बुद्धि बल सह कौसल, जे कुल तीनै मंत्र ।
आन एक सों मिले तबहि , चलए सुचारू तंत्र ।१८८१।
भावार्थ : -- बुद्धि बल( शक्ति ) एवं कौशल जब ये तीनों मंत्र संग मिलते हैं तभी कोई तंत्र सुगमता पूर्वक संचालित रहता है ।। ऊँचा-नीचा, काला- गोरा से नहीं ।।
एहि धरती माहि उपजै, ईंधन दोइ बिधान ।
उत्पादन साधन सों, का उत्खादत् खान ।१८८२।
भावार्थ : -- मंगल का तो पता नहीं किन्तु इस धरती में ऊर्जा दो प्रकार से उत्पन्न होती है । या तो उत्पादन के साधनों से या फिर संचयित भंडारों से । उत्पादन के साधन से ऊर्जा उत्पादित की जाती है जबकि संचयित भंडारों से वह निष्कासित की जाती है ॥
एक गृहस्थी की पूंजी उसका स्वर्ण है । घर यदि मुद्रा के साधन से चलता हो तो उस गृहस्थी को सुगमता पूर्वक संचालित करने के लिए या तो धन का उत्पादन करो अन्यथा स्वर्ण को मुद्रा में परिवर्तित करो ॥ क्या अच्छा है श्रमपूर्वक उत्पादन करना या विश्राम पूर्वक एफ़ डी तुड़वाना ॥
यदि हम एफ डी तुड़वाते हैं तब हमारी चौथी पीढ़ी ऊर्जा संकट से घिरी होगी ॥ विकसित दशों की तीसरी पीढ़ी.....धातु एवं पत्र मुद्रा कदाचित संग्रहालयों में ही देखने को मिलेगी, क्योंकि उसका स्थान अंक मुद्रा ले चुकी होगी.....इसीलिए सड़े हुवे डॉलर/पौंड आदि आदि के बदले कच्चा माल मत दो, माल लो-माल दो.....मल मत लो
अर्थात यदि परिस्थितियां प्रतिकूल रही तब भविष्य में वस्तु विनिमय प्रणाली पुनश्च लागु होना..... भी संभवनीय है ॥
सोइ गहसि सुचारु चरए, जहँ हो धन उत्पाद ।
तहँ बिगरत खड़ खड़ करे, जहँ रह भोगी वाद ।१८८३।
भावार्थ : -- सुगमता पूर्वक वही गृहस्थी संचालित होती है जहाँ धन का उत्पादन होता है । जहाँ भोग वादी तथा धन संचय निधि से निष्कासित हो रहा हो वहां खड़ खड़ का ध्वनि होने लगती है ॥
निकासि को उत्पाद कहें, लूट रहे दिनु रात ।
नेता मंत्री देस पति, धूत चरित की जात ।१८८४।
भावार्थ : - निष्कासन को सकल घरेलु उत्पाद कहते हैं । और दिन रात हमारी सम्पदा को लूट कर महलों में ऐश कर रहे हैं । नेता मंत्री हो कि राष्ट के पतिदेव हों ये सभी मक्कारों की जात के होते हैं.....
बीम्मे इनके भविष्य को सुरक्षित करेंगे.....बावली बूझ कहीं के.....
