मंगलवार, 30 सितंबर 2014

----- मिनिस्टर राजू १४२ -----

राजू! अहा !क्या सुन्दर जोड़ी है अमरीका में एक बम तो दूसरी मिसाइल,

राजू : -- और मास्टर जी ! हमारे यहाँ एक बम तो दूसरी शांति..... फूट जाए तो न बम रहता है न शांति.....

----- ॥ दोहा-दशम १९० ॥ -----,

बेद श्रुति सास्त्र पुरान, बोल रहे यह बात । 
जनम हो तो भरत खंड, मानस के हो गात ।१९०१। 
भावार्थ : -- वेद श्रुति शास्त्र एवं पुराण बो रहे यह बात । क्या ? यदि दुबारा जन्म हो तो भारत खंड में ही हो और शरीर मिले तो मनुष्य का ही मिले । किन्तु उसके लिए कर्म करना होगा.....

भरत खंड जो जनम ले, सोए होत बड़ भागि । 
ब्रह्म चारी जोनि मिले, होए परम सुभागी ।१९०२। 
भावार्थ : -- भारत खंड में जो जन्म लेता है वह मनुष्य बड़ा ही भाग्य शाली है  । और यदि ब्रम्ह चारि की देहाकृति प्राप्त हो जाए तो फिर वह परम सौभाग्यशाली होता है ॥ क्यों ? क्योंकि उसके रक्त में अहिंसा,  सत्य तपस्या के जीवाणु होते हैं जो मुक्ति के द्वार हैं ॥

रबि डीठ सों डीठ करै, सो तो गए कहुँ होरि । 
पीठ पाती किए त अवसिहि, बाके चरन बहोरि ।१९०३ । 
भावार्थ : -- जो सूर्य की दृष्टि पर अपनी दृष्टि रखेगा वह कहीं न कहीं  अंधेरों में चला जाएगा कहीं रुक जाएगा थम जाएगा । जो उसकी दृष्टि का अनुशरण करेगा अर्थात उसके मार्गदर्शन में रहेगा वह प्रकाश से युक्त होकर अवश्य ही लौट आएगा ॥ 

आनि जगत केतनि केत, गयऊ केत न केत । 
आनि सोइ अवसिहि जाहि, करऊ केतक हेत ।१९०४ । 
भावार्थ : -- इस संसार में न जाने कितने आए जाने कितने गए । कितना ही मोह कर लो जो आया है उसे जाना पड़ेगा ॥ 

पीछे जनम जीवन है आगिन ठाढ़े काल । 
देखु पीछे अमरत है , उलट रे अपनि चाल।१९०५। 
भावार्थ : -- पीछे जन्म है जीवन है आगे तेरा काल खड़ा है ।  देखो पीछे अमरत्व की प्राप्त है, इसलिए तू अपनी गति  परिवर्तित कर दे ॥

कोउ बहुरे हेत सहित, औरु कोउ बरजोरि । 
कोउ बहुरे मरनिहि पर, कहत दुनिआ त मोरि ।१९०६। 
भावार्थ : -- कोई प्रेम पूर्वक लौटा कोई बल पूर्वक लौटा कोई मरणोपरांत लौटा ।  यह कहते हुवे कि ये धरती क्या ये दुनिया ही मेरी है ॥ किन्तु यह किसी की न हुई

भव भाउ मह सब अपनी मर्यादा गए भूल । 
रंग रहे ना रंग अरु  फूल रहे ना फूल ।१९०७। 
भावार्थ : -- सांसारिक सत्ता की लालसा के कारण सब ने अपनीमर्यादाएं बिसरा दी हैं । अब तो रंग रंग नहीं रहा फूल फूल नहीं रहा ॥

चले जोइ अनुमान के, बिहान अरु अवसान । 
पथ परचत घर आपने  सोइ बहोरत आन ।१९०८। 
भावार्थ : -- जो आरम्भ से अंत को अनुमान कर चलता है । पथ को पहचानते हुवे वही लौट कर अपने घर आता है ॥

धर्म गुरु रूप है अरु , मोचन भगवन मान । 
कर्म एक तपस्या है, अरु  फल है बरदान ।१९०९। 
भावार्थ : -- धर्म सद्गुरु का स्वरूप है एवं मोक्ष भगवान के समान है । जिस प्रकार सद्गुरु भगवद प्राप्ति का मार्ग दर्शाता है उसी  प्रकार धर्म मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताता है ॥ सदकर्म  एक तपस्या है तो उसका फल एक वरदान ही है  कुकर्म एक विषय-विलास है तो उसका फल श्राप के समान है ॥

यक्ष : -  कौन सा धर्म श्रेष्ठ है.....?
युधिष्ठिर : -- जो कष्टों से निवृत्त करे.....?

तो : -- अहिंसा ही परम धर्म है.....

अन्न अहइँ पोषन हेतु, परायन हेतु नाहि । 
मुख अहइँ सद बचन हेतु, कड़कड़ हुँत दुति आहि ।१९१०। 
भावार्थ : -- अन्न पोषण के लिए है, उदर-परायण के लिए नहीं । वाणी सद्वचनों के लिए है, कड़कने के लिए तो बिजली है न ॥






सोमवार, 29 सितंबर 2014

----- मिनिस्टर राजू १४१ -----

राजू ! ऐसा करते हैं जमीं उसकी हड़प लेते हैं ग़ज़ल अपनी लिखते हैं कैसा रहेगा..?

राजू : -- मास्टर जी  ! बढ़िया !

 " ऐसा करते हैं दो कदम आगे बढ़ते हैं उसके तख्खलुस पर भी हक़ तलफ़ कर लेते है ये कैसा रहेगा..?

राजू : -- बहुंत बढ़िया ! किन्तु मास्टर जी ! यदि हम दो कदम पीछे हट जाएं तो अपनी जमीं पर पहुँच जाएंगे.....


रविवार, 28 सितंबर 2014

----- मिनिस्टर राजू १४० -----

राजू : - मास्टर जी !  देस का तो धन और अपणा समय नष्ट करके बिमान में चढ़े ये अड़ोसी -पड़ोसी सात समंदर पार करने क्या गए हैं..?

" तू तू मैं मैं"

राजू : -- लै मास्टर जी ! इससे बढ़िया तू तू मैं मैं तो हमारी गरहिनिया रोट्टी बणाते-बणाते कलकुलेटर पे कर लेती हैं । बावली बुझ जब चढ़ के गए ही थे तो किम्मे ढंग का करते.....

शनिवार, 27 सितंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १८९॥ -----

कलुषि कुचालि कुटिल संग जाकी सम्मति लागि । 
वाके करे कर्मन के, होहि सोइ सह भागि ।१८९१ । 
भावार्थ : -- जिसकी सम्मति पापीयों,  दुष्टों, धूर्त चरत्रों के संग लग गई । ऐसे सम्मति प्रापी  के किए कर्मों में फिर सम्मति दाता की भी सहभागिता हो जाती  है ॥ 

गाँउ गवइँ  ग्यान कू तरसे आपनि देस । 
ग्यानद पैहन दान कू , उड़त फिरे परदेस ।१८९२।  
भावार्थ : --  अपने देश के गांव -गवईं तो ज्ञान को तरस रहें हैं । और दान के भूखे ज्ञानद परदेश में उड़े फिर रहे हैं ॥ 

पराए देस के बिअ कू, दानै जल खादान । 
धरती दिए जो आपनी, सिरो पर चढ़ी आन ।१८९३। 
भावार्थ : -- पराए देश के बीज को जल दो खाद दो किन्तु अपनी धरती कभी मत दो । यदि उसे अपनी धरती दे दी तो वह तुम्हारे सिर में चढ़ के जग जाएगा  ॥  

पराए बिआ धरती दिए, गहे गहन जब मूल । 
सिरोपर आन चढे  भै हमरी भारी भूल ।१८९४। 
भावार्थ : -- हमसे भारी भूल हुई हमने पराए देश के बीज को अपनी धरती दी जब वे गहरे मूल को प्राप्त हो गए तब वे फैल फैल के हमारे ही सिर पर चढ़े आते हैं हम पूछते हैं क्यों आते हो.....तो कहते है जागेंगे.....

पहिले जो सेवक बने, बहुरि बन करन धार । 
सुरग पर अधिकार कर, करे नरक बिस्तार ।१८९५। 
भावार्थ : -- ये पहले सेवक बन के आते हैं (मुख्य कार्यपालन अधिकारी, प्रबंधक और जाने क्या क्या )फिर देश के कर्ण धार बन जाते हैं और तुम्हारे स्वर्ग पर अधिकार करते हैं, अपने नरक का विस्तार करते हैं ॥

तुम भी यदि अपने  देश के सच्चे नागरिक हो तो जाँच कर लो तुम्हारा राष्ट्राध्यक्ष पराया बीज तो नहीं है । कहीं का कौशल (टैलेंट) तुम्हारे देश में सेवक बन के तो नहीं आया है.....आया है तो खेद दो.....भगा दो.....कहीं एक हजार साल बाद वह तुम्हारा स्वर्ग अपने  अधिकार में न कर ले.....

जनमत संग्रह देश वासियों का होता है, विदेश वासियों का नहीं..... 

परिजन अस परबासि भए हरियर रहे ने बासि 
अजहुँ बंधु बाके हेतु काबा रहे न कासि ।१८९६। 
भवार्थ : -- परिजन ऐसे प्रवासी हुवे की वो न ताजा रहे न बासी  । वह न तो ग्रहण करने के योग्य रहा न त्यागने के । हे बंधु अब तो उसके लिए न काबा रहा न काशी ॥ 

अधर धर सत सुधाधार, तजत हिंसा द्वेस । 
तपस चरन चारत बने, सुरपुर सोई देस ।१८९७।
भावार्थ : -- अधरों पर सत्य रूपी सुधा का आधार कर जो  हिंसा व्  विद्वेष का त्याग कर दे । तथा सदा तपस्या के मार्ग का अनुशरण करे तब वह देश भी स्वर्ग हो जाता है ॥  

देखो परबासि कू नृप, देवे कस उपदेस । 
पाप परे देस करौ, निबेस अपने देस ।१८९८। 
भावार्थ : -- देखो भारत के शासक अपने प्रवासियों को कैसे कैसे उपदेश दे रहे हैं । पाप पराए देशों में करो पाप की कमाई अपने देश में निवेश करो ॥ भारत के इन भ्रष्टाचारी नेताओं को तो काली कमाई चाहिए वो चाहे राष्ट्रीय हो या अंतरराष्ट्रीय ॥ 

 हे मित्रों ! तुम अपने भारत को हिन्दुस्तान बनने से बचा लो यदि यह हिन्दुस्तान बन गया तो इसका इण्डिया बनना तय है, यदि यह इण्डिया बन गया तो फिर यह एक खालिस्थान बन के रह जाएगा जिसमें पुनश्च भारत लिखने के लिए जाने कितनी पीढ़ियों के रक्त की आवश्यकता होगी.....

सर्बर सागर का सरित , रे बाँचे ना कूप । 
भ्रष्ट चारी रोग अजहुँ, ले महमारी रूप ।१८९९। 
भावार्थ : -- क्या सरोवर क्या  सरिता सागर क्या निर्झर क्या बावली कुँए कुछ नहीं बचा । भारत देश में भ्रष्टाचार  का रोग अब तो महामारी का रूप ले चूका है । अत: ऐसे रोगी कही दिखें तो अपनी नासिका में कपड़ा  रख ले । और उन्हें लौटा दें.....उनके देश और कहां.....

दरपन करनी आपनी, छबि कैसिउ दरसाए  । 
मानस जैसे करम किए तैसे हो भबिताए ।१९०० । 
भावार्थ : -- अपनी करनी का दर्पण देखो कैसी छवि दर्शा रहा है । मनुष्य ने जैसे कर्म करेगा उसका भविष्य भी वैसा ही होगा ॥   



शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

----- मिनिस्टर राजू १३९ -----

राजू : -- मास्टर जी ! अंग्रेज, अंग्रेज क्यों थे..?

" वे भारत के राजस्व को स्वीस अधिकोष में संचित करते थे"

राजू : -- मास्टर जी ! जवाहर लाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू कैसे बने..,? 

 " अंग्रेजों के बनाए ( भारत की जनता के हितों के विरुद्ध )  नियम को तोड़कर "

राजू : - मास्टर जी ! अच्छा तो  फिर वो  प्रधान मंत्री कैसे बने ? 

 " उन्हीं नियमों को पुनश्च लागु करके"

राजू  : -- मास्टर जी ! ये मोहन दास करम चंद गांधी कौन है..? 

  " पता नहीं कौन है.....चले आते हैं कहीं कहीं से " 


गुरुवार, 25 सितंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १८८ ॥ -----

बुद्धि बल सह कौसल, जे कुल तीनै मंत्र । 
आन एक सों मिले तबहि , चलए सुचारू तंत्र ।१८८१।  
भावार्थ : -- बुद्धि बल( शक्ति ) एवं कौशल जब ये तीनों मंत्र संग मिलते हैं तभी कोई तंत्र सुगमता पूर्वक संचालित रहता है ।। ऊँचा-नीचा, काला- गोरा से नहीं ।।

एहि धरती माहि उपजै, ईंधन दोइ बिधान । 
उत्पादन साधन सों, का उत्खादत् खान ।१८८२। 
भावार्थ : -- मंगल का तो पता नहीं किन्तु इस धरती में ऊर्जा दो प्रकार से उत्पन्न होती है ।  या तो उत्पादन के साधनों से या फिर संचयित भंडारों से । उत्पादन के साधन से ऊर्जा उत्पादित की जाती है जबकि संचयित भंडारों से वह निष्कासित  की जाती है ॥

एक गृहस्थी की पूंजी उसका स्वर्ण है । घर यदि मुद्रा के साधन  से चलता हो तो उस गृहस्थी को सुगमता पूर्वक संचालित करने के लिए या तो धन का उत्पादन करो अन्यथा स्वर्ण को मुद्रा में परिवर्तित करो ॥ क्या अच्छा है श्रमपूर्वक उत्पादन करना या विश्राम पूर्वक एफ़ डी तुड़वाना ॥

यदि हम एफ डी तुड़वाते हैं तब हमारी चौथी पीढ़ी ऊर्जा संकट से घिरी होगी ॥ विकसित दशों की तीसरी पीढ़ी.....धातु एवं पत्र मुद्रा कदाचित संग्रहालयों में ही देखने को मिलेगी, क्योंकि उसका स्थान अंक मुद्रा ले चुकी होगी.....इसीलिए सड़े हुवे डॉलर/पौंड आदि आदि के बदले कच्चा माल मत दो, माल लो-माल दो.....मल मत लो

अर्थात यदि परिस्थितियां  प्रतिकूल रही तब भविष्य में वस्तु विनिमय प्रणाली पुनश्च लागु होना..... भी  संभवनीय है ॥

सोइ गहसि सुचारु चरए, जहँ हो धन उत्पाद ।
 तहँ बिगरत खड़ खड़ करे, जहँ रह भोगी वाद ।१८८३।
भावार्थ : --  सुगमता पूर्वक वही गृहस्थी संचालित होती है जहाँ धन का उत्पादन होता है । जहाँ भोग वादी  तथा धन संचय निधि से निष्कासित हो रहा हो वहां खड़ खड़ का ध्वनि होने लगती है ॥

निकासि को उत्पाद कहें, लूट रहे दिनु रात । 
नेता मंत्री देस पति, धूत चरित की जात ।१८८४। 
भावार्थ : - निष्कासन को सकल घरेलु उत्पाद कहते हैं । और दिन रात हमारी सम्पदा को लूट कर महलों में ऐश कर रहे हैं ।  नेता मंत्री हो कि राष्ट के पतिदेव हों ये सभी मक्कारों की जात के होते हैं.....

बीम्मे इनके भविष्य को सुरक्षित करेंगे.....बावली बूझ कहीं के.....

