कलुषि कुचालि कुटिल संग जाकी सम्मति लागि ।
वाके करे कर्मन के, होहि सोइ सह भागि ।१८९१ ।
भावार्थ : -- जिसकी सम्मति पापीयों, दुष्टों, धूर्त चरत्रों के संग लग गई । ऐसे सम्मति प्रापी के किए कर्मों में फिर सम्मति दाता की भी सहभागिता हो जाती है ॥
गाँउ गवइँ ग्यान कू तरसे आपनि देस ।
ग्यानद पैहन दान कू , उड़त फिरे परदेस ।१८९२।
भावार्थ : -- अपने देश के गांव -गवईं तो ज्ञान को तरस रहें हैं । और दान के भूखे ज्ञानद परदेश में उड़े फिर रहे हैं ॥
पराए देस के बिअ कू, दानै जल खादान ।
धरती दिए जो आपनी, सिरो पर चढ़ी आन ।१८९३।
भावार्थ : -- पराए देश के बीज को जल दो खाद दो किन्तु अपनी धरती कभी मत दो । यदि उसे अपनी धरती दे दी तो वह तुम्हारे सिर में चढ़ के जग जाएगा ॥
पराए बिआ धरती दिए, गहे गहन जब मूल ।
सिरोपर आन चढे भै हमरी भारी भूल ।१८९४।
भावार्थ : -- हमसे भारी भूल हुई हमने पराए देश के बीज को अपनी धरती दी जब वे गहरे मूल को प्राप्त हो गए तब वे फैल फैल के हमारे ही सिर पर चढ़े आते हैं हम पूछते हैं क्यों आते हो.....तो कहते है जागेंगे.....
पहिले जो सेवक बने, बहुरि बन करन धार ।
सुरग पर अधिकार कर, करे नरक बिस्तार ।१८९५।
भावार्थ : -- ये पहले सेवक बन के आते हैं (मुख्य कार्यपालन अधिकारी, प्रबंधक और जाने क्या क्या )फिर देश के कर्ण धार बन जाते हैं और तुम्हारे स्वर्ग पर अधिकार करते हैं, अपने नरक का विस्तार करते हैं ॥
तुम भी यदि अपने देश के सच्चे नागरिक हो तो जाँच कर लो तुम्हारा राष्ट्राध्यक्ष पराया बीज तो नहीं है । कहीं का कौशल (टैलेंट) तुम्हारे देश में सेवक बन के तो नहीं आया है.....आया है तो खेद दो.....भगा दो.....कहीं एक हजार साल बाद वह तुम्हारा स्वर्ग अपने अधिकार में न कर ले.....
जनमत संग्रह देश वासियों का होता है, विदेश वासियों का नहीं.....
परिजन अस परबासि भए हरियर रहे ने बासि
अजहुँ बंधु बाके हेतु काबा रहे न कासि ।१८९६।
भवार्थ : -- परिजन ऐसे प्रवासी हुवे की वो न ताजा रहे न बासी । वह न तो ग्रहण करने के योग्य रहा न त्यागने के । हे बंधु अब तो उसके लिए न काबा रहा न काशी ॥
अधर धर सत सुधाधार, तजत हिंसा द्वेस ।
तपस चरन चारत बने, सुरपुर सोई देस ।१८९७।
भावार्थ : -- अधरों पर सत्य रूपी सुधा का आधार कर जो हिंसा व् विद्वेष का त्याग कर दे । तथा सदा तपस्या के मार्ग का अनुशरण करे तब वह देश भी स्वर्ग हो जाता है ॥
देखो परबासि कू नृप, देवे कस उपदेस ।
पाप परे देस करौ, निबेस अपने देस ।१८९८।
भावार्थ : -- देखो भारत के शासक अपने प्रवासियों को कैसे कैसे उपदेश दे रहे हैं । पाप पराए देशों में करो पाप की कमाई अपने देश में निवेश करो ॥ भारत के इन भ्रष्टाचारी नेताओं को तो काली कमाई चाहिए वो चाहे राष्ट्रीय हो या अंतरराष्ट्रीय ॥
हे मित्रों ! तुम अपने भारत को हिन्दुस्तान बनने से बचा लो यदि यह हिन्दुस्तान बन गया तो इसका इण्डिया बनना तय है, यदि यह इण्डिया बन गया तो फिर यह एक खालिस्थान बन के रह जाएगा जिसमें पुनश्च भारत लिखने के लिए जाने कितनी पीढ़ियों के रक्त की आवश्यकता होगी.....
सर्बर सागर का सरित , रे बाँचे ना कूप ।
भ्रष्ट चारी रोग अजहुँ, ले महमारी रूप ।१८९९।
भावार्थ : -- क्या सरोवर क्या सरिता सागर क्या निर्झर क्या बावली कुँए कुछ नहीं बचा । भारत देश में भ्रष्टाचार का रोग अब तो महामारी का रूप ले चूका है । अत: ऐसे रोगी कही दिखें तो अपनी नासिका में कपड़ा रख ले । और उन्हें लौटा दें.....उनके देश और कहां.....
