कोउ जल की आस करे, कोउ नाज के आस ।
खेत खेड़ के हास किए, का तिन कहत बिकास ।१९३१।
भावार्थ : - कोई प्यासा है और जल की आस किए है कोई भूखा है और अन्न की आस किए है है । जो निर्माण खेत खलिहानों गांव-खेड़ों की हानि करता हो क्या उसे विकास कहा जाएगा ।
गांव की हानि का अर्थ है : - भारत की हानि
जीउ जंतु के जी भयो, पुरजन के पाक ।
ता कहँ जा निबासिए जब, तेरा किए सो साक ।१९३२।
भावार्थ : -- जीउ जंतुओं का तो वह जीवन है किन्तु लोगों का वह पकवान हुवा । वे तब कहाँ जाकर निवास करेंगे जब ये जंतु उन्हें अपना ग्रास समझ लेंगे ॥
दाता सदा अमर रहे, आपुनि कीरति सोंह ।
गाहि मरिहैं बहुरि बहुरि, लाहन लाहन जोंह ।१९३३।
भावार्थ : -- साधु सज्जन कह गए हैं कि दाता अपनी कीर्ति के संग अमर रहता है जैसे : - दानवीर कर्ण । किन्तु ग्रहिता जब जब पाने की आस करता है वह तब तब मरता है ।
देखऊ जगत सेठ कस, भयऊ कृपा निधान ।
खाए खेत के खेत अरु, दाए मूठ भर दान ।१९३४।
भावार्थ : -- देखो उन जगत सेठ ( जनता जनार्दन ) के सालोँ को अरे वही जो कहते थे म्हारी सुरक्षा जेड टाइप होगी ।
पण भायो पेमेंट कूण करोगो..?
उत्तर मिल्या : - हम आपे करेंगे !
तो फेर पूरी सेणा न न राख लो..,
मास्टर बोल्या : - फेर अपणी सुरछा ? नई वाली राख लेवैंगे.... वोई जगत सेठ का साला
ओर उस जगत 'सेठ जी' को तो देखो कैसा कृपा निधान बणता फिरो ह । खा तो खेत का खेत गयो देवे है एक मुट्ठी नाज ॥
धनवंत के कंठ लहे, पीतर लागे सौन ।
निर्धन कंठ गहे सौन, सौन कहे तिन कौन ।१९३५।
भावार्थ : -- धनवालों के कंठ में यदि पीतल भी हो तो वह स्वर्ण लगता है । निर्धन के कंठ में स्वर्ण भी हो तो उसे स्वर्ण कौन कहता है ॥
अग्रेजों के गले में सांप भी लटक रहा हो तो सब उसे टाई कहते हैं .....क्या कहते हैँ वाई फाई वाली टाई.....और यदि भोला टाई भी पहन ले तो सब उसे सांप ही कहते हैं.....
धनिमन जोगिहु नउ बसन, पल महु देई ताज ।
निर्धन के जो कर गहे, करे देह पर राज ।१९३६।
भावार्थ : - हे नवल वसन ! तुम धनवंत के आलिंगन की प्रतीक्षा में हो किन्तु वह तो पलक भर में तुम्हारा त्याग कर देंगे । यदि निर्धन का पाणि ग्रहण करो तो सदा उसकी देह पर राज करोगे ॥
जोग बिंदु घन बन उठे, देइ गगन बहु मान ।
जहँ रहे निज घमंड तहँ , पतत खोए निज थान ।१९३७।
भावार्थ : -- घन बनकर उठती है तब गगन उसे अत्यधिक मान देता है एवं उत्तम स्थान देता है । किन्तु यदि वह अपने ही घमंड में रहे तो पलक में ही पतित होकर अपना स्थान खो देता है ॥
निडर ईस अभिमान के, दस मुख अरु भुज बीस ।
गया गया सब कहे जौ बान लगे एक तीस ।१९३८।
भावार्थ : -- मृत्य से जग डरता है किन्तु ईश्वर से निडर अभिमानी के दस मुख एवं बीस भुजाएं होती हैं । थोड़ा कुछ हुवा नहीं की सब कह उठते हैं गया....ये तो गया.....नहीं गया तो विजया दसमी को चला जाएगा.....
