सिंधु तीरे तीर चले, पाइबु बाकी थाह ।
अवगहत धरातल अबर, पाइबी औरु काह ।१८६१ ।
भावार्थ : -- सिंधु के तीर तीर चलने से ही उसकी थाह प्राप्त हो जाती है । गहरे जा के देखिए वहां भी धरातल के अतिरिक्त और कुछ नहीं होगा ॥
चिंतन सूक्ति सदबचन, चारि घरी के नाह ।
जब लग जग रहि जीबि जन, तब लग करे निबाह ।१८६२ ।
भावार्थ : -- सूक्तियाँ, सुवचन एवं सद्चिन्तन किंचित काल के लिए नहीं होते । संसार में जब तक जीवन रहेगा ये उसे प्रभावित करती रहेंगी ॥
पुत भया इतराई जनि, धरे राम के नाम ।
रावन कहत पुकारिआ, कारे ऐसे काम ।१८६३।
भावार्थ : -- पुत हुवा.....अच्छी बात है.....माई ने इतरा के भगवान का नाम रख दिया.....भोत अच्छी बात है । पण उसने कुकरम ऐसे किए कि जग में रावण नाम से पुकारा जाने लगा । लोग कहने लगे खसमन खाणी यो सुपूत जना है की भूत.....
अंतर माहि पाप भरे, बहिर दिखावै प्रेम ।
सोइ सरूप सुरा धरे, गहे कलस जो हेम ।१८६४।
भावार्थ : -- जिसके अंतर में पाप भरे हों, जो बाहिर से प्रेम प्रदर्शित करे । वह अमृत-कलश में भरी हुई सूरा के सदृश्य होकर सुराप्रेमी को ही प्रिय होता है ॥
भारत के भंडार मह, भरे रहे सद्भाउ ।
भोग बिलासी भाउ नै, वाके करे अभाउ ।१८६५।
भावार्थ : -- भारत के भंडार सद्भावों से संपन्न था । भोग विलासिता के कुभावों ने जिन्हें की आयातित माना जाता है आभाव व्युत्पन्न करते हुवे उसे विपन्न कर दिया ॥
दर्पन दर्पत कल कहे, मम सोंह नहि सुदीठ ।
सीस फिरा के देख तौ, पहिए आपनि पीठ ।१८६५।
भावार्थ : -- दर्पण दर्प में भर कर बढे ही गर्व से कहता है , मेरे जैसी सुदृष्टि संसार में नहीं है, मैं किसी की भी छवि गढ़ सकता हूँ । सिर फेरा के तू पहले अपने पिछवाड़े को तो देख ॥
उसे थोड़े ही पता है कि लोग सिंगर के बोले तो मेकअप करके के ही उसके सम्मुख होते हैं.....है ना.....
उत्तम अन्न कीट धरे,कहलाए सोइ नीच ।
कमल दल जब नीच तरे, रहे कीच के कीच ।१८६६।
भावार्थ : -- उत्तम अन्न में यदि कीड़े लग जाए तो वह भी निकृष्ट ही कहलाता है । कीचड़ से उठा कमल दल भी यदि नीचता पर उतर आए तो वह अधम का अधम ही रहता है ॥
मानव समाजिक बिनिमय, हो जग हित के पाख ।
सृष्टि सृजन सन करे जो जीव जगत के राख ।१८६७ ।
भावार्थ : - हे मानव ! सामाजिक परिवर्तन यदि हो तो वह सृष्टि एवं उसके सृजन के सह जीव जगत की रक्षा करते हुवे सम्पूर्ण विश्व के कल्याण के लिए ही हो ॥
प्रागीतिहास सह रूप बोल रहा यह बात ।
भारत भुइँ माहि उपजे ये मानस के गात ।१८६८ ।
भवार्थ : -- केवल भारत का पौराणिक इतिहास ही स्मृति चिन्हों सहित यह अभिकथन करता है कि मानव जाति का समग्र विकास उसकी पावन भूमि में ही हुवा था ॥
महँगाई काटे पेट, तुला रहा गल काट ।
सासन कफन खसोट फिर , लूटे छप्पर खाट ।१८६९ ।
भावार्थ : -- महंगाई पेट काट रही है, डंडी मार तराजू गला काट रहा है । फिर ये कफ़न खसोट शासन छप्पर खाट लूट रहा है ॥
सील भ्रष्ट सासन तंत्र, तापर वाके ठाट ।
मरे जन कू पीस रहे, चाकी के दो पाट ।१८७० ।
भावार्थ : -- फिर शील भ्रष्ट शासन तंत्र उसपर उसके ठाट-बाट । मानो चक्की के दो पाट है जो मरे हुए जन सामान्य को पीस रहा है ॥
अवगहत धरातल अबर, पाइबी औरु काह ।१८६१ ।
भावार्थ : -- सिंधु के तीर तीर चलने से ही उसकी थाह प्राप्त हो जाती है । गहरे जा के देखिए वहां भी धरातल के अतिरिक्त और कुछ नहीं होगा ॥
चिंतन सूक्ति सदबचन, चारि घरी के नाह ।
जब लग जग रहि जीबि जन, तब लग करे निबाह ।१८६२ ।
भावार्थ : -- सूक्तियाँ, सुवचन एवं सद्चिन्तन किंचित काल के लिए नहीं होते । संसार में जब तक जीवन रहेगा ये उसे प्रभावित करती रहेंगी ॥
पुत भया इतराई जनि, धरे राम के नाम ।
रावन कहत पुकारिआ, कारे ऐसे काम ।१८६३।
भावार्थ : -- पुत हुवा.....अच्छी बात है.....माई ने इतरा के भगवान का नाम रख दिया.....भोत अच्छी बात है । पण उसने कुकरम ऐसे किए कि जग में रावण नाम से पुकारा जाने लगा । लोग कहने लगे खसमन खाणी यो सुपूत जना है की भूत.....
