कुभाउ कुबानि न छाँड़े, छाँड़े नहीं कुचाह ।
कल सासक फल छाँड़ दिए, अस छाँड़न का लाह ।१८७१।
भावार्थ : -- विद्वेष भौवों को न छोड़ा बुरी बानि नहीं छोड़ी कुत्सित कामनाओं को नहीं छोड़ा । शासक जी ने कल फल छोड़ दिए बताओ ये भी कोई छोड़ना हुवा ।। पीणा-खाणा नहीं छोड़ा..... ले बता फल छोड़ दिए.....परसों मुटियारी छोड़ दी थी.....
स्वारथ परत आपने, नेता चलते चाल ।
यह विकल्पी ब्यवस्था जस मकड़ी का जाल ।१८७२।
भावार्थ : -- अपने अपने स्वार्थों के परायण होकर नेता-मंत्री कुचालि करते हैं । चुनावी विकल्प उन्हीं के द्वारा बुना गया दुविधाओं का जाल भर है, जिसमें भोले-भाले भले लोग फँस जाते हैं ॥
सिंहासन की दौड़ है, नेता रह अस दौड़ ।
होढ पैहन होड़ा बीच, जैसे लगि हो होड़ ।१८७३।
भावार्थ : -- सिहासन की दौड़ है, और नेता ऐसे दौड़ रहे हैं जैसे चोर डाकुओं में चोरी डकैती का मॉल हड़पने की होड़ लगी हो ॥
दान के तो क्या.....ये आपकी भीख के भी योग्य नहीं हैं.....
सिंहासन की दौड़ है, दौड़ सके तो दौड़ ।
सेवा सत साद चारिता, अगहन पाछे छोड़ ।१८७४।
भावार्थ : -- सिंहासन की दौड़ है दौड़ सके तो दौड़ । आगे होना है.....? तो सेवा सत्य सदाचरण पीछे छोड़ना पड़ेगा ॥
टीका : -- यही कारण है कि ऐसे भ्रष्ट तंत्र को सज्जन एवं सदाचारी दूर से ही नमस्ते करते हैं.....
बधिरु को सब बधिरु लगे, अँधरे को सब अंध ।
मुचित को सब मुचित लगे, बंधे को सब बंध ।१८७५।
भावार्थ : -- बहरे को सारा संसार बहरा लगता है अंधे का अँधा लगता है । छूटे हुवे को सब छूटे हुवे लगते हैं । जेलवाले को सब अपराधी लगते हैं ॥
धनिक बनिक की जाति कू, सब किछु की है छूट ।
निर्धन जान सधारन कू, सबहि रहे हैं लूट ।१८७६।
भावार्थ : -- भारत में धनवानों की यद्योगपतियों की नेता- मंत्री की जाति को सब कुछ की छूट हैं सब फ्री है । एक निर्धन जन साधारण को सब कोई लूट रहे हैं ॥
"एक साधारण निर्धन की बेटी मूलभूत शिक्षा से भी वंचित है । एक असाधारण जाति के धनी बेटे को सब कुछ की छूट है । ये रही भारत की साइनिंग और ये रहा उसका निर्माण.....
सत सत कोटि सोहि अधिक , भए जग जन की भीर ॥
तापर भोग बादिता अगजग करे अधीर ।१८७७ ।
भावार्थ : -- विश्व की जनसँख्या सात अरब से भी अधिक हो गई है ( इसमें से एक तिहाई अंश भारत एवं चीन में है ) उसपर उसकी भोगवादी प्रवृत्ति । यह वैश्विक चिंतन का विषय है ॥
एक अरु अरध सति पूरब, अनुहार एक अनुमान ।
ईंधन सोत सों ईंधन, होई जाहि बिहान ।१८७८ ।
भावार्थ : -- एक अनुमान के अनुसार लगभग डेढ़ सौ वर्ष पश्चात ऊर्जा के स्त्रोतों से ऊर्जा समाप्त हो जाएगी ॥
कदाचित तब गांय चिड़िया घरों में ही देखने को मिलेगी ।
हे रे दुनिआ गोल जब बोले को एहि बोल ।
मूर्खता कह कह हँसी, ह रे दुनिआ गोल ।१८७९ ।
भावार्थ : -- जब किसी ने कहा हे रे ये दुनिया गोल है । तब उसपर मूर्खता यह कहकर हँसी हा हा हा ये दुनिया गोल है ॥ गोल होती तो हम लोग नीचे गिर नहीं जाते ॥
जुगति संग बड़ी जुगता जुगता सों बड़ जोग ।
जोग सों संजोग बड़े संजोग सों सुजोग ।१८८० ।
भावार्थ : -- युक्ति से बड़ी योग्यता होती है , योग्यता से नियम बड़े होते हैं । नियम से बड़ा संयोग होता है सुअवसर संयोग से बड़ा होता है ॥
अर्थात : - युक्तियाँ तो सब कोई भिड़ा लेते है योग्यता दुर्लभ होती है, योग्यता के ऊपर नियम भारी होता है । संयोग हो तो नियम भी हार जाते हैं, कोई अवसर ही न हो तो संयोग वहां क्या करेगा ।
कल सासक फल छाँड़ दिए, अस छाँड़न का लाह ।१८७१।
भावार्थ : -- विद्वेष भौवों को न छोड़ा बुरी बानि नहीं छोड़ी कुत्सित कामनाओं को नहीं छोड़ा । शासक जी ने कल फल छोड़ दिए बताओ ये भी कोई छोड़ना हुवा ।। पीणा-खाणा नहीं छोड़ा..... ले बता फल छोड़ दिए.....परसों मुटियारी छोड़ दी थी.....
