नौ समाज के रचयता, मायाबी जन होए ।
सुवारथ के वसीभूत, गुन बिहून बिअ बोए ।१९५१ ।
भावार्थ : -- नव समाज के ये प्रारंभिक रचयिता विलासिता की साधन स्वरुप माया के दास होते हैं औॅर अपने स्वार्थों के वष में रहते हैं । ये बिना रसहीन गुणहीन बीज बोते हैं इनसे जो जीवन उत्पन्न होता है वह फिर समाज के किसी काम नहीं आता जो समाज के काम नहीं आया वह राष्ट्र के क्या काम आएगा । कोई आया हो तो बता दो ॥
नाउ तेरो धर्म कहे, जात कहे उपनाउ ।
जात जीवत जुगत करे, जोग तेरा सुभाउ ।१९५२ ।
भावार्थ : -- नाम किसी मनुष्य के धर्म का सूचक होता है, उपनाम उसकी जाति का सूचक होता है नाम उपनाम से किसी व्यक्ति का पूर्ण विवरण है । जाति मनुष्य के स्वभाव की गणना कर उसकी जीविका का उपाय करती है ॥ प्रत्येक प्राणी का गुण-धर्म होता है जाति-प्रजाति होती है । चूँकि पशुपक्षियों में वाणी नहीं होती, बुद्धि अल्प होती हैं इसलिए वे अपने भावों को अभिव्यक्त नहीं कर पाते ॥
बहुंत ऊपर रहने से नीचे का कुछ दिखाई नहीं देता ॥ यह सब देखने के लिए बहुंत नीचे उतरना पड़ता है । नेता-मंत्रियों ( नेताओं में धनाढ्य भी आते हैं) को तो मध्यम वर्गीय मनुष्य ही दिखाई नहीं देते बाकि तो छोड़ो ॥
नामकरण सावधानी पूर्वक करना चाहिए , नए समाज वाले नाम नहीं नंबर रखेंगे जैसे 'अरे ओ चार सौ बीस इधर आ' । अंकों के आधार पर ही इनमें जातियां विकसित होंगी जैसे : -- जीरो अंक वाले उच्च जाति के हैं भई अभिनेता थोड़े ही हैं नेता हैं ) मतलब की घूम फिर के ये जहां थे वहीँ आ जाएंगे ।
मानस जोनि जनम लिए त, कारउ ऐसे काज ।
बिगड़े भलेहि आपुना, बिगड़े नहीं समाज ।१९५३।
भावार्थ : -- मनुष्य योनि में जन्म मिला है तो ऐसे कार्य करने चाहिए कि अपना चाहे जो बिगड़ जाए किन्तु समाज बिगड़ने न पाए ।।
बानी जैसी बोलिये, कारत भल भल काम ।
सुनन करन मैं काठ हो देउ मधुर परिनाम ।१९५४ ।
भावार्थ : -- भले भले कार्य करते हुवे वाणी जैसी भी बोले सुनने करने में भले ही वह कठोर हो किन्तु उसका परिणाम मधुर हो ॥ मीठी वाणी का परिणाम यदि कटु हो तब ऐसी वाणी बोलने का क्या लाभ ।।
बीती साँझ सिंदूरी जब गहनावै रत ।
बहोरि केतु नाथ संग उदयत नवल प्रभात ।१९५५ ।
भावार्थ : -- सिंदूरी संध्या के व्यतीत होने पर जब यामिनी गहरी होती जाती है तब फिर केतु नाथ के संग नवल प्रभात का भी उदय होता ही ।
प्रस्तुत पंक्तियों में यद्यपि नवल कुछ भी नहीं है तथापि प्रभात को नवल कहा गया क्यों कहा गया ? अपन सब थोड़े ही जानते हैं । रिक्तता कहीं लक्षित नहीं है तो भी एक नई क्रिया प्राप्त हुई ।।
पूरबतस समउ मैं तो, दीन रहे सब कोइ ।
लाख टके के प्रसन यहु, अजहुँ तुम्ह का होइ ।१९५६।
भावार्थ : -- पूर्व समय में तो सभी दीन थे (पूर्वकाल में हमारे सभी के पितृजन दीन हीन किसान थे, थे की नहीं फिर मुनीम फिर न जाने क्या क्या बने ) । लाख टके का प्रश्न यह है कि वर्त्तमान में तुम क्या हो ॥
था था था, है है है.....