चुनि चुनि के ओढ़ पहिरै, चुनि चुनि के जो खाए । 
 मनीषि मंडलि चयन भए, जाने कहाँ फिकाएँ ।१८८५। 
भावार्थ : -- जो चुन चुन कर ओढ़ते हैं चुन चुन कर पहनते हैं..... ये तो कितना गन्दा है..... ये बहुंत मस्त है और चुन चुन कर खाते हैं.....जैसे छी छी ये अनाज के कण है या मानस का उत्सर्जन है.....जब विचार शील मंडली का चयन होता है तब ऐसे मूर्ख  आठवे समंदर में फैक दिए जाते हैं ॥

कलि सरि माहि डूब मरैं,  कृत करमन प्रत्यास । 
अस  बेद बिमुख कुजन के, सुजन उड़ावैं हास् ।१८८६ । 
भावार्थ : -- पाप परिष्कृत होने की प्रत्याशा में जो कर्म नासा नदी के गोते लेते हैं । ऐसे वेद विमुख दुष्टों की सद्जन  समुदाय सदा हँसी उड़ाते हैं ॥

खल कर सब किछु सौंप दिए, परमारथ के आस । 
सो मूरख आपनि संग, किए औरन के नास ।१८८७। 
भावार्थ : -- दानव दल के हाथों सब कुछ सौंप कर जो उनसे परमार्थ की आस लगा रहे हैं ॥ ऐसे मूर्ख सत्यानासी अपने संग दूसरों का भी नास कर देते हैं ॥

आलू के त भाउ बढे, फल को जाऊ भूर । 
दाखा बात बैरी भए, दरसन सोहीं दूर ।१८८८। 
भावार्थ : -- आलू का तो थोबड़ा ही ऊपर हो गया है, कहता है मैं ही हूँ बस । फलों को तो भूल ही जाओ । द्राक्षा एवं वातवैरी  बोले तो मेवा तो दर्शनातीत हो गए ॥

धरती ने तो दीप दिए, तिलहन ने दिए तेल । 
मूरख भर भर बार सब माटी मैं दिए मेल ।१८८९। 
भावार्थ : -- धरती ने दीपक दिया तिलहनों ने तेल दिया । मूर्खों न भर भर के उसे ऐसे  जलाया कि हमारा जीवन अंधेरों से घिरा है( चौथी पीढ़ी ) । दिन में दीपक जलाना चाहिए.....? रातों में सूर्य उगाना चाहिए कि सो जाना चाहिए.....? 

उदरथि सों अगनी बड़ी, अगनी सों बड़ क्रोध । 
प्रभात सों बड़ा प्रबोध, जोधन सों बड़ जोध ।१८९० ।  
भावार्थ : --  समुद्र से अग्नि बड़ी होती है वाडवाग्नि सारे समुद्र को शोषित करने की क्षमता होती है । अगनी से बड़ा क्रोध होता है, यह तो अखिल विश्व को भस्म कर दे । प्रभात से बड़ा जागरण होता है जब जागो तभी सवेरा और कुशल योद्धा, युद्ध सामग्री से भी बड़ा होता है ॥


सोमवार, 22 सितंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १८७ ॥ -----

कुभाउ कुबानि न छाँड़े, छाँड़े नहीं कुचाह । 
कल सासक फल छाँड़ दिए, अस छाँड़न का लाह ।१८१। 
 भावार्थ : -- विद्वेष भौवों को न छोड़ा बुरी बानि नहीं छोड़ी कुत्सित कामनाओं को नहीं छोड़ा । शासक जी ने कल फल छोड़ दिए बताओ ये भी कोई छोड़ना हुवा ।।  पीणा-खाणा नहीं छोड़ा..... ले बता  फल छोड़ दिए.....परसों मुटियारी छोड़ दी थी.....


स्वारथ परत आपने, नेता चलते चाल । 
यह विकल्पी ब्यवस्था जस मकड़ी का जाल ।१८७२। 
भावार्थ : -- अपने अपने स्वार्थों के परायण होकर नेता-मंत्री कुचालि करते हैं । चुनावी विकल्प उन्हीं के द्वारा बुना गया दुविधाओं का जाल भर है, जिसमें भोले-भाले भले लोग फँस जाते हैं ॥

सिंहासन की दौड़ है, नेता रह अस दौड़ । 
होढ पैहन होड़ा बीच, जैसे लगि हो होड़ ।१८७३। 
भावार्थ : -- सिहासन की दौड़ है, और नेता ऐसे दौड़ रहे हैं जैसे चोर डाकुओं में चोरी डकैती का मॉल हड़पने की होड़ लगी हो ॥

 दान के तो क्या.....ये आपकी भीख के भी योग्य नहीं हैं.....


सिंहासन की दौड़ है, दौड़ सके तो दौड़ । 
सेवा सत साद चारिता, अगहन पाछे छोड़ ।१८७४। 
भावार्थ : -- सिंहासन की दौड़ है दौड़ सके तो दौड़ । आगे होना है.....? तो सेवा सत्य सदाचरण पीछे छोड़ना पड़ेगा ॥

टीका : -- यही कारण है कि ऐसे भ्रष्ट तंत्र को सज्जन एवं सदाचारी दूर से ही नमस्ते करते हैं.....

बधिरु को सब बधिरु लगे, अँधरे को सब अंध । 
मुचित को सब मुचित लगे, बंधे को सब बंध ।१८७५। 
भावार्थ : -- बहरे को सारा संसार बहरा लगता है अंधे का अँधा लगता है । छूटे हुवे को सब छूटे हुवे लगते हैं । जेलवाले को सब अपराधी लगते हैं ॥

धनिक बनिक की जाति कू, सब किछु की है छूट । 
निर्धन जान सधारन कू, सबहि रहे हैं लूट ।१८७६। 
भावार्थ : -- भारत में धनवानों की यद्योगपतियों की नेता- मंत्री की जाति को सब कुछ की छूट हैं सब फ्री है । एक निर्धन जन  साधारण को सब कोई लूट रहे हैं ॥ 

 "एक साधारण निर्धन की बेटी मूलभूत शिक्षा से भी वंचित है । एक असाधारण जाति के धनी बेटे को सब कुछ की छूट है । ये रही भारत की साइनिंग और ये रहा उसका निर्माण.....

सत सत कोटि सोहि अधिक , भए जग जन की भीर ॥ 
तापर भोग बादिता अगजग करे अधीर ।१८७७ । 
भावार्थ : -- विश्व की जनसँख्या सात अरब से  भी अधिक हो गई है ( इसमें से एक तिहाई अंश भारत एवं चीन में है ) उसपर उसकी भोगवादी प्रवृत्ति । यह वैश्विक चिंतन का विषय है ॥ 

एक अरु अरध सति पूरब, अनुहार एक अनुमान । 
ईंधन सोत सों ईंधन,  होई जाहि बिहान  ।१८७८ । 
भावार्थ : -- एक अनुमान के अनुसार लगभग डेढ़ सौ वर्ष पश्चात ऊर्जा के स्त्रोतों से ऊर्जा समाप्त हो जाएगी ॥ 

कदाचित तब गांय चिड़िया घरों में ही देखने को मिलेगी । 

हे रे दुनिआ गोल जब बोले को एहि बोल । 
मूर्खता कह कह हँसी, ह रे दुनिआ गोल ।१८७९ । 
भावार्थ : -- जब किसी ने कहा हे रे ये दुनिया गोल है । तब उसपर मूर्खता यह कहकर हँसी हा हा हा ये दुनिया गोल है ॥ गोल होती तो हम लोग नीचे गिर नहीं जाते ॥  

जुगति संग बड़ी जुगता जुगता सों बड़ जोग । 
जोग सों संजोग बड़े संजोग सों सुजोग ।१८८० । 
भावार्थ : -- युक्ति से बड़ी योग्यता होती है , योग्यता से नियम बड़े होते हैं । नियम से बड़ा संयोग होता है सुअवसर संयोग से बड़ा होता है ॥ 

अर्थात : - युक्तियाँ तो सब कोई भिड़ा लेते है योग्यता दुर्लभ होती है, योग्यता के ऊपर नियम भारी होता है । संयोग हो तो नियम भी हार जाते हैं, कोई अवसर ही न हो  तो संयोग वहां क्या करेगा  ।  




शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १८६ ॥ -----

सिंधु तीरे तीर चले, पाइबु बाकी थाह । 
अवगहत धरातल अबर, पाइबी औरु काह ।१८१ । 
भावार्थ : -- सिंधु के तीर तीर चलने से ही उसकी थाह प्राप्त हो जाती है । गहरे जा के देखिए वहां भी धरातल के अतिरिक्त और कुछ नहीं होगा ॥ 

चिंतन सूक्ति सदबचन, चारि घरी के नाह । 
जब लग जग रहि जीबि जन, तब लग करे निबाह ।१८६२ । 
भावार्थ : -- सूक्तियाँ, सुवचन एवं सद्चिन्तन किंचित काल के लिए नहीं होते । संसार में जब तक जीवन रहेगा ये उसे प्रभावित करती रहेंगी ॥ 

पुत भया इतराई जनि, धरे राम के नाम । 
रावन कहत पुकारिआ, कारे ऐसे काम ।१८६३। 
भावार्थ : -- पुत हुवा.....अच्छी बात है.....माई ने इतरा के भगवान का नाम रख दिया.....भोत अच्छी बात है । पण उसने कुकरम ऐसे किए कि जग में रावण नाम से पुकारा जाने लगा । लोग कहने लगे खसमन खाणी यो सुपूत जना है की भूत.....   

अंतर माहि पाप भरे, बहिर दिखावै प्रेम । 
सोइ सरूप सुरा धरे, गहे कलस जो हेम ।१८६४। 
भावार्थ : -- जिसके अंतर में पाप भरे हों, जो बाहिर से प्रेम प्रदर्शित करे ।  वह अमृत-कलश में भरी हुई सूरा के सदृश्य होकर सुराप्रेमी को ही प्रिय होता है ॥ 

भारत के भंडार मह, भरे रहे सद्भाउ । 
भोग बिलासी भाउ नै, वाके करे अभाउ ।१८६५। 
भावार्थ : -- भारत के भंडार सद्भावों से संपन्न था । भोग विलासिता के कुभावों ने जिन्हें की आयातित माना जाता है आभाव व्युत्पन्न करते हुवे उसे विपन्न कर दिया ॥ 

दर्पन दर्पत कल कहे, मम सोंह नहि सुदीठ । 
सीस फिरा के देख तौ, पहिए आपनि पीठ ।१८६५।  
भावार्थ : -- दर्पण दर्प में भर कर बढे ही गर्व से कहता है , मेरे जैसी सुदृष्टि संसार में नहीं है, मैं किसी की भी छवि गढ़ सकता हूँ  । सिर फेरा के तू पहले अपने पिछवाड़े को तो देख ॥ 

उसे थोड़े ही पता है कि लोग सिंगर के बोले तो मेकअप करके के ही उसके सम्मुख होते हैं.....है ना..... 

उत्तम अन्न  कीट धरे,कहलाए सोइ नीच । 
कमल दल जब नीच तरे, रहे कीच के कीच ।१८६६। 
भावार्थ : -- उत्तम अन्न में यदि कीड़े लग जाए तो वह भी निकृष्ट ही कहलाता है । कीचड़ से उठा कमल दल भी यदि नीचता पर उतर आए तो वह अधम का अधम ही रहता है ॥ 

मानव समाजिक बिनिमय, हो जग हित के पाख । 
सृष्टि सृजन सन करे जो जीव जगत के राख ।१८६७ । 
भावार्थ : - हे मानव ! सामाजिक परिवर्तन यदि हो तो वह सृष्टि एवं उसके सृजन के सह जीव जगत की रक्षा करते हुवे सम्पूर्ण विश्व के कल्याण के लिए ही हो ॥ 

प्रागीतिहास सह रूप  बोल रहा यह बात । 
भारत भुइँ माहि उपजे ये मानस के गात ।१८६८ । 
भवार्थ : -- केवल भारत का पौराणिक इतिहास ही  स्मृति चिन्हों सहित यह अभिकथन करता है कि मानव जाति  का समग्र विकास उसकी पावन भूमि में ही हुवा था ॥ 

महँगाई काटे पेट, तुला रहा गल काट । 
सासन कफन खसोट फिर , लूटे छप्पर खाट ।१८६९ । 
भावार्थ : -- महंगाई पेट काट रही है, डंडी मार तराजू गला काट रहा है । फिर ये  कफ़न खसोट शासन  छप्पर खाट लूट रहा है ॥   

सील भ्रष्ट सासन तंत्र, तापर वाके ठाट । 
मरे जन कू पीस रहे, चाकी के दो पाट ।१८७० । 
भावार्थ : -- फिर शील भ्रष्ट शासन तंत्र  उसपर उसके ठाट-बाट ।  मानो चक्की के दो पाट है जो मरे हुए  जन सामान्य को पीस रहा है ॥ 







बुधवार, 17 सितंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १८५॥ -----

देखो पंचतंत्र करै, कटक सुठि उद्भास । 
जेहि एक बारि घात किए, बाका का बिस्वास ।१८५१। 
भावार्थ : -- पंचतंत्र  को देखो कितने सुन्दर उक्ति कह रहा है : -- नेता हो मंत्री हो दल हो मित्र हो, चाहे कोई भी क्यों न हो : --   जिसने एक  बार भी विश्वासघात किया, फिर उसका कभी विश्वास नहीं करना चाहिए ॥ 

पंचतंत्र ? अब ये कौन सा तंत्र है ? संस्कृत की एक प्रसिद्ध पुस्तक है 

स्वामि कुकर्मी एक बिधि, सेबक तीनि बिधान । 
स्वामि सुकरमी एक निधि, सेबक तीनि निधान ।१८५२। 
भावार्थ : -- स्वामि यदि बुराई करता है तो सेवक तीन करता है, स्वामी एक पाप करता है तो सेवक तीन करता है स्वामी यदि एक रुपया खाता है तो सेवक तीन जी करता है । यदि स्वामी के सद्कर्मों का यदि एक भी कोष होता है, वह कोष सेवक के ही सद्कर्मों के तीन कोष कर देता है ॥ 

हाथ ते अधिक घाउ किए, ताहि गही तलबारि । 
स्वामि के पटतर होत , सेबक कुकरम भारी ।१८५३ । 
भावार्थ : -- हाथ की तलवार हाथ से अधिक चोट करती है । उसी प्रकार स्वामी की तुलना में सेवक के कुकरम अधिक भारी होते हैं ॥ 


सीवाँ एक संकासि दुइ, दोनों रहे निहार । 
एक निहारि बिन प्रतिकार दूज संग प्रतिकार ।१८५४। 
भावार्थ : -- सीमा एक है, निहारने वाले दो हैं । दोनों के निहारने में अंतर यह है कि एक बिना प्रतिकार के निहार रहा है, दूसरे के निहारी पर प्रतिकार का अत्याचार हो रहा है ॥

समरथ हुँत बैपार सों बर बाहन बर भेस । 
रे बहिआ रिन भार सों, तुहरे हुँत उपदेस ।१८५५। 

भावार्थ : - ये आर्थिक नीतियां, देसी विदेशी पॉलिसी, काम धंधा, बढ़िया बढ़िया बाहन, बढ़िया बढ़िया कपडे  ये सब सामर्थ्यवान  के लिए है । रे बहिआ बोले तो बोट देने वाले पागलों तुम्हारे लिए ऋण का भार है.....समझे.....नहीं समझे ? 

 उधारी की फरारी नक़द में बीमारी यही है सरकार की देसी बिदेसी पालिसी 
उधारी ? = तेरी 
फ़रारी ? = उनकी 
बीमारी ? = तेरी 
नक़दी ? = उनकी  

देस माहि सासन  तंतु, न्याय नेम त आहि । 
पर जे सब समरथ हेतु, तुम्हरे हेतु नाहि ।१८५६। 
भावार्थ : -- देश में एक शासन भी है तंत्र भी है न्याय भी नियम-कानून भी है ॥ पर ये सब सामर्थ्यवान हेतु है तुम्हारे लिए नहीं.....समझे..... 

सामर्थ्य कैसे बने? = वो चोरी करे तू डाके डाल वो विप्लव करें तू संसद में आतंक मचा,  वो दलाली करें तू बम फोड़..... 
 अन्यथा ? ..... उपदेश दे.....उन्हें सुनना पड़ेगा 

ऊँचे ऊँचे गढ़ गढ़े, चीतत  ऊंची भीत । 
तापर राउन्हि ऊपर, भयउ काल के जीत ।१८५७। 
भावार्थ : -- ऊंची भित्ति उत्तान के ऊँचे ऊँचे दुर्ग बनाए गए । तिसपर भी राजाओं के ऊपर काल ने विजय प्राप्त की ॥ ये किले सुरक्षा के लिए बने थे न.....क्या लाभ हुवा..... 

