पल हीन होके पीपल तुलसी उपजे मोरि ।
अजहुँ सङ्कृत अवगुन भए, सदगुन डाका चोरि ।१७७१।
भावार्थ : -- पलहीन होकर पीपल एवं तुलसी नालियों में उगने लगे हैं । समय ऐसा अ गया है अब कृतकर्म अवगुण हो गए हैं चोरी डाका सद्गुण हो गए हैं
चोरी- डाका किए बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता, इनके किए बिना न कहीं कोई टिकने देता ॥
पलहीन होके पीपल तुलसी उपजे मोरि ।
पद पद सुरास्पद मिले, मिले पयस पय पोरि ।१७७२।
भावार्थ : -- पलहीन होकर पीपल एवं तुलसी, नालियों में उपजने लगे हैं । समय ऐसा ला दिया गया \कि देवालय नहीं अपितु पग-पग पर मदिरा आलय में मिलने लगी और अमृत उसकी सीढ़ियों में ( चरण त्राण के सदृश्य) मिलने लगा है ॥
पलहीन होके पीपल तुलसी उपजे मोरि ।
पद पद सुरास्पद मिले, बरजत किए बरजोरि । १७७३।
भावार्थ : -- पलहीन होकर पीपल एवं तुलसी, नालियों में उपजने लगे हैं । समय ऐसा ला दिया गया \कि देवालय नहीं अपितु पग-पग पर मदिरा आलय में मिलने लगी यदि इसका विरोध करो तो यह भ्रष्ट शासन बल का प्रयोग करता है ॥
दोषि के गुन गान किए गुनोपेत कह दोषि ।
सोए सासन ब्यवस्था, दंड कर्म की पोषि ।१७७४।
भावार्थ : -- गुणोपेत को दूषित कहकर जो दोषियों का गुणगान करती हो, ऐसी शासन व्यवस्था अपराधों को पोषित करती है ।
"जहां जघन्य अपराधों को सामान्य घटना की श्रेणी में रखा जाए, फिर वह शासन प्रणाली ही दोष पूर्ण है.…."
रचिइता रचनाएँ रचे, स्याम मनिसर खाँच ।
काक बकुले हिय भरओ, आए कहौ का आँच ।१७७५।
भावाथ : -- रचना कार श्याम मणि सर खचित कर रचनाएँ रचता है । कौवे बकुले जैसे बिना मसलहत के परिंदे उसमें बीट कर देते हैं, कहो तो उसकी महिमा कहीं घटती है ? नहीं ॥
सेवा ऐसी कीजिये, सेवक हो जो कोइ ।
जासु सेवा सो स्वयं, स्वामि उपकृत होइ ।१७७६।
भावार्थ : -- सेवक फिर जो कोई भी हो, उसे ऐसी सेवा करनी चाहिए । स्वामि उसे क्या दे उसकी सुश्रुता से अभिभूत होकर वह स्वयं उसका ऋणी हो जाए ॥
जब लग सुबरन सों रहे, मोल गहे सोहाग ।
वा संग सुबरनहु गलै, लगे आपनी लाग ।१७७७।
भावार्थ : -- आभूषण स्वरूप में सुहागा तबतक मूल्यवान होता है जबतक उसे स्वर्ण का संग प्राप्त होता है त्याग किये जाने पर उसका कोई मूल्य नहीं होता । यदि वह अपने ही लगन में रहे अर्थात क्षारद्रव के रूप में रहे तो स्वर्ण को भी गला दे ॥ उसे उसकी वास्तविकता ज्ञात करा दे कि तू स्वर्ण है की विवर्ण है ॥
जन जन मुख पाहन सोइ, कहिलावै जल जान ।
स्वयं तो बूड़े रहे, पारगमन किए आन ।१७७८।
भावार्थ : -- लोगों के मुख से वही पत्थर जलयान कहलाता है जो स्वयं तो जल में डूबा रहे और दूसरों को पार लगा दे । वो कहाँ का जलजान है जो स्वयं तीर जाए और दूसरे को डूबा दे ॥
हिम संग जो प्रगसि अनल, पाहन पूछिहि कौन ।
हो मधुराई लावनी, पूछिहि जग को लौन ।१७७९।
भावार्थ : -- यदि हिम से अग्नि प्रकट हो जाए तो पत्थर को कौन पूछेगा । मिष्ठान्न यदि लवण का स्वाद देने लगे तो संसार में लवण को कौन पूछेगा ।
" तात्पर्य यह है कि : -- प्रत्येक व्यक्ति,वस्तु अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है"
का करिहौ का न करिहौं कहलाइ सोइ ज्ञान ।
मैं जस कहुँ तसहि करिहौ, कहत तिन्ह सँविधान ।१७८०।
भावार्थ : -- "क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए " किससे करना चाहिए किससे नहीं करना चाहिए, कैसे करना चाहिए एक करना चाहिए की बहुंत सारे करना चाहिए, करना चाहिए कि ? नहीं नहीं करना चाहे । यह ज्ञान कहलाता है । मैं जो कहूँ तुम्हे वैसा ही करना चाहिए इसे संविधान कहते हैं ॥
