बिकराल ।२०३४ ।  
भावार्थ : -- कथनी का ढेर लग गया है,  करनी का अकाल पड़ा हुवा है । रावण-राज में समस्याओं ने सुरसा मुख के जैसे विकराल रूप धारण कर लिया है ॥ 

कहुँ धूतकृति कुनीति कहुँ भ्रष्टाचरन अथाह । 
समस्या मुँह बाए खड़ी, समाधान की चाह ।२०३५ । 
भावार्थ : --  कहीं झुठाई है तो  कहीं दुर्नीतियां  हैं कहीं अथाह भ्रष्टाचरण है । कहीं समाधान  की चाह में समस्याएँ मुंह बाए खड़ी हैं, शील सदाचरण है की दिखाई नहीं देता ॥ 

सासन सन न्यायायन , करेँ देस पर राज । 
ब्यापत आपद सब कहुँ, चौहट कर ब्याज ।२०३६ । 
भवार्थ : -- रावण राज कैसे हैं ? ऐसे है : -- शासन-प्रबंधन व्  न्यायपालिका  एक होकर सत्ता का सुख भी भोग रहे हैं एवं जन-धन की हानिकर संकट को चारों ओर व्यापत करते हुवे निर्भीक होकर कदाचरण भी कर रहे हैं,जो रावण-राज का सूचक है ॥ 

२०१४ का महाजनादेश का अध्ययन किया जाए तो निष्कर्ष यही निकलता है कि भारतीय जान मानस इस दलगत चुनाव प्रणाली से विरक्त हो चला है यह जैसे दलगत व्यवस्था हेतु अंतरिमादेश प्रतीत होता है.....

अजहुँ त कालहि काल है, मति कर करनि अकाल । 
करता करतब का करिए, होइहि सहुँ जब काल । २०३७ । 
भावार्थ : - अभी तो समय ही समय है रे कर्त्ता ! करनी का अकाल मत कर । तब कार्य- कुशलता क्या करेगी जब तुम्हारा अंत  तुम्हारे सम्मुख होगा ॥  

जिअहि दस पाँच बरस बस,होइहि पलक बिहान । 
कलप अंत अनुमान किए, करें सकल अभिमान ।२०३८ । 
भावार्थ : -- केवल दस पांच बरसों का ही जीना है, लोग  कल्पनाओं की सीमाओं के परे तक जीने का अनुमान कर अपने आप पर घमंड करते हैं जीवन का अंत तो पलभर में ही हो जाता है, अत: कभी समय मत मांगो  ॥ ॥ 

बिलास भवन निबास के, होत बड़प्पन नाए । 
जासु निलयन भवन बड़े, बड़ा सोए कहलाए ।२०३९। 
भावार्थ : -- विलास भवनों इन निवास करने से बड़प्पन नहीं होता  । जिसका हृदय भवन बड़ा हो बड़ा वही कहलाता है ॥ 








----- मिनिस्टर राजू १५० -----

राजू : - माँ खादी कि चादर दे, मैं गांधी बन जाउँ ।

राजू की माँ : --  पर पुत्तर बिड़ला बाला, भवन कहाँ ते लाउँ ॥
                         तू जो है वही रह.....

शनिवार, 15 नवंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २०९ ॥ -----

जोइ पालन जानि सोइ, जानै आयसु दान । 
अज्ञप्ति करन ते पहिले, आज्ञा पालन जान  ।२०९१ । 
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- जो आज्ञा का पालन करना जानते हैं वही आज्ञा देना जान सकते हैं ॥ पहले आदेशों का पालन करना सीखना चाहिए ततपश्चात कोई आदेश अथवा निर्देश देना चाहिए ॥ 

तो अब से जनता जनार्दन जो आदेश दे उसका पालन करो फिर किसी को कोई आदेश दो  .....

जग मैं अपने आप कू, समुझैं सबहि महान । 
प्रतिपालन कू छाँड़ के, कूदे नेम गठान ।२०९२ । 
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- संसार में सभी स्वयं को महान समझते हुवे नियमों का प्रतिपालन त्याग कर नियम गढ़ने के लिए कूदे जा रहे हैं सारे नेता बनना चाहते हैं ॥ 

आज्ञा पालन के बिना एकसूत्रता सम्भव नहीं होती.....

सेवक सरिस सेवक तो, जग मह बहुतक आहि । 
स्वामी सरिस स्वामी, अगजग लग को नाहि ।२०९३ । 
----- ॥  गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ : -- ऐसे सेवकों के समान सेवक तो संसार में बहुंत मिल जाएंगे । किन्तु भारत की जनता जनार्दन के जैसा स्वामी संसार भर में कहीं नहीं हैं । 

छनु भंगुरा प्रपंच है, जीवन कवन अधार । 
खाट पड़े जिन् पछताहु  तिन कृत पहिले कार ।२०९४ । 
------ ॥ विदुर नीति ॥ -----

येन खट्वां समारूढ: परितप्येत कर्मणा । 
आदावेव न तत् कुर्यादध्रुवे जीविते सति ॥ २९ ॥ 
भावार्थ : -- जगत का प्रपंच क्षणभंगुर है तो उसके सम्मुख इस जीवन का क्या ठिकाना।अत: वे  कार्य पहले कर लेने चाहिए जिन्हें न करने पर बाद में खट्वा में पड़कर पश्चाताप करना पड़े ॥ 

चित्त के संगत चित्त मिले रहस रहस के संग । 
बुद्धि संगत बुद्धि मिले, मितता होत न भंग ।२०९५। 
    ----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : --  यदि चित्त के संग चित्त,  रहस्यों के संग रहस्य,  बुद्धि के संग बुद्धि का सुसंयोग हो तो मैत्री कभी भंग नहीं होती ।

बुद्धि बिद्या धर्म बय, जोइ बड़ापन पाए । 
कृताकृत के पूछ करै, कबहु न मोह सताए ।२०९६। 
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- जो बुद्धि,धर्म, विद्या व् अवस्था में बड़े से आदर सहित कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य से संबंधित प्रश्न करता है वह कभी मोह में नहीं पड़ता ॥
जीवन नदि दया तरंग सत्कृत तीरथ थान । 
धृतिकूल असनात सदा, होत पबित पुनबान ।२०९७। 
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----

भावार्थ : -- भारत ! यह जीवात्मा एक नदी है सत्य स्वरूप परमात्मा से इसका उद्गम हुवा है  धर्य ही इसके दो तट हैं जिसमें दया की तरंगे उठती हैं, पुण्य-कर्ता मनुष्य इसमें स्नान करके पवित्र  होता है क्योंकि लोभ रहित आत्मा सदा पवित्र ही होती है ॥ 

फल भव मोचन सों पाए चरन भगवान । 
एहि बिधि धन के एकै फल,धर्म हेतु अनुठान ।२१५५। 
 ----- ॥ श्रीमद भगवद् पुराण १ । २ । ९-१० । ॥ -----
भावार्थ : -- धर्म का फल ही संसार के बंधनों से मुक्ति व् ईश्वर की प्राप्ति । इससे कुछ सांसारिक विभूतियां उपार्जित  कर ली तो यह धर्म की सफलता नहीं है । इसी प्रकार धन का एकमात्र फल है -- धर्म का अनुष्ठान; वह न करके इससे यदि विलास सामग्रियाँ एकत्र कर लीं तो वह कोई सफलता नहीं ॥

जाकी हार न चाहिबे, वाके हुँत कल्यान । 
खल हो कि भल सकल बचन, बिन पूछे दे कान ।२१५६।
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- मनुष्य को चाहिए कि वह जिसकी पराजय नहीं चाहता है, उसको बिना पूछे कल्याणकारी अथवा अनिष्ठाशंसी भली-बुरी जो भी बात हो उससे कह दे ॥

काल कलुषित सम्पद सों ढकै नहीं को पाप  ।
ऐसो ढकनी उभारै अबर  अबर संताप  ।२१५७। 
 ----- ॥ विदुर-नीति ॥ -----
भावार्थ : -- अनुचित मार्ग से प्राप्त हुवे धन के द्वारा कोई दोष नहीं छिपता । ऐसे छिपाव के प्रयास से अन्यान्य दोष प्रकट हो जाते हैं ॥

