पाहिनी जस चरन देख पल मह लए पहचान ।
सेवकहु को चाहिए तस, होए सेवा निधान ।१९४१ ।
भावार्थ : --चरण पादुका जैसे चरण देखते ही उन्हें पलक भर में ही पहचान लेती है । सेवक को भी चाहिए कि वह सेवा का भंडार होकर अपने स्वामी के चरणों से सदैव परिचित रहे ॥
सोइ नदि नग सोइ सिंधु , भगवन सोइ पुरान ।
जो नउ अहैँ सो जीवन, जग मह आनइ जान ।१९४२।
भावार्थ : -- वही नदी है वही पर्वत है सागर भी वही है भगवान भी वही पुराने से हैं । संसार ,में यदि कुछ नया है तो वह जीवन है जो कि आता -जाता रहता है ॥
अर्थात : -- एक यह जीवन ही अस्थिर है, शेष सब कुछ यथावस्थिर हैं ।
सोइ नियति सोइ नियंता सोई तासु बिधान ।
प्रतिछन परिभर्मित रहे ,जन मानस के कान ।१९४३।
भावार्थ : -- वही नियति है वही नियंता है उसके विधि विधान भी वही है । किन्तु जन मानस के रचे विधि विधान प्रतिक्षण परिभ्रमित रहते हैं ।।
अँधेरा कहन भर सोंह , दूरए नहीँ अँधेर ।
अँधेरा तब दूरए जब, अलोक दिए तिन हेर ।१९४४।
भावार्थ : - - अँधेरा कहने भर से अँधेरे दूर नहीं होते।यह तभी दूर होते हैं जब उसे आलोक पुकारता है ॥
अँधेरा कहने भर से अँधेरे दूर नहीं होते..,
मुहसिल-ओ-महशर कभी मशहूर नहीं होते.....
मुहसिल-ओ-महशर = प्यादों की भीड़ के प्यादे
असन बसन भुइ दीप सन , जो घृत बरतिक दाए ।
ऐसे दाता के भवन,चरन चरत लखि आए ।१९४५।
भावार्थ : -- जो भूमि अन्न वस्त्र सहित दीपक -घृत-वर्तिका का दान करता है । ऐसे दाता के घर लक्ष्मी स्वयं चल कर आती है और माया को भगाती है ॥ जीवन के आधार भूत आवश्यकताओं की साधन स्वरुपा लक्ष्मी है विलासिता की साधन स्वरूपा माया है ॥
चौपट नृप के राज हैं माँगत सब अवकास ।
कोउ बिहारबन बिहरे , कोउ फिरै आकास ।१९४६।
भावार्थ : -- चौपट राजा का राज है सभी अवकाश में है । कोई पर्वतीय स्थलों में अर्थात हिल टेसन में विचर रहा है कोई अफ़्लाक में फिर रहा है । काहे : -- प्रवास पर जाने को और काहे ॥
"जैसा शासन वैसा प्रशासन "
जुगति से आसन मारे, उलटी पवन चलाए ।
मिर्ज़ापुर का पाउना, पाँच कोस में पाए ।१९४७।
भावार्थ : -- युक्तियों से सिंहासन मार लिया अब उलटी पवन चला रहा है । मिर्ज़ापुर ( अहमदाबाद ) का मेहमान है और पांच कोस ( काशी) में पाया जाता है ।।
धोए नहाए पहन खाए, छाउँ बिराजे भूप ।
परजा मारि मारि फिरै, सर पर धूपहि धूप ।१९४८।
भावार्थ : - राष्ट्र प्रमुख तो साफ सुथरे खा पी के छाँव में बैठे रहते हैं । बेचारी जनता जनार्दन धूप में मारी मारी फिरती है ॥ कैसा तंत्र है ये ।
अर्थात : --" जहां राष्ट्र प्रमुख रत्न जड़ित प्रासादों में निवासित हो वह लोक तंत्र कदापि नहीं हो सकता " यह अधिनायक तंत्र ( डिक्टेटरशिप ) अथवा स्वेच्छा चारि तंत्र अथवा एकसत्तावाद है ॥
मानस के एकाकीपन, प्रतिछन हेरि समाज ।
