मंगलवार, 28 अक्टूबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १९८ ॥ -----

मानस बिय बुराई के, बोए बहुत इतराए । 
बहुरि पोषन  पाई के, साख परन फल आए ।१९८१ । 
भावार्थ : -- रे मानव तुमने इतरा इतरा के जो बुराई के बीज बोए थे ।  वह पोषण को  प्राप्त हो गए हैं अब तो उसमें शाख-पत्र  प्रस्फुटित हो गए हैं और वह फलीभूत भी हो गया ॥ 



भले तरु भलाई फले, बुरे तरु मैं बुराइ । 
खल तरु मैं तौं खल फले, भल में संत सहाइ ।१९८२। 
भावार्थ : -- भले  तरुवर में भलाई ही फलती है बुरे तरुवर में बुराई ही फलती ही । दुष्टता के तरुवर में दुष्टता फलती ही, आतंक फलता है, एवं सज्जनता के  तरुवर में संत सहाई फलते हैं ॥

पद प्रतिठा धन जोग के, उठा न कोउ समाज । 
जे तौ तबहि उभरे जब  किए सत सेवा काज ।१९८३। 
भावार्थ : - पद प्रतिष्ठा व् धन की प्राप्ति से समाज का उद्धरण नहीं होता । जाति एवं समाज का उद्धरण तभी  होता है जब सेवा व् कृतकार्य किया जाए ॥

रच्छा अवसरु पाए के, उत्थाईं कोउ एक । 
जो सत सेवा काज किए, उठएँ सकल समवेत ।१९८४। 
भावार्थ : -- सुरक्षित किवे गए अवसरों को प्राप्त कर कोई एक उठता है जो अनेको को  निचे गिरा देता है ॥ किन्तु यदि वही एक समाज सेवा के सह सत्कार्य करे तो जाति सहित सम्पूर्ण समाज का उत्थान संभव है ॥

जिन्ह जन की मनसा रहि सदैव लेवन माहि । 
तिन्ह जन के कोष गहे गुन सम्पद कभु नाहि ।१९८५। 
भावार्थ : -- जिन लोगों मंशा सदैव  लेने में ही होती है । उन लोगों के कोष में गुणों की सम्पदा का अभाव रहता है ॥

रनोपकरन सो उपकरन, जो जन के रखबार । 
जो अरि चोट चपेट किए होत सोइ हथियार  ।१९८६। 
भावार्थ : -- वह उपकरण रणोपकरण है जो रणभूमि में जनता की रक्षा करे । आयुध वही है जो शत्रुओं को चोटिल कर दे, अन्यथा तो सभी लोहा है ।

भारत खंड ने देखे, बड़े बड़े साम्राज । 
रावन हो कि रामराज, जमन कि अँगुली राज ।१९८७ । 
भावार्थ : -- यह भारत खंड है साहेब । इसने बड़े बड़े साम्राज्य देखें है चाहे वह रावण राज हो या राम राज हो एवं राज हो या फिर अंगेरजी राज,  सामरिक विषयों में इससे अधिक अनुभवी न कोई हुवा न होगा ॥ 

प्रानी जन रखे चाहे रखेव दिवस के कान । 
जामें जीवन हानि हो, तिन उपकरन न मान ।१९८८। 
भावार्थ : -- चाहे  वह प्राणीजनों की रक्षा करता हो चाहे राष्ट्र  सहित सीमा की सुरक्षा करता हो ।  रणोपकरण में उस उपकरण की गणना नहीं की जानी चाहिए जिसमें निज राष्ट्र के जीवन की हानि होती हो ॥

मानवबम रणायुध नहीं होने चाहिए ।

क्या परमाणु गोले निज राष्ट्र के जीवन हेतु सुरक्षित हैं.....?

गौवें रूरत फिर रही, कहँ हैं पालन हार । 
मंत्रियों ने बना दिया, उनको मच्छी मार ।१९८९। 
भावार्थ : -- गौवें तो ठोकर खाती फिर रही हैं,  कहाँ हैं गौपाल । इन दुष्ट मंत्रियों ने उनको मछरी मार बना दिया ॥

ये दुष्ट मंत्री  किसानों को कहते हैं, मछली पालो, खेती-वेती छोडो खेत हमें दे दो हम उन्हें उद्योग पतियों को देंगे । 

देखत करतब आपुना, गरब करे सब कोए । 
ऐसो कारज किजीये, गरब दूज को होए ।१९९०। 
भावार्थ : -- अपना कौशल देखकर तो अपने आप पर तो सभी गर्व करते हैं । ऐसे कार्य करने चाहिए कि अपने ऊपर दूसरों को गर्व हो ।। 

अपना गाल तो सभी बजाते हैं ऐसे कार्य करने चाहिए कि दूसरे ताल बजाएं..... 





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