जितेन्द्रिय के सासक गुरु, खलमन को जन पाल । 
छिपे छिपे जो पाप किए, तिनके सासक काल ।२१५८। 
 ----- ॥ विदुर -नीति ॥ -----
भावार्थ : -- जिंतेंद्रिय पुरुष का शासक गुरु होता है । दुष्टों का शासक राजा होता है सेवक नहीं ॥ जो गुप्त रीति से दोष कारित करते हैं उनका शासक यमराज होता है ॥

को वस्तु नहि आपनी,जहँ न होत  को राए । 
मीन सरिस सब  लोग  तहँ लेइ  परस्पर खाएँ ।२१५९। 
-----॥ महर्षि  वाल्मीकि ॥ -----
भावार्थ : -- जहाँ कोई राजा नहीं होता वहां कोई भी वस्तु अपनी नहीं होती, जहां  कोई वस्तु अपनी न हो वहां शासन व्यवस्था नहीं होती  । मछली की भांति वहां सब लोग एक दूसरे को खाने में लगे रहते हैं ॥

स्वाध्ययन सत्योधन धरम करम करताए ।
संतापित तापस चरन बिहनै सुख बरधाए ॥ ३२६० ॥  

----- ॥ विदूर नीति ॥ -----
भावार्थ : - आवृत्ति पूर्वक अध्ययन, न्यायोचित युद्ध, पुण्यकर्म व् संतप्त तपस्या से अंत में सुख की वृद्धि होती है ॥ 
















गुरुवार, 13 नवंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २०२ ॥ -----

नीचकी पद पैहत भए  सबहि जगत बिद्वान । 
जेसेउ  नीचे निपते, पूछे नाहि सुवान ।२०२१ । 
भावार्थ : -- ऊँचा पदक  प्राप्त होते ही सभी जगत विद्वान हो जाते हैं । जैसे ही वह उस पदक से नीचे उतरते  हैं उन्हें कुत्ते भी नहीं पूछते ॥

संत सुधिजन की बानी, कही गई उपदेस । 
बिदुजन सर्वत्र पूजिनिअ, राजन अपने देस ।२०२२। 
भावार्थ : -- संतो सुधीजनों की वाणी यह उपदेश कर गई है कि विद्वान सर्वत्र पूज्यनीय है राजा अपने देश में ही पूज्यनीय है,  और भिखारी  केवल अपने घर में पूज्यनीय है ॥

जहँ लज्जा तहँ लावना , जहँ सद्गुन तहँ रूप । 
जोई चाल चरित गढ़े, सोई भेस अनूप ।२०२३। 
भावार्थ  : -- जहां लज्जा होती है वहीँ सौंदर्य होता है । जहाँ सद्गुण होते हैं वहीं रूप होता है ॥ जो  शील एवं सदाचार-वृत्ति का निर्माण करती हो वेशभूषा वही उत्तम होती है ॥ 

अनुरति बिनु अनुराग नहि, बिरति बिनु बैराग । 
लवनाई बिनु लाग नहिं, अलगाई बिनु आग ।२०२४ । 
भावार्थ : - आसक्ति  बिना अनुराग नहीं होता विरक्ति बिना वैराग नहीं होता । सुंदरता बिना चित्त कहीं प्रवृत्त नहीं होता , लगाए बिना आग नहीं लगती ॥

प्रियतमा हो प्रान समा, प्रीतम प्रान अधार । 
दूनौ के सील सौमुख, बिरथा सब सिंगार ।२०२५। 
भावार्थ : -- प्रियतमा यदि प्राण प्रिया हों ( प्रेतात्मा नहीं रे ) प्रियतम प्राणाधार हों । दोनों के मध्य संकोच का भाव उपस्थित हो तो उस श्रृंगार सम्मुख सभी श्रृंगार व्यर्थ हैं ॥

