मंगलवार, 5 अगस्त 2014

----- ॥ दोहा-दशम १७२ ॥ -----

तीन गति के मानस की जथानुपूरब बानि । 
लिखि लीक जोग रखे जस, पाहन सिकता पानि ।१७२१ । 
 ----- गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ : -- तीन प्रकार के मनुष्य होते हैं उसकी वाणी भी यथानुरूप होती है । उत्तम मध्यम एवं अधम । उत्तम पुरुष की वाणी पत्थर की लकीर होती है, अर्थात वह कभी परिवर्तित नहीं होाती । मध्यम की वाणी, रेत पर की गई लकीर होती है जो एक तरंग में मीट जाती है अर्थात मध्यम पुरुष केवल कुछ समय तक ही अपने वचन पर अडिग रहता है । अधम पुरुष की वाणी पानी में की गई लकीर होती है जो कहते ही परिवर्तित हो जाती है अर्थात उसे अपनी कहे पर फिरते देर नहीं लगती ॥ 

पातक  पत पानी तजे, तजे लोभ अरु लाह । 
जो कुपंथ सज्जन तजे, कुजन लें ललियाह ।१७२२ । 
 ----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावाथ : -- पापों को त्याग देते है, पद प्रतिष्ठा को त्याग देते लोभ-लाभ को त्याग देते हैं जिस कुमार्ग को सज्जन त्याग देते है कुजाण उसे पाने के लिए ललचाते हैं ॥  

निर्धनी उदर की अगन , निरस करे रसवादि । 
धनवान के जिहा संग , दुर्लभ रहे सुवाद ।१७२३। 
      ----- । विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ  : -- निर्धन के  उदर की अग्नि निरस  को भी सरस कर देती है  ।धनवानों की जिह्वा से स्वाद सदैव दुर्लभ रहता है ॥ 

बृद्धि बल बिक्रम दृढ़ चेत, भाव जतन जो जोइ । 
तिन्हन्हि निज जीवत के, नसवन भय कस होइ।१७२४। 
 ----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : --  जिसमें वृद्धि करने का बल हो, पराक्रम हो, जो दृढ़ निश्चयी हो, जो प्रभावी हो, जो परिश्रमी भी हो । कहो तो उन्हें  फिर अपनी जीविका के नष्ट होने का भय क्योंकर होगा ॥

बर आभूषन बर बसन मह बड़प्पन नाहि । 
जोइ अहइँ पवितात्मन्, सोइ बड़ा कहलाहि ।१७२५ । 
 ----- ॥ मुंशी प्रेमचंद ॥ -----  

भावार्थ : -- " बड़प्पन सूट-बूट और ठाट-बाट में नहीं है,  जिसकी आत्मा पवित्र है वही बड़ा होता है "

अब ये आत्मा कौन है.....? जिसे शस्त्र नहीं काट सकते अग्नि नहीं जला सकती वैगेरह वैगेरह वही है 


बल मत्ता कू चाहिये निर्बल दे छम दान । 
छिमा हितकारि जासु हुँत अर्थानरथ समान ।१७२६। 
 ----- ॥ विदुर ॥ -----
भावार्थ : -- बलशील  को चाहिए कि वह निर्बल को क्षमा दान दे ॥ क्योंकि जिसके लिए अर्थ -अनर्थ समान होंता है  उसके लिए क्षमा कल्याण कारी होती है ॥

बिद्या लवन बल का मन, पावन पुन का पाप । 
मापै धनिमन हरिदैहु, कर धर धन के माप ।१७२७।  
 ----- । जयशंकर प्रसाद ॥ -----
भावार्थ : -- क्या विद्या क्या सुंदरता बल बुद्धि पवित्रता क्या पुण्य क्या पाप । धनवाले हृदय को भी धन के मानदंड से ही मापते हैं ॥

कोट कर संतोख के, आपनि परिगत जोइ ।
बहोरि परिगत कोट कू, भेद सके ना कोइ ।१७२८। 
 ----- ॥ इपिक्टीटस ॥ -----
भावार्थ : -- अपने चारों ओर संतोष का दुर्ग बना लीजिए फिर उस दुर्ग को  कोई ( अभिलाषा  ) भेद नहीं पाएगा ॥

सोचे कारे अरु पाए, जो किछु मानउ जाति । 
सो सब रच्छित मायाबि, पुस्त पीठ बध पाँति ।१७२९ । 
 ----- ॥ क्लाइव ॥ -----
भावार्थ : --  मानव जाति ने जो कुछ किया, सोचा  और पाया है, वह पुसतको के मायावी पृष्ठों में पंक्तिबद्ध होकर सुरक्षित है ॥


जहाँ दीप प्रजुरे तहाँ, होत अवसि उजियार । 
जहाँ सोत फूटे तहाँ, बहत अवसि जलधार ।१७३०। 
 ----- ॥ दान की महिमा से साभार ॥ -----

भावार्थ : -- जहाँ दीपक प्रज्वलित होता है वहां प्रकाश अवश्य ही होता है ॥ जहाँ कोई स्त्रोत प्रस्फुटित होता है वहां से जल  -धार अवश्य ही प्रवाहित होती है ॥ 





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