मंगलवार, 28 अक्टूबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १९८ ॥ -----

मानस बिय बुराई के, बोए बहुत इतराए । 
बहुरि पोषन  पाई के, साख परन फल आए ।१९८१ । 
भावार्थ : -- रे मानव तुमने इतरा इतरा के जो बुराई के बीज बोए थे ।  वह पोषण को  प्राप्त हो गए हैं अब तो उसमें शाख-पत्र  प्रस्फुटित हो गए हैं और वह फलीभूत भी हो गया ॥ 



भले तरु भलाई फले, बुरे तरु मैं बुराइ । 
खल तरु मैं तौं खल फले, भल में संत सहाइ ।१९८२। 
भावार्थ : -- भले  तरुवर में भलाई ही फलती है बुरे तरुवर में बुराई ही फलती ही । दुष्टता के तरुवर में दुष्टता फलती ही, आतंक फलता है, एवं सज्जनता के  तरुवर में संत सहाई फलते हैं ॥

पद प्रतिठा धन जोग के, उठा न कोउ समाज । 
जे तौ तबहि उभरे जब  किए सत सेवा काज ।१९८३। 
भावार्थ : - पद प्रतिष्ठा व् धन की प्राप्ति से समाज का उद्धरण नहीं होता । जाति एवं समाज का उद्धरण तभी  होता है जब सेवा व् कृतकार्य किया जाए ॥

रच्छा अवसरु पाए के, उत्थाईं कोउ एक । 
जो सत सेवा काज किए, उठएँ सकल समवेत ।१९८४। 
भावार्थ : -- सुरक्षित किवे गए अवसरों को प्राप्त कर कोई एक उठता है जो अनेको को  निचे गिरा देता है ॥ किन्तु यदि वही एक समाज सेवा के सह सत्कार्य करे तो जाति सहित सम्पूर्ण समाज का उत्थान संभव है ॥

जिन्ह जन की मनसा रहि सदैव लेवन माहि । 
तिन्ह जन के कोष गहे गुन सम्पद कभु नाहि ।१९८५। 
भावार्थ : -- जिन लोगों मंशा सदैव  लेने में ही होती है । उन लोगों के कोष में गुणों की सम्पदा का अभाव रहता है ॥

रनोपकरन सो उपकरन, जो जन के रखबार । 
जो अरि चोट चपेट किए होत सोइ हथियार  ।१९८६। 
भावार्थ : -- वह उपकरण रणोपकरण है जो रणभूमि में जनता की रक्षा करे । आयुध वही है जो शत्रुओं को चोटिल कर दे, अन्यथा तो सभी लोहा है ।

भारत खंड ने देखे, बड़े बड़े साम्राज । 
रावन हो कि रामराज, जमन कि अँगुली राज ।१९८७ । 
भावार्थ : -- यह भारत खंड है साहेब । इसने बड़े बड़े साम्राज्य देखें है चाहे वह रावण राज हो या राम राज हो एवं राज हो या फिर अंगेरजी राज,  सामरिक विषयों में इससे अधिक अनुभवी न कोई हुवा न होगा ॥ 

प्रानी जन रखे चाहे रखेव दिवस के कान । 
जामें जीवन हानि हो, तिन उपकरन न मान ।१९८८। 
भावार्थ : -- चाहे  वह प्राणीजनों की रक्षा करता हो चाहे राष्ट्र  सहित सीमा की सुरक्षा करता हो ।  रणोपकरण में उस उपकरण की गणना नहीं की जानी चाहिए जिसमें निज राष्ट्र के जीवन की हानि होती हो ॥

मानवबम रणायुध नहीं होने चाहिए ।

क्या परमाणु गोले निज राष्ट्र के जीवन हेतु सुरक्षित हैं.....?

गौवें रूरत फिर रही, कहँ हैं पालन हार । 
मंत्रियों ने बना दिया, उनको मच्छी मार ।१९८९। 
भावार्थ : -- गौवें तो ठोकर खाती फिर रही हैं,  कहाँ हैं गौपाल । इन दुष्ट मंत्रियों ने उनको मछरी मार बना दिया ॥

ये दुष्ट मंत्री  किसानों को कहते हैं, मछली पालो, खेती-वेती छोडो खेत हमें दे दो हम उन्हें उद्योग पतियों को देंगे । 

देखत करतब आपुना, गरब करे सब कोए । 
ऐसो कारज किजीये, गरब दूज को होए ।१९९०। 
भावार्थ : -- अपना कौशल देखकर तो अपने आप पर तो सभी गर्व करते हैं । ऐसे कार्य करने चाहिए कि अपने ऊपर दूसरों को गर्व हो ।। 

अपना गाल तो सभी बजाते हैं ऐसे कार्य करने चाहिए कि दूसरे ताल बजाएं..... 





----- मिनिस्टर राजू १४५ -----

राजू : -- मास्टर जी ! तनिक सिद्ध कर के बताइये कि यदि एक भ्रष्टाचार करें तो वह पांच गुना बन के फिरता है..,

" एक नेता जी थे.....वि समझते थे कि आदमी की खाल में तो वो ही है "

राजू : -- मास्टर जी ! फिर का हुवा..?

" फिर का होना था सामने वाला आदमी बम निकला"

और हमारे छेत्र माँ एक उद्योग पति थे.....अपना अम्पायर दख देख के लोगों पर हँसते थे.....एक दिन वो उड़न खटोले से कहीं जा रहे थे..,

 राजू : -- मास्टर जी ! फिर का हुवा..?

" फिर का होना था, धड़ाम से नीचे गिरे और सीधा गए.....कुछ दिन बाद पता चला उसका जो पायलट था वो पायलट नहीं था.....वो लोको पायलट था.....अब लोग उसका अंपायर देख देख के हँसते हैं..... 