पसु द्रव धन अन्न कन के कोउ किए ब्योपार ।
कल हीन होकरश्रम किए, को रहि खेतीहार ।१९५७ ।
भावार्थ : -- पशु द्रव्य धन अन्न कणों का व्यापार करता था कोई यन्त्र हीन होकर किसी के पिता महापिता श्रमपूर्वक खेती करते ॥
जो मैं होता कर्मना, करता बर बर काम ।
अस कथिक आपन आपहि, धरे अकरमन नाम ।१९५८।
भावार्थ : -- यदि मैं कर्मठ होता तो बड़े बड़े काम करता । ऐसा कहने वालों को अकर्मण्य कहने की आवश्यकता नहीं क्योंकि वह स्वयं ही स्वयं को अकर्मण्य कहते हैं ॥
करे कढ़ाई कड़ी भए, लौह बने भल नेम ।
करे ढिराई लड़ी भए, कंठ गहे बन हेम ।१९५९ ।
भावार्थ : -- यदि भली नीतियों नियमों को कठोरता पूर्वक लागु किया जाए तो वह लोहा होकर हथकड़ी बन जाते हैं । और यदि उन्हें लागु ही नहीं किया जाए तो वह स्वर्ण होकर कंठ -माल बन जाते हैं ॥
जेतक ऊँची जीउनी, तेतक नीची सोच ।
जेतक नीची सोच सो, होइहि तेतक पोच ।१९६०।
भावार्थ : -- जिसकी जितनी ऊंची जीवन शैली होती है उसके उतने ही नीचे विचार होते हैं । जिसके जितने नीचे विचार होते हैं वह उतना ही तुच्छ होता है ॥
सुवारथ के वसीभूत, गुन बिहून बिअ बोए ।१९५१ ।
भावार्थ : -- नव समाज के ये प्रारंभिक रचयिता विलासिता की साधन स्वरुप माया के दास होते हैं औॅर अपने स्वार्थों के वष में रहते हैं । ये बिना रसहीन गुणहीन बीज बोते हैं इनसे जो जीवन उत्पन्न होता है वह फिर समाज के किसी काम नहीं आता जो समाज के काम नहीं आया वह राष्ट्र के क्या काम आएगा । कोई आया हो तो बता दो ॥
नाउ तेरो धर्म कहे, जात कहे उपनाउ ।
जात जीवत जुगत करे, जोग तेरा सुभाउ ।१९५२ ।
भावार्थ : -- नाम किसी मनुष्य के धर्म का सूचक होता है, उपनाम उसकी जाति का सूचक होता है नाम उपनाम से किसी व्यक्ति का पूर्ण विवरण है । जाति मनुष्य के स्वभाव की गणना कर उसकी जीविका का उपाय करती है ॥ प्रत्येक प्राणी का गुण-धर्म होता है जाति-प्रजाति होती है । चूँकि पशुपक्षियों में वाणी नहीं होती, बुद्धि अल्प होती हैं इसलिए वे अपने भावों को अभिव्यक्त नहीं कर पाते ॥
बहुंत ऊपर रहने से नीचे का कुछ दिखाई नहीं देता ॥ यह सब देखने के लिए बहुंत नीचे उतरना पड़ता है । नेता-मंत्रियों ( नेताओं में धनाढ्य भी आते हैं) को तो मध्यम वर्गीय मनुष्य ही दिखाई नहीं देते बाकि तो छोड़ो ॥
नामकरण सावधानी पूर्वक करना चाहिए , नए समाज वाले नाम नहीं नंबर रखेंगे जैसे 'अरे ओ चार सौ बीस इधर आ' । अंकों के आधार पर ही इनमें जातियां विकसित होंगी जैसे : -- जीरो अंक वाले उच्च जाति के हैं भई अभिनेता थोड़े ही हैं नेता हैं ) मतलब की घूम फिर के ये जहां थे वहीँ आ जाएंगे ।
