रविवार, 3 अगस्त 2014

----- ॥ दोहा-दशम १७१॥ -----,

बैरि सरन को देस दिए, मांगे पठावत दूत । 
न कहत चहुँ पुर घेर के, लहे बजावत जूत ।१७११। 
भावार्थ : --  किसी राष्ट्र के शत्रु को यदि किसी अन्य राष्ट्र ने शरण दी हो । तब उस राष्ट्र के प्रमुख का कर्त्तव्य है वह शरणदातृ राष्ट्र से उस शत्रु की शान्ति पूर्वक मांग करे ।  ना  करने पर उसे  चारों ओर से घेर ले तत्पश्चात दूत भेजकर पून: उस शत्रु की शान्ति पूर्वक मांग करे । तथापि  ना करने पर अड़ोस- पड़ोस को सूचना देते हुवे उसके संग युद्ध कर शत्रु को प्राप्त करे ॥

बोधहीन को बोधना, काज बहुंत कठनाए । 
बहरे सुने नहि चाहे केतक ढोल बजाए ।१७१२। 
भावार्थ : - बुद्धि हीं को बुद्धि देना बहुंत कठिन कार्य है । चाहे कितने ढोल बजा लो बहरे को सुनाई नहीं देगा चाहे कितना पीट लो गधा घोड़ा नहीं बन सकता ॥ 

मंदर मंदर भँवर प्रभु ढूंडा देस पराए । 
कही गया सो बावरा, भगवन जन जन पाए ।१७१४। 
भावार्थ : -- मंदिर मंदिर धक्के खा के इस प्रधान मंत्री जी को पराए देश में भगवान मिले । भगवान जन जन में मिलेजो  यह कह गया वह तो पागल था ॥ 

जो मैं होता आन पद, करता काज महान । 
कारे का रे मूरखा, बैठे निज अस्थान ।१७१५। 
भावार्थ : -- यदि मैं -----खालिस्थान----- होता अथवा होऊँ  तो बड़े महान कार्य करता या करूंगा  । रे मूर्ख ये बता तू अभी जिस स्थान पर विराजित  है वहां क्या क्या किया ॥  

त्याग सोइ त्याग है, खावै ना जो आम । 
एक चखे दूजा रखे, अस त्याग किस काम ।१७१६। 
भावार्थ : --  त्याग वही है जो आम खाए ही नहीं । एक चख कर त्याग दे, दुसरा त्याग के रख ले और कहे इसे जिसे कहूँ वही खाए, जैसे कहूँ वैसे खाए, जहां कहूँ वहां खाए, फिर ऐसा त्याग किस काम का ॥ 

टिप्पणी : -- खा के गुठली त्यागने वाले बहुंत मिलेंगे.....

मेरा पिया मेरा पुत, मैं अरु मेरी मात । 
मेरे में ही संकुचित रहे, नेता की यह जात ।१७१७। 
भावार्थ : -- मेरा पति मेरा पुत्र, मैं और मेरी माता । केवल मैं और मेरे तक ही सिमित रहना नेताओं की यही जात है ॥ 

" कितना घृणित होता है इन नेताओं का व्यक्तित्व । इन्हें यदि मरुस्थल में छोड़ दिया जाए, एक पात्र में जल दूसरे में सत्ता रखी हो तो ये सत्ता लेकर ही मरेंगे, जल पान कर जीवित नहीं रहेंगे । क्या ऐसे 'लोग' किसी जन संचालन तंत्र के संचालन हेतु सम्मति के पात्र हो सकते हैं ॥ 
मुख मंडल छल छबि बरे, भरे ह्रदय सुबार्थ । 

सेबा धरम का जाने, किए न जो परमार्थ ।१७१८। 
भावार्थ : -- जिसका मुख मंडल ने  छद्म छवि वरण किए हो जिसके ह्रदय में स्वार्थ भरा हो । जो कभी परमार्थ न करता हो वह सेवा धर्म तो क्या उसे कोई भी धर्म ज्ञात नहीं है ॥ 

अ आ इ ई जोग के रे, जगा बरतनी दीप । 
पीठ पीठ तौं लेख धर, मुकुति धरे जूँ सीप ।१७१९।   
भावार्थ : - अ आ इ  ई जोड़ के रे फिर मार्ग में दीप प्रज्ज्वलित कर दूसरे वर्ण क्रम तथा उच्चारण विधि का ज्ञान कर । फिर पृष्ठ पृष्ठ लिखकर तू उन्हें ऐसे संजो  जैसे सीप में मुक्ता संजोए रहते हैं ॥  

मेरा मेरा सब कहे, तेरा कहे न कोए । 
जो मुख तेरा दुःख कहे, वा सम मुख ना होए ।१७२० ।   
भावार्थ : -- मेरा मेरा तो सब कहते हैं तेरा कोई नहीं कहता । जो मुख तेरे दुखों का वर्णन करे उसके सदृश्य फिर कोई मुख नहीं है ॥ 




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