जल चर सों बर नभ चारि, नभ सों बर थल चारि ।
थल चारि मैं स्तन धारि, ताते बर नर नारि ।१८३१ ।
भावार्थ : -- जलचर से उत्तम नभचर, नभचर से उत्तम स्थलचर है । थलचर में स्तनधारी उत्तम है । स्तनधारियों में मनुष्य उत्तम है सर्वोत्तम नहीं ।
करें न पतन आपन हुँत, करें आप उद्धाप ।
मानस अपुना मित आप, अरु रिपु आपहि आप ।।
----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता ६ /५॥ -----
भावार्थ : -- अपने द्वारा अपना उद्धार करें, अपना पतन न करें । क्योंकि ( मनुष्य) आप ही अपना मित्र है, और आप ही अपना शत्रु है ॥
कर्म किए बिना कर्म किए कर्महीन किए जाप ।
कर्म निष्ठ के किए काम, बोलें आपहि आप ।१८३२।
भावार्थ : -- कर्मण्य का काम बोलता है, अकर्मण्य का मुख.....
बिदुजन बिद्या गुरु ज्ञान, सद्जन दे गए सीख ।
धर्मबान कू दान दैं, मँगतों को दैं भीख ।१८३४।
भावार्थ : -- विद्वज्जन विद्या दाए ज्ञानद ने ज्ञान दिया सद्जन ने दी सीख । की भैया धर्म में निष्ठां रखने वाले, विषय विमुख वैराग्यपरायण, ज्ञानी, जीवन्मुक्त ब्रह्मलीन सद्पात्र धर्मात्मा को ही दान दें, भिक्षार्थी को भिक्षा दें ॥
अति परिश्रम पूर्बक जो सद मारग सों आनि ।
बिनु माँगे सो मुकुति दिए, कहत जगत तिन दानि ।१८३५।
। भावार्थ : -- अतिशय परिश्रम पूर्वक सद्मार्ग से अर्जित की गई उत्तम वस्तु जो किसी सद्पात्र को बिना मांगे दे दे संसार उसे ही उदार-चरित कहता है ॥
गगन एक धरा पवन एक, एकै अगन जल धूर ।
बन उपबन परफुरै बरु, बरन बरन के फूर ।१८३६।
भावार्थ : -- गगन एक है धरा पवन एक है अगनी एक है जल धूरि भी एक ही है । तथापि वन उपवनों में भांति भांति के पुष्प प्रफुरित हैं ॥
जनम दात बँसानुगत, जनिमन रचे सुभाव ।
तैसी भावै भावना जैसे अंतर भाउ ।१८३७ ।
भावार्थ : -- संतान को उसका मूल स्वभाव यद्यपि उसके वंश द्वारा प्राप्त होता है । तथापि उसके अंतकरण में जैसे भाव व्युत्पन्न होते हैं उसकी भावनाएं वैसी ही होती है ॥
जनम दात बँसानुगत, जनिमन रचे सुभाव ।
तैसी भावै भावना जैसे अंतर भाउ ।१८३७ ।
भावार्थ : -- संतान को उसका मूल स्वभाव यद्यपि उसके वंश द्वारा प्राप्त होता है । तथापि उसके अंतकरण में जैसे भाव व्युत्पन्न होते हैं उसकी भावनाएं वैसी ही होती है ॥
प्रथम पंक्ति - आनुवंशिक अभियांत्रिकी बोले तो जैनेटिक इंजनियरिंग कहलाती है, दूसरी पंक्ति सामजिक अभियांत्रिकी कहलाती है ॥