मुख हेतु अन कन जल फल उदर हेतु आहार । 
देस बासि नगर लेख  बरे सोइहि बिचार ।१८५८ । 
भावार्थ : -- मुख हेतु जो अन्न है दाल है चावल है जल है फल है, किंतु उदर हेतु ये केवल आहार मात्र हैं । 

 एक राष्ट्र को चाहिए कि वह उदर के विचारों को वरण करते हुवे अपने निवासियों को धर्म वर्ण जाति में  विभक्त न कर उन्हें नागरिक शब्द से संबोधित करे । जन-तंत्र के संचालक को राष्ट्र की विचार धाराओं में ही प्रवाहित होना चाहिए, क्योंकि विपरीत बुद्धि होने पर विनाश अवश्यम्भावी होता है  ॥ 

मुनि मुनीष मूरख मूरि, ग्यान सिंच सिधाए । 
बहरे कू न कान उगे, अँधरे आँखि न आए ।१८५९। 
भावार्थ : -- विचार शील मुनि महात्मा लोग  मूर्खता की मूल को ज्ञान जल से सींच सींच के सिधा गए । पर उस अंधी बहरी के न तो  कान उगे न उसको आँख आई ॥ 

जे जग सबहि मतिन्ह के, आपुनि आपुनि खेह । 
जामें निज हित जानिबे, तामें धरिहै नेह ।१८ ६० । 
भावाथ : - इस संसार में  सबके अपने अपने विचारों के क्षेत्र हुवे। उसने जिसमें अपना हित जाना उसमें ही स्नेह प्रकट किया ॥ 



सोमवार, 15 सितंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १८४॥ -----

रोगी लेइ औषध जब, भिषज् करे गुन गान ।  
रोग पर तब काम करे, देइ कंठदूज अधिज्ञानि जब दान ।१८४१ । 
भावार्थ : --  रोगी तबतक औषधि नहीं लेता जबतक चिकित्सक उस औषधि का गुणगान नहीं करता ( चिकित्सक भी औषधि विशेष का तभी गुणगान करता जब वह रोगों पर प्रभावकारी होती है ) । वह रोगों पर तब तक नियंत्रित नहीं करती जब तक उसे कंठ को प्रदान न कर दिया जाए ॥

किसी भाषा अथवा किसी विशेष कृत्य की विशेषता संज्ञापित करने से ही कोई उस भाषा अथवा उस कृत्य का संज्ञान लेगा । संज्ञान लेकर उसे व्यवहृत करने पर ही उस भाषा अथवा कृत्य की उपयोगिता सिद्ध होगी.....

एक कोत आँग्ल भाषी, दुज हिंदी के जानि ।
दोनों के जो तोल किए,  पैइहु दुज अधिज्ञानि ।१८४२।
भावार्थ : -- एक और आंग्ल भाषी है दूसरी और ओर  हिंदी भाषी है । यदि दोनों के ज्ञान की तूलना  की जाए तो हिंदी भाषी को आप अधिक ज्ञानी पाएंगे ||

यदि एक ही कक्षा के, समान आयु वर्ग  एवं समान अंकधारी दो छात्रों को लिया जाए।  जिसमें एक हिंदी भाषी हो दूसरा केवल अङ्गलभाषी हो दोनों को यदि  एक ही विषय पर निबंध लेखबद्ध करने दिया जाए तब आप पाएंगे कि हिंदी भाषी छात्र  का ज्ञान आँग्लभाषी छात्र की अपेक्षा अधिक विस्तृत है.....कारण  स्पष्ट है, अंग्रेजी की तुलना में हिंदी-भाषा अधिक जिज्ञासित है.....

सेवा धर्म भिरत रहे, सो सेवक सम राउ । 
जो आपनी राउ कहे, सो तो जोग न काउ ।१८४३। 
भावार्थ : -- सेवा धर्म के परायण सेवक स्वामी के स्वरूप ही होता है । जो जन सेवक राजा का वेश धारण करता हो, राजा जैसा जीवन जीता हो राज की नीतियां करता हो वह किसी योग्य नहीं है ॥

तीन देउ रक्छा करे स्वामि सेबक सैन । 
भूरी सों वाकू कोउ, लखे न तिर्छित नैन ।१८४४। 
भावार्थ : -- जिस राष्ट्र की रक्षा स्वामि, सेवक और सैनिक यह तीन देव जिस राष्ट्र की रक्षा करते हैं फिर उसे तिर्यक दृष्टि से देखने का साहस किसी में नहीं होता ॥

यदि ये देव रक्षा नहीं करते तब कभी बाढ़ तो कभी भूकम्प तो कभी सूखा  कभी अड़ोसी कभी पड़ोसी उस देख लेने की धमकी देते हैं.....

रे प्रगत राष्ट्र अधुनत, लेखु प्रगति के अर्थ । 
तेरी परिभाषा, भाबिन हेतु अनर्थ ।१८४५। 
भावार्थ : -- रे प्रगतिशील राष्ट तू अब तो अपनी प्रगति का संज्ञान कर। तेरी गढ़ी हुई प्रगति की परिभाषा भविष्य में अहित की कामना करती है ॥

नाज बिनु भंडार भरे भांड बिनु भंडारि ।  
रसवत भोजन सूचि लहि कस भीख बिनु भिखारि ।१८४६। 
भावार्थ : -- अनाज भी नहीं और भंडार भी भर गया.....वाह ! बर्तन नहीं और रसोइया रख लिया ।  भीख का पता नहीं कितनी मिलेगी कब मिलेगी मिलेगी कि.....? नहीं मिलेगी.....और भिखारी हैं की मेन्यु लिए घूम रहे हैं ॥

एक दूषन का भंडारि,  दूजा वाका कोष । 
ऐसेउ निज सम्मत दए,  रहे दोष को पोष ।१८४७। 
भावार्थ : -- एक दूषण का खजांची है तो दुसरा उसका कोष ही है  । ऐसे दुष्टों को अपनी सम्मति देकर हम दोषों का ही पोषण कर रहे हैं ॥ 

हे जनमानस सँभारौ, पहिले आपनि भीत । 
दूषन दुष्करमन उपर पैइहि तबही जीत ।१८४८ । 
भावार्थ : - हे जनमानस सर्वप्रथम अपने अंतर जगत को व्यवस्थित करना होगा । तभी बुराई पर अच्छाई की विजय होती है, अच्छाई ही नहीं होगी तो बुराई को कौन जीतेगा ?  

 "अंतर जगत व्यवस्थित रहने से ही बाह्य जगत व्यवस्थित रहता है....." 
   ----- ।।  शैक्सपीयर ॥ -----
तुम सोचोगे कि मैं तो खाऊँ, शासन प्रशासन न खाए.....यह उचित नहीं है..... 

दुर्जन के सँग करे जो दुराचरन के अंत । 
जन जन मुख सों कहिलाए, सोई जगत नियंत ।१८४९ । 
भावार्थ : -- दुर्जन के साथ जो दुराचरण का भी अंत करता है चाहे वह सेवक हो अथवा स्वामी जगत भर में वही जगत नियंता कहलाता है ॥ या तो शासक दुराचरण को नियंत्रित करे अथवा जनमानस.....

 शासक जैसा होता है शासन-व्यवस्था भी वैसी ही होती है, फिर शासनी भी वैसे ही हो जाते हैं.....विवशता है, बिना दिए तो कुछ होगा ही नहीं.....बैठो रहो..... 

सुरसरि माहि नहान किए, कलिमल सरित निषेध । 
साधो सिद्धि पावन हुँत, अस लख बीथी बेध ।१८५० ।  
भावार्थ : -- शास्त्रों में गंगा के स्नान की विधि बताई गई और कर्मानाशा नदी को इस हेतु निषेध किया गया है । कारण की गंगा पाप हर लेती है, कर्मनाशा पापों से भर देती है । इस लिए सज्जन पुरुषों को चाहिए कि वह निज  उद्देश्य में सफलता प्राप्ति हेतु लक्ष्य-अलक्ष्य में विभेद रखें ॥ 

मूर्ख कहते हैं अब गंगा नहीं मिलेगी तो नहाएंगे नहीं का.....
तो भैया नल्ली में डुबकी थोड़े ही लगाओगे.....ईमानदार नहीं मिलेगा तो भोट नहीं देंगे का.....       
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             
 ये अनर्थार्थानुबंधी शासक है 

----- मिनिस्टर राजू १३८ -----

 प्रधान मंत्री जी के प्रदेश के कुपोषित बचपन के कुपोषण का कारण स्पष्ट करने के लिए प्रस्तुत चित्र पर्याप्त है..... ऐसे माडल को तो मैडल मिलना चाहिए.....नई..... यदि राजसी वाहनों माने की लक्सरी बसों के स्थान पर गौ पालते तो बचपन कुपोषित नहीं होता.....

राजू : -- मास्टर जी ! उ तो कह रहे हैं गौ पालेगा कौन ?

