गुरुवार, 21 अगस्त 2014

----- ॥ दोहा-दशम १७७ ॥ -----

पल हीन होके पीपल तुलसी उपजे मोरि । 
अजहुँ सङ्कृत अवगुन भए, सदगुन  डाका चोरि ।१७७१। 
भावार्थ : --  पलहीन होकर पीपल एवं तुलसी नालियों में उगने लगे हैं । समय ऐसा अ गया है अब कृतकर्म अवगुण हो गए हैं चोरी डाका सद्गुण हो गए हैं

चोरी- डाका किए बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता, इनके किए बिना न कहीं कोई टिकने देता ॥

पलहीन होके पीपल तुलसी उपजे मोरि । 
पद पद सुरास्पद मिले, मिले पयस पय पोरि ।१७७२। 
भावार्थ : -- पलहीन होकर पीपल एवं तुलसी,  नालियों में उपजने लगे हैं । समय ऐसा ला दिया गया \कि देवालय नहीं अपितु पग-पग पर मदिरा आलय में मिलने लगी और अमृत उसकी सीढ़ियों में ( चरण त्राण के सदृश्य) मिलने लगा है ॥

पलहीन होके पीपल तुलसी उपजे मोरि । 
पद पद सुरास्पद मिले, बरजत किए बरजोरि । १७७३। 
भावार्थ : -- पलहीन होकर पीपल एवं तुलसी,  नालियों में उपजने लगे हैं । समय ऐसा ला दिया गया \कि देवालय नहीं अपितु पग-पग पर मदिरा आलय में मिलने लगी यदि इसका विरोध करो तो यह भ्रष्ट शासन बल का प्रयोग करता है ॥

दोषि के गुन  गान किए गुनोपेत कह दोषि । 
सोए सासन ब्यवस्था, दंड कर्म की पोषि ।१७७४। 


भावार्थ : -- गुणोपेत को दूषित कहकर जो दोषियों का गुणगान करती हो, ऐसी शासन व्यवस्था अपराधों को पोषित करती है । 

 "जहां जघन्य अपराधों को सामान्य घटना की श्रेणी में रखा जाए, फिर वह शासन प्रणाली ही दोष पूर्ण है.…." 

रचिइता रचनाएँ रचे, स्याम मनिसर खाँच । 
काक बकुले हिय भरओ, आए कहौ का आँच ।१७७५। 
भावाथ : -- रचना कार श्याम मणि सर खचित कर  रचनाएँ रचता है । कौवे बकुले जैसे बिना मसलहत के परिंदे उसमें बीट  कर देते हैं, कहो तो उसकी महिमा कहीं घटती है ? नहीं ॥

सेवा ऐसी कीजिये, सेवक हो जो कोइ । 
जासु सेवा सो स्वयं, स्वामि उपकृत होइ ।१७७६। 
भावार्थ : -- सेवक फिर जो कोई भी हो, उसे ऐसी सेवा करनी चाहिए । स्वामि उसे क्या दे  उसकी सुश्रुता से अभिभूत होकर वह स्वयं उसका ऋणी हो जाए ॥

जब लग सुबरन सों रहे, मोल गहे सोहाग । 
वा संग सुबरनहु  गलै, लगे आपनी लाग ।१७७७। 
भावार्थ : -- आभूषण स्वरूप में सुहागा तबतक मूल्यवान  होता है जबतक उसे स्वर्ण का संग प्राप्त  होता है त्याग किये जाने पर उसका कोई मूल्य नहीं होता । यदि  वह अपने ही लगन में रहे अर्थात क्षारद्रव के रूप में रहे तो स्वर्ण को भी गला दे ॥ उसे उसकी वास्तविकता ज्ञात करा दे कि तू स्वर्ण है की विवर्ण है ॥  

जन जन मुख पाहन सोइ, कहिलावै जल जान । 
स्वयं तो बूड़े रहे, पारगमन किए आन ।१७७८। 
भावार्थ : -- लोगों के मुख से वही  पत्थर जलयान कहलाता है  जो स्वयं तो जल में डूबा रहे और दूसरों को पार लगा दे । वो कहाँ का जलजान है जो स्वयं तीर जाए और दूसरे को डूबा दे ॥ 

हिम संग जो प्रगसि अनल, पाहन  पूछिहि कौन । 
हो मधुराई लावनी, पूछिहि जग को लौन ।१७७९। 
भावार्थ : -- यदि हिम से अग्नि प्रकट हो जाए तो पत्थर को कौन पूछेगा । मिष्ठान्न यदि लवण का स्वाद देने लगे तो संसार में लवण को कौन पूछेगा  । 

" तात्पर्य यह है कि  : -- प्रत्येक व्यक्ति,वस्तु अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है" 

का करिहौ का न करिहौं  कहलाइ सोइ  ज्ञान । 
मैं जस कहुँ तसहि करिहौ, कहत तिन्ह सँविधान ।१७८०। 
भावार्थ : -- "क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए  " किससे करना चाहिए किससे नहीं करना चाहिए,  कैसे करना चाहिए एक करना चाहिए की बहुंत सारे करना चाहिए, करना चाहिए कि ? नहीं नहीं  करना चाहे । यह ज्ञान  कहलाता है । मैं जो कहूँ तुम्हे वैसा ही करना चाहिए  इसे संविधान कहते हैं ॥ 







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