गुरुवार, 4 सितंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १८१ ॥ -----,

बर बर भूषन बर बसन, आपुनि देह बसाए । 
तव बानि कहँ संग आनि, सासक कही न पाए ।१८११। 
भावार्थ : -- जिस जन सेवक ने स्वयं ही उत्तम उत्तम आभूषण के सह उत्तम वस्त्र धारण कर रखें हों वह अपने अधीनस्थ से प्रश्न नहीं  कर सकता कि तुम्हारी यह उत्तम वेशभूषा कहाँ से आई है ।

अर्थात : -- जो शासक स्वयं दोषी हो वह अपने अधीनस्थ के दोषों को डंडा नहीं दिखाता । जब अधीनस्थ दोषी है तो वह जनता के दोषों को डंडा कैसे दिखाएगा.....

कर किए जब मन के काज, अरु मन किए किछु नाहि । 
छाँडत निज गुन बचन तब, धरे सुबारथ बाहि ।१८१२। 
भावार्थ : -- जब कर अपने मन का काज  करने  लगे  तब मन कर का काज करने लगता है   अर्थात वह कुछ नहीं करता ॥ ऐसी स्थिति से वचन अपने स्वाभाविक गुणों ( मधुरता, सत्यता, हितवादिता) का परित्याग कर स्वार्थ के वशीभूत हो जाता है ॥

कुनै सँग किए कुचालि सो सासक रूप  खजूरि । 
जन संचालन तंत्र पथ, कंकड़ अरि भरि भूरि ।१८१३। 
भावार्थ : -- जो शासक कुनीतियों का सह प्राप्त कर कुचालि  करता हो वह खजूर के स्वरूप होकर जन संचालन तंत्र के मार्ग को कंकड़ों एवं कंटकों से भर देता है ॥

बोधकर बोधन कर मुए, खल किंचित न प्रबोधि । 
खलुहीन खर्र खर्र किए, सपनेहु खलइ सोधि । १८१४। 

भावार्थ : - जगानेवाले जगा जगा के सिधा गए, ज्ञानद ज्ञान दे  दे के सिधा गए । पर दुष्टों को किंचित भीं बुद्धि नहीं आई ।  ये निपट अजिज्ञासी खर्रखर्र- कर सपने में भी दुष्टता पर ही पीएचडी करते रहे ॥ 

सद गुरु बाहि ग्यान घन, सिस सुबरन अनुहार । 
हरिहरि बाहित देइ भव, भूषन रूप सँवार ।१८१५। 
भावार्थ : -- जब सद्गुरु कारु के स्वरूप होता है ज्ञान हथौड़ी स्वरूप होता है तब सद शिष्य स्वर्ण के स्वरूप हो जाता है । हलकी हलकी चोट उसे भवभूषण के रूप में संवार देती है अर्थात योग्य बना देती है ॥ 

यह मह माया यह मोह, चितबन् बहुतहि भाए । 
करतार अकरषन न किए, ऐसे जग को नाए ।१८१६। 
भावार्थ : -- सुबुद्ध जन कह गए हैं : -- ये महा माया ( दैवीय) और उसका मोह चित्त को अतिशय प्रिय लगता है । संसार में ऐसा कोई भी नहीं है जो इस सष्टि के कृतकर्ता से आकर्षित न हुवा हो अर्थात इस संसार में रहना सभी को प्रिय है ॥ 

मन लगाई तन जोगन, बिषयन भोगन माहि । 
एही जगत वाके जनम  , अर्थ रखे किछु नाहि ।१८१७ । 
भावार्थ : - जिसका चित्त को काया  के रखरखाव एवं विषय-भोग में अनुरक्त हो । उसमें और जीव जंतुओं में कोई भेद नहीं है । इस संसार में उसने व्यर्थ ही जन्म लिया है ॥ 

सागर पारगमन चहे , चहिए तरनि तिन ताहि । 
जो को डूब मरन चहे, चहिए बहुरि किछु नाहि ।१७१८। 
भावार्थ : -- यदि ( भव ) सागर पारगमन करना छाते हो तो उसको नाव,सेतु आदि  की आवश्यकता होगी । याद कोई डूब मरना चाहता है फिर उसे किसी की भी आवश्यकता नहीं होती..... तैरने की भी नहीं ||    

मुक्ता बनने के लिए मुक्ति आवश्यक है मीन बनने के लिए उन्मुक्ति बहुंत है । मुक्ता को कोई खाता है तो उसे दुखता नहीं है  ॥
मीन बनने से क्या होगा ? होगा क्या तुम किसी को खाना  कोई तुमको खाएगा.....

कृपा सिंधु ने दास कू, दायो ऊंचो काम । 
अजहुँ यह मन दिवस रयन लिखे राम के नाम ।१८१९। 
भावार्थ : -- कृपा के सागर ने अपने सेवक को बड़ा ऊंचा काम दिया है । अब तो यह मन दिनरात भगवान का ही नाम लिख रहा है ॥

अजोधा भुइ पावन किए, लिए रघुबर अवतार । 
खेल दुर्जन दानौ दलन, करन जगत उद्धार ।१८२०। 
भावार्थ : -- भगवान श्रीराम चन्द्र ने दुष्टों का दलन कर जगत का उद्धार करने हेतु अयोध्या की भूमि में अवतरित होकर उसे पावन कर दिया ॥



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