हृदय घाती रोग बस , मरे चैन के साथ ।
सिंह घाति मृग माँग किए, मरे राम के हाथ ।१९३९।
भावार्थ : -- अधुनातन समय में जिस प्रकार चैन से मरना हो तो लोग हारडा टेक वाली मरनी की मांग करते हैं ॥ उसी प्रकार पुरातन समय में मृग भी सिंग के द्वारा हृदय विदारक मृत्यु की अपेक्षा श्रीराम के हाथों मरनी की मांग करते थे ॥
लागे लागि जोइ कहीँ समन करे जल कोष ।
लागत मन महुँ लाह तौं, साँत करत संतोष ।१९४०।
भावार्थ : -- याद कहीं आग लग जावे तो उसका शमन जलकोष ही कर सकता है ॥ उसी प्रकार यदि मन में कामनाएं भड़क उठे तो उसका शमन संतोष ही कर सकता है ॥
खेत खेड़ के हास किए, का तिन कहत बिकास ।१९३१।
भावार्थ : - कोई प्यासा है और जल की आस किए है कोई भूखा है और अन्न की आस किए है है । जो निर्माण खेत खलिहानों गांव-खेड़ों की हानि करता हो क्या उसे विकास कहा जाएगा ।
गांव की हानि का अर्थ है : - भारत की हानि
जीउ जंतु के जी भयो, पुरजन के पाक ।
ता कहँ जा निबासिए जब, तेरा किए सो साक ।१९३२।
भावार्थ : -- जीउ जंतुओं का तो वह जीवन है किन्तु लोगों का वह पकवान हुवा । वे तब कहाँ जाकर निवास करेंगे जब ये जंतु उन्हें अपना ग्रास समझ लेंगे ॥
दाता सदा अमर रहे, आपुनि कीरति सोंह ।
गाहि मरिहैं बहुरि बहुरि, लाहन लाहन जोंह ।१९३३।
भावार्थ : -- साधु सज्जन कह गए हैं कि दाता अपनी कीर्ति के संग अमर रहता है जैसे : - दानवीर कर्ण । किन्तु ग्रहिता जब जब पाने की आस करता है वह तब तब मरता है ।
देखऊ जगत सेठ कस, भयऊ कृपा निधान ।
खाए खेत के खेत अरु, दाए मूठ भर दान ।१९३४।
भावार्थ : -- देखो उन जगत सेठ ( जनता जनार्दन ) के सालोँ को अरे वही जो कहते थे म्हारी सुरक्षा जेड टाइप होगी ।
पण भायो पेमेंट कूण करोगो..?
उत्तर मिल्या : - हम आपे करेंगे !
तो फेर पूरी सेणा न न राख लो..,
मास्टर बोल्या : - फेर अपणी सुरछा ? नई वाली राख लेवैंगे.... वोई जगत सेठ का साला
ओर उस जगत 'सेठ जी' को तो देखो कैसा कृपा निधान बणता फिरो ह । खा तो खेत का खेत गयो देवे है एक मुट्ठी नाज ॥
धनवंत के कंठ लहे, पीतर लागे सौन ।
निर्धन कंठ गहे सौन, सौन कहे तिन कौन ।१९३५।
भावार्थ : -- धनवालों के कंठ में यदि पीतल भी हो तो वह स्वर्ण लगता है । निर्धन के कंठ में स्वर्ण भी हो तो उसे स्वर्ण कौन कहता है ॥
अग्रेजों के गले में सांप भी लटक रहा हो तो सब उसे टाई कहते हैं .....क्या कहते हैँ वाई फाई वाली टाई.....और यदि भोला टाई भी पहन ले तो सब उसे सांप ही कहते हैं.....
धनिमन जोगिहु नउ बसन, पल महु देई ताज ।
निर्धन के जो कर गहे, करे देह पर राज ।१९३६।
भावार्थ : - हे नवल वसन ! तुम धनवंत के आलिंगन की प्रतीक्षा में हो किन्तु वह तो पलक भर में तुम्हारा त्याग कर देंगे । यदि निर्धन का पाणि ग्रहण करो तो सदा उसकी देह पर राज करोगे ॥
जोग बिंदु घन बन उठे, देइ गगन बहु मान ।
जहँ रहे निज घमंड तहँ , पतत खोए निज थान ।१९३७।
भावार्थ : -- घन बनकर उठती है तब गगन उसे अत्यधिक मान देता है एवं उत्तम स्थान देता है । किन्तु यदि वह अपने ही घमंड में रहे तो पलक में ही पतित होकर अपना स्थान खो देता है ॥
निडर ईस अभिमान के, दस मुख अरु भुज बीस ।
गया गया सब कहे जौ बान लगे एक तीस ।१९३८।
भावार्थ : -- मृत्य से जग डरता है किन्तु ईश्वर से निडर अभिमानी के दस मुख एवं बीस भुजाएं होती हैं । थोड़ा कुछ हुवा नहीं की सब कह उठते हैं गया....ये तो गया.....नहीं गया तो विजया दसमी को चला जाएगा.....
हृदय घाती रोग बस , मरे चैन के साथ ।
सिंह घाति मृग माँग किए, मरे राम के हाथ ।१९३९।
भावार्थ : -- अधुनातन समय में जिस प्रकार चैन से मरना हो तो लोग हारडा टेक वाली मरनी की मांग करते हैं ॥ उसी प्रकार पुरातन समय में मृग भी सिंग के द्वारा हृदय विदारक मृत्यु की अपेक्षा श्रीराम के हाथों मरनी की मांग करते थे ॥
लागे लागि जोइ कहीँ समन करे जल कोष ।
लागत मन महुँ लाह तौं, साँत करत संतोष ।१९४०।
भावार्थ : -- याद कहीं आग लग जावे तो उसका शमन जलकोष ही कर सकता है ॥ उसी प्रकार यदि मन में कामनाएं भड़क उठे तो उसका शमन संतोष ही कर सकता है ॥
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