शनिवार, 25 अक्टूबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १९७ ॥ -----

जहँ ग्यान तहँ भल नीति, जहाँ दान तहँ नीत । 
जहाँ जगहीत तहँ धर्म, जहाँ धर्म तहँ जीत ।१९७१ । 
भावार्थ : -- जहाँ ज्ञान है भली भली नीतियां भी वहीँ होती है जहाँ दान है धन भी वहीँ होता है । जहाँ जगहीत है धर्म उसी के पक्ष में होता है और जहां धर्म होता है वहीँ जीत होती है ॥ 

दान संग कल्यान है दान सुरग सोपान 
दान के तिनि बिधान मैं , सबसे उत्तम ज्ञान ।१९७२ । 
भावार्थ : --दान कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है दान ही स्वर्ग-सोपान है ।दन के तीन विधान में (भौतिक वस्तुओं का दान, बौद्धिक वस्तुओं का दान, अध्यात्म अथवा ज्ञान का दान )सबसे उत्तम ज्ञान का दान है । 

एक ते पहले आठ किए, बहुरि आठ ते साठ । 
अजहुँ त  पार गमन हुवे , भ्रष्ट चरन परिकाठ ।१९७३ । 
भावार्थ : -- सबसे निकृष्ट दान है बौद्धिक वस्तुओं का दान जिसमें मत दान भी सम्मिलित है \ काहे की इसको देने के लिए बहुंत सोचना पड़ता है । देखो तुमने किसको दिया : -- 

जिसने  पहले एक से आठ किए फिर आठ के साठ । अब तो  यह भ्रष्टाचार परिकाष्ठा को पार कर गया है ॥ 

तीनि बरन की चाकरी भयउ बरस कुल चार । 
चाकर अबर बाहि संग, रचे मनिक आगार ।१९७४ । 
भावार्थ : -- चारपांच वर्ष पुराने एक तृतीय वर्ग के कर्मचारी का  कुल पारिश्रमिक कितना होगा  यही कोई सात -आठ लाख लाख ॥ पर यहाँ तो सेवक के पास दो तीन उत्तम वाहन है फटिक रचना वाला भव्य भवन भी हो गया है ॥ 

गुरु गधा ही रहा । लटक लटक के पास होने वाले चेले चीनी हो गए और उनके भी चेले मिश्री हो गए .....

काल करम के पोखरा, पोठे लहुरी मीन । 
पलत पोस बढ़के तहाँ, होइहि केतक पीन ।१९७५। 
भावार्थ : -- काले कुकर्मों के पोखर मैं जब छोटी छोटी मछलियाँ इतनी पोठ हैं तब द्वितीय फिर प्रथम फिर शासन फिर मंत्री, मुख्यमंत्री,  केंद्रीय मंत्री तत्पश्चात प्रधान मंत्री रूपी बड़े बड़े मगर मच्छ पलते पोषित होते कितने पुष्ट होंगे ॥ 

ऐसा दान एक दिन अपने ही घर को नरक बना देता है.....

भ्रष्ट चरन रे मूरखा करत बहुत इतराए । 
जो एक किए तो पांच गुन, बनके घर बहुराए ।१९७६। 
भावार्थ : -- भ्रष्ट आचरण करते हुवे बहुंत इतराते हो न  । मूर्खों गधो-खच्चरों यदि तुम एक करते हो तो वह तुम्हारे घर पांच बनके लौटता है ॥ 

धरम सकलित बिचार हैं, धर्म जनम आधार । 
देस काल बै जोग के, करौ समुचित सुधार ।१९७७। 
भावार्थ : -- धर्म क्या है ? सुविचारों का संकलन ही तो है । देश काल एवं परिस्थितियों का अवलोकन कर इसमें सावधानी पूर्वक सुधार करते रहना चाहिए ॥ 

जिस प्रकार एक मीन सारे तालाब को गन्दा कर देती है उसी प्रकार एक कुविचार पूरे धर्म के निंदा का कारण  बनता है.....

धर्म जाति जमोगन है , सार तीज तौहार ।
देसज समाज संग जो , बाँध रखे परिबार ।१९७८। 
भावार्थ : - धर्म एवं जाति यदि जुड़ावन हैं तो तीज त्यौहार उसका सार हैं जो देसवासियों सहित समाज एवं परिवार को दृढ़ता पूर्वक बांध रखते हैं ॥ 

कोई त्यौहार किसी एक धर्म का होता है, कोई त्यौहार किसी विशिष्ट जाति का होता है, कोई त्यौहार किसी स्थान विशेष का होता है ।।  

धर्म जाति बपुरधर हैं त , परब हार सिंगार। 
तामें रीति के मनि कू, गाठों सोच बिचार ।१९७९। 
भावार्थ : -- धर्म-जाति यदि सुन्दर शरीर हैं तो त्यौहार उसका श्रृंगार हैं ( संस्कार उसके वस्त्र हैं ) अस हर में फिर रीतियों की मणियों को सोच समझ कर पिरोना चाहिए ॥ रीतियाँ ऐसी होनी चाहिए कि उससे जीवन,  धन एवं वातावरण की हानि न हो ॥ 

बोअन हारु ने त बोए एकै मूठिका नाज । 
पालन पोषण पेह के, बढ़े बाके समाज ।१९८० । 
भावार्थ : -- बोने वाले यद्यपि एक मुष्टिका अनाज ही बोता है । पालित व् पोषित होकर ही उसका समाज   विस्तार को प्राप्त होता है ॥ 

भलाई हो अथवा बुराई हो वह कतिपय से ही प्रारम्भ होती है व् पालित पोषित होकर अतिसय पर समाप्त होती है ॥  



 







मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १९६॥ ----

जेतक ऊँचे पद गहे, धंसे तेतक नीच ।
वाके करे कुकरम भुइ , भरे कीच ही कीच  ।१९६१। 
भावार्थ : -- समय ऐसा लाया गया कि जो जितने ऊँचे पद पर विराजित है /हुवा , दुराचार के कीचड़ में वह उतना ही धंसा हुवा है ।दुराचार रूपी यह कीचड़ कहीं से आयातित होकर नहीं आया अपितु  उसके ही किए कुकर्मों का परिणाम है ॥  

रसना संग स्वादु लिए, खावैं पसु की टाँग । 
ऊँचे आसन राज सो, दान रहे हैं माँग ।१९६२। 
भावार्थ : - जिह्वा से स्वाद ले ले कर पशुओं की टाँग खाने वाले ऊंचे आसान में विराजित होकर दान मांग रहे हैं ॥ क्या ऐसे लोग किसी भी प्रकार का दान ग्रहण की योग्यता रखते हैं । 

टिप्पणी : --  आजीविका हेतु कतिपय योग्यता पर्याप्त होती है किन्तु दान ग्रहण हेतु अतिशय योग्यता चाहिए.....

काँकरी कन दोउ परे, चुगि कन चिरि की चोँच । 
रे मानस तुम का चुँगे, बैठ ठाउँ कहुँ सोच ।१९६३। 
भावार्थ : - कंकरी और कण दोनों पड़े रहते हैं चिड़िया की चोँच  केवल कण को ही चुनती है । रे मानव तुमने क्या चुना कहीं किसी सत्संग की संगती करते हुवे यह विचार कर ॥  

करतल धारे माथ मुख कहन सोइ दुहराए । 
चिरिआ चुग गइ खेह अरु पिछे बैठ पछिताए ।१९६४। 
भावार्थ : -- माथा पकड़े हुवे मतदाता  के मुख ने फिर वही दुहराया । चिड़िया चुन गई खेत रे बैठ पीछे पछताया ॥ 

गाहक लेवन मैं लगे, बेचन मैं बैपारि । 
सगुन मनाउन आपुनो, दिवारि पंथ जुहारि ।१९६५। 
भावार्थ : -- ग्राहक  मोल मलाई में लगे हैं बैपारी ठगाई में लगे हैं । दीवाली है कि  अपने शगुन की प्रतीक्षा में है ॥ 

 लेन-देन में ही ये जीवन व्यतीत हो जाएगा, पहले सोच ले रे बन्दे फिर पीछे पछताएगा..... 

जोड़ जन जन जुगाउनी, लगे रहे दिन रात । 
जी उठे जब रे मूरख, परी रही यह गात ।१९६६। 
भावार्थ : - धन संग्रह करने में सब दिन रात एक किए हैं । न उन्हें वार की सुध है न त्यौहार की ॥ रे मूरखों , गधों -खच्चरों जब यह प्राण निकलते हैं न तब संग्रह क्या तुम्हारा यह शरीर भी यहीं पड़ा रह जाता है ॥ 

देन जोग सुख सम्पदा, लेन जोग पर ताप । 
जुगौनी जोग  पुन अहै, परिहरन जोग  पाप ।१९६७ । 
भावार्थ : -- देने योग्य यदि कुछ है तो वह सुख की सम्पदा है, लेने योग्य यदि कुछ है तो वह पराया संताप है । संग्रह करने योग्य यदि कुछ है तो वह पुण्य है, त्याग करने योग्य यदि कुछ है तो वह पापकर्म हैं ॥  

संतों की वाणी है : -- 
चार वेद षट शास्त्र में बात मिली है दोय । 
सुख दीन्हे सुख होत है, दुःख दीन्हे दुःख होए ॥ 


स्त्री अरु पुरुख लिंग के रखे सदैव धिआन । 
सटीक वाचक के संग कबित माहि रस आन ।१९६८। 
भावार्थ : -- स्त्री लिंग एवं पुर्लिंग का ध्यान रखते हुवे रचना रचनी चाहिए । सटीक वाचकता के संग रसों का प्रादुर्भाव होता है एवं कविताएँ रसवती होती है ।।  

सकल देस नदी नदपत, रहे आपनी कान । 
तबहि सीउँ के मान सहित, होत जगत के मान ।१९६९ । 
भावार्थ : -- समस्त देश, नदियां सागर जब अपनी अपनी मर्यादा में रहते हैं तभी सीमाओं के सम्मान सहित संसार का मान होता है अन्यथा इनकी आवश्यकता ही क्या है ॥ 

" यदि सागर अपना मर्यादा भूल जाए तो पृथ्वी जल जल हो जाएगी....." 

जासु  बुद्धि जड़ होत जब जगत बिपरीत होइ । 
तासु  बिनासन के अबर अवरु गति नाहि कोइ ।१९७०। 
भावार्थ : -- जिसकी बुद्धि  जड़ होकर संसार के विरुद्ध हो गई हो  उस बुद्धि की विनाश के अतिरिक्त और कोई गति नहीं होनी ॥ 








शनिवार, 18 अक्टूबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १९५ ॥ -----

नौ समाज के रचयता, मायाबी जन होए । 
सुवारथ के वसीभूत, गुन बिहून बिअ बोए ।१९५१ । 
भावार्थ : -- नव समाज के ये प्रारंभिक रचयिता विलासिता की साधन स्वरुप माया के दास होते हैं औॅर अपने स्वार्थों के वष में रहते हैं । ये बिना रसहीन गुणहीन बीज बोते हैं इनसे जो जीवन उत्पन्न होता है वह फिर समाज के किसी काम नहीं आता जो समाज के काम नहीं आया वह राष्ट्र के क्या काम आएगा । कोई आया हो तो बता दो ॥ 