दानि घर अदानि जनमें, पहरी के घर चोर।
अँधियारे घर चन्द्रमा, रयनी के घर भोर ।१८३८।
भावार्थ : -- दानी के घर अदानी भी जन्म लेता है । प्रहरी के घर चोर भी हो जाते हैं ॥ जैसे अँधेरे घर में चन्द्रमा होता है और रयनी के घर में भोर होती है ॥
तात्पर्य है कि : -- चोरी, दान, मांगना , नेता गिरी, कवि, कलाकारी, यह मूल स्वभाव नहीं है । यह एक सामाजिक प्रभाव है । मनुष्य जैसे वातावरण में रहता है उसकी वृत्तियाँ भी वैसी ही होती जाती हैं ॥
बिश्वम्भरा जुगत रही , सकल सुहागि चीन्ह ।
छीन कुल कलन्किन्हि ने मातु कुबेषि कीन्ह ।१८३९ ।
भावार्थ : -- विश्व का भरण पोषण करने वाली जननी स्वरूप यह वसुंधरा समस्त सुहाग चिन्हों से युक्त रही । उसके कुपुत्र ऐसे हुवे की उन्होंने सबकुछ छीनकर उसे कुवेषी कर दिया ॥
हबिर गेह गह आहुती, उठे धूम जब केतु ।
होइहि असन औषधी, प्रान बायु के हेतु ।१८४०।
भावार्थ : -- हविर् गृह में गृहीत आहुति गगन में जब हविर् धूम बनकर उठती है तब वह रोगित एवं क्षुधित प्राणवायु अर्थात ओजोन के लिए भोजन एवं औषधी का कार्य करती है ॥
हमारी पृथ्वी सार्वभौमिक उष्णता का नित नव कीर्तिमान स्थापित कर रही है, प्रास्थितक असंतुलन गहराता जा रहा है जो वैश्विक कुशासन एवं अति भोग वादिता का ही दुष्परिणाम है । शासक वर्ग है कि सत्ता संघर्ष में ही व्यस्त है, ऊर्जा के स्त्रोत से ऊर्जा समाप्त हो रही है वन समाप्त हो रहे हैं, वन्य-जीवन समाप्त हो रहा है, उद्यम खेतो को खाए जा रहे हैं । ऐसी समाप्ति पर नियंत्रण एवं ऊर्जा के अन्य विकल्पों पर ध्यान केंद्रित करना अब आवश्यक हो गया है.....
थल चारि मैं स्तन धारि, ताते बर नर नारि ।१८३१ ।
भावार्थ : -- जलचर से उत्तम नभचर, नभचर से उत्तम स्थलचर है । थलचर में स्तनधारी उत्तम है । स्तनधारियों में मनुष्य उत्तम है सर्वोत्तम नहीं ।
करें न पतन आपन हुँत, करें आप उद्धाप ।
मानस अपुना मित आप, अरु रिपु आपहि आप ।।
----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता ६ /५॥ -----
भावार्थ : -- अपने द्वारा अपना उद्धार करें, अपना पतन न करें । क्योंकि ( मनुष्य) आप ही अपना मित्र है, और आप ही अपना शत्रु है ॥
कर्म किए बिना कर्म किए कर्महीन किए जाप ।
कर्म निष्ठ के किए काम, बोलें आपहि आप ।१८३२।
भावार्थ : -- कर्मण्य का काम बोलता है, अकर्मण्य का मुख.....