परसासन सब काजु किए, सासन किए किछु नाह । 
ऐसी दुरब्यसनी को, राखन के का लाह ।२०२६ । 
भावार्थ : -- जब समस्त कार्य प्रशासन ही निष्पादित कर रहा हो, शासन कुछ नहीं कर रहा हो  । तब ऐसे दुर्व्यसनी शासन को रखने से क्या लाभ,  यह तो अपव्यय है ॥

नेम निबंधन रचे बहु, पालन करे न कोइ । 
नेम बंध्या आपुना, आपहि ताड़क होइ ।२०२७। 
भवार्थ : - नियम निबंधन तो भतेरे रचे पड़े हैं पालनहार भी तो कोई हो ।  स्वयं नियम बनाते हैं स्वयं ही उसे तोड़ते हैं॥

राजू : -- लो समय काटने के लिए और कुछ काम नहीं है का..... नहीं है तो हम बता दें.....

दंड पासक कंठ गहे, करे बहुंत संग्राम । 
देस निबासि कहत फिरें, माया मिली न राम । २०२८। 
भावार्थ : -- फांसी को गले में लटकाए सेनानियों ने स्वतंत्रता के लिए बहुंत संग्राम किया..... मर मर गए भई.....अब तो देश वासी कहते फिर रहे हैं प्राण भी गए और स्वाधीनता भी नहीं मिली.....फोकट का रोना रह गया.....

देस निबासी गरब किए, जन्मे हीरा लाल । 
कलुखित जोनिज होइ के, होए कोयरी काल ।२०२९ । 
भावार्थ : - देश वासियों गर्व करते फिरे देखो म्हारे देस नै  कैसे हीरे लाल जन्में हैं । फिर क्या हुवा वर्ण संकर हो कर के काला कोयला सिद्ध हुवे ॥

जन जन माँसाहारि भए, सड़े देस मैं नाज ।
एहि अहैं स्वाधीनता, तिन्हनि कहत सुराज ।२०३०। 
भावार्थ : --  देशवासी मांसादी हो गए हैं, अनाज है की सड़ रहा है |  क्या यही है स्वाधीनता ? इसको स्वराज बोलते हैं.....? ऐसी स्वाधीनता के लिए गोली खाने से अच्छा है अपने घर में बैठे रहें..... 








----- मिनिस्टर राजू १४९ -----

राजू : -- मास्टर जी ! इन नेता-मंत्रियों के सिर से राजत्व भूत अर्थात राजा के भाव का भूत कब उतरेगा..? 

 " जब जनता जनार्दन के सिर से 'गाँधी' का भूत उतरेगा तब "

राजू : -- कठिन ही मास्टर जी ! 

 " का कठिन है " 

राजू : -- भूत उतारना और का .....मास्टर जी ! मास्टर जी ! गाना सुनाओ ना  

" कौन सा ? पच्छिम बाला की पूरब बाला " 

राजू : - मास्टर जी ! सूरज बाला.....
  

मंगलवार, 11 नवंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २०१ ॥ -----,

ताडन की अधिकारी सो, नारी कोई कोइ । 
ढोर गँवारु नीच पुरुष, अजहुँ त घर घर होइ ।२०११। 
भावार्थ : - ताड़न की अधिकारी कोई विरलई ही होगी किन्तु समय ऐसा ला दिया गया  कि अब तो ढोर, गँवार और नीच पुरुष घर घर में मिलने लगे हैं ॥

अजहुँ पुरुख जाति पहिले, खींचे आपनि रेख । 
मर्यादा निर्धार के, फिर नारी की लेख ।२०१२। 
भावार्थ : -- अब तो पुरुष जाति पहले अपनी लक्ष्मण-रेखा खेंचे ।  ततपश्चात नारी की लेख कर उसकी मर्यादा निर्धरित करे ॥

अधुनै  काल अस दूषित, होइ प्रुख की जाति । 
धर्म चरण न जानपनी, घनि परबंचनताति ।२०१३। 
भावार्थ : -- इस आधुनिक काल में पुरुष-जाति ऐसी दूषित हो गई है कि वह न दया न दान न सत्य जानती है समझदारी तो किसी में रही ही नही,  उसकी बुद्धि में मूर्खता का भाव और ठगी का धंधा बहुंत अधिक समां गया है ॥

 कन्याओं को साड़ी पहने देखा होगा....क्या  किसी युवा पुरुष को धोती पहने देखा है.....? हम नारी के वेश की चर्चा  तो बहुंत करते हैं,  पुरुष को भूल जाते हैं.....