दरपन करनी आपनी, छबि कैसिउ दरसाए ।
मानस जैसे करम किए तैसे हो भबिताए ।१९०० ।
भावार्थ : -- अपनी करनी का दर्पण देखो कैसी छवि दर्शा रहा है । मनुष्य ने जैसे कर्म करेगा उसका भविष्य भी वैसा ही होगा ॥
वाके करे कर्मन के, होहि सोइ सह भागि ।१८९१ ।
भावार्थ : -- जिसकी सम्मति पापीयों, दुष्टों, धूर्त चरत्रों के संग लग गई । ऐसे सम्मति प्रापी के किए कर्मों में फिर सम्मति दाता की भी सहभागिता हो जाती है ॥
गाँउ गवइँ ग्यान कू तरसे आपनि देस ।
ग्यानद पैहन दान कू , उड़त फिरे परदेस ।१८९२।
भावार्थ : -- अपने देश के गांव -गवईं तो ज्ञान को तरस रहें हैं । और दान के भूखे ज्ञानद परदेश में उड़े फिर रहे हैं ॥
पराए देस के बिअ कू, दानै जल खादान ।
धरती दिए जो आपनी, सिरो पर चढ़ी आन ।१८९३।
भावार्थ : -- पराए देश के बीज को जल दो खाद दो किन्तु अपनी धरती कभी मत दो । यदि उसे अपनी धरती दे दी तो वह तुम्हारे सिर में चढ़ के जग जाएगा ॥
पराए बिआ धरती दिए, गहे गहन जब मूल ।
सिरोपर आन चढे भै हमरी भारी भूल ।१८९४।
भावार्थ : -- हमसे भारी भूल हुई हमने पराए देश के बीज को अपनी धरती दी जब वे गहरे मूल को प्राप्त हो गए तब वे फैल फैल के हमारे ही सिर पर चढ़े आते हैं हम पूछते हैं क्यों आते हो.....तो कहते है जागेंगे.....
पहिले जो सेवक बने, बहुरि बन करन धार ।
सुरग पर अधिकार कर, करे नरक बिस्तार ।१८९५।
भावार्थ : -- ये पहले सेवक बन के आते हैं (मुख्य कार्यपालन अधिकारी, प्रबंधक और जाने क्या क्या )फिर देश के कर्ण धार बन जाते हैं और तुम्हारे स्वर्ग पर अधिकार करते हैं, अपने नरक का विस्तार करते हैं ॥
तुम भी यदि अपने देश के सच्चे नागरिक हो तो जाँच कर लो तुम्हारा राष्ट्राध्यक्ष पराया बीज तो नहीं है । कहीं का कौशल (टैलेंट) तुम्हारे देश में सेवक बन के तो नहीं आया है.....आया है तो खेद दो.....भगा दो.....कहीं एक हजार साल बाद वह तुम्हारा स्वर्ग अपने अधिकार में न कर ले.....
जनमत संग्रह देश वासियों का होता है, विदेश वासियों का नहीं.....
परिजन अस परबासि भए हरियर रहे ने बासि
अजहुँ बंधु बाके हेतु काबा रहे न कासि ।१८९६।
भवार्थ : -- परिजन ऐसे प्रवासी हुवे की वो न ताजा रहे न बासी । वह न तो ग्रहण करने के योग्य रहा न त्यागने के । हे बंधु अब तो उसके लिए न काबा रहा न काशी ॥
अधर धर सत सुधाधार, तजत हिंसा द्वेस ।
तपस चरन चारत बने, सुरपुर सोई देस ।१८९७।
भावार्थ : -- अधरों पर सत्य रूपी सुधा का आधार कर जो हिंसा व् विद्वेष का त्याग कर दे । तथा सदा तपस्या के मार्ग का अनुशरण करे तब वह देश भी स्वर्ग हो जाता है ॥
देखो परबासि कू नृप, देवे कस उपदेस ।
पाप परे देस करौ, निबेस अपने देस ।१८९८।
भावार्थ : -- देखो भारत के शासक अपने प्रवासियों को कैसे कैसे उपदेश दे रहे हैं । पाप पराए देशों में करो पाप की कमाई अपने देश में निवेश करो ॥ भारत के इन भ्रष्टाचारी नेताओं को तो काली कमाई चाहिए वो चाहे राष्ट्रीय हो या अंतरराष्ट्रीय ॥
हे मित्रों ! तुम अपने भारत को हिन्दुस्तान बनने से बचा लो यदि यह हिन्दुस्तान बन गया तो इसका इण्डिया बनना तय है, यदि यह इण्डिया बन गया तो फिर यह एक खालिस्थान बन के रह जाएगा जिसमें पुनश्च भारत लिखने के लिए जाने कितनी पीढ़ियों के रक्त की आवश्यकता होगी.....
सर्बर सागर का सरित , रे बाँचे ना कूप ।
भ्रष्ट चारी रोग अजहुँ, ले महमारी रूप ।१८९९।
भावार्थ : -- क्या सरोवर क्या सरिता सागर क्या निर्झर क्या बावली कुँए कुछ नहीं बचा । भारत देश में भ्रष्टाचार का रोग अब तो महामारी का रूप ले चूका है । अत: ऐसे रोगी कही दिखें तो अपनी नासिका में कपड़ा रख ले । और उन्हें लौटा दें.....उनके देश और कहां.....
दरपन करनी आपनी, छबि कैसिउ दरसाए ।
मानस जैसे करम किए तैसे हो भबिताए ।१९०० ।
भावार्थ : -- अपनी करनी का दर्पण देखो कैसी छवि दर्शा रहा है । मनुष्य ने जैसे कर्म करेगा उसका भविष्य भी वैसा ही होगा ॥
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