बानि बान मुख लौह किए ऐसे सान सँवार ।
एक सूल बन घाव करे, दूज करे उपचार ।१७४१ ।
भावार्थ : -- वाणी हो कि वाण हो उसके मुख को लोहा किए सान पर ऐसे सँवारना चाहिए कि वह दुर्जनों का निरादर करे एवं सज्जनों का आदर करे ॥
कबहु आपन बनिक कहे कबहु कहे भूथियार ।
राजासन राजा बसन, राजा के सिंगार ।१७४२।
भावार्थ : -- जिसका राजसी संहासन है राजसी वेश हैं और उसपर राजसी श्रृंगार है । वह कभी स्वयं को चाय विक्रेता कहता है, कभी श्रमिक ॥
करनन परिश्रम हीन किए अरु रसना लिए बहु काम ।
करतल माल अधीन किए, तासु निकर्मन नाम ।१७४३।
भावार्थ : --कान को जिसने परिश्रम से विहीन किया हुवा है और जिह्वा को कोल्हू का बैल बना रखा हो ॥ जो करतल को कर 'माल' के अधीन किये हुवे हो वह व्यक्ति निकम्मा कहलाता है ॥
बारहि बार बिचार कै, ले पुनि मुख को नाम ।
ररत कहे सो मरा है, भजत कहे सो राम ।१७४४।
भावार्थ : -- वारम्वार विचार करने के पश्चात ही कोई बात कहनी चाहिए । रट्टा मारने से राम का मरा हो जाता है, भाव पूर्वक स्मरण करने से 'मरा' का भी 'राम' हो जाता है ॥
मानस आपनि भाग के, आपहि लेखन हार ।
करम खरी कर काल दिए, सोई लिपे लिलार ।१७४५।
भावार्थ : -- मनुष्य अपने भाग्य का आपही लेखक है । उसके कर्म लिखनी है जो समय के हस्तगत है और वही मस्तक को लिपिबद्ध करता है ॥
दूसरे शब्दों में : -- "मनुष्य के कर्म ही उसके भाग्य का निर्धारण करते हैं....."
मत गहन कह रन किए रच सिंहासन बत्तीस ।
जान सेवक निज नाउ दिए, बन बैठे आधीस ।१७४६।
भावाथ : -- जिसे 'स्वतंत्रता संग्राम' कहा जाता है वास्तव में वह 'सत्ता संग्राम' था । मत संग्रह कहकर लड़े-भिड़े, सिंहासन बत्तीस रचा । स्वयं को जन सेवक कहा उसपर स्वामी बनकर बैठ गए ॥
नयनवान समुह जस तम, अँधरे समुह प्रकास ।
अभिमानी के समूह तस, ज्ञान बचन की भास् ।१७४७ ।
भावार्थ : -- जैसे नयनवान को अन्धेरा समझ नहीं आता । अंधे को प्रकाश समझ नहीं आता । वैसे ही अभिमानी व्यक्ति ज्ञान पूरित वचन की भाषा समझ नहीं आती ॥
सूई की चोरितक को कहे चोर रे चोर ।
चोरि किए जल जान आप , करे बिन कोइ सोर ।१७४८ ।
भावार्थ : -- स्वयं बिना शोर किए जलयान की चोरी करते हैं और सुई की छोटी-मोटी चोरी करने वाले को चोर-चोर कहते हैं ॥ वो देखो समंदर के सदरे आइल का चोट्टा ..... कैसे मोबाइल-चोर, मोबाइल-चोर चिल्ला रहा है ॥
बिपन्न हो संपन्न सुख को देइ हँकार ।
साधारन सबते भला, रहे जो सुखाधार ।१७४९ ।
भावार्थ : -- सुख के साधनभूत द्रव्यों से कोई संपन्न हो चाहे विपन्न हो, सुख के अभलाषी दोनों ही हैं । सबसे भला बीच का है, जो स्वर्ग में निवास रत है ॥ तो.....सबसे उत्तम मध्यम वर्ग है.....
