दूर होत लमाए चरन, सिरु पर सीधौ होए ।
सेबक स्वामि छाए रबि, अंतर अहे न कोए ।१७६१।
भावार्थ : -- सेवक -स्वामी एवं छाया-रवि में कोई अंतर नहीं । रवि एवं स्वामी की दृष्टि से दूर होकर दोनों ही के सेवक-छाया दोनों के चरण लम्बे हो जाते हैं । सिर पर खड़े रहे तभी वह सीधे होते हैं । थोड़ा इधर-उधर हुवे नहीं की दोनों चंपत ।।
जो किए सो सब जिहा किए, किए कर श्रम कछु नाह ।
गगन सीस उपबरन करे, नख छादन की चाह ।१७६२।
भावार्थ : -- जो श्रम किया वो सब जिह्वा करे, बाहुदल कुछ भी नहीं करें । निकम्मे जिह्वा के बल पर गगन को सिर का उपबरण बना कर नक्षत्रों को छादन करने की अभिलाषा करते हैं अर्थात असंभव कार्य करने की चेष्टा करते हैं ॥ असंभव को संभव करने के लिए परिश्रम करना पड़ता है ।
रूपकार एक रूप दिए दीप कहे सब कोइ ।
जबलग जग अलोके नहि, तबलग दीप न होए ।१७६३।
भावार्थ : -- रचनाकार ने एक रचना रची, सभी ने उसे दीपक कहा । जबतक वह संसार को आलोकित नहीं करता, तबतक दीपक नहीं होता॥
जग लग के रस चाख लिए, पाप करम किए लाख ।
सुजन तब का लाह भयो, जब तिन आई आँख ।१७६४।
भावार्थ : -- सभी लौकीक सुखों को उपभोग कर लिया लाखो लाख पाप कर्म कर लिए । हे सज्जनों ! फिर कुछ समझ में आया, अब ऐसी समझ का क्या लाभ ॥
जग लग के रस स्वादन, बिषयन भोगन भाव ।
हो न जोइ छुधा सहिंष्नु, सोइ स्वान सुभाव ।१७६५।
भावार्थ : -- संसार भर के सुखों का रसास्वादन कर विषय-भोग के प्रति आसक्ति एवं क्षुधा की असहिष्णुता, स्वान - स्वभाव को दर्शाता है । स्वयं क्षुधा सहन नहीं होती वह मल भी खा लेता है । स्वाद के लिए मनुष्य को भी खा जाता है ॥
रज रजत जो बुझाए तिस, पूछिहि को मरु पानि ।
असत सन जो कार सधे, पूछिहि को सदबानि ।१७६६।
भावार्थ : -- यदि चमकती हुई रेत प्यास बुझा दे, तो मरुस्थल में पानी को कौन पूछे । यदि असत्य से सब कार्य सिद्ध हो जाते तो सत्य-वचनों को कौन पूछता ॥
खेह खन खेट पसुधन, बन जीवन किए हास ।
अस बृद्धि होतब माहि होत निहोर बिनास ।१७६७।
भावार्थ : -- यदि कोई विकास कृषि-भूमि पशु धन वन्य जीवन का क्षीणता पर आधारित हो तब ऐसा विकास भविष्य में विनास का कारण बनता है ॥
जननी ने सौ पुत जने, गुनोपेत को नाहि ।
जने जनित सो एक बहुँत, जो गुन गाँउ गहाहि ।१७६८।
भावार्थ : -- जननी ने सौ पुत्र जने । किन्तु गुणवंत कोई नहीं है । वह संतान एक ही अतिसय है जो गुणग्राम से युक्त हो ॥
"उत्पादन यदि हो तो गुणवत्ता पूर्ण हो....."
कृषकबंधु रासायनिक तथा गोमय, जैविक आदि नैसर्गिक उर्वरा से उत्पादित उपज के मूल्य में अंतर रखें तो उन्हें अधिक लाभ होगा, वर्त्तमान में यह एक ही मूल्य में उपलब्ध है ॥
कौड़ी कौड़ी जोड़ कै, भयौ अरबी करोड़ि ।
जीअत जी एकहु कौड़ी, जावे नाहि छोड़ि ।१७६९।
भावार्थ : -- कौड़ी कौड़ी जोड़ के, रोडीमल मल अरबी करोड़ी हो गए । जीते जी उनसे एक कौड़ी छोड़ी नहीं जाती । छोड़ भी दें तो पहले चार पकड़ते हैं फिर एक छोड़ते हैं ॥ भैया जहां से उठाई है वहीँ पहुंचा दो अन्यथा मृत्यु जाने कहाँ ले जाएगी ।।
धिंग धरम ध्वज धंधा , जो किए सो सब बाप ।
बाप के आप मुख धरे,कहलावै पुत आप ।१७८०।
भावार्थ : -- बाबूजियों ने धींगाधींगी करने वाले धर्म की झूठी ध्वजा फहराने वाले कपट धंधे किए और चल दिए । सपूत जी बाबूजियों का पानी मुख पर मला और आप आप कहलाने लगे बाप के बिना इन्हें कोई तू तू भी न कहता ॥
इनके धिंग धंधे का क्या कहना ! पहले प्रदूषण कर कर के कमाते हैं प्रदुषण से बीमारी फैलाते हैं और फिर इलाज का धंधा करते हैं भारत में कुछ देखने लायक है तो इनका शिक्षा का धंधा देखने लायक है इसके आगे ताज-फाज भी फीके हैं ॥