सामाजिक रीति अनुसार, चलत सधै सब काज ।१९४९।
भावार्थ : -- मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है उसका एकाकीपन प्रतिक्षण समाज को ही अन्वेषित करता रहता है । अत: सामजिक रीति के अनुसार चलने से ही सभी कार्य सिद्ध होते हैं ॥
" परिवर्तन शनै: शनै: होता है, समाज को वही परिवर्तन स्वीकार्य होता है जिसमें संसार का कल्याण निहित हो ॥
" किसी एक व्यक्ति अथवा कुछ व्यक्तियों के न मानने से सामाजिक मान्यताएं समाप्त नहीं होती "
जाति धर्म लच्छन बिमुख , रहे सोइ संसार ।
पूरब समाज परिहरत, रचे आप अनुसार ।१९५० ।
भावार्थ : -- जो धर्म जाति के जन्मजात लक्षणों से विमुख व्यक्ति रहते तो इसी संसार में है । किन्तु थीदा ऊपर । ऐसी विमुखता का एक ही परिणाम होता है वो है संकर संतति ( जैसे हाइब्रिड फल सब्जी जो देखने में तो अच्छी लगती हैं खाने में नीरस में एवं स्वास्थ् की दृष्टि से गुणहीन होती हैं ) । ये पूर्व के सामाजिक ढाँचे को विध्वंस कर अपने अनुसार फिर नए समाज की रचना करते हैं ।
व्यक्तियों का समुच्चय परिवार की रचना करता है, परिवार का कर्म ही उसकी जाति है, निकृष्ट जाति की व्युत्पत्ति निकृष्ट कर्म करने के कारण हुई परिवारों का समुच्चय समाज की रचना करता है समाजों का समुच्चय ही राष्ट्र की रचना करता है, अर्थात व्यक्ति है तो परिवार है परिवार है तो समाज है समाज है तभी किसी राष्ट्र का अस्तित्व है, उत्तम विचारों का संकलन ही धर्म है, कोई व्यक्ति, परिवार, समुदाय, अथवा राष्ट्र जिसका अनुशरण करता है करता है ।
''परम विचार ही परमोधर्म है "
सेवकहु को चाहिए तस, होए सेवा निधान ।१९४१ ।
भावार्थ : --चरण पादुका जैसे चरण देखते ही उन्हें पलक भर में ही पहचान लेती है । सेवक को भी चाहिए कि वह सेवा का भंडार होकर अपने स्वामी के चरणों से सदैव परिचित रहे ॥
सोइ नदि नग सोइ सिंधु , भगवन सोइ पुरान ।
जो नउ अहैँ सो जीवन, जग मह आनइ जान ।१९४२।
भावार्थ : -- वही नदी है वही पर्वत है सागर भी वही है भगवान भी वही पुराने से हैं । संसार ,में यदि कुछ नया है तो वह जीवन है जो कि आता -जाता रहता है ॥
अर्थात : -- एक यह जीवन ही अस्थिर है, शेष सब कुछ यथावस्थिर हैं ।
सोइ नियति सोइ नियंता सोई तासु बिधान ।
प्रतिछन परिभर्मित रहे ,जन मानस के कान ।१९४३।
भावार्थ : -- वही नियति है वही नियंता है उसके विधि विधान भी वही है । किन्तु जन मानस के रचे विधि विधान प्रतिक्षण परिभ्रमित रहते हैं ।।
अँधेरा कहन भर सोंह , दूरए नहीँ अँधेर ।
अँधेरा तब दूरए जब, अलोक दिए तिन हेर ।१९४४।
भावार्थ : - - अँधेरा कहने भर से अँधेरे दूर नहीं होते।यह तभी दूर होते हैं जब उसे आलोक पुकारता है ॥
अँधेरा कहने भर से अँधेरे दूर नहीं होते..,
मुहसिल-ओ-महशर कभी मशहूर नहीं होते.....
