जहँ ग्यान तहँ भल नीति, जहाँ दान तहँ नीत ।
जहाँ जगहीत तहँ धर्म, जहाँ धर्म तहँ जीत ।१९७१ ।
भावार्थ : -- जहाँ ज्ञान है भली भली नीतियां भी वहीँ होती है जहाँ दान है धन भी वहीँ होता है । जहाँ जगहीत है धर्म उसी के पक्ष में होता है और जहां धर्म होता है वहीँ जीत होती है ॥
दान संग कल्यान है दान सुरग सोपान
दान के तिनि बिधान मैं , सबसे उत्तम ज्ञान ।१९७२ ।
भावार्थ : --दान कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है दान ही स्वर्ग-सोपान है ।दन के तीन विधान में (भौतिक वस्तुओं का दान, बौद्धिक वस्तुओं का दान, अध्यात्म अथवा ज्ञान का दान )सबसे उत्तम ज्ञान का दान है ।
एक ते पहले आठ किए, बहुरि आठ ते साठ ।
अजहुँ त पार गमन हुवे , भ्रष्ट चरन परिकाठ ।१९७३ ।
भावार्थ : -- सबसे निकृष्ट दान है बौद्धिक वस्तुओं का दान जिसमें मत दान भी सम्मिलित है \ काहे की इसको देने के लिए बहुंत सोचना पड़ता है । देखो तुमने किसको दिया : --
जिसने पहले एक से आठ किए फिर आठ के साठ । अब तो यह भ्रष्टाचार परिकाष्ठा को पार कर गया है ॥
तीनि बरन की चाकरी भयउ बरस कुल चार ।
चाकर अबर बाहि संग, रचे मनिक आगार ।१९७४ ।
भावार्थ : -- चारपांच वर्ष पुराने एक तृतीय वर्ग के कर्मचारी का कुल पारिश्रमिक कितना होगा यही कोई सात -आठ लाख लाख ॥ पर यहाँ तो सेवक के पास दो तीन उत्तम वाहन है फटिक रचना वाला भव्य भवन भी हो गया है ॥
गुरु गधा ही रहा । लटक लटक के पास होने वाले चेले चीनी हो गए और उनके भी चेले मिश्री हो गए .....
काल करम के पोखरा, पोठे लहुरी मीन ।
पलत पोस बढ़के तहाँ, होइहि केतक पीन ।१९७५।
भावार्थ : -- काले कुकर्मों के पोखर मैं जब छोटी छोटी मछलियाँ इतनी पोठ हैं तब द्वितीय फिर प्रथम फिर शासन फिर मंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री तत्पश्चात प्रधान मंत्री रूपी बड़े बड़े मगर मच्छ पलते पोषित होते कितने पुष्ट होंगे ॥
ऐसा दान एक दिन अपने ही घर को नरक बना देता है.....
भ्रष्ट चरन रे मूरखा करत बहुत इतराए ।
जो एक किए तो पांच गुन, बनके घर बहुराए ।१९७६।
भावार्थ : -- भ्रष्ट आचरण करते हुवे बहुंत इतराते हो न । मूर्खों गधो-खच्चरों यदि तुम एक करते हो तो वह तुम्हारे घर पांच बनके लौटता है ॥
धरम सकलित बिचार हैं, धर्म जनम आधार ।
देस काल बै जोग के, करौ समुचित सुधार ।१९७७।
भावार्थ : -- धर्म क्या है ? सुविचारों का संकलन ही तो है । देश काल एवं परिस्थितियों का अवलोकन कर इसमें सावधानी पूर्वक सुधार करते रहना चाहिए ॥
जिस प्रकार एक मीन सारे तालाब को गन्दा कर देती है उसी प्रकार एक कुविचार पूरे धर्म के निंदा का कारण बनता है.....
धर्म जाति जमोगन है , सार तीज तौहार ।
देसज समाज संग जो , बाँध रखे परिबार ।१९७८।
भावार्थ : - धर्म एवं जाति यदि जुड़ावन हैं तो तीज त्यौहार उसका सार हैं जो देसवासियों सहित समाज एवं परिवार को दृढ़ता पूर्वक बांध रखते हैं ॥
कोई त्यौहार किसी एक धर्म का होता है, कोई त्यौहार किसी विशिष्ट जाति का होता है, कोई त्यौहार किसी स्थान विशेष का होता है ।।
धर्म जाति बपुरधर हैं त , परब हार सिंगार।
तामें रीति के मनि कू, गाठों सोच बिचार ।१९७९।
भावार्थ : -- धर्म-जाति यदि सुन्दर शरीर हैं तो त्यौहार उसका श्रृंगार हैं ( संस्कार उसके वस्त्र हैं ) अस हर में फिर रीतियों की मणियों को सोच समझ कर पिरोना चाहिए ॥ रीतियाँ ऐसी होनी चाहिए कि उससे जीवन, धन एवं वातावरण की हानि न हो ॥
बोअन हारु ने त बोए एकै मूठिका नाज ।
पालन पोषण पेह के, बढ़े बाके समाज ।१९८० ।
भावार्थ : -- बोने वाले यद्यपि एक मुष्टिका अनाज ही बोता है । पालित व् पोषित होकर ही उसका समाज विस्तार को प्राप्त होता है ॥
भलाई हो अथवा बुराई हो वह कतिपय से ही प्रारम्भ होती है व् पालित पोषित होकर अतिसय पर समाप्त होती है ॥
जहाँ जगहीत तहँ धर्म, जहाँ धर्म तहँ जीत ।१९७१ ।