चुनि चुनि के ओढ़ पहिरै, चुनि चुनि के जो खाए ।
मनीषि मंडलि चयन भए, जाने कहाँ फिकाएँ ।१८८५।
भावार्थ : -- जो चुन चुन कर ओढ़ते हैं चुन चुन कर पहनते हैं..... ये तो कितना गन्दा है..... ये बहुंत मस्त है और चुन चुन कर खाते हैं.....जैसे छी छी ये अनाज के कण है या मानस का उत्सर्जन है.....जब विचार शील मंडली का चयन होता है तब ऐसे मूर्ख आठवे समंदर में फैक दिए जाते हैं ॥
कलि सरि माहि डूब मरैं, कृत करमन प्रत्यास ।
अस बेद बिमुख कुजन के, सुजन उड़ावैं हास् ।१८८६ ।
भावार्थ : -- पाप परिष्कृत होने की प्रत्याशा में जो कर्म नासा नदी के गोते लेते हैं । ऐसे वेद विमुख दुष्टों की सद्जन समुदाय सदा हँसी उड़ाते हैं ॥
खल कर सब किछु सौंप दिए, परमारथ के आस ।
सो मूरख आपनि संग, किए औरन के नास ।१८८७।
भावार्थ : -- दानव दल के हाथों सब कुछ सौंप कर जो उनसे परमार्थ की आस लगा रहे हैं ॥ ऐसे मूर्ख सत्यानासी अपने संग दूसरों का भी नास कर देते हैं ॥
आलू के त भाउ बढे, फल को जाऊ भूर ।
दाखा बात बैरी भए, दरसन सोहीं दूर ।१८८८।
भावार्थ : -- आलू का तो थोबड़ा ही ऊपर हो गया है, कहता है मैं ही हूँ बस । फलों को तो भूल ही जाओ । द्राक्षा एवं वातवैरी बोले तो मेवा तो दर्शनातीत हो गए ॥
धरती ने तो दीप दिए, तिलहन ने दिए तेल ।
मूरख भर भर बार सब माटी मैं दिए मेल ।१८८९।
भावार्थ : -- धरती ने दीपक दिया तिलहनों ने तेल दिया । मूर्खों न भर भर के उसे ऐसे जलाया कि हमारा जीवन अंधेरों से घिरा है( चौथी पीढ़ी ) । दिन में दीपक जलाना चाहिए.....? रातों में सूर्य उगाना चाहिए कि सो जाना चाहिए.....?
उदरथि सों अगनी बड़ी, अगनी सों बड़ क्रोध ।
प्रभात सों बड़ा प्रबोध, जोधन सों बड़ जोध ।१८९० ।
भावार्थ : -- समुद्र से अग्नि बड़ी होती है वाडवाग्नि सारे समुद्र को शोषित करने की क्षमता होती है । अगनी से बड़ा क्रोध होता है, यह तो अखिल विश्व को भस्म कर दे । प्रभात से बड़ा जागरण होता है जब जागो तभी सवेरा और कुशल योद्धा, युद्ध सामग्री से भी बड़ा होता है ॥
आन एक सों मिले तबहि , चलए सुचारू तंत्र ।१८८१।
भावार्थ : -- बुद्धि बल( शक्ति ) एवं कौशल जब ये तीनों मंत्र संग मिलते हैं तभी कोई तंत्र सुगमता पूर्वक संचालित रहता है ।। ऊँचा-नीचा, काला- गोरा से नहीं ।।
एहि धरती माहि उपजै, ईंधन दोइ बिधान ।
उत्पादन साधन सों, का उत्खादत् खान ।१८८२।
भावार्थ : -- मंगल का तो पता नहीं किन्तु इस धरती में ऊर्जा दो प्रकार से उत्पन्न होती है । या तो उत्पादन के साधनों से या फिर संचयित भंडारों से । उत्पादन के साधन से ऊर्जा उत्पादित की जाती है जबकि संचयित भंडारों से वह निष्कासित की जाती है ॥
एक गृहस्थी की पूंजी उसका स्वर्ण है । घर यदि मुद्रा के साधन से चलता हो तो उस गृहस्थी को सुगमता पूर्वक संचालित करने के लिए या तो धन का उत्पादन करो अन्यथा स्वर्ण को मुद्रा में परिवर्तित करो ॥ क्या अच्छा है श्रमपूर्वक उत्पादन करना या विश्राम पूर्वक एफ़ डी तुड़वाना ॥
यदि हम एफ डी तुड़वाते हैं तब हमारी चौथी पीढ़ी ऊर्जा संकट से घिरी होगी ॥ विकसित दशों की तीसरी पीढ़ी.....धातु एवं पत्र मुद्रा कदाचित संग्रहालयों में ही देखने को मिलेगी, क्योंकि उसका स्थान अंक मुद्रा ले चुकी होगी.....इसीलिए सड़े हुवे डॉलर/पौंड आदि आदि के बदले कच्चा माल मत दो, माल लो-माल दो.....मल मत लो
अर्थात यदि परिस्थितियां प्रतिकूल रही तब भविष्य में वस्तु विनिमय प्रणाली पुनश्च लागु होना..... भी संभवनीय है ॥
सोइ गहसि सुचारु चरए, जहँ हो धन उत्पाद ।
तहँ बिगरत खड़ खड़ करे, जहँ रह भोगी वाद ।१८८३।
भावार्थ : -- सुगमता पूर्वक वही गृहस्थी संचालित होती है जहाँ धन का उत्पादन होता है । जहाँ भोग वादी तथा धन संचय निधि से निष्कासित हो रहा हो वहां खड़ खड़ का ध्वनि होने लगती है ॥
निकासि को उत्पाद कहें, लूट रहे दिनु रात ।
नेता मंत्री देस पति, धूत चरित की जात ।१८८४।
भावार्थ : - निष्कासन को सकल घरेलु उत्पाद कहते हैं । और दिन रात हमारी सम्पदा को लूट कर महलों में ऐश कर रहे हैं । नेता मंत्री हो कि राष्ट के पतिदेव हों ये सभी मक्कारों की जात के होते हैं.....
