सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १९१॥ -----


कहूँ बिपन्न अतीव है कहूँ सम्पन अतीउ । 
समतुल समाजि राज हुँत, रहे सबहि के सीउ ।१९११।  
भावार्थ : -- कहीं अत्यधिक विपन्नता है कहीं अत्यधिक सम्पन्नता है । समता का सामजिक साम्राज्य स्थापित करने हेतु सभी की सीमाएं तय करनी होगी,  निर्धन रेखा से काम नहीं चलेगा धन वालों की भी रेखा होनी चाहिए ॥

खाई मिट्ठा चिरपरा, माल मसालेदार । 
तबहि मैं कहूँ सरकार, लागे कूँ बीमार ।१९१२। 
भावार्थ : -- मिट्ठा भी खा गई, चटपटा  भी खा गई, तर माल भी खा गई, मसाले दार भी खा गई । तभी मैं कहूँ ये म्हारी सरकार बीमार सी क्यूँ लग्गे हैं ॥ मुह मैं दांत नहीं, पेट मैं आंत नहीं, गुलगुली गात नहीं, फेर इतणों खा के बीमार तो लाग्गै गी ॥

गाही के धन रेख के पहिले कर अनुमान । 
बाके सेवा पन देख, दाता पुनि दे दान ।१९१३। 
भावार्थ : -- पहले ग्राही ( लेण वाले की ) की धन की रेखा देख..... ले वा तो चाँद से भी दिख जावेगी.....इब अपणी देख.....दिख्खी.....सूक्षम दरसी लगा के देख.....रै गधे की पूँछ वा तो बिंदु सै..... बड़ा दाता बणा फिरै सै.....मत दूंगा .....देगा तै मत.....इब बोल न मत लूंगा न दूंगा..... 

सेवापन की आस लिए, दुर्जन बरे स्वामि । 
जग महुँ कबहु सेवक भए, छलि पातन धन कामि ।१९१४। 
भावार्थ : -- सेवासुश्रुता की आस में स्वामी ने दुष्टों का चयन किया और करते जा रहे हैं। संसार में ठग, ढिंगी, स्वेच्छाचारी, धन के कामी भी कभी सेवक हुवे हैं.....? 

 यह देही एक अतिथि गह, आत्मा अतिथि देउ । 
अतिथि धर्म निभाए सुची, राखैं तिन्ह सदैउ ।१९१५।  
भावार्थ : -- यह देहि एक अतिथि गृह है एवं अंतरात्मा अतिथि देव है । अतिथि को चाहिए कि वह अपना अतिथि धर्म का पालन करते हुवे उस गृह को सदा अकल्क रखे ॥  

धणी मणी कू चाहिये, बरें सिंधु सुभाए । 
 तपत रहे जो अपनपौ , खन खन कन बरखाए ।१९१६ । 
भावार्थ : - धनवंत को चाहिए की वह सिंधु के स्वभाव को वरण करें । सिंधु रत्नाकर होते हुवे भी स्वयं तपकर से तप्त रहता है किन्तु खंड खंड में शीतल कणों की वर्षा करता है ॥ 

अर्थात : -- धनी स्वयं हेतु कृपणधी रहते हुवे कृपणी हेतु उदारमना रहे..... 

उदर परायन आपना खावै आपहि आप । 
वासों कर पोषित होत, सकल जगत संताप ।१९१७। 
भावार्थ : -- जो अपने उदर के परायण होकर स्वयं पकाता है स्वयं ही खाता है । संसार के समस्त  संताप  ऐसे अधमी के हाथों ही पोषित होते हैं ॥ 

साँच सम बड़े सत्कर्म, जग माहि को नाहि । 
तोष के कोष मह सकल, सुख सम्पद संचाहि ।१९१८। 
भावार्थ : --  संसार में सत्य के समान दूसरा कोई पुण्य नहीं है । समस्त सुख सम्पदा संतोष के कोष में ही संचयित रहती है ॥ 

एकै अगास के तलहट, सबहीं करे निबास । 
कल ससि तुहरे पास रहए, अजहूँ हमरे पास ।१९१९। 
भावार्थ : -- एक ही आकाश के नीचे हम सभी का निवास है । यह चमकता हुवा चाँद कल तुम्हारे पास था । आज हमारे पास है । 

अर्थात : -- परिस्थितियां आर्थिक हो सामाजिक हो अथवा कोई भी क्यों न हो वह नित्य परिवर्तनशील रहती हैं..... 

बीतत समऊ अधारे, तुहरे होवनिहार । 
होव्निहार उजास हो, ऐसो कारज कार ।१९२० । 
भावार्थ : -- व्यतीत होते समय में ही तुम्हारा भविष्य टीका हुवा है । ऐसे कार्य करने चाहिए जिससे यह भविष्य उज्जवल हो ॥ 

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