निज निज जाति धरम निष्ठ, के मुख साधे मौन ।
बितथ मरजाद बिप्लबी, पूछ रहे तू कौन ।१८०१ ।
भावार्थ : -- स्वजाति एवं स्वधर्म निष्ठ के मुख तो मौन साधे हैं । जो गिरगिट के जैसे धर्म जाति बदलते हैं जो विप्लववादी हिंसक हैं वो उनसे पूछते हैं : -- तू है कौन ?.....
पहले ये बता तू कौन है ? कहाँ से आया है ?
"न खग मृग न मानस काया, आधी धूप आधी छाया "
लेनहार को बस्तु रुचे, देनहार को दान ।
हिय न आदर भाव भरे, दोउ अरुचि मन आन ।१८०२ ।
भावार्थ : - ग्रहिता को वस्तु प्रिय होती है दाता को देन प्रिय होता है । ग्रहिता को वस्तु के प्रति आदरभाव नहीं हो तो दाता की दान के प्रति अरुचि उत्पन्न हो जाती है । यदि दाता देने में आदरभाव नहीं बरतता तब ग्रहिता की वस्तु के प्रति अरुचि उत्पन्न हो जाती है ॥
निज सम्मत ए देस काल, गै जो को के साथ ।
ओढ़ पहन बिमान फिरै बहुरि लगे ना हाथ ।१८०३।
भावार्थ : -- देश काल एवं इन परिस्थितियों में यदि अपनी सम्मति एक बार किसी के साथ चली गई । फिर तो उसे भूल ही जाओ काहे की वह लौट के आने वाली नहीं । ओड पहन के बिमान में जो फिरती है ॥
कैसे खटिआ तोड़ ये, देखो देस प्रधान ।
खाए भी अरु खरचै भी, पहन पंच परिधान ।१८०४ ।
भावार्थ : -- देखो इन राष्ट्राध्यक्षों को कैसे खटिया तोड़ हैं । खाते भी हैं, खरचते भी हैं, पहनते भी हैं, उड़ते भी हैं ॥ तू बस खेत बेचियो ओर ऊपर देख देख के पिलेन-पिलेन चिल्लाते रहियो ।।
टिप्पणी : - ये शिखर वार्त्ताएं द्वी पक्षीय हो अथवा बहु पक्षीय केवल फैशन-शो के अतिरिक्त कुछ नहीं होती। इसमें अपने प्रधान क्या पहनेगे, क्या खाएंगे, कैसे जाएंगे, कहाँ जाएंगे, की ही वार्त्ता होती है । क्या करेंगे ? वह पता नहीं होता । वैसे भी ये जितना करते हैं उससे कई गुना तो दो देश के बाबू लोग कम्पूटर में कर लेते हैं ।
पत्राली को काचक किए, मलिन्दु दिए मलिनाए ।
साहित्य के अस दर्पन, समाज छबि दरसाए ।१८०५।
पत्रावली को कांच कर उसमें मलिन्दु मल दिया । साहित्य के ऐसे दर्पण में समाज अपनी छवि दर्शाने लगा
" साहित्य ही समाज का दर्पण है....."
सदकरम सत्यवदन सद चारित के सिंगार ।
सदगुन सील सदाचरन, कंगन कंकनि हार।१८०६।
भावार्थ : -- सत्कृत् सत्यंवदन, सच्चरित्र के श्रंगार प्रसाधन हैं। सद्गुण शील एवं सदाचरण उसके आभूषण हैं ॥
साजन बुद्धिभवन लगे लोभ लब्ध की लाग ।
त्रयलोक के संपत सहुँ, बुझे नहीं सो आग ।१८०७।
भावाथ : -- हे सज्जनों ! यदि बुद्धि के भवन में लोभ लब्धि की लाग लग जाए तब वह आग तीन लोक की सम्पदा से भी नहीं बुझती ।।
जहँ ब्ययिन ब्यसन बसे, तहँ धन रहे दुराए ।
जब निर्धनता सन बसे, दरसन मैं नहि आए ।१८०८।
भावार्थ : -- जहां अपव्ययता एवं व्यसन बसते हैं वहां से धन दूर होता जाता है । यदि निर्धनता भी संग आ बसे तब तो वह दर्शनातीत हो जाता है ॥
"जहां व्यसन होता है, वहां धन नहीं होता....."
ऊँचे त्रान बान भरे , उरत फिरै बैमान ।
कंकरी अरि पंथ घात, सोइ चरन का जान ।१८०९।
भावार्थ : -- वे चरण कंटक एवं ककड़ भरे पंथ के आघात को क्या जाने जो महँगे -महँगे त्राण एवं महंगी महँगी वेश भूषा भरे विमानों में उड़ते फिरते हैं ॥
बिना खाए-पिए यहां एक ठो जींस और बूसट नहीं आ रही है.....ई प्रधान मंत्री एक दिन में तीन तीन चार चार भव्य पोशाकें कहाँ से पहन लेते हैं.....?
आरम्भ में दीप बरे, सब जन बहुंत सुहाए ।
सार खात जो किए बमन , सकल भवन कलुखाए ।१८१० ।
भावार्थ : -- जगमग करता दीपक प्रारम्भ में सबको बहुंत भाता है । बुझते समय जब वह तेल खा के उल्टी करता है उस उल्टी से सारा घर कलुषित हो जाता है ॥
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