अंतर माहि पाप भरे, बहिर दिखावै प्रेम ।
सोइ सरूप सुरा धरे, गहे कलस जो हेम ।१८६४।
भावार्थ : -- जिसके अंतर में पाप भरे हों, जो बाहिर से प्रेम प्रदर्शित करे । वह अमृत-कलश में भरी हुई सूरा के सदृश्य होकर सुराप्रेमी को ही प्रिय होता है ॥
भारत के भंडार मह, भरे रहे सद्भाउ ।
भोग बिलासी भाउ नै, वाके करे अभाउ ।१८६५।
भावार्थ : -- भारत के भंडार सद्भावों से संपन्न था । भोग विलासिता के कुभावों ने जिन्हें की आयातित माना जाता है आभाव व्युत्पन्न करते हुवे उसे विपन्न कर दिया ॥
दर्पन दर्पत कल कहे, मम सोंह नहि सुदीठ ।
सीस फिरा के देख तौ, पहिए आपनि पीठ ।१८६५।
भावार्थ : -- दर्पण दर्प में भर कर बढे ही गर्व से कहता है , मेरे जैसी सुदृष्टि संसार में नहीं है, मैं किसी की भी छवि गढ़ सकता हूँ । सिर फेरा के तू पहले अपने पिछवाड़े को तो देख ॥
उसे थोड़े ही पता है कि लोग सिंगर के बोले तो मेकअप करके के ही उसके सम्मुख होते हैं.....है ना.....
उत्तम अन्न कीट धरे,कहलाए सोइ नीच ।
कमल दल जब नीच तरे, रहे कीच के कीच ।१८६६।
भावार्थ : -- उत्तम अन्न में यदि कीड़े लग जाए तो वह भी निकृष्ट ही कहलाता है । कीचड़ से उठा कमल दल भी यदि नीचता पर उतर आए तो वह अधम का अधम ही रहता है ॥
मानव समाजिक बिनिमय, हो जग हित के पाख ।
सृष्टि सृजन सन करे जो जीव जगत के राख ।१८६७ ।
भावार्थ : - हे मानव ! सामाजिक परिवर्तन यदि हो तो वह सृष्टि एवं उसके सृजन के सह जीव जगत की रक्षा करते हुवे सम्पूर्ण विश्व के कल्याण के लिए ही हो ॥
प्रागीतिहास सह रूप बोल रहा यह बात ।
भारत भुइँ माहि उपजे ये मानस के गात ।१८६८ ।
भवार्थ : -- केवल भारत का पौराणिक इतिहास ही स्मृति चिन्हों सहित यह अभिकथन करता है कि मानव जाति का समग्र विकास उसकी पावन भूमि में ही हुवा था ॥
महँगाई काटे पेट, तुला रहा गल काट ।
सासन कफन खसोट फिर , लूटे छप्पर खाट ।१८६९ ।
भावार्थ : -- महंगाई पेट काट रही है, डंडी मार तराजू गला काट रहा है । फिर ये कफ़न खसोट शासन छप्पर खाट लूट रहा है ॥
सील भ्रष्ट सासन तंत्र, तापर वाके ठाट ।
मरे जन कू पीस रहे, चाकी के दो पाट ।१८७० ।
भावार्थ : -- फिर शील भ्रष्ट शासन तंत्र उसपर उसके ठाट-बाट । मानो चक्की के दो पाट है जो मरे हुए जन सामान्य को पीस रहा है ॥
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