पुत भया घर नाउ धरे, माई मोहन लाल ।
कुकृत ने नाउ संग किए, कुल कज्जल सम काल ।१७३१।
भावार्थ : -- घर में पुत्र हो गया चलो अच्छी बात है, माई ने नाम मोहन लाल रखा । किन्तु ये क्या उसके कुकृत्यों नाम को गंदा किया ही कुल और धर्म को भी काजल के जैसे कलुषित कर दिया ॥
बहु समुझाए समझे नहि ग्यान की जो बात ।
ऐसे दुइ रेतस हुँत बने, भाखा के दुइ लात ।१७३२ ।
भावार्थ : -- बहुंत समझाने पर भी जो ज्ञान की वाणी को नहीं समझते । ऐसे गधे,खच्चरों के लिए फिर भाषा की दुलत्ती बनी ॥
मुकुति को ही हेत करे, परिहरे सबहि सीप ।
ग्यान रहित भाखा जस, बिना जोति के दीप ।१७३३।
भावार्थ : -- मुक्ता से ही प्रीत होती है, सीप को सभी त्याग देते हैं । ज्ञान रहित व्यक्ति की भाषा ऐसे है जैसे ज्योत रहित दीप ॥
टिप्पणी : -- अभी अमरीक्की रक्षा मंत्री आएगा न उससे पूछना : -- वार्त्तालाप करने में तुम्हें कौन रुचिकर लगता है ज्ञानी या आङ्गलभाषी में .....?
जाति जुगति भाख कि ज्ञान, तामें कौन प्रबेक ।
अवगुन छाँडत गुन गहे, सोई हंस बिबेक ।१७३४।
भावार्थ : -- जाति श्रेष्ठ है कि योग्यता ? भाषा श्रेष्ठ है कि ज्ञान । जो अवगुणों को छोड़ कर गुण ग्रहण करे वही हंस विवेक है ॥
टिप्पणी : -- जाति के संग आप वैश्विक ज्ञान से स्पर्धा कैसे करेंगे । ज्ञान रहित अंग्रेज किस काम का । कोई भी तंत्र हो वह कौशल एवं योग्यता से चलता है ज्ञान से चलता है जाति एवं अंग्रेजी से नहीं चलता, चलता तो अंग्रेज क्या किसी से कम थे.....? कितनी अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं, क्यूँ भगाया.....उत्तर दे भारत शासन....
अधम उत्तम जीवन की, सैली एकै समान ।
एक अति दिन दारिद है, एक अतिसय धनवान ।१७३६।
भावार्थ : -- ध्यान से देखिए तो आर्थिक आधार पर अधम एवं उत्तम वर्ग की जीवन शैली एक समान है । इनमें अंतर केवल यही है कि एक अत्यधिक निर्धन एवं अभावो से भरा तो दुसरा अत्यधिक धनवान है ॥
समानता यह है कि दोनों को भक्ष अभक्ष का ज्ञान नहीं है । अधम इस हेतु नग्न है कि उसके पास वस्त्र नहीं है धनवान के पास बुद्धि नहीं है । एक, दो, तीन ब्याह किए फिर भी लुगाई नहीं..... अरे अपने शषि जी और वो भूथियार पलटू..... मार के गढ़िया दिया था तीसरी को .….दोनों ही पहले दिन पकड़ाते हैं दूसरे दिन छूट जाते हैं । क्वारें घूमे तो लोग बोलने लगते हैं अब तो ब्याह कर ले ? , और कितने ब्याह करेगा ये ? और भी बहुंत कुछ..... बोलते हैं.....
भगति भाउ चितवन भए, अजहुँ समउ धनहीन ।
ज्ञान बचन कानन परे, होहिहि सोई पीन ।१७३५।
भावार्थ : -- विद्यमान समय के निर्धन का चित्त भक्ति के भाव से युक्त एवं दानी हो चला है। यदि इस वर्ग के कानों तक ज्ञान की दो बातें पहुंचे तब यह वर्ग परिपुष्ट हो सकता है ।।
चितवन भगति भाउ हरे, अजहुँ समउ धनवान ।
धरम अधरम ग्यान बिनु, रहे आपनी मान ।१७३६ ।
भावार्थ : -- विद्यमान समय का आर्थिक वर्गीकरण पर आधारित श्रेष्ठि वर्ग के चित्त में भक्ति का भाव शनै: शनै: विलुप्त हो चला है, जो दूरदर्शन पर दिखावे वाला भाव में परिणित हो गया है ये एक पैसे दान के बदले दस लाख चाहते हैं । िनहन धर्म-अधरम, कर्त्तव्य -अकर्त्तव्य, भक्ष्य -अभक्ष्य आदि के ज्ञान से रहित होकर ये अपने ही अहंकार में रहते हैं ॥ नको सुबचन, भगवद् आदि कथा सुनाना भैंस के आगे बीन बजाना जैसा है.....