नाउ तेरो धर्म कहे, जात कहे उपनाउ । 
जात जीवत जुगत करे, जोग तेरा सुभाउ ।१९५२ । 
भावार्थ : -- नाम किसी मनुष्य  के धर्म का सूचक होता है, उपनाम उसकी जाति का सूचक होता है नाम उपनाम से किसी व्यक्ति का पूर्ण विवरण है । जाति मनुष्य  के स्वभाव की गणना कर उसकी जीविका का उपाय करती है  ॥  प्रत्येक प्राणी का गुण-धर्म होता है जाति-प्रजाति होती है । चूँकि पशुपक्षियों में वाणी नहीं होती, बुद्धि अल्प होती हैं इसलिए वे अपने भावों को अभिव्यक्त नहीं कर पाते ॥

                                                    बहुंत ऊपर रहने से नीचे का कुछ दिखाई नहीं देता ॥ यह सब देखने के लिए बहुंत नीचे उतरना पड़ता है । नेता-मंत्रियों ( नेताओं में धनाढ्य भी आते हैं)  को तो मध्यम वर्गीय मनुष्य ही दिखाई नहीं देते बाकि तो छोड़ो ॥ 

 नामकरण सावधानी पूर्वक करना चाहिए , नए समाज वाले नाम नहीं नंबर रखेंगे जैसे 'अरे ओ चार सौ बीस इधर आ' । अंकों के आधार पर ही इनमें जातियां विकसित होंगी जैसे : -- जीरो अंक वाले उच्च जाति  के हैं भई अभिनेता थोड़े ही हैं नेता हैं  ) मतलब की घूम फिर के ये जहां थे वहीँ आ जाएंगे । 

मानस जोनि जनम लिए त, कारउ ऐसे काज । 
बिगड़े भलेहि आपुना, बिगड़े नहीं समाज ।१९५३। 
भावार्थ : -- मनुष्य योनि में जन्म मिला है तो ऐसे कार्य करने चाहिए कि अपना चाहे जो बिगड़ जाए किन्तु समाज बिगड़ने न पाए ।। 

बानी जैसी बोलिये, कारत भल भल काम । 
सुनन करन मैं काठ हो देउ मधुर परिनाम ।१९५४ । 
भावार्थ : -- भले भले कार्य करते हुवे वाणी जैसी भी बोले सुनने करने में भले ही वह कठोर हो किन्तु उसका परिणाम मधुर हो ॥ मीठी वाणी का परिणाम यदि कटु हो तब ऐसी वाणी बोलने का क्या लाभ ।। 

बीती साँझ सिंदूरी जब गहनावै रत । 
बहोरि  केतु नाथ संग उदयत नवल प्रभात ।१९५५ । 
भावार्थ : -- सिंदूरी संध्या के व्यतीत होने पर जब यामिनी गहरी होती जाती है तब फिर केतु नाथ के संग नवल प्रभात  का भी उदय होता ही । 

प्रस्तुत पंक्तियों में यद्यपि नवल कुछ भी नहीं है तथापि प्रभात  को नवल कहा गया क्यों कहा गया ? अपन सब थोड़े ही जानते हैं । रिक्तता कहीं लक्षित नहीं है तो भी एक नई क्रिया प्राप्त हुई ।। 

पूरबतस समउ मैं तो, दीन रहे सब कोइ । 
लाख टके के प्रसन यहु, अजहुँ तुम्ह का होइ ।१९५६। 
भावार्थ : -- पूर्व समय में तो सभी दीन थे (पूर्वकाल में हमारे  सभी के पितृजन दीन हीन किसान थे, थे की नहीं फिर मुनीम फिर न जाने क्या क्या बने  ) । लाख टके का प्रश्न यह है कि वर्त्तमान में तुम क्या हो ॥ 

 था था था, है है है.....

पसु द्रव धन अन्न कन के कोउ किए ब्योपार । 
कल हीन होकरश्रम किए, को रहि खेतीहार ।१९५७ । 
भावार्थ : -- पशु द्रव्य धन अन्न कणों का व्यापार करता था कोई यन्त्र हीन होकर किसी के पिता महापिता श्रमपूर्वक खेती करते ॥  

जो मैं होता कर्मना, करता बर बर काम । 
अस कथिक आपन आपहि, धरे अकरमन नाम ।१९५८। 
भावार्थ : -- यदि मैं कर्मठ होता तो बड़े बड़े काम करता । ऐसा कहने वालों को  अकर्मण्य कहने की आवश्यकता नहीं क्योंकि वह स्वयं ही स्वयं को अकर्मण्य कहते हैं ॥ 

करे कढ़ाई कड़ी भए, लौह बने भल नेम । 
करे ढिराई लड़ी भए, कंठ गहे बन हेम ।१९५९ । 
भावार्थ : -- यदि भली नीतियों नियमों को  कठोरता पूर्वक लागु किया जाए तो वह लोहा होकर हथकड़ी बन जाते हैं । और यदि उन्हें लागु ही नहीं किया जाए तो वह स्वर्ण होकर कंठ -माल बन जाते हैं ॥

जेतक ऊँची जीउनी, तेतक नीची सोच । 
जेतक नीची सोच सो, होइहि तेतक पोच ।१९६०। 
भावार्थ : -- जिसकी जितनी ऊंची जीवन शैली होती है उसके उतने ही नीचे विचार होते हैं । जिसके जितने नीचे विचार होते हैं वह उतना ही तुच्छ होता है ॥ 








मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १९४ ॥ -----

पाहिनी जस चरन  देख पल मह लए पहचान । 
सेवकहु को चाहिए तस, होए सेवा निधान ।१९४१ । 
भावार्थ : --चरण पादुका जैसे चरण देखते ही उन्हें पलक भर में ही पहचान लेती है । सेवक को भी चाहिए कि वह सेवा का भंडार होकर अपने स्वामी के चरणों से सदैव परिचित रहे ॥ 

सोइ नदि नग सोइ सिंधु , भगवन सोइ पुरान । 
जो नउ अहैँ सो जीवन, जग मह आनइ जान ।१९४२। 
भावार्थ : -- वही नदी है वही पर्वत है सागर भी वही है भगवान भी वही पुराने से हैं । संसार ,में यदि कुछ नया है तो वह जीवन है जो कि आता -जाता रहता है ॥ 

अर्थात : --  एक यह जीवन ही अस्थिर है, शेष सब कुछ यथावस्थिर हैं ।  

सोइ नियति सोइ नियंता सोई तासु बिधान । 
प्रतिछन परिभर्मित रहे ,जन मानस के कान ।१९४३। 
 भावार्थ : -- वही नियति है वही नियंता है उसके विधि विधान भी वही है । किन्तु जन मानस के रचे विधि विधान प्रतिक्षण परिभ्रमित रहते हैं ।। 

अँधेरा  कहन भर सोंह , दूरए नहीँ अँधेर । 
अँधेरा तब दूरए जब, अलोक दिए तिन हेर ।१९४४। 
भावार्थ : - -  अँधेरा कहने भर से अँधेरे दूर नहीं होतेयह तभी दूर होते हैं जब उसे आलोक पुकारता है ॥ 

                  अँधेरा कहने भर से अँधेरे दूर नहीं होते..,
                 मुहसिल-ओ-महशर कभी मशहूर नहीं होते.....

                   मुहसिल-ओ-महशर = प्यादों की भीड़ के प्यादे  

असन बसन भुइ दीप सन , जो घृत बरतिक दाए । 
ऐसे दाता के भवन,चरन चरत लखि आए ।१९४५। 
भावार्थ : -- जो भूमि अन्न वस्त्र सहित दीपक -घृत-वर्तिका का दान करता है । ऐसे दाता के घर लक्ष्मी  स्वयं चल कर आती है और माया को भगाती है ॥  जीवन के आधार भूत आवश्यकताओं की साधन स्वरुपा लक्ष्मी है विलासिता की साधन स्वरूपा माया है ॥ 

चौपट नृप के राज हैं माँगत सब अवकास । 
कोउ बिहारबन बिहरे , कोउ फिरै आकास ।१९४६। 
भावार्थ : -- चौपट राजा का राज है सभी अवकाश में है । कोई पर्वतीय स्थलों में अर्थात हिल टेसन में विचर रहा है कोई अफ़्लाक में फिर रहा है । काहे : -- प्रवास पर जाने को और काहे ॥

 "जैसा शासन वैसा प्रशासन "

जुगति से आसन मारे, उलटी पवन चलाए । 
मिर्ज़ापुर का पाउना, पाँच कोस में पाए ।१९४७। 
भावार्थ : -- युक्तियों से सिंहासन मार लिया अब उलटी पवन चला रहा है । मिर्ज़ापुर ( अहमदाबाद ) का मेहमान है और पांच कोस ( काशी) में पाया जाता है ।।

धोए नहाए पहन खाए, छाउँ बिराजे भूप । 
परजा मारि मारि फिरै, सर पर धूपहि धूप ।१९४८। 
भावार्थ : - राष्ट्र प्रमुख तो साफ सुथरे खा पी के छाँव में बैठे रहते हैं । बेचारी  जनता जनार्दन धूप में मारी मारी फिरती है ॥ कैसा तंत्र है ये ।

अर्थात : --" जहां राष्ट्र प्रमुख रत्न जड़ित प्रासादों में निवासित हो वह लोक तंत्र कदापि नहीं हो सकता " यह अधिनायक तंत्र ( डिक्टेटरशिप ) अथवा स्वेच्छा चारि तंत्र  अथवा एकसत्तावाद है ॥

मानस के एकाकीपन, प्रतिछन  हेरि समाज । 
सामाजिक रीति अनुसार, चलत सधै सब काज ।१९४९। 
भावार्थ : -- मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है उसका एकाकीपन प्रतिक्षण समाज को ही अन्वेषित करता रहता है । अत: सामजिक रीति  के अनुसार चलने से ही सभी कार्य सिद्ध होते हैं ॥

" परिवर्तन शनै: शनै: होता है, समाज को वही परिवर्तन स्वीकार्य होता है जिसमें  संसार का कल्याण निहित हो ॥

" किसी एक व्यक्ति अथवा कुछ व्यक्तियों के न मानने से सामाजिक मान्यताएं समाप्त नहीं होती "

जाति धर्म लच्छन बिमुख , रहे सोइ संसार । 
पूरब समाज परिहरत, रचे आप अनुसार ।१९५० । 
भावार्थ : -- जो धर्म जाति  के जन्मजात लक्षणों से विमुख व्यक्ति रहते तो इसी संसार में है ।  किन्तु थीदा ऊपर । ऐसी विमुखता का एक ही परिणाम होता है वो है संकर संतति ( जैसे हाइब्रिड फल सब्जी जो देखने में तो अच्छी लगती हैं खाने में नीरस में एवं स्वास्थ् की दृष्टि से गुणहीन होती हैं ) । ये पूर्व के सामाजिक ढाँचे को विध्वंस कर अपने अनुसार फिर नए समाज की रचना करते हैं । 

                                        व्यक्तियों का समुच्चय परिवार की रचना करता है, परिवार का कर्म ही उसकी जाति है, निकृष्ट जाति की व्युत्पत्ति निकृष्ट कर्म करने के कारण हुई परिवारों का समुच्चय समाज की रचना करता है समाजों का समुच्चय ही राष्ट्र की रचना करता है,  अर्थात व्यक्ति है तो परिवार है परिवार है तो समाज है समाज है तभी किसी राष्ट्र का अस्तित्व है, उत्तम विचारों का संकलन ही धर्म है, कोई व्यक्ति, परिवार, समुदाय, अथवा राष्ट्र जिसका अनुशरण करता है करता है । 

  ''परम विचार ही परमोधर्म है "   











शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

----- मिनिस्टर राजू १४४ -----

राजू : -- मास्टर जी !

