जेतक ऊँचे पद गहे, धंसे तेतक नीच ।
वाके करे कुकरम भुइ , भरे कीच ही कीच ।१९६१।
भावार्थ : -- समय ऐसा लाया गया कि जो जितने ऊँचे पद पर विराजित है /हुवा , दुराचार के कीचड़ में वह उतना ही धंसा हुवा है ।दुराचार रूपी यह कीचड़ कहीं से आयातित होकर नहीं आया अपितु उसके ही किए कुकर्मों का परिणाम है ॥
रसना संग स्वादु लिए, खावैं पसु की टाँग ।
ऊँचे आसन राज सो, दान रहे हैं माँग ।१९६२।
भावार्थ : - जिह्वा से स्वाद ले ले कर पशुओं की टाँग खाने वाले ऊंचे आसान में विराजित होकर दान मांग रहे हैं ॥ क्या ऐसे लोग किसी भी प्रकार का दान ग्रहण की योग्यता रखते हैं ।
टिप्पणी : -- आजीविका हेतु कतिपय योग्यता पर्याप्त होती है किन्तु दान ग्रहण हेतु अतिशय योग्यता चाहिए.....
काँकरी कन दोउ परे, चुगि कन चिरि की चोँच ।
रे मानस तुम का चुँगे, बैठ ठाउँ कहुँ सोच ।१९६३।
भावार्थ : - कंकरी और कण दोनों पड़े रहते हैं चिड़िया की चोँच केवल कण को ही चुनती है । रे मानव तुमने क्या चुना कहीं किसी सत्संग की संगती करते हुवे यह विचार कर ॥
करतल धारे माथ मुख कहन सोइ दुहराए ।
चिरिआ चुग गइ खेह अरु पिछे बैठ पछिताए ।१९६४।
भावार्थ : -- माथा पकड़े हुवे मतदाता के मुख ने फिर वही दुहराया । चिड़िया चुन गई खेत रे बैठ पीछे पछताया ॥
गाहक लेवन मैं लगे, बेचन मैं बैपारि ।
सगुन मनाउन आपुनो, दिवारि पंथ जुहारि ।१९६५।
भावार्थ : -- ग्राहक मोल मलाई में लगे हैं बैपारी ठगाई में लगे हैं । दीवाली है कि अपने शगुन की प्रतीक्षा में है ॥
लेन-देन में ही ये जीवन व्यतीत हो जाएगा, पहले सोच ले रे बन्दे फिर पीछे पछताएगा.....
जोड़ जन जन जुगाउनी, लगे रहे दिन रात ।
जी उठे जब रे मूरख, परी रही यह गात ।१९६६।
भावार्थ : - धन संग्रह करने में सब दिन रात एक किए हैं । न उन्हें वार की सुध है न त्यौहार की ॥ रे मूरखों , गधों -खच्चरों जब यह प्राण निकलते हैं न तब संग्रह क्या तुम्हारा यह शरीर भी यहीं पड़ा रह जाता है ॥
देन जोग सुख सम्पदा, लेन जोग पर ताप ।
जुगौनी जोग पुन अहै, परिहरन जोग पाप ।१९६७ ।
भावार्थ : -- देने योग्य यदि कुछ है तो वह सुख की सम्पदा है, लेने योग्य यदि कुछ है तो वह पराया संताप है । संग्रह करने योग्य यदि कुछ है तो वह पुण्य है, त्याग करने योग्य यदि कुछ है तो वह पापकर्म हैं ॥
संतों की वाणी है : --
चार वेद षट शास्त्र में बात मिली है दोय ।
सुख दीन्हे सुख होत है, दुःख दीन्हे दुःख होए ॥
स्त्री अरु पुरुख लिंग के रखे सदैव धिआन ।
सटीक वाचक के संग कबित माहि रस आन ।१९६८।
भावार्थ : -- स्त्री लिंग एवं पुर्लिंग का ध्यान रखते हुवे रचना रचनी चाहिए । सटीक वाचकता के संग रसों का प्रादुर्भाव होता है एवं कविताएँ रसवती होती है ।।
सकल देस नदी नदपत, रहे आपनी कान ।
तबहि सीउँ के मान सहित, होत जगत के मान ।१९६९ ।
भावार्थ : -- समस्त देश, नदियां सागर जब अपनी अपनी मर्यादा में रहते हैं तभी सीमाओं के सम्मान सहित संसार का मान होता है अन्यथा इनकी आवश्यकता ही क्या है ॥
" यदि सागर अपना मर्यादा भूल जाए तो पृथ्वी जल जल हो जाएगी....."
