सोमवार, 11 अगस्त 2014

----- मिनिस्टर राजू १२९ -----

" राजू !   वो भी क्या दिन थे जब एक 'उठ' लिखते ही दो दो उठ जाते थे, 'बाड़' लिखते तो 'जलजला' आ जाता जाने कितने को उठा ले जाता "

राजू : --मास्टर जी ! और वो सुखा .... वो भी आप ही का लिखा हुवा लगता है, सुख के ऐसे पीछे पड़े की बेचारा  पड़ते पड़ते रह गया वो तो आपको को भी..... 

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----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...