सेबक स्वामि छाए रबि, अंतर अहे न कोए ।१७६१।
भावार्थ : -- सेवक -स्वामी एवं छाया-रवि में कोई अंतर नहीं । रवि एवं स्वामी की दृष्टि से दूर होकर दोनों ही के सेवक-छाया दोनों के चरण लम्बे हो जाते हैं । सिर पर खड़े रहे तभी वह सीधे होते हैं । थोड़ा इधर-उधर हुवे नहीं की दोनों चंपत ।।
जो किए सो सब जिहा किए, किए कर श्रम कछु नाह ।
गगन सीस उपबरन करे, नख छादन की चाह ।१७६२।
भावार्थ : -- जो श्रम किया वो सब जिह्वा करे, बाहुदल कुछ भी नहीं करें । निकम्मे जिह्वा के बल पर गगन को सिर का उपबरण बना कर नक्षत्रों को छादन करने की अभिलाषा करते हैं अर्थात असंभव कार्य करने की चेष्टा करते हैं ॥ असंभव को संभव करने के लिए परिश्रम करना पड़ता है ।
रूपकार एक रूप दिए दीप कहे सब कोइ ।
जबलग जग अलोके नहि, तबलग दीप न होए ।१७६३।
भावार्थ : -- रचनाकार ने एक रचना रची, सभी ने उसे दीपक कहा । जबतक वह संसार को आलोकित नहीं करता, तबतक दीपक नहीं होता॥
जग लग के रस चाख लिए, पाप करम किए लाख ।
सुजन तब का लाह भयो, जब तिन आई आँख ।१७६४।
भावार्थ : -- सभी लौकीक सुखों को उपभोग कर लिया लाखो लाख पाप कर्म कर लिए । हे सज्जनों ! फिर कुछ समझ में आया, अब ऐसी समझ का क्या लाभ ॥
जग लग के रस स्वादन, बिषयन भोगन भाव ।
हो न जोइ छुधा सहिंष्नु, सोइ स्वान सुभाव ।१७६५।
भावार्थ : -- संसार भर के सुखों का रसास्वादन कर विषय-भोग के प्रति आसक्ति एवं क्षुधा की असहिष्णुता, स्वान - स्वभाव को दर्शाता है । स्वयं क्षुधा सहन नहीं होती वह मल भी खा लेता है । स्वाद के लिए मनुष्य को भी खा जाता है ॥
रज रजत जो बुझाए तिस, पूछिहि को मरु पानि ।
असत सन जो कार सधे, पूछिहि को सदबानि ।१७६६।
भावार्थ : -- यदि चमकती हुई रेत प्यास बुझा दे, तो मरुस्थल में पानी को कौन पूछे । यदि असत्य से सब कार्य सिद्ध हो जाते तो सत्य-वचनों को कौन पूछता ॥
खेह खन खेट पसुधन, बन जीवन किए हास ।
अस बृद्धि होतब माहि होत निहोर बिनास ।१७६७।
भावार्थ : -- यदि कोई विकास कृषि-भूमि पशु धन वन्य जीवन का क्षीणता पर आधारित हो तब ऐसा विकास भविष्य में विनास का कारण बनता है ॥
जननी ने सौ पुत जने, गुनोपेत को नाहि ।
जने जनित सो एक बहुँत, जो गुन गाँउ गहाहि ।१७६८।
भावार्थ : -- जननी ने सौ पुत्र जने । किन्तु गुणवंत कोई नहीं है । वह संतान एक ही अतिसय है जो गुणग्राम से युक्त हो ॥
"उत्पादन यदि हो तो गुणवत्ता पूर्ण हो....."
कृषकबंधु रासायनिक तथा गोमय, जैविक आदि नैसर्गिक उर्वरा से उत्पादित उपज के मूल्य में अंतर रखें तो उन्हें अधिक लाभ होगा, वर्त्तमान में यह एक ही मूल्य में उपलब्ध है ॥
कौड़ी कौड़ी जोड़ कै, भयौ अरबी करोड़ि ।
जीअत जी एकहु कौड़ी, जावे नाहि छोड़ि ।१७६९।
भावार्थ : -- कौड़ी कौड़ी जोड़ के, रोडीमल मल अरबी करोड़ी हो गए । जीते जी उनसे एक कौड़ी छोड़ी नहीं जाती । छोड़ भी दें तो पहले चार पकड़ते हैं फिर एक छोड़ते हैं ॥ भैया जहां से उठाई है वहीँ पहुंचा दो अन्यथा मृत्यु जाने कहाँ ले जाएगी ।।
धिंग धरम ध्वज धंधा , जो किए सो सब बाप ।
बाप के आप मुख धरे,कहलावै पुत आप ।१७८०।
भावार्थ : -- बाबूजियों ने धींगाधींगी करने वाले धर्म की झूठी ध्वजा फहराने वाले कपट धंधे किए और चल दिए । सपूत जी बाबूजियों का पानी मुख पर मला और आप आप कहलाने लगे बाप के बिना इन्हें कोई तू तू भी न कहता ॥
इनके धिंग धंधे का क्या कहना ! पहले प्रदूषण कर कर के कमाते हैं प्रदुषण से बीमारी फैलाते हैं और फिर इलाज का धंधा करते हैं भारत में कुछ देखने लायक है तो इनका शिक्षा का धंधा देखने लायक है इसके आगे ताज-फाज भी फीके हैं ॥
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