शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

----- ॥ दोहा-दशम १७५ ॥ -----

राम राम जग राम कहि कंठ रसन कस तालु । 
जो कृपनी पर कृपा किए, तासुइ नाउ कृपालु । १७५१। 
भावार्थ : --  राम-राम जगतराम..... कंठ ने रसना कस के तालु से तो कह दिया ॥ किन्तु जो दीन-दुखियों  के ऊपर कृपा करे उसका ही नाम कृपालु ॥

ग्रहन जोग सद्गुन अहैं, ताजन जोग ब्याज । 
करन जोग सदकृत् अहैं, खादन जोग अनाज ।१७५२। 
भावार्थ : -- संसार में ग्रहण करने योग्य यदि कुछ है तो वो सद्गुण हैं, त्याग करने योग्य यदि कुछ है तो वो छल-कपट, धूर्तता, दुष्टता, दुराचरण हैं। करने योग्य यदि कुछ है तो वो सद्कर्म हैं, और खाने योग्य अनाज हैं, मांस- मट्टी थोड़े ही है ॥


राम राम जग राम कहि कंठ रसन कस तालु । 
जो कृपनी पर कृपा किए, तासुइ नाउ कृपालु । १७५३ । 
भावार्थ : --  राम-राम जगतराम..... कंठ ने रसना कस के तालु से तो कह दिया ॥ किन्तु जो दीन-दुखियों  के ऊपर कृपा करे उसका ही नाम कृपालु ॥ 

बाहिर जग को सोच किए, धरे पंच परिधान । 
अंतर जगत सोधित कर जहां बसें भगवान ।१७५४ । 
भावार्थ : --बाह्य जगत की तो शुद्धि कर ली शौच किए स्नान किए फिर पंच परिधान धारण कर लिए  । हे मनुष्य ! जो तेरा अंतर जगत है उसे भी शुद्ध करने का उपाय कर कारण की भगवान का निवास वहीँ है ॥ 

लंका सैन अगन सरिस, राम जी की तृन तूल । 
धर्म हीन  दनुपत सहित, किए कपि नास समूल ।१७५५ । 
भावार्थ : -- रावण की सेना कैसी थी अग्नि  के सदृश्य और राम  की कैसी थी तृण के समतुल्य । तब भी अधर्मी रावण सहित बंदरों ने उसकी सेना को समूल नष्ट कर दिया । जो बल पर बुद्धि की, एवं बुराई पर अच्छाई की
विजय का प्रतीक है ॥ 

पाप करम छाँड़े नहीँ, धावत तीरथ जाएँ । 
एक तो करकट कूर किए, तापर भीड़ बढ़ाए ।१७५६। 
भावार्थ : -- दूषित कर्म को त्यागे बिन दौड़ दौड़ के तीरथ जा रहे हैं । एक तो वहां कूड़ा करकट की ढेरी लगा दी उसपर भीड़ बढ़ा दी ॥ पाप की कमाई दान दे रहे हैं, पहले कुछ त्यागो फिर तीरथ जाओ ॥ 

जेतक ऊँची अम्बारि तेतक ऊंची तान । 
साईँ बैठे धूरि मैं, सेबक ऊँच मचान ।१७५७। 
भावार्थ : -- अम्बारी ( मंडप ) जितनी महंगी होती है  उसकी तान भी उतनी ही ऊंची होती है ॥ स्वामी धूलधक्कड में विराजित है सेबक वर आसन में । ऐसा देखा है कहीं ?

अबसित बसन छुधा असन, थकित नयन किए आस । 
देन भाव जहँ नहीं तहँ, धन साधन के दास ।१७५८। 
भावार्थ : -- वसन एवं असन की प्रत्यासा में निर्वसन एवं क्षुधा के नैन थक गए हैं । जहां दान भाव न हो वहां जीवन के आधार भूत द्रव्य अर्थात धन फिर साधन का दास हो जाता है ।।

दानि सतजुग हेर फिरे, मिले सो सब कुपात । 
कलिजन के सुभाग बड़े, पग पग कहि दे मात ।१७५९। 
भावार्थ : -- सतयुग में दानियों  अपात्र ही मिले सुपात्र उन्हें ढूंडने स भी नहीं मिले । कलियुग में दानियों के बड़े सौभाग्य है जो उन्हें सद्पात्र पग पग पर मिलते हैं एवं माँग मांग के लेते हैं, किन्तु यह कलयुग का दुर्भाग्य है  ।। 

देन सुपात बहुँत मिले, मिले न को सददानि । 
चारि बरन लै पूर भइ, कलिजुग दान कहानि ।१७६०। 
भावार्थ : --  दान को सुपात्र बहुंत मिले किन्तु कोई सददानी नहीं मिला । इन चार शब्दों से कलयुग में दान की कहानी पूर्ण हो जाती है ॥

टिप्पणी : -- "कुपात्र को दान भी अदान की श्रेणी में आता है....."




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