राम राम मुख ररत के, चढ़े सिहासन तीस ।
कुपंथ गवन कुकरम कर, किए पाछिन की रीस ।१७९१ ।
भावार्थ : -- मुख से राम का नाम रट रट के जाने कितने सिंहासन वाले हो गए । ये कुपंथ पर चलते हैं अन्याय पूर्वक आचरण करते हैं, कुकरम करते हैं क्योंकि ये पीछेवालों का अनुशरण करते हैं ।
अनुशरण किसका होता है..... ? आगे वालों का कि पीछे वालों का.....?
" ज्ञान ही सर्वोपरि है, संविधान नहीं....."
अनुशरण किसका होना चाहिए ..... ? आगे वालों का कि पीछे वालों का.....? यह संविधान है जो हमें सीमित विकल्प देता है.....
न आगे वालों का न पीछे वालों का अनुशरण तो महा पुरुषों का होना चाहिए.....यह ज्ञान है जो असीमित विकल्प देता है.....
समरथ सुमति सो सुकृती, लभ्य लाभ जो लाहि ।
कृपन कर ब्यय करत तिन बरतत जगहित माहि ।१७९२।
भावार्थ : -- वह वाणिज्यिक वास्तविक है, सामर्थ्यवान है, बुद्धिमान है, पुण्यात्मा है, जो उचित लाभ ही अर्जित करता हो । और उस लाभ को कृपणता पूर्वक व्यय करते हुवे जग के हित में बरतता हो ॥
खड्ग पिधान खड्ग बिहिन , तीर बिहिन तूनीर ।
मटुकि धरे कटि का करे, भरे नहीं जब नीर ।१७९३।
भावार्थ : -- खड्ग बिहिन खड्ग पिधान का तीर बिहिन तूणीर का नीर बिहिन मटुकी का करधन करेगी क्या ?
देखो देखो हमरे पास खड्ग पिधान है, खाता दिखाके निर्धनता भागेगी.....? हाँ तो देंगें न खड्ग !!!
तनिक ई बताइये खड्गवा हेतु धन कहाँ से लाएंगे..... पांच सहस्त्र में तो एक चक्कु भी न आए.....
साधुचारी सत्यसील, साधू पद के जोग ।
तिन साधु का बोलिए जो, भोग रहे भाव भोग ।१७९४।
भावार्थ : -- साध्वाचारी एवं सत्यशील ही संत कहलाने योग्य होते है । उन्हें संत क्या कहिए जो असंत है और संसार भर के भोगों को भोग गए अथवा भोग रहे हैं ।
टिप्पणी : - अल्प भोगी महान हो सकता है, महान आत्मा नहीं, महात्मा वही है जो पूर्णत: अभोगी हो ॥ अत: अंधानुकरण कभी नहीं होना चाहिए ॥
बसन बासन छत छादन, बाहिर जगत ढकाए ।
सत्य सील सद आचरन, अंतरतम गुंठाए ।१७९६।
भावार्थ : - वास हो आवास ही छत हो कि आच्छादन हो ये बाह्य जगत को ढंकते हैं । सत्य विचार, सद्व्यवहार, नैतिक आचरण आदि अंतर जगत के ढकाव हैं ॥
मूँगा मुकुति स्याम मनि, बाहिर के सब साज ।
अंतर सज्जा सँभारे, सोइ रतन जल नाज ।१७९७।
भावार्थ : - मूंगा, मुक्ता, नीलम आदि रत्न बाह्य जगत के प्रसाधन हैं । जो अंतर जगत को माने की इंटीरियर को डेकोरेट करते है वह रत्न जल रूपी मोती और अनाज रूपी मूंगा माणिक हैं॥
सुधी बुधी सद सुपंथी, ते हुँत अहैं ग्यान ।
मूरख ग्यान जोग नहि, ते हुँत रचे बिधान ।१७९८।
भावार्थ : -- बुद्ध प्रबुद्ध सन्मार्गी एवं सदाचारी अर्थात समझदार लोगों के लिए ज्ञान है । चूँकि मूर्ख ज्ञान के योग्य नहीं होते अत: उनके लिए ही संविधान रचे जाते हैं ॥
" जिनको यह नहीं पता कि किधर जाना है, उनको पूछा जाता है आगे वालो के पीछे जाओगे कि, पीछे वालों के पीछे.....
पुरुष जात एक पहेली, जासु तिय समाधान ।
मानस एक समस्या है, समाधान भगवान ।१७९९।
भावार्थ : -- महान लोग कह गए हैं : -- यदि पुरुष जात एक पहेली है तो उसका हल केवल स्त्री ही है । मानव जाति यदि एक समस्या है तो उसका समाधान केवल और केवल ईश्वर है ॥
धारना सोइ धारिये, करे जगत कल्यान ।
चाहे केत नबीन हो, चाहे केत पुरान ।१८०० ।
भावार्थ : -- पुरातन हो अथवा अधुनातन, प्राचीन हो अथवा अर्वाचीन; धारणा वाही धरण करनी चाहिए जो विश्व के लिए कल्याण कारी हो ॥
कुपंथ गवन कुकरम कर, किए पाछिन की रीस ।१७९१ ।
भावार्थ : -- मुख से राम का नाम रट रट के जाने कितने सिंहासन वाले हो गए । ये कुपंथ पर चलते हैं अन्याय पूर्वक आचरण करते हैं, कुकरम करते हैं क्योंकि ये पीछेवालों का अनुशरण करते हैं ।
अनुशरण किसका होता है..... ? आगे वालों का कि पीछे वालों का.....?