जासु बुद्धि जड़ होत जब जगत बिपरीत होइ ।
तासु बिनासन के अबर अवरु गति नाहि कोइ ।१९७०।
भावार्थ : -- जिसकी बुद्धि जड़ होकर संसार के विरुद्ध हो गई हो उस बुद्धि की विनाश के अतिरिक्त और कोई गति नहीं होनी ॥
वाके करे कुकरम भुइ , भरे कीच ही कीच ।१९६१।
भावार्थ : -- समय ऐसा लाया गया कि जो जितने ऊँचे पद पर विराजित है /हुवा , दुराचार के कीचड़ में वह उतना ही धंसा हुवा है ।दुराचार रूपी यह कीचड़ कहीं से आयातित होकर नहीं आया अपितु उसके ही किए कुकर्मों का परिणाम है ॥
रसना संग स्वादु लिए, खावैं पसु की टाँग ।
ऊँचे आसन राज सो, दान रहे हैं माँग ।१९६२।
भावार्थ : - जिह्वा से स्वाद ले ले कर पशुओं की टाँग खाने वाले ऊंचे आसान में विराजित होकर दान मांग रहे हैं ॥ क्या ऐसे लोग किसी भी प्रकार का दान ग्रहण की योग्यता रखते हैं ।
टिप्पणी : -- आजीविका हेतु कतिपय योग्यता पर्याप्त होती है किन्तु दान ग्रहण हेतु अतिशय योग्यता चाहिए.....
काँकरी कन दोउ परे, चुगि कन चिरि की चोँच ।
रे मानस तुम का चुँगे, बैठ ठाउँ कहुँ सोच ।१९६३।
भावार्थ : - कंकरी और कण दोनों पड़े रहते हैं चिड़िया की चोँच केवल कण को ही चुनती है । रे मानव तुमने क्या चुना कहीं किसी सत्संग की संगती करते हुवे यह विचार कर ॥
करतल धारे माथ मुख कहन सोइ दुहराए ।
चिरिआ चुग गइ खेह अरु पिछे बैठ पछिताए ।१९६४।
भावार्थ : -- माथा पकड़े हुवे मतदाता के मुख ने फिर वही दुहराया । चिड़िया चुन गई खेत रे बैठ पीछे पछताया ॥
गाहक लेवन मैं लगे, बेचन मैं बैपारि ।
सगुन मनाउन आपुनो, दिवारि पंथ जुहारि ।१९६५।
भावार्थ : -- ग्राहक मोल मलाई में लगे हैं बैपारी ठगाई में लगे हैं । दीवाली है कि अपने शगुन की प्रतीक्षा में है ॥
लेन-देन में ही ये जीवन व्यतीत हो जाएगा, पहले सोच ले रे बन्दे फिर पीछे पछताएगा.....
जोड़ जन जन जुगाउनी, लगे रहे दिन रात ।
जी उठे जब रे मूरख, परी रही यह गात ।१९६६।
भावार्थ : - धन संग्रह करने में सब दिन रात एक किए हैं । न उन्हें वार की सुध है न त्यौहार की ॥ रे मूरखों , गधों -खच्चरों जब यह प्राण निकलते हैं न तब संग्रह क्या तुम्हारा यह शरीर भी यहीं पड़ा रह जाता है ॥
देन जोग सुख सम्पदा, लेन जोग पर ताप ।
जुगौनी जोग पुन अहै, परिहरन जोग पाप ।१९६७ ।
भावार्थ : -- देने योग्य यदि कुछ है तो वह सुख की सम्पदा है, लेने योग्य यदि कुछ है तो वह पराया संताप है । संग्रह करने योग्य यदि कुछ है तो वह पुण्य है, त्याग करने योग्य यदि कुछ है तो वह पापकर्म हैं ॥
संतों की वाणी है : --
चार वेद षट शास्त्र में बात मिली है दोय ।
सुख दीन्हे सुख होत है, दुःख दीन्हे दुःख होए ॥
स्त्री अरु पुरुख लिंग के रखे सदैव धिआन ।
सटीक वाचक के संग कबित माहि रस आन ।१९६८।
भावार्थ : -- स्त्री लिंग एवं पुर्लिंग का ध्यान रखते हुवे रचना रचनी चाहिए । सटीक वाचकता के संग रसों का प्रादुर्भाव होता है एवं कविताएँ रसवती होती है ।।
सकल देस नदी नदपत, रहे आपनी कान ।
तबहि सीउँ के मान सहित, होत जगत के मान ।१९६९ ।
भावार्थ : -- समस्त देश, नदियां सागर जब अपनी अपनी मर्यादा में रहते हैं तभी सीमाओं के सम्मान सहित संसार का मान होता है अन्यथा इनकी आवश्यकता ही क्या है ॥
" यदि सागर अपना मर्यादा भूल जाए तो पृथ्वी जल जल हो जाएगी....."
जासु बुद्धि जड़ होत जब जगत बिपरीत होइ ।
तासु बिनासन के अबर अवरु गति नाहि कोइ ।१९७०।
भावार्थ : -- जिसकी बुद्धि जड़ होकर संसार के विरुद्ध हो गई हो उस बुद्धि की विनाश के अतिरिक्त और कोई गति नहीं होनी ॥
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