अपनी कही कथनी मैं, आवै बहुंत सुवाद । 
दूजन के मुख की कही लगिहै सब बकवाद ।२०१४। 
भावार्थ : -- अपनी कही बातों में तो बहुंत स्वाद आता है  । दूसरों के  मुख की कही हुई सारी बातें बकवास लगती हैं ॥

कबहुँ त इत की हाँक दिए, कबहुँ उत की हाँकि ।
तब बासुकि बिष तरे जब, जिह भयउ दुइ फाँकि ।२०१५ । 
भावार्थ : -- कभी तो इधर की हाँक देती है कभी उधर की हाँक देती है ।जिह्वा में तब विषधारी का विष उतर आता है जब वो दो फाड़ हो जाती है ॥

जिबिहा घर की भेदिआ, भेद रही सब खोल । 
अधर ताखड़ी भार धर, तोल मोल के बोल ।२०१६। 
भावार्थ : -- जिह्वा घर की भेदी होती है वह सारे भेद खोल रही है ।  अधरों की ताखड़ी में बाट- बटखड़े रखकर पहले मोल कर फिर तोल कर तब फिर बोलना चाहिए  ॥

सम्मति के दातार नै, कैसे कर मत दाए । 
बरन  संकर बाढ़ बढ़इ, गो कुल बढ़ ना पाए ।२०१७। 

भावार्थ : --  सम्मति  के दातार  कैसे हाथों में अपना मत दे दिया  । यह मत वर्ण संकर की तो बाढ़ बढ़ाए चला जा रहा है, गोकुल की रोक रहा ही ॥ 

जाति धरम संकरज कू, जीवन समझ न आए । 
मरे परिजन फेंके की, दाहैं की गढ़ियाएँ ।२०१८। 

भावार्थ : -- जाति  व् धर्म संकर के जातक को जीवन समझ नहीं आता ।  कैसे ?  ऐसे : -- परिजन मर गया.....उसका क्या करें..... फेंके की दाग दें की गढ़िया दें.....चलो गढ़िया दिया किन्तु कितनी बार गढ़ियाएं.....कहाँ कहाँ गढ़ियाएं.....  

जीवन मरनि सिखलावै, धरम चरन की लीक । 
यहु साधु पथ जो साधै,नित कृत कारज नीक ।२०१९ । 
भावार्थ : -- धर्म के आचार -व्यवहार हमें जीवन-मरण चर्या की शिक्षा देते हैं । यह वह सन्मार्ग हैं जो हमारे जीवनचक्र को लोकरीतियों से सुंदरता पूर्वक संचालित करते  है ॥ धर्म यह शिक्षा देता है कि जीवन-मरणि पर हम क्या करें । जाति यह शिक्षा कि किस रीती से कैसे करें ॥ 

जाति धरम सब भूर के, नाउ धरे जो अंक । 
मात पिता हुँत मरे सम, कुल हुँत होत कलंक ।२०२० । 
भावार्थ : -- जो जातक जाति- धर्म विस्मृत कर अपने नाम के स्थान पर अंक रख लेते हैं । वह माता पिता के लिए मरे हुवे  के तुल्य व् कुल के लिए कलंक होते हैं क्योंकि नाम, उपनाम माता-पिता सहित पितृगण व् वंशवृक्ष का द्योतक होता है ॥  






शनिवार, 8 नवंबर 2014

----- मिनिस्टर राजू १४८ -----

राजू : -- मास्टर जी ! ये भ्रष्टाचार भी अब तो सर्वत्र व्याप्त हो गया है आगे भी, पीछे भी, नीचे भी और ऊपर भी..,

" वो कैसे ? " 

राजू : -- मास्टर जी ! वो ऐसे कि हम सौ नेता ऊपर भेजते हैं पहुँचते दस पंद्रह ही है वो देखिए कोई खाट में पड़ा है, कोई घाट में पड़ा है,  कोई बाट में खड़ा है.....  