दान मान सम्मान के, भरे रहे जहँ पात ।
तेरा दिया रे मूरख, तहँ बिरथा ही जात ।१७३७ ।
भावार्थ : -- जहाँ दान के मान-सम्मान के पात्र भरे हों । रे मूर्ख फिर वहां तेरा दिया व्यर्थ ही जाता है ॥
करन रखे श्रबितबय नहि, आँख रखे नहि आँख ।
बदन रखे बदितबय नहि, उरै रखे बिनु पाँख ।१७३८ ।
भावार्थ : -- आर्थिक वर्गीकरण पर आधारित स्वर्णों ने कान तो लगा रखे हैं पर वे श्रवितव्य नहीं हैं आँख हैं पर वह द्रष्टव्य नहीं है । वदन है तो वह वदितव्य नहीं हैं पंख तो है ही नहीं फिर भी ये उड्डितव्य हैँ ॥
प्रधान मंत्री को देखो ऐसा लगता है जब देखो उड़ते ही रहते हैं ये सेवन रेस कोर्स है की कबूतर का घोसला । कबूतर की हिंदी तो देखो लक्ष्यवेधी को 'लक्ष्यावधि' कहते हैं,खाने-पीने' के बाद ऐसा ही होता है । हे भगवान ! अबकी बार लाल कीले की लाज रख लेना.....
भँवर भँवर रे चाकरी, बधी रही कर संग ।
तेरी डोरी धारि कै, उरि फिरि गगन पतंग ।१७३९।
भावार्थ : -- रे चाकरी तू घन चक्कर होकर चाकर संग हाथ बांधे खडी रही । तेरी डोरी धार के देख ये पतंग उड़ती फिर रही है ।
भँवर भँवर रे चाकरी, बधी रही कर संग ।
तेरी डोरी धारि कै, उरि फिरि गगन पतंग ।१७३९।
भावार्थ : -- रे चाकरी तू घन चक्कर होकर हाथ बांधे खडी रही । तेरी डोरी धार के देख ये पतंग उड़ती फिर रही है ।
सद्गुन सील सूत्र संग, ऐसो साख सँजोए ।
चाहे केतक छींट दे, दाग लगे ना कोए ।१७८०।
सूत्र शाख = शरीर
भावार्थ : -- सद्गुणों, सद्व्यवहार, एवं नैतिक आचरण के सूत्रों से शरीर को इस प्रकार सजा लें । कि कोई कितना भी छींटाकसी करे तो उसपर कलंक न लगे ॥
कुकृत ने नाउ संग किए, कुल कज्जल सम काल ।१७३१।
भावार्थ : -- घर में पुत्र हो गया चलो अच्छी बात है, माई ने नाम मोहन लाल रखा । किन्तु ये क्या उसके कुकृत्यों नाम को गंदा किया ही कुल और धर्म को भी काजल के जैसे कलुषित कर दिया ॥
बहु समुझाए समझे नहि ग्यान की जो बात ।
ऐसे दुइ रेतस हुँत बने, भाखा के दुइ लात ।१७३२ ।
भावार्थ : -- बहुंत समझाने पर भी जो ज्ञान की वाणी को नहीं समझते । ऐसे गधे,खच्चरों के लिए फिर भाषा की दुलत्ती बनी ॥
मुकुति को ही हेत करे, परिहरे सबहि सीप ।
ग्यान रहित भाखा जस, बिना जोति के दीप ।१७३३।
भावार्थ : -- मुक्ता से ही प्रीत होती है, सीप को सभी त्याग देते हैं । ज्ञान रहित व्यक्ति की भाषा ऐसे है जैसे ज्योत रहित दीप ॥
टिप्पणी : -- अभी अमरीक्की रक्षा मंत्री आएगा न उससे पूछना : -- वार्त्तालाप करने में तुम्हें कौन रुचिकर लगता है ज्ञानी या आङ्गलभाषी में .....?
जाति जुगति भाख कि ज्ञान, तामें कौन प्रबेक ।
अवगुन छाँडत गुन गहे, सोई हंस बिबेक ।१७३४।
भावार्थ : -- जाति श्रेष्ठ है कि योग्यता ? भाषा श्रेष्ठ है कि ज्ञान । जो अवगुणों को छोड़ कर गुण ग्रहण करे वही हंस विवेक है ॥
टिप्पणी : -- जाति के संग आप वैश्विक ज्ञान से स्पर्धा कैसे करेंगे । ज्ञान रहित अंग्रेज किस काम का । कोई भी तंत्र हो वह कौशल एवं योग्यता से चलता है ज्ञान से चलता है जाति एवं अंग्रेजी से नहीं चलता, चलता तो अंग्रेज क्या किसी से कम थे.....? कितनी अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं, क्यूँ भगाया.....उत्तर दे भारत शासन....