'हुँ'

राजू : -- मास्टर जी !!

" हूँऊंऊं'

राजू : - इब ठीक सै मास्टर जी ! यो तालिबान आले गोली मारणों का के लेता सी.....?

" थे आधो दे दियो "

राजू : -- पण मास्टर जी ! जीन की  के गारंटी सिधा गयो तो..?

" तेणे अपणो धंधो का बेरो स तो उणां न बी बेरो स, कित मारणी स कित ना "






शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १९३॥ -----,

कोउ जल की आस करे,  कोउ नाज के आस ।   
खेत खेड़ के हास किए, का तिन कहत बिकास ।१९३१। 
भावार्थ : - कोई प्यासा है और जल की आस किए है कोई भूखा है और अन्न की आस किए है है । जो निर्माण खेत खलिहानों गांव-खेड़ों की हानि करता हो क्या उसे विकास कहा जाएगा ।

गांव की हानि का अर्थ है : - भारत की हानि

जीउ जंतु के जी भयो, पुरजन के पाक । 
ता कहँ जा निबासिए जब, तेरा किए सो साक ।१९३२। 
भावार्थ : -- जीउ जंतुओं का तो वह जीवन है किन्तु लोगों का वह पकवान हुवा  । वे तब कहाँ  जाकर निवास करेंगे जब ये जंतु उन्हें अपना ग्रास समझ लेंगे ॥

दाता सदा अमर रहे, आपुनि कीरति सोंह । 
गाहि मरिहैं बहुरि बहुरि, लाहन लाहन जोंह ।१९३३। 
भावार्थ : -- साधु सज्जन कह गए हैं कि दाता अपनी कीर्ति के संग अमर रहता है जैसे : - दानवीर कर्ण ।  किन्तु ग्रहिता  जब जब पाने की आस करता है वह तब तब मरता है ।

देखऊ जगत सेठ कस, भयऊ कृपा निधान । 
खाए खेत के खेत अरु, दाए मूठ भर दान ।१९३४। 

भावार्थ : -- देखो उन जगत सेठ ( जनता जनार्दन ) के सालोँ को अरे वही जो कहते थे  म्हारी सुरक्षा जेड टाइप होगी ।

पण भायो पेमेंट कूण करोगो..?
उत्तर मिल्या : -  हम आपे करेंगे !

तो फेर पूरी सेणा न न राख लो..,

मास्टर बोल्या : - फेर अपणी सुरछा ?  नई वाली राख लेवैंगे.... वोई जगत सेठ का साला

ओर  उस जगत 'सेठ जी' को तो देखो कैसा कृपा निधान बणता फिरो ह । खा तो खेत का खेत गयो  देवे है एक मुट्ठी नाज ॥

धनवंत के कंठ लहे, पीतर लागे सौन । 
निर्धन कंठ गहे सौन, सौन कहे तिन कौन ।१९३५। 
भावार्थ : -- धनवालों के कंठ में  यदि पीतल भी हो तो वह स्वर्ण लगता है । निर्धन के कंठ में स्वर्ण भी हो तो उसे स्वर्ण कौन कहता है ॥

अग्रेजों के गले में सांप भी लटक रहा हो तो सब उसे टाई कहते हैं .....क्या कहते हैँ वाई फाई वाली टाई.....और यदि भोला टाई भी पहन ले तो सब उसे सांप ही कहते हैं.....

धनिमन जोगिहु नउ बसन, पल महु देई ताज । 
निर्धन के जो कर गहे, करे देह पर राज ।१९३६। 
भावार्थ : - हे नवल वसन !   तुम धनवंत के आलिंगन की प्रतीक्षा में हो  किन्तु वह तो  पलक भर में तुम्हारा त्याग कर देंगे । यदि निर्धन का पाणि ग्रहण करो तो सदा उसकी देह पर राज करोगे ॥

जोग बिंदु घन बन उठे, देइ गगन बहु मान । 
जहँ रहे निज घमंड तहँ , पतत खोए निज थान ।१९३७। 
भावार्थ : --  घन बनकर उठती है तब गगन उसे अत्यधिक मान  देता है एवं उत्तम स्थान देता है । किन्तु यदि वह अपने ही घमंड में रहे तो पलक में ही पतित होकर अपना स्थान खो देता है ॥

निडर ईस अभिमान के, दस मुख अरु भुज बीस । 
गया गया सब कहे जौ बान लगे एक तीस ।१९३८। 
भावार्थ : -- मृत्य से जग डरता है किन्तु ईश्वर से निडर अभिमानी के दस मुख एवं बीस भुजाएं होती हैं । थोड़ा कुछ हुवा नहीं की सब कह उठते हैं गया....ये तो गया.....नहीं गया तो विजया दसमी को चला जाएगा.....