" ज्ञान ही सर्वोपरि है, संविधान नहीं....."
अनुशरण किसका होना चाहिए ..... ? आगे वालों का कि पीछे वालों का.....? यह संविधान है जो हमें सीमित विकल्प देता है.....
न आगे वालों का न पीछे वालों का अनुशरण तो महा पुरुषों का होना चाहिए.....यह ज्ञान है जो असीमित विकल्प देता है.....
समरथ सुमति सो सुकृती, लभ्य लाभ जो लाहि ।
कृपन कर ब्यय करत तिन बरतत जगहित माहि ।१७९२।
भावार्थ : -- वह वाणिज्यिक वास्तविक है, सामर्थ्यवान है, बुद्धिमान है, पुण्यात्मा है, जो उचित लाभ ही अर्जित करता हो । और उस लाभ को कृपणता पूर्वक व्यय करते हुवे जग के हित में बरतता हो ॥
खड्ग पिधान खड्ग बिहिन , तीर बिहिन तूनीर ।
मटुकि धरे कटि का करे, भरे नहीं जब नीर ।१७९३।
भावार्थ : -- खड्ग बिहिन खड्ग पिधान का तीर बिहिन तूणीर का नीर बिहिन मटुकी का करधन करेगी क्या ?
देखो देखो हमरे पास खड्ग पिधान है, खाता दिखाके निर्धनता भागेगी.....? हाँ तो देंगें न खड्ग !!!
तनिक ई बताइये खड्गवा हेतु धन कहाँ से लाएंगे..... पांच सहस्त्र में तो एक चक्कु भी न आए.....
साधुचारी सत्यसील, साधू पद के जोग ।
तिन साधु का बोलिए जो, भोग रहे भाव भोग ।१७९४।
भावार्थ : -- साध्वाचारी एवं सत्यशील ही संत कहलाने योग्य होते है । उन्हें संत क्या कहिए जो असंत है और संसार भर के भोगों को भोग गए अथवा भोग रहे हैं ।
टिप्पणी : - अल्प भोगी महान हो सकता है, महान आत्मा नहीं, महात्मा वही है जो पूर्णत: अभोगी हो ॥ अत: अंधानुकरण कभी नहीं होना चाहिए ॥
बसन बासन छत छादन, बाहिर जगत ढकाए ।
सत्य सील सद आचरन, अंतरतम गुंठाए ।१७९६।
भावार्थ : - वास हो आवास ही छत हो कि आच्छादन हो ये बाह्य जगत को ढंकते हैं । सत्य विचार, सद्व्यवहार, नैतिक आचरण आदि अंतर जगत के ढकाव हैं ॥
मूँगा मुकुति स्याम मनि, बाहिर के सब साज ।
अंतर सज्जा सँभारे, सोइ रतन जल नाज ।१७९७।
भावार्थ : - मूंगा, मुक्ता, नीलम आदि रत्न बाह्य जगत के प्रसाधन हैं । जो अंतर जगत को माने की इंटीरियर को डेकोरेट करते है वह रत्न जल रूपी मोती और अनाज रूपी मूंगा माणिक हैं॥
सुधी बुधी सद सुपंथी, ते हुँत अहैं ग्यान ।
मूरख ग्यान जोग नहि, ते हुँत रचे बिधान ।१७९८।
भावार्थ : -- बुद्ध प्रबुद्ध सन्मार्गी एवं सदाचारी अर्थात समझदार लोगों के लिए ज्ञान है । चूँकि मूर्ख ज्ञान के योग्य नहीं होते अत: उनके लिए ही संविधान रचे जाते हैं ॥
" जिनको यह नहीं पता कि किधर जाना है, उनको पूछा जाता है आगे वालो के पीछे जाओगे कि, पीछे वालों के पीछे.....
पुरुष जात एक पहेली, जासु तिय समाधान ।
मानस एक समस्या है, समाधान भगवान ।१७९९।
भावार्थ : -- महान लोग कह गए हैं : -- यदि पुरुष जात एक पहेली है तो उसका हल केवल स्त्री ही है । मानव जाति यदि एक समस्या है तो उसका समाधान केवल और केवल ईश्वर है ॥
धारना सोइ धारिये, करे जगत कल्यान ।
चाहे केत नबीन हो, चाहे केत पुरान ।१८०० ।
भावार्थ : -- पुरातन हो अथवा अधुनातन, प्राचीन हो अथवा अर्वाचीन; धारणा वाही धरण करनी चाहिए जो विश्व के लिए कल्याण कारी हो ॥
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