शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

----- मिनिस्टर राजू १३४ -----

राजू : -- मास्टर जी ! मास्टर जी ! हाई कमांड कहती हैं सत्ता जहर है ! जहर !!,

 "तो उ बिटवा कोन्हो इच्छा धारी नाग से कम है का....."  

----- ॥ दोहा-दशम १७९ ॥ -----,

राम राम मुख ररत के, चढ़े सिहासन तीस । 
कुपंथ गवन कुकरम कर, किए पाछिन की रीस ।१७९१ ।  
भावार्थ : -- मुख से  राम का नाम रट रट के जाने कितने सिंहासन वाले हो गए । ये कुपंथ पर चलते हैं अन्याय पूर्वक आचरण करते हैं,  कुकरम करते हैं क्योंकि ये पीछेवालों का अनुशरण करते हैं । 
अनुशरण किसका होता है..... ? आगे वालों  का कि पीछे वालों का.....?  

" ज्ञान ही सर्वोपरि है, संविधान नहीं....."

 अनुशरण किसका होना चाहिए ..... ? आगे वालों  का कि पीछे वालों का.....? यह संविधान है जो हमें सीमित विकल्प देता है..... 

न आगे वालों का न पीछे वालों का अनुशरण तो महा पुरुषों का होना चाहिए.....यह ज्ञान है जो असीमित विकल्प देता है.....

समरथ सुमति सो सुकृती, लभ्य लाभ जो लाहि । 
कृपन कर ब्यय करत तिन बरतत जगहित माहि ।१७९२। 
भावार्थ : -- वह वाणिज्यिक वास्तविक है, सामर्थ्यवान है, बुद्धिमान है, पुण्यात्मा है, जो उचित लाभ ही अर्जित करता हो । और उस लाभ को  कृपणता पूर्वक  व्यय करते हुवे जग के हित में बरतता हो ॥

खड्ग पिधान खड्ग बिहिन , तीर बिहिन तूनीर ।  
मटुकि धरे कटि का करे, भरे नहीं जब नीर ।१७९३। 
भावार्थ : -- खड्ग बिहिन खड्ग पिधान का  तीर बिहिन तूणीर का  नीर बिहिन मटुकी का करधन करेगी क्या ?

देखो देखो हमरे पास खड्ग पिधान है, खाता दिखाके निर्धनता भागेगी.....? हाँ तो देंगें न खड्ग !!!

तनिक ई बताइये खड्गवा हेतु धन कहाँ से लाएंगे..... पांच सहस्त्र में तो एक चक्कु भी न आए.....

साधुचारी सत्यसील, साधू पद के जोग । 
तिन साधु का बोलिए जो, भोग रहे भाव भोग ।१७९४। 
भावार्थ : -- साध्वाचारी एवं सत्यशील ही संत कहलाने योग्य होते है । उन्हें संत क्या कहिए जो असंत है और संसार भर के भोगों को भोग गए अथवा भोग रहे हैं ।

टिप्पणी : -  अल्प भोगी महान हो सकता है,  महान आत्मा  नहीं, महात्मा वही है जो पूर्णत: अभोगी हो ॥ अत: अंधानुकरण कभी नहीं होना चाहिए ॥

बसन बासन छत छादन, बाहिर जगत ढकाए   । 
सत्य सील सद आचरन, अंतरतम गुंठाए  ।१७९६। 
भावार्थ : - वास हो आवास ही छत हो कि आच्छादन हो ये  बाह्य जगत को ढंकते हैं  । सत्य विचार, सद्व्यवहार, नैतिक आचरण आदि अंतर जगत के ढकाव हैं ॥ 

मूँगा मुकुति स्याम मनि, बाहिर के सब साज । 
अंतर सज्जा सँभारे, सोइ रतन जल नाज ।१७९७। 
भावार्थ : -  मूंगा, मुक्ता, नीलम आदि रत्न बाह्य जगत के प्रसाधन हैं । जो अंतर जगत  को  माने की इंटीरियर को  डेकोरेट करते है वह रत्न  जल रूपी मोती और अनाज रूपी मूंगा माणिक हैं॥ 

सुधी बुधी सद सुपंथी, ते हुँत अहैं ग्यान । 
मूरख ग्यान जोग नहि, ते  हुँत रचे बिधान ।१७९८। 
भावार्थ : -- बुद्ध प्रबुद्ध  सन्मार्गी एवं सदाचारी अर्थात समझदार लोगों के लिए ज्ञान है । चूँकि मूर्ख ज्ञान के योग्य नहीं होते अत: उनके लिए ही संविधान रचे जाते हैं ॥ 

" जिनको यह नहीं पता कि किधर जाना है, उनको पूछा जाता है आगे वालो के पीछे जाओगे कि, पीछे वालों के पीछे.....

