रचे महजीद मूरखा जो अपनी हठ जोग ।
चढ़े ता ऊपर नाच किए, ताते बरसो लोग ।१८२१।
भावार्थ : -- एक तो वह मूर्ख जिसने एक पूजा स्थली को तोड़ के दूसरी बना दी । दूसरे वो महामूर्ख जिन्होंने दूसरी को भी रहने नहीं दिया ॥
नदी नदी इतराइ के बँधे बाँध अरु सेतु ।
बरखा कल दुकाल किए, कृषक अहित के हेतु ।१८२२।
भावार्थ : -- नदी नदी में इतरा इतरा के जो सेतु और बांध बनाये गए हैं । वह वर्षा में भी अकाल की स्थित उत्पन्न कर रहे हैं । यह किसानों का हित नहीं अहित करने के हेतु ही रचे जाते हैं ॥
जब पानी नहीं चाहिए तब ये सर्वत्र पानी पानी कर देते हैं। जब चाहिए तब ये उसे रोक लेते हैं.....ऐसा क्षेत्र के किसानों का कहना है..... यही वह विकास है जो विनाश का कारण बन रहा है.....
लोहा लागए लाकरी, जल मैं देइ डुबाए ।
लाकरी सँग लोह लगे, पारग रूप धराए ।१८२३।
भावार्थ : -- लकड़ी यदि लोहे कीसंगती करे तो वह पारग से गाहग हो जाती है । लोहा यदि लकड़ी की संगती करेतो वह गाहग से पारग के स्वरूप हो जाता है ॥
अर्थात : -- दुर्जनों की संगती से सद्जन भी दुर्जन हो जाता है । और सज्जनों की संगती प्राप्त कर दुरजन भी सज्जन हो जाता है ॥
एक अपना एक आपुना, जगत भले अस दोए ।
जोइ सबकहुँ भला करे, सुहृदय् कहि सब कोए ।१८२४।
भावार्थ : -- सुबुद्ध जन कह गए हैं : -- संसार में हितवादी दो प्रकार के होते हैं एक स्वहितवादी
दूसरा स्व सहित स्वजन हितवादी होता है । जो तीसरे प्रकार का अर्थात सर्वतस हितवादी होता है जगज्जन उसे ही सौहृदय कहते हैं ॥
संसार में दो प्रकार के सोचक होते हैं एक जो केवल अपना ही सोचे, दूसरे वो जो अपनों का भी सोचे ॥ जो तीसरे प्रकार के सोचक होते हैं अर्थात जो सबका सोचते हैं, वही सौहृदय कहे जाते हैं.....
मिलए बंधाए सो अमृत, गरल सुनिअ मैं आए ।
घृत अमृत चख जो चाहिए, घर मैं बांधो गाए ।१८२५।
भावार्थ : -- जो बंधा हुवा अमृत मिल रहा है,सुनने में आया है कि वह अमृत नहीं विषैला रसायन है । यदि कोई घीव-दुग्ध चख चाहता है तो उसे घर में गांय बांधनी चाहिए, बंधे हुवे गरल को नहीं ॥
बस्तु कर्मन अधुनातन ऐसो भवन बनाए ।
लोग लुगाया बँधे नहिं, बंधे कहाँ सन गाए ।१८२६।
भावार्थ : -- अाधुनिक काल में वास्तु कार ऐसे भवन बनाते हैं ज लोग लुगाई को तो ठीक से बांध नहीं पाते गायोँ को कहां से बांधेंगे ।।
वस्तु की अत्यधिक मांग का कारण परिश्रम की न्यूनता एवं जनमानस की सघनता एवं अधिकता है
जनमानस की संख्या एवं उसके घनत्व की समस्या के समाधान हेतु वैश्विक स्तर पर चिंतन आवश्यक हो गया है । जनसंकुलता का दोषी जहां शासक वर्ग ही है वहीँ संख्या की अधिकता की दोषी स्वयं जनता है.....