मानस जोनि जनम लिए त, कारउ ऐसे काज ।
बिगड़े भलेहि आपुना, बिगड़े नहीं समाज ।१९५३।
भावार्थ : -- मनुष्य योनि में जन्म मिला है तो ऐसे कार्य करने चाहिए कि अपना चाहे जो बिगड़ जाए किन्तु समाज बिगड़ने न पाए ।।
बानी जैसी बोलिये, कारत भल भल काम ।
सुनन करन मैं काठ हो देउ मधुर परिनाम ।१९५४ ।
भावार्थ : -- भले भले कार्य करते हुवे वाणी जैसी भी बोले सुनने करने में भले ही वह कठोर हो किन्तु उसका परिणाम मधुर हो ॥ मीठी वाणी का परिणाम यदि कटु हो तब ऐसी वाणी बोलने का क्या लाभ ।।
बीती साँझ सिंदूरी जब गहनावै रत ।
बहोरि केतु नाथ संग उदयत नवल प्रभात ।१९५५ ।
भावार्थ : -- सिंदूरी संध्या के व्यतीत होने पर जब यामिनी गहरी होती जाती है तब फिर केतु नाथ के संग नवल प्रभात का भी उदय होता ही ।
प्रस्तुत पंक्तियों में यद्यपि नवल कुछ भी नहीं है तथापि प्रभात को नवल कहा गया क्यों कहा गया ? अपन सब थोड़े ही जानते हैं । रिक्तता कहीं लक्षित नहीं है तो भी एक नई क्रिया प्राप्त हुई ।।
पूरबतस समउ मैं तो, दीन रहे सब कोइ ।
लाख टके के प्रसन यहु, अजहुँ तुम्ह का होइ ।१९५६।
भावार्थ : -- पूर्व समय में तो सभी दीन थे (पूर्वकाल में हमारे सभी के पितृजन दीन हीन किसान थे, थे की नहीं फिर मुनीम फिर न जाने क्या क्या बने ) । लाख टके का प्रश्न यह है कि वर्त्तमान में तुम क्या हो ॥
था था था, है है है.....
पसु द्रव धन अन्न कन के कोउ किए ब्योपार ।
कल हीन होकरश्रम किए, को रहि खेतीहार ।१९५७ ।
भावार्थ : -- पशु द्रव्य धन अन्न कणों का व्यापार करता था कोई यन्त्र हीन होकर किसी के पिता महापिता श्रमपूर्वक खेती करते ॥
जो मैं होता कर्मना, करता बर बर काम ।
अस कथिक आपन आपहि, धरे अकरमन नाम ।१९५८।
भावार्थ : -- यदि मैं कर्मठ होता तो बड़े बड़े काम करता । ऐसा कहने वालों को अकर्मण्य कहने की आवश्यकता नहीं क्योंकि वह स्वयं ही स्वयं को अकर्मण्य कहते हैं ॥
करे कढ़ाई कड़ी भए, लौह बने भल नेम ।
करे ढिराई लड़ी भए, कंठ गहे बन हेम ।१९५९ ।
भावार्थ : -- यदि भली नीतियों नियमों को कठोरता पूर्वक लागु किया जाए तो वह लोहा होकर हथकड़ी बन जाते हैं । और यदि उन्हें लागु ही नहीं किया जाए तो वह स्वर्ण होकर कंठ -माल बन जाते हैं ॥
जेतक ऊँची जीउनी, तेतक नीची सोच ।
जेतक नीची सोच सो, होइहि तेतक पोच ।१९६०।
भावार्थ : -- जिसकी जितनी ऊंची जीवन शैली होती है उसके उतने ही नीचे विचार होते हैं । जिसके जितने नीचे विचार होते हैं वह उतना ही तुच्छ होता है ॥
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