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २०० ॥ -----

जेतक माहि भाग बँधे, तेतक ही फल खाएँ । 
भाजक अंस सेष रहे, भाजन के कर दाएँ ।२००१। 
भावार्थ : -- जितने में भाग बंधा हो उतना ही खाना चाहिए । यदि भाजक अंश शेष रह जाए तो उसे उसके   अधिकारी को दे देना चाहिए ॥ 

 जीवन सरलित संचरै, तेतक सम्पद जोए । 
भव भूमि के भंडारी, सुख सांति सब खोए ।२००२ । 
भावार्थ : -- जीवन सरलता पूर्वक संचालित हो इतनी ही सम्पदा जोड़नी चाहिए । क्योंकि भव भूतियों  का भंडारी सुख-शांति से रिक्त  होता है ॥ 

सूत ऐतक कृत कार कि तन मन देइ ढकाए । 
अधिकाधिक का लोभना, दोउ देइ उघराए ।२००३ । 
भावार्थ : -  इतना ही सूत्र होना  चाहिए जो तन और मन  को ढाँप सके । अधिकधिक की लालसा दोनों को निर्वस्त्र कर देती है ॥ 

टिप्पणी : -- चित्त की निर्वस्त्रता वाणी प्रकट कर देती है......

अंतर भाउ राग जने, अभाउ जने द्वेष । 
द्वेष जब कुभाउ जने, रहे न पुनि कछु सेष ।२००४ । 
भावार्थ : -- भाव से भरा चित्त अनुराग को जन्म देता है । अभाव ग्रस्त चित्त विद्वेष  को जन्म देता है । विद्वेष से जब दुर्भावनाएँ जन्म लेती हैं तब फिर कुछ भी शेष नहीं रहता, केवल एक रिक्तता रह जाती है ॥ 

भू भवन धन सम्पद सन , जोड़े लाखों लाख । 
अंत काल के सहुँ आए, होए चिता मैं राख ।२००५। 
भावार्थ : -- भूमि फिर भवन फिर सम्पद-साधन फिर करोडो संचय किया । अंत में जब मृत्य के सम्मुख हुवे तब वह रिक्तता भी चिता में जल के राख हो गई ॥ 

सुख सम्पद सँजोउ के ऐसो कारज कार । 
भाव भरे हरिदै संग, भरे रहे परिवार ।२००६। 
भावार्थ : -- तो.....मोरल ऑफ़ द स्टोरी.....सुख की सम्पदा का संचयन करते हुवे ऐसे सत्कार्य करने चाहिए । जिससे की हृदय  भाव से भरा रहे और घर कुटुम्जनों से ।। 

साजन सन मारग भया , अजहुँत  बहुंत कठोर । 
चल देखे तो भेंट किए, पग पग डाकू चोर ।२००७ । 
भावार्थ : -- सज्जनों विद्यमान समय में  सत्य का पथ बहुंत ही कठोर हो गया है । एक आध महीने चल के देखो तो सही पग पग पर डाकू चोर न मिले तो कहना ॥ 

कहूँ गड़बड़ कहुँ गड़बड़ियाँ अरु कहुँ गड्डम गोल । 
कुपंथि कर सों देस के, बिगड़े सकल भूगोल ।२००८। 
भावार्थ -- कहीं अव्यवस्था है कहीं अवस्थापक  हैं कहीं पर भारी गड़बड़ झाला है घोटाला है हवाला है कहीं पे केवल ला ला है । इन कुपंथियों के हाथों देश का पूरा भूगोल ही बिगड़ गया ।। 

चौहट हाट लगाए के माँग रहे उत्कोच । 
सासन संग परसासन, पाइहु सब ते पोच ।२००९। 
भावार्थ :-- जो बीच चौराहे पर पण ठानते हुवे घूस माँगते हैं घोटाले करते हैं । विद्यमान समय में वह शासन व् प्रशासन, श्रमिक-जगत, व्यापार-जगत, आदि की तुलना में सबसे अधिक भ्रष्ट है ॥

