मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १९६॥ ----

जेतक ऊँचे पद गहे, धंसे तेतक नीच ।
वाके करे कुकरम भुइ , भरे कीच ही कीच  ।१९६१। 
भावार्थ : -- समय ऐसा लाया गया कि जो जितने ऊँचे पद पर विराजित है /हुवा , दुराचार के कीचड़ में वह उतना ही धंसा हुवा है ।दुराचार रूपी यह कीचड़ कहीं से आयातित होकर नहीं आया अपितु  उसके ही किए कुकर्मों का परिणाम है ॥  

रसना संग स्वादु लिए, खावैं पसु की टाँग । 
ऊँचे आसन राज सो, दान रहे हैं माँग ।१९६२। 
भावार्थ : - जिह्वा से स्वाद ले ले कर पशुओं की टाँग खाने वाले ऊंचे आसान में विराजित होकर दान मांग रहे हैं ॥ क्या ऐसे लोग किसी भी प्रकार का दान ग्रहण की योग्यता रखते हैं । 

टिप्पणी : --  आजीविका हेतु कतिपय योग्यता पर्याप्त होती है किन्तु दान ग्रहण हेतु अतिशय योग्यता चाहिए.....

काँकरी कन दोउ परे, चुगि कन चिरि की चोँच । 
रे मानस तुम का चुँगे, बैठ ठाउँ कहुँ सोच ।१९६३। 
भावार्थ : - कंकरी और कण दोनों पड़े रहते हैं चिड़िया की चोँच  केवल कण को ही चुनती है । रे मानव तुमने क्या चुना कहीं किसी सत्संग की संगती करते हुवे यह विचार कर ॥  

करतल धारे माथ मुख कहन सोइ दुहराए । 
चिरिआ चुग गइ खेह अरु पिछे बैठ पछिताए ।१९६४। 
भावार्थ : -- माथा पकड़े हुवे मतदाता  के मुख ने फिर वही दुहराया । चिड़िया चुन गई खेत रे बैठ पीछे पछताया ॥ 

गाहक लेवन मैं लगे, बेचन मैं बैपारि । 
सगुन मनाउन आपुनो, दिवारि पंथ जुहारि ।१९६५। 
भावार्थ : -- ग्राहक  मोल मलाई में लगे हैं बैपारी ठगाई में लगे हैं । दीवाली है कि  अपने शगुन की प्रतीक्षा में है ॥ 

 लेन-देन में ही ये जीवन व्यतीत हो जाएगा, पहले सोच ले रे बन्दे फिर पीछे पछताएगा..... 

जोड़ जन जन जुगाउनी, लगे रहे दिन रात । 
जी उठे जब रे मूरख, परी रही यह गात ।१९६६। 
भावार्थ : - धन संग्रह करने में सब दिन रात एक किए हैं । न उन्हें वार की सुध है न त्यौहार की ॥ रे मूरखों , गधों -खच्चरों जब यह प्राण निकलते हैं न तब संग्रह क्या तुम्हारा यह शरीर भी यहीं पड़ा रह जाता है ॥ 

देन जोग सुख सम्पदा, लेन जोग पर ताप । 
जुगौनी जोग  पुन अहै, परिहरन जोग  पाप ।१९६७ । 
भावार्थ : -- देने योग्य यदि कुछ है तो वह सुख की सम्पदा है, लेने योग्य यदि कुछ है तो वह पराया संताप है । संग्रह करने योग्य यदि कुछ है तो वह पुण्य है, त्याग करने योग्य यदि कुछ है तो वह पापकर्म हैं ॥  

संतों की वाणी है : -- 
चार वेद षट शास्त्र में बात मिली है दोय । 
सुख दीन्हे सुख होत है, दुःख दीन्हे दुःख होए ॥ 


स्त्री अरु पुरुख लिंग के रखे सदैव धिआन । 
सटीक वाचक के संग कबित माहि रस आन ।१९६८। 
भावार्थ : -- स्त्री लिंग एवं पुर्लिंग का ध्यान रखते हुवे रचना रचनी चाहिए । सटीक वाचकता के संग रसों का प्रादुर्भाव होता है एवं कविताएँ रसवती होती है ।।  

सकल देस नदी नदपत, रहे आपनी कान । 
तबहि सीउँ के मान सहित, होत जगत के मान ।१९६९ । 
भावार्थ : -- समस्त देश, नदियां सागर जब अपनी अपनी मर्यादा में रहते हैं तभी सीमाओं के सम्मान सहित संसार का मान होता है अन्यथा इनकी आवश्यकता ही क्या है ॥ 

" यदि सागर अपना मर्यादा भूल जाए तो पृथ्वी जल जल हो जाएगी....." 

जासु  बुद्धि जड़ होत जब जगत बिपरीत होइ । 
तासु  बिनासन के अबर अवरु गति नाहि कोइ ।१९७०। 
भावार्थ : -- जिसकी बुद्धि  जड़ होकर संसार के विरुद्ध हो गई हो  उस बुद्धि की विनाश के अतिरिक्त और कोई गति नहीं होनी ॥ 








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