जूझ कै भई बूझ कै किए जो सेवा दान ।
चारि चारु परलोक पथ, चौहट करे मिलान ।१९२१।
भावार्थ : -- जो बुराइयों से लड़ते हुवे फिर ज्ञान लेता-देता हो, उसपर सेवा दान देता हो । ऐसा चौंक परलोक के चार सुन्दर मार्ग ( बरहमन - ज्ञानार्जन-व्ययन , क्षत्रिय- समर सम्मुख, वैश्य- दानधर्म, क्षुद्र- सेवाकर्म ) का मिलान करता है ॥
सोइ उदर भूखन मरे, खा खा जो अघयाए ।
सो सदा तुषित रहे जो, दुजी भूख अपनाए ।१९२२।
भावार्थ : -- वह उदर सदा क्षुधित ही रहता है जो भर भर के खाता है । उदर वही तृप्त रहता है जो पराई भूख को अपनाता है ॥
एक हस्त त न्याय करे, दूज करे अन्याय ।
ऐसो अर्जित सकल धन, पापर्जनहि कहाए ।१९२३।
भावार्थ : -- एक हस्त न्याय करता है दूसरा अन्याय करता है । इस भांति का अर्जित समस्त धन पाप अर्जन ही कहलाता है ॥
कनक कनक किए कंकरी, कंकर के एक मूठ ।
सकल साँच असाँच करे, कहे तस एकए झूठ ।१९२४।
भावार्थ : -- जिस प्रकार एक मुठ्ठी कंकड़, कनक कनक को कंकड़ कंकड़ कर देता है । उसी प्रकार एक असत्य समस्त सत्य को असत्य कर देता है ॥
धर्मी जोरन बिलोइए, निकसिहि संतनि सार ।
अधर्मी कू का जोइए, निकसे वासों गार ।१९२५।
भावार्थ : -- धर्मात्माओं के समाज को एकत्र कर उसका मंथन करें तो उसमें से संत-फकीरों का समाज रूपी सार प्राप्त होगा । अधर्मी को क्या जोड़ना उसमें से तो गार ( नेता जी, आतंक, नक्सल, विप्लव वादी ) ही निकलेगी ॥
ब्यबहारि बिरहमन तो, जग मैं भरे बहोत ।
जाका मन थित चिदगगन, बिरहमन सोइ होत ।१९२६।
भावार्थ : - व्यवहारी ब्राम्हण तो जग में भरे पड़े हैं । जिसके अंत: करण में चदानंद घन स्वरूप ब्रम्ह प्रतिष्ठित हो वही सदब्राम्हण है ॥
साधृत भए ब्यास पीठ, अधीस भए बैपारि ।
एक हथ ले एक हथ देइ, ब्यबहारि बन भारि।१९२७।
भावार्थ : --व्यास पीठ भी दुकान हो गई है ।और पीठाधीश दुकानदार । एक हाथ से लेते हैं फिर दूसरे से देते है भारी व्यवहारी हो गए हैं ये । महाराज कथा करवानी है.....? पूछ के देखो..... अष्टांक से नीचे बात ही नहीं करते..... कहते ये ये ००००००० शुन्य मेरे.....पीछे की संख्या जो श्रद्धा हो वो लगा लेना.....अब चोरी डाके बिना ये अंक संकलित होएंगे क्या.....?
ब्यास पीठ बिराज के, बेच रहे जो ज्ञान ।
जननी भगिनी जाता का, बैपारि तिन्ह जान ।१९२८।
भावार्थ : -- व्यास पीठ पर आसित हो कर जो ज्ञान का धिंग धंधा कर रहे हैं । उन्हें उनकी माता बहन-बेटियों का व्यापारी ही समझना चाहिए ॥
पूछ रह सब भारत कू, कहाँ मिलेगी सांति ।
रे सठ पहिले छांड़ तो, तू अपनी आक्राँति ।।
भावार्थ : -- सब भारत से प्रश्न करते हैं ये शांति कहाँ मिलेगी । तू पहले ये चढ़ा चढ़ाई की होड़, पराभूत करने वाले, अधिपत्य स्थापित करने वाले कुभावों का त्याग कर फिर मिल जाएगी ॥
लोगिन्हि सोइ सोइ किए, जोइ करें सब कोइ ।
कारज सोए करन भला, करे नहीं को जोइ ।१९२९।
भावार्थ : -- लोग बाग वही करते है जो सब कोई करते हैं । जहाँ भीड़ देखि नहीं वहीँ घुस जाते हैं कार्य वही करना उत्तम है जो कोई न करे । मंदिर में भारी भीड़ है गॉवों भूखी है उन्हें दो ।गॉवों को सब देवे तब मंदिर में देना चाहिए । जब सब नेता गिरी कर रहे हों तो क्या करना चाहिए ताना गिरी करना चाहिए ॥
कारज हो अकारज हो , दोउ समय के जोग ।
उचित संग सुजोग अहै, अनुचित संग कुजोग ।१९३०।
भावार्थ : -- कार्य हो चाहे अकार्य हो दोनों ही समय से बंधे हैं । यदि समय उचित है तब सब शुभ शुभ ही होता है, यदि समय अनुचित है तब सब अशुभ ही होता है ॥
चारि चारु परलोक पथ, चौहट करे मिलान ।१९२१।
भावार्थ : -- जो बुराइयों से लड़ते हुवे फिर ज्ञान लेता-देता हो, उसपर सेवा दान देता हो । ऐसा चौंक परलोक के चार सुन्दर मार्ग ( बरहमन - ज्ञानार्जन-व्ययन , क्षत्रिय- समर सम्मुख, वैश्य- दानधर्म, क्षुद्र- सेवाकर्म ) का मिलान करता है ॥
सोइ उदर भूखन मरे, खा खा जो अघयाए ।
सो सदा तुषित रहे जो, दुजी भूख अपनाए ।१९२२।
भावार्थ : -- वह उदर सदा क्षुधित ही रहता है जो भर भर के खाता है । उदर वही तृप्त रहता है जो पराई भूख को अपनाता है ॥
एक हस्त त न्याय करे, दूज करे अन्याय ।
ऐसो अर्जित सकल धन, पापर्जनहि कहाए ।१९२३।
भावार्थ : -- एक हस्त न्याय करता है दूसरा अन्याय करता है । इस भांति का अर्जित समस्त धन पाप अर्जन ही कहलाता है ॥
कनक कनक किए कंकरी, कंकर के एक मूठ ।
सकल साँच असाँच करे, कहे तस एकए झूठ ।१९२४।
भावार्थ : -- जिस प्रकार एक मुठ्ठी कंकड़, कनक कनक को कंकड़ कंकड़ कर देता है । उसी प्रकार एक असत्य समस्त सत्य को असत्य कर देता है ॥
धर्मी जोरन बिलोइए, निकसिहि संतनि सार ।
अधर्मी कू का जोइए, निकसे वासों गार ।१९२५।
भावार्थ : -- धर्मात्माओं के समाज को एकत्र कर उसका मंथन करें तो उसमें से संत-फकीरों का समाज रूपी सार प्राप्त होगा । अधर्मी को क्या जोड़ना उसमें से तो गार ( नेता जी, आतंक, नक्सल, विप्लव वादी ) ही निकलेगी ॥
ब्यबहारि बिरहमन तो, जग मैं भरे बहोत ।
जाका मन थित चिदगगन, बिरहमन सोइ होत ।१९२६।
भावार्थ : - व्यवहारी ब्राम्हण तो जग में भरे पड़े हैं । जिसके अंत: करण में चदानंद घन स्वरूप ब्रम्ह प्रतिष्ठित हो वही सदब्राम्हण है ॥
साधृत भए ब्यास पीठ, अधीस भए बैपारि ।
एक हथ ले एक हथ देइ, ब्यबहारि बन भारि।१९२७।
भावार्थ : --व्यास पीठ भी दुकान हो गई है ।और पीठाधीश दुकानदार । एक हाथ से लेते हैं फिर दूसरे से देते है भारी व्यवहारी हो गए हैं ये । महाराज कथा करवानी है.....? पूछ के देखो..... अष्टांक से नीचे बात ही नहीं करते..... कहते ये ये ००००००० शुन्य मेरे.....पीछे की संख्या जो श्रद्धा हो वो लगा लेना.....अब चोरी डाके बिना ये अंक संकलित होएंगे क्या.....?
ब्यास पीठ बिराज के, बेच रहे जो ज्ञान ।
जननी भगिनी जाता का, बैपारि तिन्ह जान ।१९२८।
भावार्थ : -- व्यास पीठ पर आसित हो कर जो ज्ञान का धिंग धंधा कर रहे हैं । उन्हें उनकी माता बहन-बेटियों का व्यापारी ही समझना चाहिए ॥
पूछ रह सब भारत कू, कहाँ मिलेगी सांति ।
रे सठ पहिले छांड़ तो, तू अपनी आक्राँति ।।
भावार्थ : -- सब भारत से प्रश्न करते हैं ये शांति कहाँ मिलेगी । तू पहले ये चढ़ा चढ़ाई की होड़, पराभूत करने वाले, अधिपत्य स्थापित करने वाले कुभावों का त्याग कर फिर मिल जाएगी ॥
लोगिन्हि सोइ सोइ किए, जोइ करें सब कोइ ।
कारज सोए करन भला, करे नहीं को जोइ ।१९२९।
भावार्थ : -- लोग बाग वही करते है जो सब कोई करते हैं । जहाँ भीड़ देखि नहीं वहीँ घुस जाते हैं कार्य वही करना उत्तम है जो कोई न करे । मंदिर में भारी भीड़ है गॉवों भूखी है उन्हें दो ।गॉवों को सब देवे तब मंदिर में देना चाहिए । जब सब नेता गिरी कर रहे हों तो क्या करना चाहिए ताना गिरी करना चाहिए ॥
कारज हो अकारज हो , दोउ समय के जोग ।
उचित संग सुजोग अहै, अनुचित संग कुजोग ।१९३०।
भावार्थ : -- कार्य हो चाहे अकार्य हो दोनों ही समय से बंधे हैं । यदि समय उचित है तब सब शुभ शुभ ही होता है, यदि समय अनुचित है तब सब अशुभ ही होता है ॥
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें