बेद श्रुति सास्त्र पुरान, बोल रहे यह बात ।
जनम हो तो भरत खंड, मानस के हो गात ।१९०१।
भावार्थ : -- वेद श्रुति शास्त्र एवं पुराण बो रहे यह बात । क्या ? यदि दुबारा जन्म हो तो भारत खंड में ही हो और शरीर मिले तो मनुष्य का ही मिले । किन्तु उसके लिए कर्म करना होगा.....
भरत खंड जो जनम ले, सोए होत बड़ भागि ।
ब्रह्म चारी जोनि मिले, होए परम सुभागी ।१९०२।
भावार्थ : -- भारत खंड में जो जन्म लेता है वह मनुष्य बड़ा ही भाग्य शाली है । और यदि ब्रम्ह चारि की देहाकृति प्राप्त हो जाए तो फिर वह परम सौभाग्यशाली होता है ॥ क्यों ? क्योंकि उसके रक्त में अहिंसा, सत्य तपस्या के जीवाणु होते हैं जो मुक्ति के द्वार हैं ॥
रबि डीठ सों डीठ करै, सो तो गए कहुँ होरि ।
पीठ पाती किए त अवसिहि, बाके चरन बहोरि ।१९०३ ।
भावार्थ : -- जो सूर्य की दृष्टि पर अपनी दृष्टि रखेगा वह कहीं न कहीं अंधेरों में चला जाएगा कहीं रुक जाएगा थम जाएगा । जो उसकी दृष्टि का अनुशरण करेगा अर्थात उसके मार्गदर्शन में रहेगा वह प्रकाश से युक्त होकर अवश्य ही लौट आएगा ॥
आनि जगत केतनि केत, गयऊ केत न केत ।
आनि सोइ अवसिहि जाहि, करऊ केतक हेत ।१९०४ ।
भावार्थ : -- इस संसार में न जाने कितने आए जाने कितने गए । कितना ही मोह कर लो जो आया है उसे जाना पड़ेगा ॥
पीछे जनम जीवन है आगिन ठाढ़े काल ।
देखु पीछे अमरत है , उलट रे अपनि चाल।१९०५।
भावार्थ : -- पीछे जन्म है जीवन है आगे तेरा काल खड़ा है । देखो पीछे अमरत्व की प्राप्त है, इसलिए तू अपनी गति परिवर्तित कर दे ॥
कोउ बहुरे हेत सहित, औरु कोउ बरजोरि ।
कोउ बहुरे मरनिहि पर, कहत दुनिआ त मोरि ।१९०६।
भावार्थ : -- कोई प्रेम पूर्वक लौटा कोई बल पूर्वक लौटा कोई मरणोपरांत लौटा । यह कहते हुवे कि ये धरती क्या ये दुनिया ही मेरी है ॥ किन्तु यह किसी की न हुई
भव भाउ मह सब अपनी मर्यादा गए भूल ।
रंग रहे ना रंग अरु फूल रहे ना फूल ।१९०७।
भावार्थ : -- सांसारिक सत्ता की लालसा के कारण सब ने अपनीमर्यादाएं बिसरा दी हैं । अब तो रंग रंग नहीं रहा फूल फूल नहीं रहा ॥
चले जोइ अनुमान के, बिहान अरु अवसान ।
पथ परचत घर आपने सोइ बहोरत आन ।१९०८।
भावार्थ : -- जो आरम्भ से अंत को अनुमान कर चलता है । पथ को पहचानते हुवे वही लौट कर अपने घर आता है ॥
धर्म गुरु रूप है अरु , मोचन भगवन मान ।
कर्म एक तपस्या है, अरु फल है बरदान ।१९०९।
भावार्थ : -- धर्म सद्गुरु का स्वरूप है एवं मोक्ष भगवान के समान है । जिस प्रकार सद्गुरु भगवद प्राप्ति का मार्ग दर्शाता है उसी प्रकार धर्म मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताता है ॥ सदकर्म एक तपस्या है तो उसका फल एक वरदान ही है कुकर्म एक विषय-विलास है तो उसका फल श्राप के समान है ॥
यक्ष : - कौन सा धर्म श्रेष्ठ है.....?
युधिष्ठिर : -- जो कष्टों से निवृत्त करे.....?
तो : -- अहिंसा ही परम धर्म है.....
