सोमवार, 15 सितंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १८४॥ -----

रोगी लेइ औषध जब, भिषज् करे गुन गान ।  
रोग पर तब काम करे, देइ कंठदूज अधिज्ञानि जब दान ।१८४१ । 
भावार्थ : --  रोगी तबतक औषधि नहीं लेता जबतक चिकित्सक उस औषधि का गुणगान नहीं करता ( चिकित्सक भी औषधि विशेष का तभी गुणगान करता जब वह रोगों पर प्रभावकारी होती है ) । वह रोगों पर तब तक नियंत्रित नहीं करती जब तक उसे कंठ को प्रदान न कर दिया जाए ॥

किसी भाषा अथवा किसी विशेष कृत्य की विशेषता संज्ञापित करने से ही कोई उस भाषा अथवा उस कृत्य का संज्ञान लेगा । संज्ञान लेकर उसे व्यवहृत करने पर ही उस भाषा अथवा कृत्य की उपयोगिता सिद्ध होगी.....

एक कोत आँग्ल भाषी, दुज हिंदी के जानि ।
दोनों के जो तोल किए,  पैइहु दुज अधिज्ञानि ।१८४२।
भावार्थ : -- एक और आंग्ल भाषी है दूसरी और ओर  हिंदी भाषी है । यदि दोनों के ज्ञान की तूलना  की जाए तो हिंदी भाषी को आप अधिक ज्ञानी पाएंगे ||

यदि एक ही कक्षा के, समान आयु वर्ग  एवं समान अंकधारी दो छात्रों को लिया जाए।  जिसमें एक हिंदी भाषी हो दूसरा केवल अङ्गलभाषी हो दोनों को यदि  एक ही विषय पर निबंध लेखबद्ध करने दिया जाए तब आप पाएंगे कि हिंदी भाषी छात्र  का ज्ञान आँग्लभाषी छात्र की अपेक्षा अधिक विस्तृत है.....कारण  स्पष्ट है, अंग्रेजी की तुलना में हिंदी-भाषा अधिक जिज्ञासित है.....

सेवा धर्म भिरत रहे, सो सेवक सम राउ । 
जो आपनी राउ कहे, सो तो जोग न काउ ।१८४३। 
भावार्थ : -- सेवा धर्म के परायण सेवक स्वामी के स्वरूप ही होता है । जो जन सेवक राजा का वेश धारण करता हो, राजा जैसा जीवन जीता हो राज की नीतियां करता हो वह किसी योग्य नहीं है ॥

तीन देउ रक्छा करे स्वामि सेबक सैन । 
भूरी सों वाकू कोउ, लखे न तिर्छित नैन ।१८४४। 
भावार्थ : -- जिस राष्ट्र की रक्षा स्वामि, सेवक और सैनिक यह तीन देव जिस राष्ट्र की रक्षा करते हैं फिर उसे तिर्यक दृष्टि से देखने का साहस किसी में नहीं होता ॥

यदि ये देव रक्षा नहीं करते तब कभी बाढ़ तो कभी भूकम्प तो कभी सूखा  कभी अड़ोसी कभी पड़ोसी उस देख लेने की धमकी देते हैं.....

रे प्रगत राष्ट्र अधुनत, लेखु प्रगति के अर्थ । 
तेरी परिभाषा, भाबिन हेतु अनर्थ ।१८४५। 
भावार्थ : -- रे प्रगतिशील राष्ट तू अब तो अपनी प्रगति का संज्ञान कर। तेरी गढ़ी हुई प्रगति की परिभाषा भविष्य में अहित की कामना करती है ॥

नाज बिनु भंडार भरे भांड बिनु भंडारि ।  
रसवत भोजन सूचि लहि कस भीख बिनु भिखारि ।१८४६। 
भावार्थ : -- अनाज भी नहीं और भंडार भी भर गया.....वाह ! बर्तन नहीं और रसोइया रख लिया ।  भीख का पता नहीं कितनी मिलेगी कब मिलेगी मिलेगी कि.....? नहीं मिलेगी.....और भिखारी हैं की मेन्यु लिए घूम रहे हैं ॥

एक दूषन का भंडारि,  दूजा वाका कोष । 
ऐसेउ निज सम्मत दए,  रहे दोष को पोष ।१८४७। 
भावार्थ : -- एक दूषण का खजांची है तो दुसरा उसका कोष ही है  । ऐसे दुष्टों को अपनी सम्मति देकर हम दोषों का ही पोषण कर रहे हैं ॥ 

हे जनमानस सँभारौ, पहिले आपनि भीत । 
दूषन दुष्करमन उपर पैइहि तबही जीत ।१८४८ । 
भावार्थ : - हे जनमानस सर्वप्रथम अपने अंतर जगत को व्यवस्थित करना होगा । तभी बुराई पर अच्छाई की विजय होती है, अच्छाई ही नहीं होगी तो बुराई को कौन जीतेगा ?  

 "अंतर जगत व्यवस्थित रहने से ही बाह्य जगत व्यवस्थित रहता है....." 
   ----- ।।  शैक्सपीयर ॥ -----
तुम सोचोगे कि मैं तो खाऊँ, शासन प्रशासन न खाए.....यह उचित नहीं है..... 

दुर्जन के सँग करे जो दुराचरन के अंत । 
जन जन मुख सों कहिलाए, सोई जगत नियंत ।१८४९ । 
भावार्थ : -- दुर्जन के साथ जो दुराचरण का भी अंत करता है चाहे वह सेवक हो अथवा स्वामी जगत भर में वही जगत नियंता कहलाता है ॥ या तो शासक दुराचरण को नियंत्रित करे अथवा जनमानस.....

 शासक जैसा होता है शासन-व्यवस्था भी वैसी ही होती है, फिर शासनी भी वैसे ही हो जाते हैं.....विवशता है, बिना दिए तो कुछ होगा ही नहीं.....बैठो रहो..... 

सुरसरि माहि नहान किए, कलिमल सरित निषेध । 
साधो सिद्धि पावन हुँत, अस लख बीथी बेध ।१८५० ।  
भावार्थ : -- शास्त्रों में गंगा के स्नान की विधि बताई गई और कर्मानाशा नदी को इस हेतु निषेध किया गया है । कारण की गंगा पाप हर लेती है, कर्मनाशा पापों से भर देती है । इस लिए सज्जन पुरुषों को चाहिए कि वह निज  उद्देश्य में सफलता प्राप्ति हेतु लक्ष्य-अलक्ष्य में विभेद रखें ॥ 

मूर्ख कहते हैं अब गंगा नहीं मिलेगी तो नहाएंगे नहीं का.....
तो भैया नल्ली में डुबकी थोड़े ही लगाओगे.....ईमानदार नहीं मिलेगा तो भोट नहीं देंगे का.....       
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             
 ये अनर्थार्थानुबंधी शासक है 

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