बीम्मे इनके भविष्य को सुरक्षित करेंगे.....बावली बूझ कहीं के.....
चुनि चुनि के ओढ़ पहिरै, चुनि चुनि के जो खाए ।
मनीषि मंडलि चयन भए, जाने कहाँ फिकाएँ ।१८८५।
भावार्थ : -- जो चुन चुन कर ओढ़ते हैं चुन चुन कर पहनते हैं..... ये तो कितना गन्दा है..... ये बहुंत मस्त है और चुन चुन कर खाते हैं.....जैसे छी छी ये अनाज के कण है या मानस का उत्सर्जन है.....जब विचार शील मंडली का चयन होता है तब ऐसे मूर्ख आठवे समंदर में फैक दिए जाते हैं ॥
कलि सरि माहि डूब मरैं, कृत करमन प्रत्यास ।
अस बेद बिमुख कुजन के, सुजन उड़ावैं हास् ।१८८६ ।
भावार्थ : -- पाप परिष्कृत होने की प्रत्याशा में जो कर्म नासा नदी के गोते लेते हैं । ऐसे वेद विमुख दुष्टों की सद्जन समुदाय सदा हँसी उड़ाते हैं ॥
खल कर सब किछु सौंप दिए, परमारथ के आस ।
सो मूरख आपनि संग, किए औरन के नास ।१८८७।
भावार्थ : -- दानव दल के हाथों सब कुछ सौंप कर जो उनसे परमार्थ की आस लगा रहे हैं ॥ ऐसे मूर्ख सत्यानासी अपने संग दूसरों का भी नास कर देते हैं ॥
आलू के त भाउ बढे, फल को जाऊ भूर ।
दाखा बात बैरी भए, दरसन सोहीं दूर ।१८८८।
भावार्थ : -- आलू का तो थोबड़ा ही ऊपर हो गया है, कहता है मैं ही हूँ बस । फलों को तो भूल ही जाओ । द्राक्षा एवं वातवैरी बोले तो मेवा तो दर्शनातीत हो गए ॥
धरती ने तो दीप दिए, तिलहन ने दिए तेल ।
मूरख भर भर बार सब माटी मैं दिए मेल ।१८८९।
भावार्थ : -- धरती ने दीपक दिया तिलहनों ने तेल दिया । मूर्खों न भर भर के उसे ऐसे जलाया कि हमारा जीवन अंधेरों से घिरा है( चौथी पीढ़ी ) । दिन में दीपक जलाना चाहिए.....? रातों में सूर्य उगाना चाहिए कि सो जाना चाहिए.....?
उदरथि सों अगनी बड़ी, अगनी सों बड़ क्रोध ।
प्रभात सों बड़ा प्रबोध, जोधन सों बड़ जोध ।१८९० ।
भावार्थ : -- समुद्र से अग्नि बड़ी होती है वाडवाग्नि सारे समुद्र को शोषित करने की क्षमता होती है । अगनी से बड़ा क्रोध होता है, यह तो अखिल विश्व को भस्म कर दे । प्रभात से बड़ा जागरण होता है जब जागो तभी सवेरा और कुशल योद्धा, युद्ध सामग्री से भी बड़ा होता है ॥
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