मानस बिय बुराई के, बोए बहुत इतराए ।
बहुरि पोषन पाई के, साख परन फल आए ।१९८१ ।
भावार्थ : -- रे मानव तुमने इतरा इतरा के जो बुराई के बीज बोए थे । वह पोषण को प्राप्त हो गए हैं अब तो उसमें शाख-पत्र प्रस्फुटित हो गए हैं और वह फलीभूत भी हो गया ॥
भले तरु भलाई फले, बुरे तरु मैं बुराइ ।
खल तरु मैं तौं खल फले, भल में संत सहाइ ।१९८२।
भावार्थ : -- भले तरुवर में भलाई ही फलती है बुरे तरुवर में बुराई ही फलती ही । दुष्टता के तरुवर में दुष्टता फलती ही, आतंक फलता है, एवं सज्जनता के तरुवर में संत सहाई फलते हैं ॥
पद प्रतिठा धन जोग के, उठा न कोउ समाज ।
जे तौ तबहि उभरे जब किए सत सेवा काज ।१९८३।
भावार्थ : - पद प्रतिष्ठा व् धन की प्राप्ति से समाज का उद्धरण नहीं होता । जाति एवं समाज का उद्धरण तभी होता है जब सेवा व् कृतकार्य किया जाए ॥
रच्छा अवसरु पाए के, उत्थाईं कोउ एक ।
जो सत सेवा काज किए, उठएँ सकल समवेत ।१९८४।
भावार्थ : -- सुरक्षित किवे गए अवसरों को प्राप्त कर कोई एक उठता है जो अनेको को निचे गिरा देता है ॥ किन्तु यदि वही एक समाज सेवा के सह सत्कार्य करे तो जाति सहित सम्पूर्ण समाज का उत्थान संभव है ॥
जिन्ह जन की मनसा रहि सदैव लेवन माहि ।
तिन्ह जन के कोष गहे गुन सम्पद कभु नाहि ।१९८५।
भावार्थ : -- जिन लोगों मंशा सदैव लेने में ही होती है । उन लोगों के कोष में गुणों की सम्पदा का अभाव रहता है ॥
रनोपकरन सो उपकरन, जो जन के रखबार ।
जो अरि चोट चपेट किए होत सोइ हथियार ।१९८६।
भावार्थ : -- वह उपकरण रणोपकरण है जो रणभूमि में जनता की रक्षा करे । आयुध वही है जो शत्रुओं को चोटिल कर दे, अन्यथा तो सभी लोहा है ।
भारत खंड ने देखे, बड़े बड़े साम्राज ।
रावन हो कि रामराज, जमन कि अँगुली राज ।१९८७ ।
भावार्थ : -- यह भारत खंड है साहेब । इसने बड़े बड़े साम्राज्य देखें है चाहे वह रावण राज हो या राम राज हो एवं राज हो या फिर अंगेरजी राज, सामरिक विषयों में इससे अधिक अनुभवी न कोई हुवा न होगा ॥
प्रानी जन रखे चाहे रखेव दिवस के कान ।
जामें जीवन हानि हो, तिन उपकरन न मान ।१९८८।
भावार्थ : -- चाहे वह प्राणीजनों की रक्षा करता हो चाहे राष्ट्र सहित सीमा की सुरक्षा करता हो । रणोपकरण में उस उपकरण की गणना नहीं की जानी चाहिए जिसमें निज राष्ट्र के जीवन की हानि होती हो ॥
मानवबम रणायुध नहीं होने चाहिए ।
क्या परमाणु गोले निज राष्ट्र के जीवन हेतु सुरक्षित हैं.....?
गौवें रूरत फिर रही, कहँ हैं पालन हार ।
मंत्रियों ने बना दिया, उनको मच्छी मार ।१९८९।
भावार्थ : -- गौवें तो ठोकर खाती फिर रही हैं, कहाँ हैं गौपाल । इन दुष्ट मंत्रियों ने उनको मछरी मार बना दिया ॥
ये दुष्ट मंत्री किसानों को कहते हैं, मछली पालो, खेती-वेती छोडो खेत हमें दे दो हम उन्हें उद्योग पतियों को देंगे ।
देखत करतब आपुना, गरब करे सब कोए ।
ऐसो कारज किजीये, गरब दूज को होए ।१९९०।
भावार्थ : -- अपना कौशल देखकर तो अपने आप पर तो सभी गर्व करते हैं । ऐसे कार्य करने चाहिए कि अपने ऊपर दूसरों को गर्व हो ।।
अपना गाल तो सभी बजाते हैं ऐसे कार्य करने चाहिए कि दूसरे ताल बजाएं.....