जड़ जीव घाउ करन दिए, सिंग लूम नख दंत ।
ब्यास पीठाधीस के सीस लगायो संत ।१८२७।
भावार्थ : -- विधाता ने गँवार ढोरों को चोट पहुंचाने हेतु सिंग,पूँछ , नख और दन्त का साधन किया । इन व्यास पीठाधीसों के सिर पर संत लगा दिए ॥
नाम बढे सोई करै, छोटे छोटे काम ।
जग हित काम बड़े करो, राखो ओछा नाम ।१८२८।
भावार्थ : -- बड़े नाम वाले ही छोटे छोटे काम करते हैं । देखो कोई जेल में पड़ा है, कोई भिखमंगा हो गया है कोई घपले घोटाले में लिप्त होकर ये जी वो जी कर रहा है, जाने कब चला जाए...., जेल और कहां..... फिर.....? फिर का इनके अंश पत्र रद्दी के भाव भी नहीं बिकेंगे | काम बड़े करो संसार के कल्याण के लिए करो, नाम ओछा ही रहे ॥ जैसे : -- 'राम' ये भी कोई नाम है जपो तो मरा मरा हो जाता है ॥
अजहुँ स्वजन मरनी पर देवैं उत्तम भोग ।
जैसेउ दसगात किए भूर परे सब लोग । १८२९।
भावार्थ : -- विचारों का पतन इस प्रकार से हो रहा है कि अब तो स्वजनों के मरनी में भी ऊतम भोग परोसा जा रहा हैं । दरी पर बैठके कई बार यह समझ ही नहीं आता कि यहां रोना है की हंसना है। जैसे ही दसगात्र -विधान पूर्ण हुवा प्रियजन जाने वाले को नमस्ते कह देते हैं ॥
त्रेता जुग बरनन मिले, देउ दनुज नर नारि ।
बैदिक जुग मनु जात के, बरन बिभागे चारि ।१८३० ।
भावार्थ : -- यद्यपि इन योनियों का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण तो नहीं है किन्तु त्रेता युग में मनुष्य योनि के सह देवताओं एवं दानव योनि का भी वर्णन मिलता है । मनुष्य जाति में वर्ण-व्यवस्था एवं जनसंचालन तंत्र वैदिक काल की ही देन है । चूँकि भगवान श्रीरामचन्द्र जी क्षत्रिय वर्ण के हैं अत: इससे यह सिद्ध हो जाता है कि रामायण वैदिक युग के पश्चात ही चरितार्थ हुई है।
द्वापर युग में कदाचित देव योनि विलुप्त हो गई थी । कहीं कहीं पर राक्षस योनि का वर्णन मिलता है । कलयुग में मनुष्य योनि शनै शनें राक्षस योनि में रूपांतरित होती जा रही है ॥
चढ़े ता ऊपर नाच किए, ताते बरसो लोग ।१८२१।
भावार्थ : -- एक तो वह मूर्ख जिसने एक पूजा स्थली को तोड़ के दूसरी बना दी । दूसरे वो महामूर्ख जिन्होंने दूसरी को भी रहने नहीं दिया ॥
नदी नदी इतराइ के बँधे बाँध अरु सेतु ।
बरखा कल दुकाल किए, कृषक अहित के हेतु ।१८२२।
भावार्थ : -- नदी नदी में इतरा इतरा के जो सेतु और बांध बनाये गए हैं । वह वर्षा में भी अकाल की स्थित उत्पन्न कर रहे हैं । यह किसानों का हित नहीं अहित करने के हेतु ही रचे जाते हैं ॥
जब पानी नहीं चाहिए तब ये सर्वत्र पानी पानी कर देते हैं। जब चाहिए तब ये उसे रोक लेते हैं.....ऐसा क्षेत्र के किसानों का कहना है..... यही वह विकास है जो विनाश का कारण बन रहा है.....
लोहा लागए लाकरी, जल मैं देइ डुबाए ।
लाकरी सँग लोह लगे, पारग रूप धराए ।१८२३।
भावार्थ : -- लकड़ी यदि लोहे कीसंगती करे तो वह पारग से गाहग हो जाती है । लोहा यदि लकड़ी की संगती करेतो वह गाहग से पारग के स्वरूप हो जाता है ॥
अर्थात : -- दुर्जनों की संगती से सद्जन भी दुर्जन हो जाता है । और सज्जनों की संगती प्राप्त कर दुरजन भी सज्जन हो जाता है ॥
एक अपना एक आपुना, जगत भले अस दोए ।
जोइ सबकहुँ भला करे, सुहृदय् कहि सब कोए ।१८२४।
भावार्थ : -- सुबुद्ध जन कह गए हैं : -- संसार में हितवादी दो प्रकार के होते हैं एक स्वहितवादी
दूसरा स्व सहित स्वजन हितवादी होता है । जो तीसरे प्रकार का अर्थात सर्वतस हितवादी होता है जगज्जन उसे ही सौहृदय कहते हैं ॥
संसार में दो प्रकार के सोचक होते हैं एक जो केवल अपना ही सोचे, दूसरे वो जो अपनों का भी सोचे ॥ जो तीसरे प्रकार के सोचक होते हैं अर्थात जो सबका सोचते हैं, वही सौहृदय कहे जाते हैं.....