टिप्पणी १  : --  एक तृतीय वर्ग कर्मचारी के पास प्रवास पत्र मिल जाएगा । किन्तु दस लाख की  पूंजी वाले एक व्यापारी के पास गरीबी रेखा का पत्र भी मिल जाए तो बड़ी बात होगी ॥

टिप्पणी २ : -- पूर्व समय में व्यपारी-वर्ग सबसे अधिक भ्रष्ट कहा जाता था.....

भूखे गेही छांड़ के करत तुषित प्रतिबेस । 
तेहि गेह माहि अवसिहि उपजहि भीत कलेस ।२०१०। 
भावार्थ : --  जिस घर में क्षुधा पीड़ित कुटुंब को त्याग कर पड़ोसियों को तृप्त किय जाता हो । उस घर में अंत: क्लेश का उत्पन्न होना निश्चित है ॥







----- मिनिस्टर राजू १४७ -----

" यहाँ सम्बन्ध तोड़े व् जोड़े जाते हैं.., "

राजू : - मास्टर जी ! क्या खोल रहे हो..?

" दूकान "

राजू : - ओह ! मुझे लगा की कचहरी खोल रहे हो.....

" एक ही है.....भई जहां जो नहीं होगा वही तो खुलेगा.....वैसे भी झगड़े निपटाना जुलम तो है नहीं.....

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

----- मिनिस्टर राजू १४६ -----

राजू : -- बाबा रे बाबा !!! मास्टर जी ! ये पाखंडी बाबा तो कहते थे मैं तो दो सो साल जिऊंगा..?

" ये मरी दौलत वाली औरत जीण देगी तब तो जिएगा....."
  

शनिवार, 1 नवंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १९९ ॥ -----

चाहे जी रखे चाहे राखे सौ सौ साँच । 
तापरझूठे बोल की बड़ी कसूती आँच ।१९९१। 
भावार्थ : --   चाहे वह  प्राण रक्षा हेतु ही क्यों न बोले गए हो अथवा सौ सौ सत्य की रक्षा हेतु क्यों न बोले गए  हो असत्य वचन अकल्याण कारी ही सिद्ध होते है ॥ 

कर्म कर अरु कर्म करी, मंदिरु रहे बुहार । 
पुजेरी जी बन ठन के, जता रहे अधिकार ।१९९२ । 
भावार्थ : -- मंदिर को किसे बुहारना चाहिए ? पुजारी को..... बुहार कौन रहा है कर्म चारी और कर्म चारिणी  । अर्थात मंदिरों को दास और दासी से स्वच्छ करवाया जा रहा है और उसके आवक पर बने ठने पुजारी जी अपना अधिकार किए हैं ।। 

हे बिरह मन पहलै तू, सोध आपनी जात । 
ऊँचे पीठ बिराज पुनि, कर दूजन की बात ।१९९३ । 
भावार्थ : - रे बिरहा-मन प्रथमस् तू अपनी जात परिष्कृत कर । ऊँचे आसन पर विराजित होकर फिर दूसरे की बात कर ॥ 

जलद उपजत जलधि संग, अन्न खेत खलिहान । 
ज्ञान उपजत जगत दरस  पुस्त पीठ के पान ।१९९४ । 
भावार्थ  : -- मेघ सागर से उत्पन्न होते हैं अन्न खेत खलिहानों में उत्पन्न होता है । ज्ञान संसार के दर्शन एवं पुस्तक के पृष्ठ-पत्र से उत्पन्न होता है ॥ 

चाहे अर्वाचीन हो, चाहे हो प्राचीन । 
जो जगत परिपीडन दए, सो बिचार है दीन ।१९९५ । 
भावार्थ : -- अर्वाचीन हो चाहे प्राचीन जो विचार सृष्टि एवं सृजन को पीड़ा देता हो वह विचार दरिद्र एवं निकृष्ट है ॥ 