चोरी किए छल छंद किए किए ब्याज बिनु लाज ।
ऐसे मुखिआ जोइ किए, निपते सोइ समाज ।१७५०।
भावाथ : -- जो चोरी करता हो, छल-कपट करता हो, धिंग धंधे करता हो, बिना लज्जा के दुराचार करता हो । जो देश/समाज/कुटुंब ऐसे प्रधान को नियुक्त करता है, उसका निपतन अवश्यभावी है ॥
एक सूल बन घाव करे, दूज करे उपचार ।१७४१ ।
भावार्थ : -- वाणी हो कि वाण हो उसके मुख को लोहा किए सान पर ऐसे सँवारना चाहिए कि वह दुर्जनों का निरादर करे एवं सज्जनों का आदर करे ॥
कबहु आपन बनिक कहे कबहु कहे भूथियार ।
राजासन राजा बसन, राजा के सिंगार ।१७४२।
भावार्थ : -- जिसका राजसी संहासन है राजसी वेश हैं और उसपर राजसी श्रृंगार है । वह कभी स्वयं को चाय विक्रेता कहता है, कभी श्रमिक ॥
करनन परिश्रम हीन किए अरु रसना लिए बहु काम ।
करतल माल अधीन किए, तासु निकर्मन नाम ।१७४३।
भावार्थ : --कान को जिसने परिश्रम से विहीन किया हुवा है और जिह्वा को कोल्हू का बैल बना रखा हो ॥ जो करतल को कर 'माल' के अधीन किये हुवे हो वह व्यक्ति निकम्मा कहलाता है ॥
बारहि बार बिचार कै, ले पुनि मुख को नाम ।
ररत कहे सो मरा है, भजत कहे सो राम ।१७४४।
भावार्थ : -- वारम्वार विचार करने के पश्चात ही कोई बात कहनी चाहिए । रट्टा मारने से राम का मरा हो जाता है, भाव पूर्वक स्मरण करने से 'मरा' का भी 'राम' हो जाता है ॥
मानस आपनि भाग के, आपहि लेखन हार ।
करम खरी कर काल दिए, सोई लिपे लिलार ।१७४५।
भावार्थ : -- मनुष्य अपने भाग्य का आपही लेखक है । उसके कर्म लिखनी है जो समय के हस्तगत है और वही मस्तक को लिपिबद्ध करता है ॥
दूसरे शब्दों में : -- "मनुष्य के कर्म ही उसके भाग्य का निर्धारण करते हैं....."
मत गहन कह रन किए रच सिंहासन बत्तीस ।
जान सेवक निज नाउ दिए, बन बैठे आधीस ।१७४६।
भावाथ : -- जिसे 'स्वतंत्रता संग्राम' कहा जाता है वास्तव में वह 'सत्ता संग्राम' था । मत संग्रह कहकर लड़े-भिड़े, सिंहासन बत्तीस रचा । स्वयं को जन सेवक कहा उसपर स्वामी बनकर बैठ गए ॥
नयनवान समुह जस तम, अँधरे समुह प्रकास ।
अभिमानी के समूह तस, ज्ञान बचन की भास् ।१७४७ ।
भावार्थ : -- जैसे नयनवान को अन्धेरा समझ नहीं आता । अंधे को प्रकाश समझ नहीं आता । वैसे ही अभिमानी व्यक्ति ज्ञान पूरित वचन की भाषा समझ नहीं आती ॥
सूई की चोरितक को कहे चोर रे चोर ।
चोरि किए जल जान आप , करे बिन कोइ सोर ।१७४८ ।
भावार्थ : -- स्वयं बिना शोर किए जलयान की चोरी करते हैं और सुई की छोटी-मोटी चोरी करने वाले को चोर-चोर कहते हैं ॥ वो देखो समंदर के सदरे आइल का चोट्टा ..... कैसे मोबाइल-चोर, मोबाइल-चोर चिल्ला रहा है ॥
बिपन्न हो संपन्न सुख को देइ हँकार ।
साधारन सबते भला, रहे जो सुखाधार ।१७४९ ।
भावार्थ : -- सुख के साधनभूत द्रव्यों से कोई संपन्न हो चाहे विपन्न हो, सुख के अभलाषी दोनों ही हैं । सबसे भला बीच का है, जो स्वर्ग में निवास रत है ॥ तो.....सबसे उत्तम मध्यम वर्ग है.....
चोरी किए छल छंद किए किए ब्याज बिनु लाज ।
ऐसे मुखिआ जोइ किए, निपते सोइ समाज ।१७५०।
भावाथ : -- जो चोरी करता हो, छल-कपट करता हो, धिंग धंधे करता हो, बिना लज्जा के दुराचार करता हो । जो देश/समाज/कुटुंब ऐसे प्रधान को नियुक्त करता है, उसका निपतन अवश्यभावी है ॥
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