मिलए बंधाए सो अमृत, गरल सुनिअ मैं आए ।
घृत अमृत चख जो चाहिए, घर मैं बांधो गाए ।१८२५।
भावार्थ : -- जो बंधा हुवा अमृत मिल रहा है,सुनने में आया है कि वह अमृत नहीं विषैला रसायन है । यदि कोई घीव-दुग्ध चख चाहता है तो उसे घर में गांय बांधनी चाहिए, बंधे हुवे गरल को नहीं ॥
बस्तु कर्मन अधुनातन ऐसो भवन बनाए ।
लोग लुगाया बँधे नहिं, बंधे कहाँ सन गाए ।१८२६।
भावार्थ : -- अाधुनिक काल में वास्तु कार ऐसे भवन बनाते हैं ज लोग लुगाई को तो ठीक से बांध नहीं पाते गायोँ को कहां से बांधेंगे ।।
वस्तु की अत्यधिक मांग का कारण परिश्रम की न्यूनता एवं जनमानस की सघनता एवं अधिकता है
जनमानस की संख्या एवं उसके घनत्व की समस्या के समाधान हेतु वैश्विक स्तर पर चिंतन आवश्यक हो गया है । जनसंकुलता का दोषी जहां शासक वर्ग ही है वहीँ संख्या की अधिकता की दोषी स्वयं जनता है.....
जड़ जीव घाउ करन दिए, सिंग लूम नख दंत ।
ब्यास पीठाधीस के सीस लगायो संत ।१८२७।
भावार्थ : -- विधाता ने गँवार ढोरों को चोट पहुंचाने हेतु सिंग,पूँछ , नख और दन्त का साधन किया । इन व्यास पीठाधीसों के सिर पर संत लगा दिए ॥
नाम बढे सोई करै, छोटे छोटे काम ।
जग हित काम बड़े करो, राखो ओछा नाम ।१८२८।
भावार्थ : -- बड़े नाम वाले ही छोटे छोटे काम करते हैं । देखो कोई जेल में पड़ा है, कोई भिखमंगा हो गया है कोई घपले घोटाले में लिप्त होकर ये जी वो जी कर रहा है, जाने कब चला जाए...., जेल और कहां..... फिर.....? फिर का इनके अंश पत्र रद्दी के भाव भी नहीं बिकेंगे | काम बड़े करो संसार के कल्याण के लिए करो, नाम ओछा ही रहे ॥ जैसे : -- 'राम' ये भी कोई नाम है जपो तो मरा मरा हो जाता है ॥
अजहुँ स्वजन मरनी पर देवैं उत्तम भोग ।
जैसेउ दसगात किए भूर परे सब लोग । १८२९।
भावार्थ : -- विचारों का पतन इस प्रकार से हो रहा है कि अब तो स्वजनों के मरनी में भी ऊतम भोग परोसा जा रहा हैं । दरी पर बैठके कई बार यह समझ ही नहीं आता कि यहां रोना है की हंसना है। जैसे ही दसगात्र -विधान पूर्ण हुवा प्रियजन जाने वाले को नमस्ते कह देते हैं ॥
त्रेता जुग बरनन मिले, देउ दनुज नर नारि ।
बैदिक जुग मनु जात के, बरन बिभागे चारि ।१८३० ।
भावार्थ : -- यद्यपि इन योनियों का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण तो नहीं है किन्तु त्रेता युग में मनुष्य योनि के सह देवताओं एवं दानव योनि का भी वर्णन मिलता है । मनुष्य जाति में वर्ण-व्यवस्था एवं जनसंचालन तंत्र वैदिक काल की ही देन है । चूँकि भगवान श्रीरामचन्द्र जी क्षत्रिय वर्ण के हैं अत: इससे यह सिद्ध हो जाता है कि रामायण वैदिक युग के पश्चात ही चरितार्थ हुई है।
द्वापर युग में कदाचित देव योनि विलुप्त हो गई थी । कहीं कहीं पर राक्षस योनि का वर्णन मिलता है । कलयुग में मनुष्य योनि शनै शनें राक्षस योनि में रूपांतरित होती जा रही है ॥
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