अजहुँ सङ्कृत अवगुन भए, सदगुन डाका चोरि ।१७७१।
भावार्थ : -- पलहीन होकर पीपल एवं तुलसी नालियों में उगने लगे हैं । समय ऐसा अ गया है अब कृतकर्म अवगुण हो गए हैं चोरी डाका सद्गुण हो गए हैं
चोरी- डाका किए बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता, इनके किए बिना न कहीं कोई टिकने देता ॥
पलहीन होके पीपल तुलसी उपजे मोरि ।
पद पद सुरास्पद मिले, मिले पयस पय पोरि ।१७७२।
भावार्थ : -- पलहीन होकर पीपल एवं तुलसी, नालियों में उपजने लगे हैं । समय ऐसा ला दिया गया \कि देवालय नहीं अपितु पग-पग पर मदिरा आलय में मिलने लगी और अमृत उसकी सीढ़ियों में ( चरण त्राण के सदृश्य) मिलने लगा है ॥
पलहीन होके पीपल तुलसी उपजे मोरि ।
पद पद सुरास्पद मिले, बरजत किए बरजोरि । १७७३।
भावार्थ : -- पलहीन होकर पीपल एवं तुलसी, नालियों में उपजने लगे हैं । समय ऐसा ला दिया गया \कि देवालय नहीं अपितु पग-पग पर मदिरा आलय में मिलने लगी यदि इसका विरोध करो तो यह भ्रष्ट शासन बल का प्रयोग करता है ॥
दोषि के गुन गान किए गुनोपेत कह दोषि ।
सोए सासन ब्यवस्था, दंड कर्म की पोषि ।१७७४।
भावार्थ : -- गुणोपेत को दूषित कहकर जो दोषियों का गुणगान करती हो, ऐसी शासन व्यवस्था अपराधों को पोषित करती है ।
"जहां जघन्य अपराधों को सामान्य घटना की श्रेणी में रखा जाए, फिर वह शासन प्रणाली ही दोष पूर्ण है.…."
रचिइता रचनाएँ रचे, स्याम मनिसर खाँच ।
काक बकुले हिय भरओ, आए कहौ का आँच ।१७७५।
भावाथ : -- रचना कार श्याम मणि सर खचित कर रचनाएँ रचता है । कौवे बकुले जैसे बिना मसलहत के परिंदे उसमें बीट कर देते हैं, कहो तो उसकी महिमा कहीं घटती है ? नहीं ॥
सेवा ऐसी कीजिये, सेवक हो जो कोइ ।
जासु सेवा सो स्वयं, स्वामि उपकृत होइ ।१७७६।
भावार्थ : -- सेवक फिर जो कोई भी हो, उसे ऐसी सेवा करनी चाहिए । स्वामि उसे क्या दे उसकी सुश्रुता से अभिभूत होकर वह स्वयं उसका ऋणी हो जाए ॥
जब लग सुबरन सों रहे, मोल गहे सोहाग ।
वा संग सुबरनहु गलै, लगे आपनी लाग ।१७७७।
भावार्थ : -- आभूषण स्वरूप में सुहागा तबतक मूल्यवान होता है जबतक उसे स्वर्ण का संग प्राप्त होता है त्याग किये जाने पर उसका कोई मूल्य नहीं होता । यदि वह अपने ही लगन में रहे अर्थात क्षारद्रव के रूप में रहे तो स्वर्ण को भी गला दे ॥ उसे उसकी वास्तविकता ज्ञात करा दे कि तू स्वर्ण है की विवर्ण है ॥
जन जन मुख पाहन सोइ, कहिलावै जल जान ।
स्वयं तो बूड़े रहे, पारगमन किए आन ।१७७८।
भावार्थ : -- लोगों के मुख से वही पत्थर जलयान कहलाता है जो स्वयं तो जल में डूबा रहे और दूसरों को पार लगा दे । वो कहाँ का जलजान है जो स्वयं तीर जाए और दूसरे को डूबा दे ॥
हिम संग जो प्रगसि अनल, पाहन पूछिहि कौन ।
हो मधुराई लावनी, पूछिहि जग को लौन ।१७७९।
भावार्थ : -- यदि हिम से अग्नि प्रकट हो जाए तो पत्थर को कौन पूछेगा । मिष्ठान्न यदि लवण का स्वाद देने लगे तो संसार में लवण को कौन पूछेगा ।
" तात्पर्य यह है कि : -- प्रत्येक व्यक्ति,वस्तु अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है"
का करिहौ का न करिहौं कहलाइ सोइ ज्ञान ।
मैं जस कहुँ तसहि करिहौ, कहत तिन्ह सँविधान ।१७८०।
भावार्थ : -- "क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए " किससे करना चाहिए किससे नहीं करना चाहिए, कैसे करना चाहिए एक करना चाहिए की बहुंत सारे करना चाहिए, करना चाहिए कि ? नहीं नहीं करना चाहे । यह ज्ञान कहलाता है । मैं जो कहूँ तुम्हे वैसा ही करना चाहिए इसे संविधान कहते हैं ॥
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