हृदय घाती रोग बस , मरे चैन के साथ । 
सिंह घाति मृग माँग किए, मरे राम के हाथ ।१९३९। 
भावार्थ : -- अधुनातन समय में जिस प्रकार चैन से मरना हो तो लोग हारडा टेक वाली मरनी की मांग करते हैं ॥ उसी प्रकार पुरातन समय में मृग भी सिंग के द्वारा हृदय विदारक मृत्यु की अपेक्षा श्रीराम के हाथों मरनी की मांग करते थे ॥

लागे लागि जोइ कहीँ समन करे जल कोष । 
लागत मन महुँ लाह तौं, साँत करत संतोष ।१९४०। 
भावार्थ : -- याद कहीं आग लग जावे तो उसका शमन जलकोष ही कर सकता है ॥ उसी प्रकार यदि मन में कामनाएं भड़क उठे तो उसका शमन संतोष ही कर सकता है ॥






बुधवार, 8 अक्टूबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १९२॥ -----

जूझ कै भई बूझ कै किए जो सेवा दान । 
चारि चारु परलोक पथ, चौहट करे मिलान ।१९२१। 
भावार्थ : -- जो बुराइयों से लड़ते हुवे फिर ज्ञान लेता-देता हो, उसपर सेवा दान देता हो । ऐसा चौंक परलोक के चार सुन्दर मार्ग ( बरहमन - ज्ञानार्जन-व्ययन , क्षत्रिय- समर सम्मुख, वैश्य- दानधर्म, क्षुद्र- सेवाकर्म ) का मिलान करता है ॥

सोइ उदर भूखन मरे, खा खा जो अघयाए । 
सो सदा तुषित रहे जो, दुजी भूख अपनाए ।१९२२। 
भावार्थ : -- वह उदर सदा क्षुधित ही रहता है जो भर भर के खाता है । उदर वही तृप्त रहता है जो पराई भूख को अपनाता है ॥

एक हस्त त न्याय करे, दूज करे अन्याय । 
ऐसो अर्जित सकल धन, पापर्जनहि कहाए ।१९२३। 
भावार्थ : -- एक हस्त न्याय करता है दूसरा अन्याय करता है । इस भांति का अर्जित समस्त धन पाप अर्जन ही कहलाता है ॥

कनक कनक किए कंकरी,  कंकर के एक मूठ । 
सकल साँच असाँच करे, कहे तस एकए झूठ ।१९२४। 
भावार्थ : -- जिस प्रकार एक मुठ्ठी कंकड़, कनक कनक को कंकड़ कंकड़ कर देता है  । उसी प्रकार एक असत्य समस्त सत्य को असत्य कर देता है ॥

धर्मी जोरन बिलोइए, निकसिहि संतनि सार । 
अधर्मी कू का जोइए, निकसे वासों गार ।१९२५। 
भावार्थ : -- धर्मात्माओं के समाज को एकत्र कर उसका मंथन करें तो उसमें से संत-फकीरों का समाज रूपी सार प्राप्त होगा । अधर्मी को क्या जोड़ना  उसमें से तो गार ( नेता जी, आतंक, नक्सल, विप्लव वादी )  ही निकलेगी ॥

ब्यबहारि बिरहमन तो, जग मैं भरे बहोत । 
जाका मन थित चिदगगन, बिरहमन सोइ होत ।१९२६। 
भावार्थ : - व्यवहारी ब्राम्हण तो जग में भरे पड़े हैं । जिसके अंत: करण में  चदानंद घन स्वरूप ब्रम्ह प्रतिष्ठित हो  वही सदब्राम्हण है ॥

साधृत भए ब्यास पीठ, अधीस भए बैपारि । 
एक हथ ले एक हथ देइ, ब्यबहारि बन भारि।१९२७। 
भावार्थ : --व्यास पीठ भी दुकान हो गई है ।और पीठाधीश  दुकानदार । एक हाथ से लेते हैं फिर दूसरे से देते है भारी  व्यवहारी हो गए हैं ये । महाराज कथा करवानी है.....? पूछ के देखो..... अष्टांक से नीचे बात ही नहीं करते..... कहते ये ये ००००००० शुन्य मेरे.....पीछे की संख्या जो श्रद्धा हो वो लगा लेना.....अब चोरी डाके बिना ये अंक संकलित होएंगे क्या.....?

ब्यास पीठ बिराज के, बेच रहे जो ज्ञान । 
जननी भगिनी जाता का, बैपारि तिन्ह जान ।१९२८। 
भावार्थ : -- व्यास पीठ पर आसित हो कर जो ज्ञान का धिंग धंधा कर रहे हैं । उन्हें उनकी माता बहन-बेटियों का व्यापारी ही समझना चाहिए ॥

पूछ रह सब भारत कू, कहाँ मिलेगी सांति । 
रे सठ पहिले छांड़ तो, तू अपनी आक्राँति ।। 
भावार्थ : -- सब भारत से प्रश्न करते हैं ये शांति कहाँ मिलेगी । तू पहले ये चढ़ा चढ़ाई की होड़,  पराभूत  करने वाले, अधिपत्य स्थापित करने वाले कुभावों का त्याग कर फिर मिल जाएगी ॥

लोगिन्हि सोइ सोइ किए, जोइ करें सब कोइ । 
कारज सोए करन भला, करे नहीं को जोइ ।१९२९। 
भावार्थ : -- लोग बाग वही करते है जो सब कोई करते हैं । जहाँ भीड़ देखि नहीं वहीँ घुस जाते हैं कार्य वही करना उत्तम है जो कोई न करे । मंदिर में भारी भीड़ है गॉवों भूखी है उन्हें दो ।गॉवों  को सब देवे तब मंदिर में देना चाहिए । जब सब नेता गिरी कर रहे हों तो क्या करना चाहिए ताना गिरी करना चाहिए ॥

कारज हो अकारज हो , दोउ समय के जोग ।
उचित संग सुजोग अहै, अनुचित संग कुजोग ।१९३०। 
भावार्थ : -- कार्य हो चाहे अकार्य हो दोनों ही समय से बंधे हैं । यदि समय उचित है तब सब शुभ शुभ ही होता है, यदि समय अनुचित है तब सब अशुभ ही होता है ॥









मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

----- मिनिस्टर राजू १४३ -----

ऐ राजू ! 'एलिट स्पेस क्लब' वालों को देखा.....?