मुहसिल-ओ-महशर = प्यादों की भीड़ के प्यादे
असन बसन भुइ दीप सन , जो घृत बरतिक दाए ।
ऐसे दाता के भवन,चरन चरत लखि आए ।१९४५।
भावार्थ : -- जो भूमि अन्न वस्त्र सहित दीपक -घृत-वर्तिका का दान करता है । ऐसे दाता के घर लक्ष्मी स्वयं चल कर आती है और माया को भगाती है ॥ जीवन के आधार भूत आवश्यकताओं की साधन स्वरुपा लक्ष्मी है विलासिता की साधन स्वरूपा माया है ॥
चौपट नृप के राज हैं माँगत सब अवकास ।
कोउ बिहारबन बिहरे , कोउ फिरै आकास ।१९४६।
भावार्थ : -- चौपट राजा का राज है सभी अवकाश में है । कोई पर्वतीय स्थलों में अर्थात हिल टेसन में विचर रहा है कोई अफ़्लाक में फिर रहा है । काहे : -- प्रवास पर जाने को और काहे ॥
"जैसा शासन वैसा प्रशासन "
जुगति से आसन मारे, उलटी पवन चलाए ।
मिर्ज़ापुर का पाउना, पाँच कोस में पाए ।१९४७।
भावार्थ : -- युक्तियों से सिंहासन मार लिया अब उलटी पवन चला रहा है । मिर्ज़ापुर ( अहमदाबाद ) का मेहमान है और पांच कोस ( काशी) में पाया जाता है ।।
धोए नहाए पहन खाए, छाउँ बिराजे भूप ।
परजा मारि मारि फिरै, सर पर धूपहि धूप ।१९४८।
भावार्थ : - राष्ट्र प्रमुख तो साफ सुथरे खा पी के छाँव में बैठे रहते हैं । बेचारी जनता जनार्दन धूप में मारी मारी फिरती है ॥ कैसा तंत्र है ये ।
अर्थात : --" जहां राष्ट्र प्रमुख रत्न जड़ित प्रासादों में निवासित हो वह लोक तंत्र कदापि नहीं हो सकता " यह अधिनायक तंत्र ( डिक्टेटरशिप ) अथवा स्वेच्छा चारि तंत्र अथवा एकसत्तावाद है ॥
मानस के एकाकीपन, प्रतिछन हेरि समाज ।
सामाजिक रीति अनुसार, चलत सधै सब काज ।१९४९।
भावार्थ : -- मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है उसका एकाकीपन प्रतिक्षण समाज को ही अन्वेषित करता रहता है । अत: सामजिक रीति के अनुसार चलने से ही सभी कार्य सिद्ध होते हैं ॥
" परिवर्तन शनै: शनै: होता है, समाज को वही परिवर्तन स्वीकार्य होता है जिसमें संसार का कल्याण निहित हो ॥
" किसी एक व्यक्ति अथवा कुछ व्यक्तियों के न मानने से सामाजिक मान्यताएं समाप्त नहीं होती "
जाति धर्म लच्छन बिमुख , रहे सोइ संसार ।
पूरब समाज परिहरत, रचे आप अनुसार ।१९५० ।
भावार्थ : -- जो धर्म जाति के जन्मजात लक्षणों से विमुख व्यक्ति रहते तो इसी संसार में है । किन्तु थीदा ऊपर । ऐसी विमुखता का एक ही परिणाम होता है वो है संकर संतति ( जैसे हाइब्रिड फल सब्जी जो देखने में तो अच्छी लगती हैं खाने में नीरस में एवं स्वास्थ् की दृष्टि से गुणहीन होती हैं ) । ये पूर्व के सामाजिक ढाँचे को विध्वंस कर अपने अनुसार फिर नए समाज की रचना करते हैं ।
व्यक्तियों का समुच्चय परिवार की रचना करता है, परिवार का कर्म ही उसकी जाति है, निकृष्ट जाति की व्युत्पत्ति निकृष्ट कर्म करने के कारण हुई परिवारों का समुच्चय समाज की रचना करता है समाजों का समुच्चय ही राष्ट्र की रचना करता है, अर्थात व्यक्ति है तो परिवार है परिवार है तो समाज है समाज है तभी किसी राष्ट्र का अस्तित्व है, उत्तम विचारों का संकलन ही धर्म है, कोई व्यक्ति, परिवार, समुदाय, अथवा राष्ट्र जिसका अनुशरण करता है करता है ।
''परम विचार ही परमोधर्म है "
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें