देखो पंचतंत्र करै, कटक सुठि उद्भास ।
जेहि एक बारि घात किए, बाका का बिस्वास ।१८५१।
भावार्थ : -- पंचतंत्र को देखो कितने सुन्दर उक्ति कह रहा है : -- नेता हो मंत्री हो दल हो मित्र हो, चाहे कोई भी क्यों न हो : -- जिसने एक बार भी विश्वासघात किया, फिर उसका कभी विश्वास नहीं करना चाहिए ॥
पंचतंत्र ? अब ये कौन सा तंत्र है ? संस्कृत की एक प्रसिद्ध पुस्तक है
स्वामि कुकर्मी एक बिधि, सेबक तीनि बिधान ।
स्वामि सुकरमी एक निधि, सेबक तीनि निधान ।१८५२।
भावार्थ : -- स्वामि यदि बुराई करता है तो सेवक तीन करता है, स्वामी एक पाप करता है तो सेवक तीन करता है स्वामी यदि एक रुपया खाता है तो सेवक तीन जी करता है । यदि स्वामी के सद्कर्मों का यदि एक भी कोष होता है, वह कोष सेवक के ही सद्कर्मों के तीन कोष कर देता है ॥
हाथ ते अधिक घाउ किए, ताहि गही तलबारि ।
स्वामि के पटतर होत , सेबक कुकरम भारी ।१८५३ ।
भावार्थ : -- हाथ की तलवार हाथ से अधिक चोट करती है । उसी प्रकार स्वामी की तुलना में सेवक के कुकरम अधिक भारी होते हैं ॥
उधारी की फरारी नक़द में बीमारी यही है सरकार की देसी बिदेसी पालिसी
उधारी ? = तेरी
फ़रारी ? = उनकी
बीमारी ? = तेरी
नक़दी ? = उनकी
देस माहि सासन तंतु, न्याय नेम त आहि ।
पर जे सब समरथ हेतु, तुम्हरे हेतु नाहि ।१८५६।
भावार्थ : -- देश में एक शासन भी है तंत्र भी है न्याय भी नियम-कानून भी है ॥ पर ये सब सामर्थ्यवान हेतु है तुम्हारे लिए नहीं.....समझे.....
सामर्थ्य कैसे बने? = वो चोरी करे तू डाके डाल वो विप्लव करें तू संसद में आतंक मचा, वो दलाली करें तू बम फोड़.....
अन्यथा ? ..... उपदेश दे.....उन्हें सुनना पड़ेगा
ऊँचे ऊँचे गढ़ गढ़े, चीतत ऊंची भीत ।
तापर राउन्हि ऊपर, भयउ काल के जीत ।१८५७।
भावार्थ : -- ऊंची भित्ति उत्तान के ऊँचे ऊँचे दुर्ग बनाए गए । तिसपर भी राजाओं के ऊपर काल ने विजय प्राप्त की ॥ ये किले सुरक्षा के लिए बने थे न.....क्या लाभ हुवा.....
मुख हेतु अन कन जल फल उदर हेतु आहार ।
देस बासि नगर लेख बरे सोइहि बिचार ।१८५८ ।
भावार्थ : -- मुख हेतु जो अन्न है दाल है चावल है जल है फल है, किंतु उदर हेतु ये केवल आहार मात्र हैं ।
एक राष्ट्र को चाहिए कि वह उदर के विचारों को वरण करते हुवे अपने निवासियों को धर्म वर्ण जाति में विभक्त न कर उन्हें नागरिक शब्द से संबोधित करे । जन-तंत्र के संचालक को राष्ट्र की विचार धाराओं में ही प्रवाहित होना चाहिए, क्योंकि विपरीत बुद्धि होने पर विनाश अवश्यम्भावी होता है ॥
मुनि मुनीष मूरख मूरि, ग्यान सिंच सिधाए ।
बहरे कू न कान उगे, अँधरे आँखि न आए ।१८५९।
भावार्थ : -- विचार शील मुनि महात्मा लोग मूर्खता की मूल को ज्ञान जल से सींच सींच के सिधा गए । पर उस अंधी बहरी के न तो कान उगे न उसको आँख आई ॥
जे जग सबहि मतिन्ह के, आपुनि आपुनि खेह ।
जामें निज हित जानिबे, तामें धरिहै नेह ।१८ ६० ।
भावाथ : - इस संसार में सबके अपने अपने विचारों के क्षेत्र हुवे। उसने जिसमें अपना हित जाना उसमें ही स्नेह प्रकट किया ॥
जेहि एक बारि घात किए, बाका का बिस्वास ।१८५१।
भावार्थ : -- पंचतंत्र को देखो कितने सुन्दर उक्ति कह रहा है : -- नेता हो मंत्री हो दल हो मित्र हो, चाहे कोई भी क्यों न हो : -- जिसने एक बार भी विश्वासघात किया, फिर उसका कभी विश्वास नहीं करना चाहिए ॥
पंचतंत्र ? अब ये कौन सा तंत्र है ? संस्कृत की एक प्रसिद्ध पुस्तक है
स्वामि कुकर्मी एक बिधि, सेबक तीनि बिधान ।
स्वामि सुकरमी एक निधि, सेबक तीनि निधान ।१८५२।