संचालित जनतंत्र कू , चला सकए सब कोए । 
ठाड़ि कू जो चला सके, सत चालक हैं सोए ।१९९६। 
भावार्थ : -- चलती हुई गाडी अथवा चलते हुवे जन तंत्र को तो कोई भी संचालित कर सकता हैं । जो डिब्बा- गाड़ी अथवा स्थिर तंत्र को चला दे वही  कुशल संचालक होता है ॥   

प्लक साफ़ करके साइलेंसर बदल के इंजन ऑयल दे के खड़खड़ बजाते धक्कापेल करते हुवे पंद्रह किलोमीटर का एवरेज देकर अंग्रजों की फटफटिया तो कोई भी चला सकता हैं । इंजन का काम करे इ एवरेज कितना होना चाहिए नब्बे से ऊपर की एवरेज दे.....फिर चला के दिखाए तो जाने.....

एक बुड़बग कहता था हमरी गाड़ी पंद्रह की एवरेज दे रही..... 

सासन सोइ सुसासन, सासक हो जहँ लोग । 
संचालक सेवक हो अरु, दूर रहे भव भोग ।१९९७ । 
भावार्थ : -- शासन वही सुशासन है जहाँ शासक जन सामान्य हो । शासन संचालक सेवक हो, और वे लौकिक सुखों के उपभोग से परहेज करें ॥ 

बिषय भोग की माधुरी, लगे बहुंत ही मीठि । 
वा संग होत आँधरी, ज्ञान गमन की डीठि ।१९९८ । 
भावार्थ : -- विषय भोगों के मिष्टान्न लगते तो बहुंत मीठे हैं । लाल-धोले प्रासादों  में रहना किसे अच्छा नहीं लगता । लेकिन,  किन्तु,  परन्तु ऐसी मिठास से विषयों को जानने व् समझने की दृष्टि अथवा ज्ञान को ग्रहण करने वाली मन की शक्ति क्षीण हो जाती है ॥ 

अधुनातन समऊ कहत, बिषय भोग को ताज । 
पुराण पुनि उपजोग कर, परिहर नउ नउ साज ।१९९९ । 
भावार्थ : -- देश काल एवं परिस्थियाँ सदैव एक जैसी नहीं रहती । इनका उचित  आकलन विवेकी ही कर सकते हैं । विद्यमान समय यह कह रहा है कि हे मानव ! तू नई नई वस्तुओं के उपभोग का परित्याग कर जहां तक हो सके  पुराने वस्तुओं का पुनश्च उपयोग कर इसी में संसार का  कल्याण निहित है ॥ 

लोक तंत्र के नाउ धर करे कूट की नीति । 
राजा भयउ अधिनायक, बरे राज की रीति ।२००० । 
भावार्थ : -- लोक तंत्र का केवल नाम भर है यह वह जन सञ्चालन तंत्र है जहाँ कूट कपट की नीति निर्धारित होती हैं  नेता यहां राजा होते  हैं मतदान एक पाखंड  हैं । यहां पीछे से राजतंत्र की रीतियाँ का ही वरण किया जाता हैं  

यथा : --   यथेष्टाचरण  का वरण कर येन केन प्रकारेण सिंहासन हथियाओ  और जनता पर राज करो ॥ 

 " लोकतंत्र में कूट नीतियों का कोई स्थान नहीं होता , जहाँ ऐसी नीतियां निर्धारित होती हैं वहां लोकतंत्र नहीं है....:" 

स्वतंत्रता संग्राम इस हेतु किया गया कि एक  लोकवादी राष्ट्र की स्थापना हो ।  जो व्यक्ति वादी राष्ट्र  में परिवर्तित हो गया 

कैसे ? ऐसे: -- 

अपना हित साधन हेतु किए जो कालि कमाइ । 
सो तो ऐसी भावना, जो जन हित बिसराए ।। 
----- ॥ लक्ष्मी नारायण मिश्र  ॥ -----

भावार्थ : -- "अनुचित रूप से धन कमाने की प्रवृत्ति लोक हित के विरोध में व्यक्ति हित की  साधना है "

















----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...