बिदुजन बिद्या गुरु ज्ञान, सद्जन दे गए सीख ।
धर्मबान कू दान दैं, मँगतों को दैं भीख ।१८३४।
भावार्थ : -- विद्वज्जन विद्या दाए ज्ञानद ने ज्ञान दिया सद्जन ने दी सीख । की भैया धर्म में निष्ठां रखने वाले, विषय विमुख वैराग्यपरायण, ज्ञानी, जीवन्मुक्त ब्रह्मलीन सद्पात्र धर्मात्मा को ही दान दें, भिक्षार्थी को भिक्षा दें ॥
अति परिश्रम पूर्बक जो सद मारग सों आनि ।
बिनु माँगे सो मुकुति दिए, कहत जगत तिन दानि ।१८३५।
। भावार्थ : -- अतिशय परिश्रम पूर्वक सद्मार्ग से अर्जित की गई उत्तम वस्तु जो किसी सद्पात्र को बिना मांगे दे दे संसार उसे ही उदार-चरित कहता है ॥
गगन एक धरा पवन एक, एकै अगन जल धूर ।
बन उपबन परफुरै बरु, बरन बरन के फूर ।१८३६।
भावार्थ : -- गगन एक है धरा पवन एक है अगनी एक है जल धूरि भी एक ही है । तथापि वन उपवनों में भांति भांति के पुष्प प्रफुरित हैं ॥
जनम दात बँसानुगत, जनिमन रचे सुभाव ।
तैसी भावै भावना जैसे अंतर भाउ ।१८३७ ।
भावार्थ : -- संतान को उसका मूल स्वभाव यद्यपि उसके वंश द्वारा प्राप्त होता है । तथापि उसके अंतकरण में जैसे भाव व्युत्पन्न होते हैं उसकी भावनाएं वैसी ही होती है ॥
जनम दात बँसानुगत, जनिमन रचे सुभाव ।
तैसी भावै भावना जैसे अंतर भाउ ।१८३७ ।
भावार्थ : -- संतान को उसका मूल स्वभाव यद्यपि उसके वंश द्वारा प्राप्त होता है । तथापि उसके अंतकरण में जैसे भाव व्युत्पन्न होते हैं उसकी भावनाएं वैसी ही होती है ॥
प्रथम पंक्ति - आनुवंशिक अभियांत्रिकी बोले तो जैनेटिक इंजनियरिंग कहलाती है, दूसरी पंक्ति सामजिक अभियांत्रिकी कहलाती है ॥
दानि घर अदानि जनमें, पहरी के घर चोर।
अँधियारे घर चन्द्रमा, रयनी के घर भोर ।१८३८।
भावार्थ : -- दानी के घर अदानी भी जन्म लेता है । प्रहरी के घर चोर भी हो जाते हैं ॥ जैसे अँधेरे घर में चन्द्रमा होता है और रयनी के घर में भोर होती है ॥
तात्पर्य है कि : -- चोरी, दान, मांगना , नेता गिरी, कवि, कलाकारी, यह मूल स्वभाव नहीं है । यह एक सामाजिक प्रभाव है । मनुष्य जैसे वातावरण में रहता है उसकी वृत्तियाँ भी वैसी ही होती जाती हैं ॥
बिश्वम्भरा जुगत रही , सकल सुहागि चीन्ह ।
छीन कुल कलन्किन्हि ने मातु कुबेषि कीन्ह ।१८३९ ।
भावार्थ : -- विश्व का भरण पोषण करने वाली जननी स्वरूप यह वसुंधरा समस्त सुहाग चिन्हों से युक्त रही । उसके कुपुत्र ऐसे हुवे की उन्होंने सबकुछ छीनकर उसे कुवेषी कर दिया ॥
हबिर गेह गह आहुती, उठे धूम जब केतु ।
होइहि असन औषधी, प्रान बायु के हेतु ।१८४०।
भावार्थ : -- हविर् गृह में गृहीत आहुति गगन में जब हविर् धूम बनकर उठती है तब वह रोगित एवं क्षुधित प्राणवायु अर्थात ओजोन के लिए भोजन एवं औषधी का कार्य करती है ॥
हमारी पृथ्वी सार्वभौमिक उष्णता का नित नव कीर्तिमान स्थापित कर रही है, प्रास्थितक असंतुलन गहराता जा रहा है जो वैश्विक कुशासन एवं अति भोग वादिता का ही दुष्परिणाम है । शासक वर्ग है कि सत्ता संघर्ष में ही व्यस्त है, ऊर्जा के स्त्रोत से ऊर्जा समाप्त हो रही है वन समाप्त हो रहे हैं, वन्य-जीवन समाप्त हो रहा है, उद्यम खेतो को खाए जा रहे हैं । ऐसी समाप्ति पर नियंत्रण एवं ऊर्जा के अन्य विकल्पों पर ध्यान केंद्रित करना अब आवश्यक हो गया है.....
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