अन्न अहइँ पोषन हेतु, परायन हेतु नाहि ।
मुख अहइँ सद बचन हेतु, कड़कड़ हुँत दुति आहि ।१९१०।
भावार्थ : -- अन्न पोषण के लिए है, उदर-परायण के लिए नहीं । वाणी सद्वचनों के लिए है, कड़कने के लिए तो बिजली है न ॥
जनम हो तो भरत खंड, मानस के हो गात ।१९०१।
भावार्थ : -- वेद श्रुति शास्त्र एवं पुराण बो रहे यह बात । क्या ? यदि दुबारा जन्म हो तो भारत खंड में ही हो और शरीर मिले तो मनुष्य का ही मिले । किन्तु उसके लिए कर्म करना होगा.....
भरत खंड जो जनम ले, सोए होत बड़ भागि ।
ब्रह्म चारी जोनि मिले, होए परम सुभागी ।१९०२।
भावार्थ : -- भारत खंड में जो जन्म लेता है वह मनुष्य बड़ा ही भाग्य शाली है । और यदि ब्रम्ह चारि की देहाकृति प्राप्त हो जाए तो फिर वह परम सौभाग्यशाली होता है ॥ क्यों ? क्योंकि उसके रक्त में अहिंसा, सत्य तपस्या के जीवाणु होते हैं जो मुक्ति के द्वार हैं ॥
रबि डीठ सों डीठ करै, सो तो गए कहुँ होरि ।
पीठ पाती किए त अवसिहि, बाके चरन बहोरि ।१९०३ ।
भावार्थ : -- जो सूर्य की दृष्टि पर अपनी दृष्टि रखेगा वह कहीं न कहीं अंधेरों में चला जाएगा कहीं रुक जाएगा थम जाएगा । जो उसकी दृष्टि का अनुशरण करेगा अर्थात उसके मार्गदर्शन में रहेगा वह प्रकाश से युक्त होकर अवश्य ही लौट आएगा ॥
आनि जगत केतनि केत, गयऊ केत न केत ।
आनि सोइ अवसिहि जाहि, करऊ केतक हेत ।१९०४ ।
भावार्थ : -- इस संसार में न जाने कितने आए जाने कितने गए । कितना ही मोह कर लो जो आया है उसे जाना पड़ेगा ॥
पीछे जनम जीवन है आगिन ठाढ़े काल ।
देखु पीछे अमरत है , उलट रे अपनि चाल।१९०५।
भावार्थ : -- पीछे जन्म है जीवन है आगे तेरा काल खड़ा है । देखो पीछे अमरत्व की प्राप्त है, इसलिए तू अपनी गति परिवर्तित कर दे ॥
कोउ बहुरे हेत सहित, औरु कोउ बरजोरि ।
कोउ बहुरे मरनिहि पर, कहत दुनिआ त मोरि ।१९०६।
भावार्थ : -- कोई प्रेम पूर्वक लौटा कोई बल पूर्वक लौटा कोई मरणोपरांत लौटा । यह कहते हुवे कि ये धरती क्या ये दुनिया ही मेरी है ॥ किन्तु यह किसी की न हुई
भव भाउ मह सब अपनी मर्यादा गए भूल ।
रंग रहे ना रंग अरु फूल रहे ना फूल ।१९०७।
भावार्थ : -- सांसारिक सत्ता की लालसा के कारण सब ने अपनीमर्यादाएं बिसरा दी हैं । अब तो रंग रंग नहीं रहा फूल फूल नहीं रहा ॥
चले जोइ अनुमान के, बिहान अरु अवसान ।
पथ परचत घर आपने सोइ बहोरत आन ।१९०८।
भावार्थ : -- जो आरम्भ से अंत को अनुमान कर चलता है । पथ को पहचानते हुवे वही लौट कर अपने घर आता है ॥
धर्म गुरु रूप है अरु , मोचन भगवन मान ।
कर्म एक तपस्या है, अरु फल है बरदान ।१९०९।
भावार्थ : -- धर्म सद्गुरु का स्वरूप है एवं मोक्ष भगवान के समान है । जिस प्रकार सद्गुरु भगवद प्राप्ति का मार्ग दर्शाता है उसी प्रकार धर्म मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताता है ॥ सदकर्म एक तपस्या है तो उसका फल एक वरदान ही है कुकर्म एक विषय-विलास है तो उसका फल श्राप के समान है ॥
यक्ष : - कौन सा धर्म श्रेष्ठ है.....?
युधिष्ठिर : -- जो कष्टों से निवृत्त करे.....?
तो : -- अहिंसा ही परम धर्म है.....
अन्न अहइँ पोषन हेतु, परायन हेतु नाहि ।
मुख अहइँ सद बचन हेतु, कड़कड़ हुँत दुति आहि ।१९१०।
भावार्थ : -- अन्न पोषण के लिए है, उदर-परायण के लिए नहीं । वाणी सद्वचनों के लिए है, कड़कने के लिए तो बिजली है न ॥
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