स्वारथ परत आपने, नेता चलते चाल ।
यह विकल्पी ब्यवस्था जस मकड़ी का जाल ।१८७२।
भावार्थ : -- अपने अपने स्वार्थों के परायण होकर नेता-मंत्री कुचालि करते हैं । चुनावी विकल्प उन्हीं के द्वारा बुना गया दुविधाओं का जाल भर है, जिसमें भोले-भाले भले लोग फँस जाते हैं ॥
सिंहासन की दौड़ है, नेता रह अस दौड़ ।
होढ पैहन होड़ा बीच, जैसे लगि हो होड़ ।१८७३।
भावार्थ : -- सिहासन की दौड़ है, और नेता ऐसे दौड़ रहे हैं जैसे चोर डाकुओं में चोरी डकैती का मॉल हड़पने की होड़ लगी हो ॥
दान के तो क्या.....ये आपकी भीख के भी योग्य नहीं हैं.....
सिंहासन की दौड़ है, दौड़ सके तो दौड़ ।
सेवा सत साद चारिता, अगहन पाछे छोड़ ।१८७४।
भावार्थ : -- सिंहासन की दौड़ है दौड़ सके तो दौड़ । आगे होना है.....? तो सेवा सत्य सदाचरण पीछे छोड़ना पड़ेगा ॥
टीका : -- यही कारण है कि ऐसे भ्रष्ट तंत्र को सज्जन एवं सदाचारी दूर से ही नमस्ते करते हैं.....
बधिरु को सब बधिरु लगे, अँधरे को सब अंध ।
मुचित को सब मुचित लगे, बंधे को सब बंध ।१८७५।
भावार्थ : -- बहरे को सारा संसार बहरा लगता है अंधे का अँधा लगता है । छूटे हुवे को सब छूटे हुवे लगते हैं । जेलवाले को सब अपराधी लगते हैं ॥
धनिक बनिक की जाति कू, सब किछु की है छूट ।
निर्धन जान सधारन कू, सबहि रहे हैं लूट ।१८७६।
भावार्थ : -- भारत में धनवानों की यद्योगपतियों की नेता- मंत्री की जाति को सब कुछ की छूट हैं सब फ्री है । एक निर्धन जन साधारण को सब कोई लूट रहे हैं ॥
"एक साधारण निर्धन की बेटी मूलभूत शिक्षा से भी वंचित है । एक असाधारण जाति के धनी बेटे को सब कुछ की छूट है । ये रही भारत की साइनिंग और ये रहा उसका निर्माण.....
सत सत कोटि सोहि अधिक , भए जग जन की भीर ॥
तापर भोग बादिता अगजग करे अधीर ।१८७७ ।
भावार्थ : -- विश्व की जनसँख्या सात अरब से भी अधिक हो गई है ( इसमें से एक तिहाई अंश भारत एवं चीन में है ) उसपर उसकी भोगवादी प्रवृत्ति । यह वैश्विक चिंतन का विषय है ॥
एक अरु अरध सति पूरब, अनुहार एक अनुमान ।
ईंधन सोत सों ईंधन, होई जाहि बिहान ।१८७८ ।
भावार्थ : -- एक अनुमान के अनुसार लगभग डेढ़ सौ वर्ष पश्चात ऊर्जा के स्त्रोतों से ऊर्जा समाप्त हो जाएगी ॥
कदाचित तब गांय चिड़िया घरों में ही देखने को मिलेगी ।
हे रे दुनिआ गोल जब बोले को एहि बोल ।
मूर्खता कह कह हँसी, ह रे दुनिआ गोल ।१८७९ ।
भावार्थ : -- जब किसी ने कहा हे रे ये दुनिया गोल है । तब उसपर मूर्खता यह कहकर हँसी हा हा हा ये दुनिया गोल है ॥ गोल होती तो हम लोग नीचे गिर नहीं जाते ॥
जुगति संग बड़ी जुगता जुगता सों बड़ जोग ।
जोग सों संजोग बड़े संजोग सों सुजोग ।१८८० ।
भावार्थ : -- युक्ति से बड़ी योग्यता होती है , योग्यता से नियम बड़े होते हैं । नियम से बड़ा संयोग होता है सुअवसर संयोग से बड़ा होता है ॥
अर्थात : - युक्तियाँ तो सब कोई भिड़ा लेते है योग्यता दुर्लभ होती है, योग्यता के ऊपर नियम भारी होता है । संयोग हो तो नियम भी हार जाते हैं, कोई अवसर ही न हो तो संयोग वहां क्या करेगा ।
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