 " प्रधान मंत्री कौन है ? "

राजू : -- मास्टर जी ! उ

"लक्सरी बस कौन पाल रहा है ? "

राजू : -- मास्टर जी ! उ

" गौ कौन पालेगा ? "

राजू : -- मास्टर जी ! उ 

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १८३॥ -----,

जल चर सों बर नभ चारि, नभ सों बर थल चारि । 
थल चारि मैं स्तन धारि, ताते बर नर नारि ।१८३१ । 
भावार्थ : -- जलचर से उत्तम  नभचर, नभचर से उत्तम  स्थलचर है ।  थलचर में स्तनधारी उत्तम है । स्तनधारियों में मनुष्य उत्तम है सर्वोत्तम नहीं । 

करें न पतन आपन हुँत, करें आप उद्धाप । 
मानस अपुना  मित आप, अरु रिपु आपहि आप ।। 
 ----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता ६ /५॥ -----   
भावार्थ : -- अपने द्वारा अपना उद्धार करें, अपना पतन न करें । क्योंकि ( मनुष्य) आप ही अपना मित्र है, और आप ही अपना शत्रु है ॥ 

कर्म किए बिना कर्म किए कर्महीन किए जाप । 
कर्म निष्ठ के किए काम, बोलें आपहि आप ।१८३२। 
भावार्थ : --  कर्मण्य का काम बोलता है, अकर्मण्य का मुख..... 

बिदुजन बिद्या गुरु ज्ञान, सद्जन दे गए सीख । 
धर्मबान कू दान दैं, मँगतों को दैं भीख ।१८३४। 
भावार्थ : -- विद्वज्जन विद्या दाए  ज्ञानद ने ज्ञान दिया  सद्जन ने दी सीख । की भैया धर्म में निष्ठां  रखने वाले, विषय विमुख वैराग्यपरायण, ज्ञानी, जीवन्मुक्त ब्रह्मलीन सद्पात्र धर्मात्मा को ही दान दें, भिक्षार्थी को भिक्षा दें ॥   

अति परिश्रम पूर्बक जो सद मारग सों आनि । 
बिनु माँगे सो मुकुति दिए, कहत जगत तिन दानि ।१८३५। 
। भावार्थ : -- अतिशय परिश्रम पूर्वक सद्मार्ग से अर्जित की गई उत्तम वस्तु जो किसी सद्पात्र को बिना मांगे दे दे संसार उसे ही उदार-चरित कहता है ॥  

गगन एक धरा पवन एक, एकै अगन जल धूर  । 
बन उपबन परफुरै बरु, बरन बरन के फूर ।१८३६। 
भावार्थ : -- गगन एक है धरा पवन एक है अगनी एक है जल धूरि भी एक ही  है । तथापि वन उपवनों में भांति भांति के पुष्प प्रफुरित हैं ॥

जनम दात बँसानुगत, जनिमन रचे सुभाव । 
तैसी भावै भावना जैसे अंतर भाउ ।१८३७ । 
भावार्थ : -- संतान को उसका मूल स्वभाव यद्यपि उसके वंश द्वारा प्राप्त होता है । तथापि उसके अंतकरण में जैसे भाव व्युत्पन्न होते हैं उसकी भावनाएं वैसी ही होती है ॥ 

जनम दात बँसानुगत, जनिमन रचे सुभाव । 
तैसी भावै भावना जैसे अंतर भाउ ।१८३७ । 
भावार्थ : -- संतान को उसका मूल स्वभाव यद्यपि उसके वंश द्वारा प्राप्त होता है । तथापि उसके अंतकरण में जैसे भाव व्युत्पन्न होते हैं उसकी भावनाएं वैसी ही होती है ॥ 

प्रथम पंक्ति - आनुवंशिक अभियांत्रिकी बोले तो जैनेटिक इंजनियरिंग कहलाती है, दूसरी पंक्ति सामजिक अभियांत्रिकी कहलाती है ॥ 

दानि घर अदानि जनमें, पहरी  के घर चोर। 
अँधियारे घर चन्द्रमा, रयनी के घर भोर ।१८३८। 
भावार्थ : -- दानी के घर अदानी भी जन्म लेता है । प्रहरी के घर चोर भी हो जाते हैं ॥ जैसे अँधेरे घर में चन्द्रमा होता है और रयनी  के घर में भोर होती है ॥ 

तात्पर्य है कि : --  चोरी, दान, मांगना , नेता गिरी,  कवि,  कलाकारी,  यह मूल स्वभाव नहीं है । यह एक सामाजिक प्रभाव है । मनुष्य जैसे वातावरण में रहता है उसकी वृत्तियाँ भी वैसी ही होती जाती हैं ॥ 

बिश्वम्भरा जुगत रही , सकल सुहागि चीन्ह । 
छीन कुल कलन्किन्हि ने मातु कुबेषि कीन्ह ।१८३९ । 
भावार्थ : -- विश्व का भरण पोषण करने वाली जननी स्वरूप यह वसुंधरा समस्त सुहाग चिन्हों से युक्त रही । उसके कुपुत्र ऐसे हुवे की उन्होंने सबकुछ छीनकर उसे कुवेषी कर दिया ॥ 

हबिर गेह गह आहुती, उठे धूम जब केतु । 
होइहि असन औषधी, प्रान बायु के हेतु ।१८४०। 
भावार्थ : -- हविर् गृह में गृहीत आहुति गगन में जब हविर् धूम बनकर उठती है  तब वह रोगित एवं क्षुधित प्राणवायु अर्थात ओजोन के लिए भोजन एवं औषधी का कार्य करती है  ॥

 हमारी पृथ्वी सार्वभौमिक उष्णता का नित नव कीर्तिमान स्थापित कर रही है, प्रास्थितक असंतुलन गहराता जा रहा है जो वैश्विक कुशासन एवं अति भोग वादिता का ही दुष्परिणाम है । शासक वर्ग है कि सत्ता संघर्ष में ही व्यस्त है, ऊर्जा के स्त्रोत से ऊर्जा समाप्त हो रही है  वन समाप्त हो रहे हैं, वन्य-जीवन समाप्त हो रहा है, उद्यम खेतो को खाए जा रहे हैं । ऐसी समाप्ति पर नियंत्रण एवं ऊर्जा के अन्य विकल्पों पर ध्यान केंद्रित करना अब आवश्यक हो गया है.....



मंगलवार, 9 सितंबर 2014

----- मिनिस्टर राजू १३७ -----

राजू ! ये बताओ घूस और घोटाले में क्या अंतर है.. ?

राजू : -- मास्टर जी ! वाही जो सत्ताधारी पार्टी एवं निवर्त्तमान सत्ताधारी पार्टी में है । एक 'मिस एज'  है दूसरी 'मिस सेज' है.....

सोमवार, 8 सितंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १८२॥ -----,

रचे महजीद मूरखा जो अपनी हठ जोग । 
चढ़े ता ऊपर नाच किए, ताते बरसो लोग ।१८२१। 
भावार्थ : -- एक तो वह मूर्ख जिसने एक पूजा स्थली  को तोड़ के दूसरी  बना दी । दूसरे वो महामूर्ख जिन्होंने दूसरी को भी रहने नहीं दिया ॥

नदी नदी इतराइ के बँधे बाँध अरु सेतु । 
बरखा कल दुकाल किए, कृषक अहित के हेतु ।१८२२। 
भावार्थ : -- नदी नदी में  इतरा इतरा के  जो सेतु और बांध बनाये गए  हैं । वह वर्षा में भी अकाल की स्थित उत्पन्न कर रहे हैं ।  यह किसानों का हित नहीं अहित करने के हेतु ही रचे जाते हैं ॥

जब पानी नहीं चाहिए तब ये सर्वत्र पानी पानी कर देते हैं। जब चाहिए तब ये उसे रोक लेते हैं.....ऐसा क्षेत्र के किसानों का कहना है..... यही वह विकास है जो विनाश का कारण बन रहा है.....

लोहा लागए लाकरी, जल मैं देइ डुबाए । 
लाकरी सँग लोह लगे,  पारग रूप धराए ।१८२३। 
भावार्थ : -- लकड़ी  यदि लोहे कीसंगती  करे तो वह पारग से गाहग हो जाती है ।  लोहा यदि लकड़ी  की संगती करेतो  वह गाहग से पारग के स्वरूप हो जाता है ॥

अर्थात : -- दुर्जनों की संगती से सद्जन भी दुर्जन हो जाता है । और सज्जनों की संगती प्राप्त कर दुरजन भी सज्जन हो जाता है ॥

एक  अपना एक आपुना, जगत भले अस दोए । 
जोइ सबकहुँ भला करे, सुहृदय् कहि सब कोए ।१८२४। 
भावार्थ : -- सुबुद्ध जन कह गए हैं : -- संसार में हितवादी दो प्रकार के  होते हैं एक स्वहितवादी
दूसरा स्व सहित स्वजन हितवादी होता है ।  जो तीसरे प्रकार का अर्थात सर्वतस हितवादी होता है जगज्जन उसे ही सौहृदय कहते हैं ॥

संसार में दो प्रकार के सोचक होते हैं एक जो केवल अपना ही सोचे, दूसरे वो जो अपनों का भी सोचे ॥ जो तीसरे प्रकार के सोचक होते हैं अर्थात जो सबका सोचते हैं, वही सौहृदय कहे जाते हैं.....