बहुरि पोषन पाई के, साख परन फल आए ।१९८१ ।
भावार्थ : -- रे मानव तुमने इतरा इतरा के जो बुराई के बीज बोए थे । वह पोषण को प्राप्त हो गए हैं अब तो उसमें शाख-पत्र प्रस्फुटित हो गए हैं और वह फलीभूत भी हो गया ॥
भले तरु भलाई फले, बुरे तरु मैं बुराइ ।
खल तरु मैं तौं खल फले, भल में संत सहाइ ।१९८२।
भावार्थ : -- भले तरुवर में भलाई ही फलती है बुरे तरुवर में बुराई ही फलती ही । दुष्टता के तरुवर में दुष्टता फलती ही, आतंक फलता है, एवं सज्जनता के तरुवर में संत सहाई फलते हैं ॥
पद प्रतिठा धन जोग के, उठा न कोउ समाज ।
जे तौ तबहि उभरे जब किए सत सेवा काज ।१९८३।
भावार्थ : - पद प्रतिष्ठा व् धन की प्राप्ति से समाज का उद्धरण नहीं होता । जाति एवं समाज का उद्धरण तभी होता है जब सेवा व् कृतकार्य किया जाए ॥
रच्छा अवसरु पाए के, उत्थाईं कोउ एक ।
जो सत सेवा काज किए, उठएँ सकल समवेत ।१९८४।
भावार्थ : -- सुरक्षित किवे गए अवसरों को प्राप्त कर कोई एक उठता है जो अनेको को निचे गिरा देता है ॥ किन्तु यदि वही एक समाज सेवा के सह सत्कार्य करे तो जाति सहित सम्पूर्ण समाज का उत्थान संभव है ॥
जिन्ह जन की मनसा रहि सदैव लेवन माहि ।
तिन्ह जन के कोष गहे गुन सम्पद कभु नाहि ।१९८५।
भावार्थ : -- जिन लोगों मंशा सदैव लेने में ही होती है । उन लोगों के कोष में गुणों की सम्पदा का अभाव रहता है ॥
रनोपकरन सो उपकरन, जो जन के रखबार ।
जो अरि चोट चपेट किए होत सोइ हथियार ।१९८६।
भावार्थ : -- वह उपकरण रणोपकरण है जो रणभूमि में जनता की रक्षा करे । आयुध वही है जो शत्रुओं को चोटिल कर दे, अन्यथा तो सभी लोहा है ।
भारत खंड ने देखे, बड़े बड़े साम्राज ।
रावन हो कि रामराज, जमन कि अँगुली राज ।१९८७ ।
भावार्थ : -- यह भारत खंड है साहेब । इसने बड़े बड़े साम्राज्य देखें है चाहे वह रावण राज हो या राम राज हो एवं राज हो या फिर अंगेरजी राज, सामरिक विषयों में इससे अधिक अनुभवी न कोई हुवा न होगा ॥
प्रानी जन रखे चाहे रखेव दिवस के कान ।
जामें जीवन हानि हो, तिन उपकरन न मान ।१९८८।
भावार्थ : -- चाहे वह प्राणीजनों की रक्षा करता हो चाहे राष्ट्र सहित सीमा की सुरक्षा करता हो । रणोपकरण में उस उपकरण की गणना नहीं की जानी चाहिए जिसमें निज राष्ट्र के जीवन की हानि होती हो ॥
मानवबम रणायुध नहीं होने चाहिए ।
क्या परमाणु गोले निज राष्ट्र के जीवन हेतु सुरक्षित हैं.....?
गौवें रूरत फिर रही, कहँ हैं पालन हार ।
मंत्रियों ने बना दिया, उनको मच्छी मार ।१९८९।
भावार्थ : -- गौवें तो ठोकर खाती फिर रही हैं, कहाँ हैं गौपाल । इन दुष्ट मंत्रियों ने उनको मछरी मार बना दिया ॥
ये दुष्ट मंत्री किसानों को कहते हैं, मछली पालो, खेती-वेती छोडो खेत हमें दे दो हम उन्हें उद्योग पतियों को देंगे ।
देखत करतब आपुना, गरब करे सब कोए ।
ऐसो कारज किजीये, गरब दूज को होए ।१९९०।
भावार्थ : -- अपना कौशल देखकर तो अपने आप पर तो सभी गर्व करते हैं । ऐसे कार्य करने चाहिए कि अपने ऊपर दूसरों को गर्व हो ।।
अपना गाल तो सभी बजाते हैं ऐसे कार्य करने चाहिए कि दूसरे ताल बजाएं.....