अधम उत्तम जीवन की, सैली एकै समान ।
एक अति दिन दारिद है, एक अतिसय धनवान ।१७३६।
भावार्थ : -- ध्यान से देखिए तो आर्थिक आधार पर अधम एवं उत्तम वर्ग की जीवन शैली एक समान है । इनमें अंतर केवल यही है कि एक अत्यधिक निर्धन एवं अभावो से भरा तो दुसरा अत्यधिक धनवान है ॥
समानता यह है कि दोनों को भक्ष अभक्ष का ज्ञान नहीं है । अधम इस हेतु नग्न है कि उसके पास वस्त्र नहीं है धनवान के पास बुद्धि नहीं है । एक, दो, तीन ब्याह किए फिर भी लुगाई नहीं..... अरे अपने शषि जी और वो भूथियार पलटू..... मार के गढ़िया दिया था तीसरी को .….दोनों ही पहले दिन पकड़ाते हैं दूसरे दिन छूट जाते हैं । क्वारें घूमे तो लोग बोलने लगते हैं अब तो ब्याह कर ले ? , और कितने ब्याह करेगा ये ? और भी बहुंत कुछ..... बोलते हैं.....
भगति भाउ चितवन भए, अजहुँ समउ धनहीन ।
ज्ञान बचन कानन परे, होहिहि सोई पीन ।१७३५।
भावार्थ : -- विद्यमान समय के निर्धन का चित्त भक्ति के भाव से युक्त एवं दानी हो चला है। यदि इस वर्ग के कानों तक ज्ञान की दो बातें पहुंचे तब यह वर्ग परिपुष्ट हो सकता है ।।
चितवन भगति भाउ हरे, अजहुँ समउ धनवान ।
धरम अधरम ग्यान बिनु, रहे आपनी मान ।१७३६ ।
भावार्थ : -- विद्यमान समय का आर्थिक वर्गीकरण पर आधारित श्रेष्ठि वर्ग के चित्त में भक्ति का भाव शनै: शनै: विलुप्त हो चला है, जो दूरदर्शन पर दिखावे वाला भाव में परिणित हो गया है ये एक पैसे दान के बदले दस लाख चाहते हैं । िनहन धर्म-अधरम, कर्त्तव्य -अकर्त्तव्य, भक्ष्य -अभक्ष्य आदि के ज्ञान से रहित होकर ये अपने ही अहंकार में रहते हैं ॥ नको सुबचन, भगवद् आदि कथा सुनाना भैंस के आगे बीन बजाना जैसा है.....
दान मान सम्मान के, भरे रहे जहँ पात ।
तेरा दिया रे मूरख, तहँ बिरथा ही जात ।१७३७ ।
भावार्थ : -- जहाँ दान के मान-सम्मान के पात्र भरे हों । रे मूर्ख फिर वहां तेरा दिया व्यर्थ ही जाता है ॥
करन रखे श्रबितबय नहि, आँख रखे नहि आँख ।
बदन रखे बदितबय नहि, उरै रखे बिनु पाँख ।१७३८ ।
भावार्थ : -- आर्थिक वर्गीकरण पर आधारित स्वर्णों ने कान तो लगा रखे हैं पर वे श्रवितव्य नहीं हैं आँख हैं पर वह द्रष्टव्य नहीं है । वदन है तो वह वदितव्य नहीं हैं पंख तो है ही नहीं फिर भी ये उड्डितव्य हैँ ॥
प्रधान मंत्री को देखो ऐसा लगता है जब देखो उड़ते ही रहते हैं ये सेवन रेस कोर्स है की कबूतर का घोसला । कबूतर की हिंदी तो देखो लक्ष्यवेधी को 'लक्ष्यावधि' कहते हैं,खाने-पीने' के बाद ऐसा ही होता है । हे भगवान ! अबकी बार लाल कीले की लाज रख लेना.....
भँवर भँवर रे चाकरी, बधी रही कर संग ।
तेरी डोरी धारि कै, उरि फिरि गगन पतंग ।१७३९।
भावार्थ : -- रे चाकरी तू घन चक्कर होकर चाकर संग हाथ बांधे खडी रही । तेरी डोरी धार के देख ये पतंग उड़ती फिर रही है ।
भँवर भँवर रे चाकरी, बधी रही कर संग ।
तेरी डोरी धारि कै, उरि फिरि गगन पतंग ।१७३९।
भावार्थ : -- रे चाकरी तू घन चक्कर होकर हाथ बांधे खडी रही । तेरी डोरी धार के देख ये पतंग उड़ती फिर रही है ।
सद्गुन सील सूत्र संग, ऐसो साख सँजोए ।
चाहे केतक छींट दे, दाग लगे ना कोए ।१७८०।
सूत्र शाख = शरीर
भावार्थ : -- सद्गुणों, सद्व्यवहार, एवं नैतिक आचरण के सूत्रों से शरीर को इस प्रकार सजा लें । कि कोई कितना भी छींटाकसी करे तो उसपर कलंक न लगे ॥
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