शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १८६ ॥ -----

सिंधु तीरे तीर चले, पाइबु बाकी थाह । 
अवगहत धरातल अबर, पाइबी औरु काह ।१८१ । 
भावार्थ : -- सिंधु के तीर तीर चलने से ही उसकी थाह प्राप्त हो जाती है । गहरे जा के देखिए वहां भी धरातल के अतिरिक्त और कुछ नहीं होगा ॥ 

चिंतन सूक्ति सदबचन, चारि घरी के नाह । 
जब लग जग रहि जीबि जन, तब लग करे निबाह ।१८६२ । 
भावार्थ : -- सूक्तियाँ, सुवचन एवं सद्चिन्तन किंचित काल के लिए नहीं होते । संसार में जब तक जीवन रहेगा ये उसे प्रभावित करती रहेंगी ॥ 

पुत भया इतराई जनि, धरे राम के नाम । 
रावन कहत पुकारिआ, कारे ऐसे काम ।१८६३। 
भावार्थ : -- पुत हुवा.....अच्छी बात है.....माई ने इतरा के भगवान का नाम रख दिया.....भोत अच्छी बात है । पण उसने कुकरम ऐसे किए कि जग में रावण नाम से पुकारा जाने लगा । लोग कहने लगे खसमन खाणी यो सुपूत जना है की भूत.....   

अंतर माहि पाप भरे, बहिर दिखावै प्रेम । 
सोइ सरूप सुरा धरे, गहे कलस जो हेम ।१८६४। 
भावार्थ : -- जिसके अंतर में पाप भरे हों, जो बाहिर से प्रेम प्रदर्शित करे ।  वह अमृत-कलश में भरी हुई सूरा के सदृश्य होकर सुराप्रेमी को ही प्रिय होता है ॥ 

भारत के भंडार मह, भरे रहे सद्भाउ । 
भोग बिलासी भाउ नै, वाके करे अभाउ ।१८६५। 
भावार्थ : -- भारत के भंडार सद्भावों से संपन्न था । भोग विलासिता के कुभावों ने जिन्हें की आयातित माना जाता है आभाव व्युत्पन्न करते हुवे उसे विपन्न कर दिया ॥ 

दर्पन दर्पत कल कहे, मम सोंह नहि सुदीठ । 
सीस फिरा के देख तौ, पहिए आपनि पीठ ।१८६५।  
भावार्थ : -- दर्पण दर्प में भर कर बढे ही गर्व से कहता है , मेरे जैसी सुदृष्टि संसार में नहीं है, मैं किसी की भी छवि गढ़ सकता हूँ  । सिर फेरा के तू पहले अपने पिछवाड़े को तो देख ॥ 

उसे थोड़े ही पता है कि लोग सिंगर के बोले तो मेकअप करके के ही उसके सम्मुख होते हैं.....है ना..... 

उत्तम अन्न  कीट धरे,कहलाए सोइ नीच । 
कमल दल जब नीच तरे, रहे कीच के कीच ।१८६६। 
भावार्थ : -- उत्तम अन्न में यदि कीड़े लग जाए तो वह भी निकृष्ट ही कहलाता है । कीचड़ से उठा कमल दल भी यदि नीचता पर उतर आए तो वह अधम का अधम ही रहता है ॥ 

मानव समाजिक बिनिमय, हो जग हित के पाख । 
सृष्टि सृजन सन करे जो जीव जगत के राख ।१८६७ । 
भावार्थ : - हे मानव ! सामाजिक परिवर्तन यदि हो तो वह सृष्टि एवं उसके सृजन के सह जीव जगत की रक्षा करते हुवे सम्पूर्ण विश्व के कल्याण के लिए ही हो ॥ 

प्रागीतिहास सह रूप  बोल रहा यह बात । 
भारत भुइँ माहि उपजे ये मानस के गात ।१८६८ । 
भवार्थ : -- केवल भारत का पौराणिक इतिहास ही  स्मृति चिन्हों सहित यह अभिकथन करता है कि मानव जाति  का समग्र विकास उसकी पावन भूमि में ही हुवा था ॥ 

महँगाई काटे पेट, तुला रहा गल काट । 
सासन कफन खसोट फिर , लूटे छप्पर खाट ।१८६९ । 
भावार्थ : -- महंगाई पेट काट रही है, डंडी मार तराजू गला काट रहा है । फिर ये  कफ़न खसोट शासन  छप्पर खाट लूट रहा है ॥   

सील भ्रष्ट सासन तंत्र, तापर वाके ठाट । 
मरे जन कू पीस रहे, चाकी के दो पाट ।१८७० । 
भावार्थ : -- फिर शील भ्रष्ट शासन तंत्र  उसपर उसके ठाट-बाट ।  मानो चक्की के दो पाट है जो मरे हुए  जन सामान्य को पीस रहा है ॥ 







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