भावार्थ : -- जहाँ ज्ञान है भली भली नीतियां भी वहीँ होती है जहाँ दान है धन भी वहीँ होता है । जहाँ जगहीत है धर्म उसी के पक्ष में होता है और जहां धर्म होता है वहीँ जीत होती है ॥
दान संग कल्यान है दान सुरग सोपान
दान के तिनि बिधान मैं , सबसे उत्तम ज्ञान ।१९७२ ।
भावार्थ : --दान कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है दान ही स्वर्ग-सोपान है ।दन के तीन विधान में (भौतिक वस्तुओं का दान, बौद्धिक वस्तुओं का दान, अध्यात्म अथवा ज्ञान का दान )सबसे उत्तम ज्ञान का दान है ।
एक ते पहले आठ किए, बहुरि आठ ते साठ ।
अजहुँ त पार गमन हुवे , भ्रष्ट चरन परिकाठ ।१९७३ ।
भावार्थ : -- सबसे निकृष्ट दान है बौद्धिक वस्तुओं का दान जिसमें मत दान भी सम्मिलित है \ काहे की इसको देने के लिए बहुंत सोचना पड़ता है । देखो तुमने किसको दिया : --
जिसने पहले एक से आठ किए फिर आठ के साठ । अब तो यह भ्रष्टाचार परिकाष्ठा को पार कर गया है ॥
तीनि बरन की चाकरी भयउ बरस कुल चार ।
चाकर अबर बाहि संग, रचे मनिक आगार ।१९७४ ।
भावार्थ : -- चारपांच वर्ष पुराने एक तृतीय वर्ग के कर्मचारी का कुल पारिश्रमिक कितना होगा यही कोई सात -आठ लाख लाख ॥ पर यहाँ तो सेवक के पास दो तीन उत्तम वाहन है फटिक रचना वाला भव्य भवन भी हो गया है ॥
गुरु गधा ही रहा । लटक लटक के पास होने वाले चेले चीनी हो गए और उनके भी चेले मिश्री हो गए .....
काल करम के पोखरा, पोठे लहुरी मीन ।
पलत पोस बढ़के तहाँ, होइहि केतक पीन ।१९७५।
भावार्थ : -- काले कुकर्मों के पोखर मैं जब छोटी छोटी मछलियाँ इतनी पोठ हैं तब द्वितीय फिर प्रथम फिर शासन फिर मंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री तत्पश्चात प्रधान मंत्री रूपी बड़े बड़े मगर मच्छ पलते पोषित होते कितने पुष्ट होंगे ॥
ऐसा दान एक दिन अपने ही घर को नरक बना देता है.....
भ्रष्ट चरन रे मूरखा करत बहुत इतराए ।
जो एक किए तो पांच गुन, बनके घर बहुराए ।१९७६।
भावार्थ : -- भ्रष्ट आचरण करते हुवे बहुंत इतराते हो न । मूर्खों गधो-खच्चरों यदि तुम एक करते हो तो वह तुम्हारे घर पांच बनके लौटता है ॥
धरम सकलित बिचार हैं, धर्म जनम आधार ।
देस काल बै जोग के, करौ समुचित सुधार ।१९७७।
भावार्थ : -- धर्म क्या है ? सुविचारों का संकलन ही तो है । देश काल एवं परिस्थितियों का अवलोकन कर इसमें सावधानी पूर्वक सुधार करते रहना चाहिए ॥
जिस प्रकार एक मीन सारे तालाब को गन्दा कर देती है उसी प्रकार एक कुविचार पूरे धर्म के निंदा का कारण बनता है.....
धर्म जाति जमोगन है , सार तीज तौहार ।
देसज समाज संग जो , बाँध रखे परिबार ।१९७८।
भावार्थ : - धर्म एवं जाति यदि जुड़ावन हैं तो तीज त्यौहार उसका सार हैं जो देसवासियों सहित समाज एवं परिवार को दृढ़ता पूर्वक बांध रखते हैं ॥
कोई त्यौहार किसी एक धर्म का होता है, कोई त्यौहार किसी विशिष्ट जाति का होता है, कोई त्यौहार किसी स्थान विशेष का होता है ।।
धर्म जाति बपुरधर हैं त , परब हार सिंगार।
तामें रीति के मनि कू, गाठों सोच बिचार ।१९७९।
भावार्थ : -- धर्म-जाति यदि सुन्दर शरीर हैं तो त्यौहार उसका श्रृंगार हैं ( संस्कार उसके वस्त्र हैं ) अस हर में फिर रीतियों की मणियों को सोच समझ कर पिरोना चाहिए ॥ रीतियाँ ऐसी होनी चाहिए कि उससे जीवन, धन एवं वातावरण की हानि न हो ॥
बोअन हारु ने त बोए एकै मूठिका नाज ।
पालन पोषण पेह के, बढ़े बाके समाज ।१९८० ।
भावार्थ : -- बोने वाले यद्यपि एक मुष्टिका अनाज ही बोता है । पालित व् पोषित होकर ही उसका समाज विस्तार को प्राप्त होता है ॥
भलाई हो अथवा बुराई हो वह कतिपय से ही प्रारम्भ होती है व् पालित पोषित होकर अतिसय पर समाप्त होती है ॥
चारो बात सही है बस मनुष्य के जीवन में जन्म होतेही कैसे पाया जाये यही उपाय किया जाए बार बार किसीभी माध्यम द्वारा महेरबानी करके|
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