भावार्थ : -- स्वामि यदि बुराई करता है तो सेवक तीन करता है, स्वामी एक पाप करता है तो सेवक तीन करता है स्वामी यदि एक रुपया खाता है तो सेवक तीन जी करता है । यदि स्वामी के सद्कर्मों का यदि एक भी कोष होता है, वह कोष सेवक के ही सद्कर्मों के तीन कोष कर देता है ॥
हाथ ते अधिक घाउ किए, ताहि गही तलबारि ।
स्वामि के पटतर होत , सेबक कुकरम भारी ।१८५३ ।
भावार्थ : -- हाथ की तलवार हाथ से अधिक चोट करती है । उसी प्रकार स्वामी की तुलना में सेवक के कुकरम अधिक भारी होते हैं ॥
सीवाँ एक संकासि दुइ, दोनों रहे निहार ।
एक निहारि बिन प्रतिकार दूज संग प्रतिकार ।१८५४।
भावार्थ : -- सीमा एक है, निहारने वाले दो हैं । दोनों के निहारने में अंतर यह है कि एक बिना प्रतिकार के निहार रहा है, दूसरे के निहारी पर प्रतिकार का अत्याचार हो रहा है ॥
समरथ हुँत बैपार सों बर बाहन बर भेस ।
रे बहिआ रिन भार सों, तुहरे हुँत उपदेस ।१८५५।
भावार्थ : - ये आर्थिक नीतियां, देसी विदेशी पॉलिसी, काम धंधा, बढ़िया बढ़िया बाहन, बढ़िया बढ़िया कपडे ये सब सामर्थ्यवान के लिए है । रे बहिआ बोले तो बोट देने वाले पागलों तुम्हारे लिए ऋण का भार है.....समझे.....नहीं समझे ?
समरथ हुँत बैपार सों बर बाहन बर भेस ।
रे बहिआ रिन भार सों, तुहरे हुँत उपदेस ।१८५५।
भावार्थ : - ये आर्थिक नीतियां, देसी विदेशी पॉलिसी, काम धंधा, बढ़िया बढ़िया बाहन, बढ़िया बढ़िया कपडे ये सब सामर्थ्यवान के लिए है । रे बहिआ बोले तो बोट देने वाले पागलों तुम्हारे लिए ऋण का भार है.....समझे.....नहीं समझे ?
उधारी की फरारी नक़द में बीमारी यही है सरकार की देसी बिदेसी पालिसी
उधारी ? = तेरी
फ़रारी ? = उनकी
बीमारी ? = तेरी
नक़दी ? = उनकी
देस माहि सासन तंतु, न्याय नेम त आहि ।
पर जे सब समरथ हेतु, तुम्हरे हेतु नाहि ।१८५६।
भावार्थ : -- देश में एक शासन भी है तंत्र भी है न्याय भी नियम-कानून भी है ॥ पर ये सब सामर्थ्यवान हेतु है तुम्हारे लिए नहीं.....समझे.....
सामर्थ्य कैसे बने? = वो चोरी करे तू डाके डाल वो विप्लव करें तू संसद में आतंक मचा, वो दलाली करें तू बम फोड़.....
अन्यथा ? ..... उपदेश दे.....उन्हें सुनना पड़ेगा
ऊँचे ऊँचे गढ़ गढ़े, चीतत ऊंची भीत ।
तापर राउन्हि ऊपर, भयउ काल के जीत ।१८५७।
भावार्थ : -- ऊंची भित्ति उत्तान के ऊँचे ऊँचे दुर्ग बनाए गए । तिसपर भी राजाओं के ऊपर काल ने विजय प्राप्त की ॥ ये किले सुरक्षा के लिए बने थे न.....क्या लाभ हुवा.....
मुख हेतु अन कन जल फल उदर हेतु आहार ।
देस बासि नगर लेख बरे सोइहि बिचार ।१८५८ ।
भावार्थ : -- मुख हेतु जो अन्न है दाल है चावल है जल है फल है, किंतु उदर हेतु ये केवल आहार मात्र हैं ।
एक राष्ट्र को चाहिए कि वह उदर के विचारों को वरण करते हुवे अपने निवासियों को धर्म वर्ण जाति में विभक्त न कर उन्हें नागरिक शब्द से संबोधित करे । जन-तंत्र के संचालक को राष्ट्र की विचार धाराओं में ही प्रवाहित होना चाहिए, क्योंकि विपरीत बुद्धि होने पर विनाश अवश्यम्भावी होता है ॥
मुनि मुनीष मूरख मूरि, ग्यान सिंच सिधाए ।
बहरे कू न कान उगे, अँधरे आँखि न आए ।१८५९।
भावार्थ : -- विचार शील मुनि महात्मा लोग मूर्खता की मूल को ज्ञान जल से सींच सींच के सिधा गए । पर उस अंधी बहरी के न तो कान उगे न उसको आँख आई ॥
जे जग सबहि मतिन्ह के, आपुनि आपुनि खेह ।
जामें निज हित जानिबे, तामें धरिहै नेह ।१८ ६० ।
भावाथ : - इस संसार में सबके अपने अपने विचारों के क्षेत्र हुवे। उसने जिसमें अपना हित जाना उसमें ही स्नेह प्रकट किया ॥
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