रविवार, 24 अगस्त 2014

----- ॥ दोहा-दशम १७८ ॥ -----

सत्ता सूत्र धारिन को, सत्ता के अस लाह । 
सिँहासन लाहन समुझे साधन पबित बिबाह ।१७८१। 
भावार्थ : -- सत्ता के सूत्र धारियों को सत्ता के लौलुपता ऐसी हो गई हैं कि  सुसंविध समाज की रचना एवंसृष्टि को सुगमता पूर्वक संचालन करने वाले विवाह जैसे पवित्र संस्कार को भी सत्ता प्राप्ति का साधन समझने लगे हैं ॥ 

सत्ता सूत्र धारित अस, होए चारित्रिक हास । 
एहि दसा रहीही त अवसि, होहि  देस के नास ।१७८२। 
भावार्थ : -- सत्ता के सूत्र धारों के चरित्र का ऐसा क्षरण हुवा है कि यदि यही स्थिति रही तो न केवल समाज अपितु समाज का समुच्चय स्वरूप समस्त राष्ट्र का सर्वनाश हो जाएगा ॥ प्रथमतस व्यक्ति तत्पश्चात परिवार फिर  समुदाय से होते हुवे एक राष्ट्र का विघटन हो जाएगा ॥ 

प्रथमतस व्यक्ति : -- एक व्यक्ति कैसे विघटित होगा : -- भारतीय संविधान का कहना है किसी बकरी को गाय यदि बनाना हो तो दोनों का परस्पर संपर्क करा दो । भैया ! फिर जो संतति उपजेगी वह बकरी रहेगी न गाय । अत: बकरी को यदि गाय बनाना हो तो उसमें गाय वाले गुण -धर्म विकसित करो ॥ 


अर्थात हमारा संविधान  केवल स्त्री-पुरुष की भाषा जानता है, सौहार्द की नहीं बोले तो भाईचारे की नहीं.... 


करषत तपत नयन लखे, बरखे न बरखे काल ।  
नृप बने जन सेबक के, भयउ सूर सम चाल  ।१७८४। 
भावार्थ : -- एक वो समय था जब सूर्य समंदर से जल उठाता और पता ही नहीं चलता । अब तो वह ऐसे जल उठाता है कि अगजग जल जल जाता है फिर उसकर ये शंका कि वापस देगा या नहीं....?  खा पी तो नहीं जाएगा ॥ जन सेवक कहकर ये जो राजा बने बैठे है उन का भी चरितर अधुनातन के सूर्य की भाँती हो गया है । ये ऐसे कर उठाते हैं  ऊपर से ऐसे महंगाई बढ़ाते हैं कि बर्फ को भी बुखार आ जाए ॥ फिर पहले तो यह  शंका कि उसका वितरण होगा कि नहीं  दूजी यह शंका उसका सम्यक वितरण होगा की नहीं ॥  

अब कहते हैं 'बुलेट' से बैलेट की जर्नी करेंगे.....पंचर हो गई न.....

बरखा बरख रीत भई, नेह देइ खलिहान ।  
बलिहारी तेहि कन की, किए जग पोष प्रदान ।१७८५। 
भावार्थ ::-  कण कण को अपना  स्नेह देकर वरखा बरस कर सनेह से रिक्त हो गई । उन कणों की जीव-जगत पर भारी कृपा होगी जो उसका पालन -पोषण करेंगे ॥

बितथाभिनिभूसा बितत, हिंस बितथ मर्यादि । 
सासन सूत्र धारिनि दल अहहैं बिप्लव वादि ।१७८६। 

भावार्थ : -- विभाजन पश्चात के  विप्लव  का इतिहास काले अक्षरों में उल्लेखित हैं । जो निवर्त्तमान सत्ता धारी दल द्वारा कारित हुवा । वर्त्तमान सत्ता धारी सहित शेष सभी दल भी उन्हीं  के दिखाए मार्ग का ही अनुशरण कर रहे हैं । यदि यही लोकतंत्र तब जनता को कोई और तंत्र का विकल्प अन्वेषित करना होगा  है । ये सभी दल विप्लव-वादी का संगठन हैं जो आतंक, नक्सल के पश्चात तृतीय श्रेणी का वाद है । खेद है ! कि हमने अपने  राष्ट्र को इन विप्लव-वादियों के अधीन कर रखा है ॥

स्पष्टीकरण : -- विप्लव वाद क्या है ? : -- झूठ बोलने की प्रवृत्ति का प्रसार करना,  समाज में व्याप्त शांति भंग कर अपना स्वार्थ सिद्ध करना, स्वार्थ साधने में हिंसा का भी प्रयोग करना  विप्लव-वाद है  । यह वितथ-मर्याद होता है अर्थात इसका आचरण निश्चित नहीं होता ( गिरगिट के जैसे आचरण करने वाले को वितथ-मर्याद बोलते  हैं).....

समुझाए समझे नहि जब  बारि बारि समुझाए । 
बिपलव बादि चुन चुन के, सिर पर देइ बिठाए । १७८७। 
भावार्थ : -- समझाने पर भी जब नहीं समझे तब बार बार समझाया । बैठा दिए न विप्लव-वादियों को सिर पर ॥ 
                           
चिकनाहट अरु उलट घट, नीर नहीं ठहराए । 
मूढ़ कहँ उपदेस जोग, कहबत माहि कहाए ।१७८८। 
भावार्थ : -- कहावतों में कहा गया है कि : --  चिकनाहट के ऊपर एवं उलटे घड़े पर पानी नहीं ठहरता, क्योंकि वह उसके योग्य नहीं होता, ऐसे ही मूर्ख भी उपदेश के योग्य नहीं होते ॥  

लाग लगाए देख जोख, लाभ हानि अनुमान । 
बिचारत ब्यबहार किए, सोई बनिक सियान ।१७८९। 
भावार्थ : -- जो देखभाल कर लाभ हानि का अनुमान  कर फिर लागत लगाता हो । और सोच-विचार कर व्यवहार करता हो, वह चतुर-बाणिया है ॥  

सुह्रदय निधि के नीति अस, खग मृगहु मित मिताइ  । 
रावण बालि कुनीति कस, बैरि बने निज भाइ ।१७९० । 
भावार्थग : -- सौहर्दय निधान की नीतियां ऐसी थीं कि मनुष्य क्या पशु-पक्षी भी उनके मित्र हो गए । और इनको देखो रावण और बालि की सी नीति वाले इनके तो अपने भाई भी इनके बैरी हो गए ॥ 

 " कोई सिखाए इनको राजनीति.....!!" 




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