मिलए बंधाए सो अमृत, गरल सुनिअ मैं आए । 
 घृत अमृत चख जो चाहिए, घर मैं बांधो गाए ।१८२५। 
भावार्थ : -- जो बंधा हुवा अमृत मिल रहा है,सुनने में आया है कि  वह अमृत नहीं विषैला रसायन है । यदि कोई घीव-दुग्ध चख चाहता है तो उसे घर में गांय बांधनी चाहिए,  बंधे हुवे गरल को नहीं ॥

बस्तु कर्मन अधुनातन ऐसो भवन बनाए । 
 लोग लुगाया बँधे  नहिं, बंधे कहाँ सन गाए ।१८२६। 
भावार्थ : -- अाधुनिक काल में वास्तु कार ऐसे भवन बनाते हैं ज  लोग लुगाई को तो ठीक से बांध नहीं पाते गायोँ को कहां से बांधेंगे  ।।

वस्तु की अत्यधिक मांग का कारण परिश्रम की न्यूनता एवं जनमानस की सघनता एवं अधिकता है
 जनमानस की संख्या एवं उसके घनत्व की समस्या के समाधान हेतु  वैश्विक स्तर पर चिंतन आवश्यक हो गया है  । जनसंकुलता का दोषी जहां  शासक वर्ग ही है वहीँ संख्या की अधिकता की दोषी स्वयं जनता है.....

जड़ जीव घाउ करन दिए, सिंग लूम नख दंत । 
ब्यास पीठाधीस के सीस लगायो संत ।१८२७। 
भावार्थ : --  विधाता ने गँवार ढोरों को चोट पहुंचाने हेतु  सिंग,पूँछ , नख और दन्त का साधन किया । इन व्यास  पीठाधीसों के सिर पर संत लगा दिए ॥

नाम बढे सोई करै, छोटे छोटे काम । 
जग हित  काम बड़े करो, राखो ओछा नाम ।१८२८। 
भावार्थ : -- बड़े नाम वाले ही छोटे छोटे काम करते हैं । देखो कोई  जेल में पड़ा है, कोई  भिखमंगा हो गया है कोई  घपले घोटाले में लिप्त होकर ये जी वो जी कर रहा है, जाने कब चला जाए...., जेल  और कहां..... फिर.....? फिर का  इनके अंश पत्र रद्दी के भाव भी नहीं बिकेंगे  | काम बड़े करो संसार के कल्याण के लिए करो, नाम ओछा ही रहे ॥ जैसे : --  'राम' ये भी कोई नाम है जपो तो मरा मरा हो जाता है ॥

अजहुँ स्वजन मरनी पर देवैं उत्तम भोग । 
जैसेउ दसगात किए भूर परे सब लोग । १८२९। 
भावार्थ : -- विचारों का पतन इस प्रकार से हो रहा है कि अब तो स्वजनों के मरनी में भी ऊतम भोग परोसा जा रहा हैं ।   दरी पर बैठके  कई बार यह समझ ही नहीं आता कि यहां रोना है की हंसना है। जैसे ही दसगात्र -विधान पूर्ण हुवा प्रियजन जाने वाले को नमस्ते कह देते हैं ॥ 

त्रेता जुग  बरनन मिले, देउ दनुज नर नारि । 
बैदिक जुग मनु जात के, बरन बिभागे चारि ।१८३० । 
भावार्थ : -- यद्यपि इन योनियों का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण तो नहीं है किन्तु त्रेता युग में मनुष्य योनि के सह देवताओं एवं दानव योनि का भी वर्णन मिलता है । मनुष्य जाति में  वर्ण-व्यवस्था एवं जनसंचालन तंत्र वैदिक काल की ही देन है  । चूँकि भगवान श्रीरामचन्द्र जी क्षत्रिय वर्ण के हैं अत: इससे यह सिद्ध हो जाता है कि रामायण वैदिक युग के पश्चात ही चरितार्थ हुई है। 

द्वापर युग में कदाचित देव योनि विलुप्त हो गई थी । कहीं कहीं पर राक्षस योनि का वर्णन मिलता है । कलयुग में मनुष्य योनि शनै शनें राक्षस योनि में रूपांतरित होती जा रही है ॥ 















  

रविवार, 7 सितंबर 2014

----- मिनिस्टर राजू १३६ -----

 "दोहे चोपाई  ले लो.....तीस रूपए किलो में ले लो..... 

राजू : -- चित्रकूट में तो बीस रूपए में मिल रही है मास्टर जी ! 

 "अयोध्या से काहे नहीं ले लेते उहाँ दसेच रूपए में मिलत है " 

 प्रधान मंत्री ले लो.....सस्ता है,  सस्ता है, सस्ता है..... 

शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

----- मिनिस्टर राजू १३५ -----

राजू : -- मास्टर जी ! आप बाहिर काहे बैठ हैं..?

  " भीतर उ मुल्ला बाँग दे रहा न.....इसीलिए "

राजू : -- मास्टर जी ! हम बड़े दुविधा में हैं बोले तो बहुंत कन्फ्यूज हैं.....आज शिक्षक दिवस है कि शिक्षार्थी दिवस है..?

" राजू ! राजू !! राजू !!! अंगरेजों को पश्चात किसका राज आया.....? पीने-खाने वालों का न.....अब वो पुण्य तिथि को जयंती घोषित करें उनकी मर्जी....."

राजू : -- मास्टर जी ! खाने-पीने में एवं पीने-खाने में क्या अंतर है..?

" कोई पीने-खाने के लिए खाता-पीता है कोई खाने-पीने लिए खाता-पीता है.....है: दोनों ही खराब.....





गुरुवार, 4 सितंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम १८१ ॥ -----,

बर बर भूषन बर बसन, आपुनि देह बसाए । 
तव बानि कहँ संग आनि, सासक कही न पाए ।१८११। 
भावार्थ : -- जिस जन सेवक ने स्वयं ही उत्तम उत्तम आभूषण के सह उत्तम वस्त्र धारण कर रखें हों वह अपने अधीनस्थ से प्रश्न नहीं  कर सकता कि तुम्हारी यह उत्तम वेशभूषा कहाँ से आई है ।

अर्थात : -- जो शासक स्वयं दोषी हो वह अपने अधीनस्थ के दोषों को डंडा नहीं दिखाता । जब अधीनस्थ दोषी है तो वह जनता के दोषों को डंडा कैसे दिखाएगा.....

कर किए जब मन के काज, अरु मन किए किछु नाहि । 
छाँडत निज गुन बचन तब, धरे सुबारथ बाहि ।१८१२। 
भावार्थ : -- जब कर अपने मन का काज  करने  लगे  तब मन कर का काज करने लगता है   अर्थात वह कुछ नहीं करता ॥ ऐसी स्थिति से वचन अपने स्वाभाविक गुणों ( मधुरता, सत्यता, हितवादिता) का परित्याग कर स्वार्थ के वशीभूत हो जाता है ॥

कुनै सँग किए कुचालि सो सासक रूप  खजूरि । 
जन संचालन तंत्र पथ, कंकड़ अरि भरि भूरि ।१८१३। 
भावार्थ : -- जो शासक कुनीतियों का सह प्राप्त कर कुचालि  करता हो वह खजूर के स्वरूप होकर जन संचालन तंत्र के मार्ग को कंकड़ों एवं कंटकों से भर देता है ॥

बोधकर बोधन कर मुए, खल किंचित न प्रबोधि । 
खलुहीन खर्र खर्र किए, सपनेहु खलइ सोधि । १८१४। 

भावार्थ : - जगानेवाले जगा जगा के सिधा गए, ज्ञानद ज्ञान दे  दे के सिधा गए । पर दुष्टों को किंचित भीं बुद्धि नहीं आई ।  ये निपट अजिज्ञासी खर्रखर्र- कर सपने में भी दुष्टता पर ही पीएचडी करते रहे ॥ 