राजू : -- हाँ मास्टर जी ! देखा !!

 "अब इनके भगवान को देख !"

राजू : -- देख लिया मास्टर जी !

 कुछ अंतर समझ में आया.... ?

राजू : - मुझे तो समझ आ गया मास्टर जी ! किन्तु मूर्खों को कौन समझाए..... 

सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १९१॥ -----


कहूँ बिपन्न अतीव है कहूँ सम्पन अतीउ । 
समतुल समाजि राज हुँत, रहे सबहि के सीउ ।१९११।  
भावार्थ : -- कहीं अत्यधिक विपन्नता है कहीं अत्यधिक सम्पन्नता है । समता का सामजिक साम्राज्य स्थापित करने हेतु सभी की सीमाएं तय करनी होगी,  निर्धन रेखा से काम नहीं चलेगा धन वालों की भी रेखा होनी चाहिए ॥

खाई मिट्ठा चिरपरा, माल मसालेदार । 
तबहि मैं कहूँ सरकार, लागे कूँ बीमार ।१९१२। 
भावार्थ : -- मिट्ठा भी खा गई, चटपटा  भी खा गई, तर माल भी खा गई, मसाले दार भी खा गई । तभी मैं कहूँ ये म्हारी सरकार बीमार सी क्यूँ लग्गे हैं ॥ मुह मैं दांत नहीं, पेट मैं आंत नहीं, गुलगुली गात नहीं, फेर इतणों खा के बीमार तो लाग्गै गी ॥

गाही के धन रेख के पहिले कर अनुमान । 
बाके सेवा पन देख, दाता पुनि दे दान ।१९१३। 
भावार्थ : -- पहले ग्राही ( लेण वाले की ) की धन की रेखा देख..... ले वा तो चाँद से भी दिख जावेगी.....इब अपणी देख.....दिख्खी.....सूक्षम दरसी लगा के देख.....रै गधे की पूँछ वा तो बिंदु सै..... बड़ा दाता बणा फिरै सै.....मत दूंगा .....देगा तै मत.....इब बोल न मत लूंगा न दूंगा..... 

सेवापन की आस लिए, दुर्जन बरे स्वामि । 
जग महुँ कबहु सेवक भए, छलि पातन धन कामि ।१९१४। 
भावार्थ : -- सेवासुश्रुता की आस में स्वामी ने दुष्टों का चयन किया और करते जा रहे हैं। संसार में ठग, ढिंगी, स्वेच्छाचारी, धन के कामी भी कभी सेवक हुवे हैं.....? 

 यह देही एक अतिथि गह, आत्मा अतिथि देउ । 
अतिथि धर्म निभाए सुची, राखैं तिन्ह सदैउ ।१९१५।  
भावार्थ : -- यह देहि एक अतिथि गृह है एवं अंतरात्मा अतिथि देव है । अतिथि को चाहिए कि वह अपना अतिथि धर्म का पालन करते हुवे उस गृह को सदा अकल्क रखे ॥  

धणी मणी कू चाहिये, बरें सिंधु सुभाए । 
 तपत रहे जो अपनपौ , खन खन कन बरखाए ।१९१६ । 
भावार्थ : - धनवंत को चाहिए की वह सिंधु के स्वभाव को वरण करें । सिंधु रत्नाकर होते हुवे भी स्वयं तपकर से तप्त रहता है किन्तु खंड खंड में शीतल कणों की वर्षा करता है ॥ 

अर्थात : -- धनी स्वयं हेतु कृपणधी रहते हुवे कृपणी हेतु उदारमना रहे..... 

उदर परायन आपना खावै आपहि आप । 
वासों कर पोषित होत, सकल जगत संताप ।१९१७। 
भावार्थ : -- जो अपने उदर के परायण होकर स्वयं पकाता है स्वयं ही खाता है । संसार के समस्त  संताप  ऐसे अधमी के हाथों ही पोषित होते हैं ॥ 

साँच सम बड़े सत्कर्म, जग माहि को नाहि । 
तोष के कोष मह सकल, सुख सम्पद संचाहि ।१९१८। 
भावार्थ : --  संसार में सत्य के समान दूसरा कोई पुण्य नहीं है । समस्त सुख सम्पदा संतोष के कोष में ही संचयित रहती है ॥ 

एकै अगास के तलहट, सबहीं करे निबास । 
कल ससि तुहरे पास रहए, अजहूँ हमरे पास ।१९१९। 
भावार्थ : -- एक ही आकाश के नीचे हम सभी का निवास है । यह चमकता हुवा चाँद कल तुम्हारे पास था । आज हमारे पास है । 

अर्थात : -- परिस्थितियां आर्थिक हो सामाजिक हो अथवा कोई भी क्यों न हो वह नित्य परिवर्तनशील रहती हैं..... 

बीतत समऊ अधारे, तुहरे होवनिहार । 
होव्निहार उजास हो, ऐसो कारज कार ।१९२० । 
भावार्थ : -- व्यतीत होते समय में ही तुम्हारा भविष्य टीका हुवा है । ऐसे कार्य करने चाहिए जिससे यह भविष्य उज्जवल हो ॥ 

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...