सद गुरु बाहि ग्यान घन, सिस सुबरन अनुहार । 
हरिहरि बाहित देइ भव, भूषन रूप सँवार ।१८१५। 
भावार्थ : -- जब सद्गुरु कारु के स्वरूप होता है ज्ञान हथौड़ी स्वरूप होता है तब सद शिष्य स्वर्ण के स्वरूप हो जाता है । हलकी हलकी चोट उसे भवभूषण के रूप में संवार देती है अर्थात योग्य बना देती है ॥ 

यह मह माया यह मोह, चितबन् बहुतहि भाए । 
करतार अकरषन न किए, ऐसे जग को नाए ।१८१६। 
भावार्थ : -- सुबुद्ध जन कह गए हैं : -- ये महा माया ( दैवीय) और उसका मोह चित्त को अतिशय प्रिय लगता है । संसार में ऐसा कोई भी नहीं है जो इस सष्टि के कृतकर्ता से आकर्षित न हुवा हो अर्थात इस संसार में रहना सभी को प्रिय है ॥ 

मन लगाई तन जोगन, बिषयन भोगन माहि । 
एही जगत वाके जनम  , अर्थ रखे किछु नाहि ।१८१७ । 
भावार्थ : - जिसका चित्त को काया  के रखरखाव एवं विषय-भोग में अनुरक्त हो । उसमें और जीव जंतुओं में कोई भेद नहीं है । इस संसार में उसने व्यर्थ ही जन्म लिया है ॥ 

सागर पारगमन चहे , चहिए तरनि तिन ताहि । 
जो को डूब मरन चहे, चहिए बहुरि किछु नाहि ।१७१८। 
भावार्थ : -- यदि ( भव ) सागर पारगमन करना छाते हो तो उसको नाव,सेतु आदि  की आवश्यकता होगी । याद कोई डूब मरना चाहता है फिर उसे किसी की भी आवश्यकता नहीं होती..... तैरने की भी नहीं ||    

मुक्ता बनने के लिए मुक्ति आवश्यक है मीन बनने के लिए उन्मुक्ति बहुंत है । मुक्ता को कोई खाता है तो उसे दुखता नहीं है  ॥
मीन बनने से क्या होगा ? होगा क्या तुम किसी को खाना  कोई तुमको खाएगा.....

कृपा सिंधु ने दास कू, दायो ऊंचो काम । 
अजहुँ यह मन दिवस रयन लिखे राम के नाम ।१८१९। 
भावार्थ : -- कृपा के सागर ने अपने सेवक को बड़ा ऊंचा काम दिया है । अब तो यह मन दिनरात भगवान का ही नाम लिख रहा है ॥

अजोधा भुइ पावन किए, लिए रघुबर अवतार । 
खेल दुर्जन दानौ दलन, करन जगत उद्धार ।१८२०। 
भावार्थ : -- भगवान श्रीराम चन्द्र ने दुष्टों का दलन कर जगत का उद्धार करने हेतु अयोध्या की भूमि में अवतरित होकर उसे पावन कर दिया ॥



----- ॥ दोहा-दशम १८०॥ -----


निज निज जाति धरम निष्ठ, के मुख साधे मौन । 
बितथ मरजाद बिप्लबी, पूछ रहे तू कौन ।१८०१ । 
भावार्थ : -- स्वजाति एवं स्वधर्म निष्ठ के मुख तो मौन साधे  हैं । जो गिरगिट के जैसे धर्म जाति बदलते हैं जो विप्लववादी हिंसक हैं वो उनसे पूछते हैं : -- तू है कौन ?..... 

पहले ये बता तू कौन है ?  कहाँ से आया है ?  

"न खग मृग न मानस काया, आधी धूप आधी छाया " 

लेनहार को बस्तु रुचे, देनहार को दान । 
हिय न आदर भाव भरे, दोउ अरुचि मन आन ।१८०२ । 
भावार्थ : -  ग्रहिता को वस्तु प्रिय होती है दाता को देन प्रिय होता है  । ग्रहिता को वस्तु के प्रति आदरभाव नहीं हो तो दाता की  दान के प्रति अरुचि उत्पन्न हो जाती है । यदि दाता देने में आदरभाव नहीं बरतता तब ग्रहिता की वस्तु के प्रति अरुचि उत्पन्न हो जाती है ॥ 

निज सम्मत ए देस काल, गै जो को के साथ । 
ओढ़ पहन बिमान फिरै बहुरि लगे ना हाथ ।१८०३। 
भावार्थ : -- देश काल एवं इन परिस्थितियों में यदि अपनी सम्मति एक बार किसी के साथ चली गई । फिर तो उसे भूल ही जाओ काहे की वह लौट के आने वाली नहीं । ओड पहन के बिमान में जो फिरती है ॥   

कैसे खटिआ तोड़ ये, देखो देस प्रधान । 
खाए भी अरु खरचै भी, पहन पंच परिधान ।१८०४ । 
भावार्थ : -- देखो इन राष्ट्राध्यक्षों को कैसे खटिया तोड़ हैं । खाते भी हैं, खरचते भी हैं, पहनते भी हैं, उड़ते भी हैं  ॥ तू बस खेत बेचियो ओर ऊपर देख देख के पिलेन-पिलेन चिल्लाते रहियो ।। 

टिप्पणी : - ये शिखर वार्त्ताएं  द्वी पक्षीय हो अथवा बहु पक्षीय केवल फैशन-शो  के अतिरिक्त कुछ नहीं होती। इसमें अपने प्रधान क्या पहनेगे, क्या खाएंगे, कैसे जाएंगे, कहाँ जाएंगे, की ही वार्त्ता होती है । क्या करेंगे ? वह पता नहीं होता । वैसे भी ये जितना करते हैं उससे कई गुना तो  दो देश के बाबू लोग कम्पूटर में कर लेते हैं । 

पत्राली को काचक किए, मलिन्दु दिए मलिनाए । 
साहित्य के अस दर्पन, समाज छबि दरसाए ।१८०५। 
पत्रावली को कांच कर उसमें मलिन्दु मल दिया  । साहित्य  के ऐसे दर्पण में समाज अपनी  छवि दर्शाने लगा

" साहित्य ही समाज का दर्पण है....."

सदकरम सत्यवदन सद चारित के सिंगार । 
सदगुन सील सदाचरन, कंगन कंकनि हार।१८०६। 
भावार्थ : -- सत्कृत् सत्यंवदन, सच्चरित्र  के श्रंगार प्रसाधन हैं। सद्गुण शील एवं सदाचरण उसके आभूषण हैं ॥

साजन बुद्धिभवन लगे लोभ लब्ध की लाग । 
त्रयलोक के संपत सहुँ, बुझे नहीं सो आग ।१८०७। 
भावाथ : -- हे सज्जनों ! यदि बुद्धि के भवन में लोभ लब्धि की लाग लग जाए तब वह आग तीन लोक की सम्पदा से भी नहीं बुझती ।।


जहँ ब्ययिन ब्यसन बसे, तहँ धन रहे दुराए । 
जब निर्धनता सन बसे, दरसन मैं नहि आए ।१८०८।  
भावार्थ : -- जहां अपव्ययता एवं व्यसन बसते हैं वहां से धन दूर होता जाता है । यदि निर्धनता भी संग आ बसे तब तो वह दर्शनातीत हो जाता है ॥ 

"जहां व्यसन होता है, वहां धन नहीं होता....." 

ऊँचे त्रान बान भरे  , उरत फिरै बैमान  । 
कंकरी अरि पंथ घात, सोइ चरन  का जान ।१८०९। 
भावार्थ : -- वे चरण  कंटक एवं ककड़ भरे पंथ के आघात को क्या जाने जो महँगे -महँगे त्राण एवं महंगी महँगी वेश भूषा भरे  विमानों में उड़ते फिरते हैं ॥   

बिना खाए-पिए यहां एक ठो जींस और बूसट नहीं आ रही है.....ई प्रधान मंत्री एक दिन में तीन तीन चार चार भव्य पोशाकें कहाँ से पहन लेते हैं.....? 

आरम्भ में दीप बरे, सब जन बहुंत  सुहाए । 
सार खात जो किए बमन , सकल भवन कलुखाए ।१८१० । 
भावार्थ : -- जगमग करता दीपक प्रारम्भ में सबको बहुंत भाता है ।  बुझते समय जब वह तेल खा के उल्टी करता है उस उल्टी से सारा घर कलुषित हो जाता है ॥ 



----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...