पुरुष जात एक पहेली, जासु तिय समाधान । 
मानस एक समस्या है, समाधान भगवान ।१७९९। 
भावार्थ : -- महान लोग कह गए हैं : -- यदि पुरुष जात एक पहेली है तो उसका हल केवल स्त्री ही है । मानव जाति यदि एक समस्या है तो उसका समाधान केवल और केवल ईश्वर है ॥ 

धारना सोइ धारिये, करे जगत कल्यान । 
चाहे केत नबीन हो, चाहे केत पुरान ।१८०० ।   
भावार्थ : -- पुरातन हो अथवा अधुनातन, प्राचीन हो अथवा अर्वाचीन; धारणा वाही धरण करनी चाहिए जो विश्व के लिए कल्याण कारी हो ॥  

रविवार, 24 अगस्त 2014

----- ॥ दोहा-दशम १७८ ॥ -----

सत्ता सूत्र धारिन को, सत्ता के अस लाह । 
सिँहासन लाहन समुझे साधन पबित बिबाह ।१७८१। 
भावार्थ : -- सत्ता के सूत्र धारियों को सत्ता के लौलुपता ऐसी हो गई हैं कि  सुसंविध समाज की रचना एवंसृष्टि को सुगमता पूर्वक संचालन करने वाले विवाह जैसे पवित्र संस्कार को भी सत्ता प्राप्ति का साधन समझने लगे हैं ॥ 

सत्ता सूत्र धारित अस, होए चारित्रिक हास । 
एहि दसा रहीही त अवसि, होहि  देस के नास ।१७८२। 
भावार्थ : -- सत्ता के सूत्र धारों के चरित्र का ऐसा क्षरण हुवा है कि यदि यही स्थिति रही तो न केवल समाज अपितु समाज का समुच्चय स्वरूप समस्त राष्ट्र का सर्वनाश हो जाएगा ॥ प्रथमतस व्यक्ति तत्पश्चात परिवार फिर  समुदाय से होते हुवे एक राष्ट्र का विघटन हो जाएगा ॥ 

प्रथमतस व्यक्ति : -- एक व्यक्ति कैसे विघटित होगा : -- भारतीय संविधान का कहना है किसी बकरी को गाय यदि बनाना हो तो दोनों का परस्पर संपर्क करा दो । भैया ! फिर जो संतति उपजेगी वह बकरी रहेगी न गाय । अत: बकरी को यदि गाय बनाना हो तो उसमें गाय वाले गुण -धर्म विकसित करो ॥ 


अर्थात हमारा संविधान  केवल स्त्री-पुरुष की भाषा जानता है, सौहार्द की नहीं बोले तो भाईचारे की नहीं.... 


करषत तपत नयन लखे, बरखे न बरखे काल ।  
नृप बने जन सेबक के, भयउ सूर सम चाल  ।१७८४। 
भावार्थ : -- एक वो समय था जब सूर्य समंदर से जल उठाता और पता ही नहीं चलता । अब तो वह ऐसे जल उठाता है कि अगजग जल जल जाता है फिर उसकर ये शंका कि वापस देगा या नहीं....?  खा पी तो नहीं जाएगा ॥ जन सेवक कहकर ये जो राजा बने बैठे है उन का भी चरितर अधुनातन के सूर्य की भाँती हो गया है । ये ऐसे कर उठाते हैं  ऊपर से ऐसे महंगाई बढ़ाते हैं कि बर्फ को भी बुखार आ जाए ॥ फिर पहले तो यह  शंका कि उसका वितरण होगा कि नहीं  दूजी यह शंका उसका सम्यक वितरण होगा की नहीं ॥  

अब कहते हैं 'बुलेट' से बैलेट की जर्नी करेंगे.....पंचर हो गई न.....

बरखा बरख रीत भई, नेह देइ खलिहान ।  
बलिहारी तेहि कन की, किए जग पोष प्रदान ।१७८५। 
भावार्थ ::-  कण कण को अपना  स्नेह देकर वरखा बरस कर सनेह से रिक्त हो गई । उन कणों की जीव-जगत पर भारी कृपा होगी जो उसका पालन -पोषण करेंगे ॥

बितथाभिनिभूसा बितत, हिंस बितथ मर्यादि । 
सासन सूत्र धारिनि दल अहहैं बिप्लव वादि ।१७८६। 

भावार्थ : -- विभाजन पश्चात के  विप्लव  का इतिहास काले अक्षरों में उल्लेखित हैं । जो निवर्त्तमान सत्ता धारी दल द्वारा कारित हुवा । वर्त्तमान सत्ता धारी सहित शेष सभी दल भी उन्हीं  के दिखाए मार्ग का ही अनुशरण कर रहे हैं । यदि यही लोकतंत्र तब जनता को कोई और तंत्र का विकल्प अन्वेषित करना होगा  है । ये सभी दल विप्लव-वादी का संगठन हैं जो आतंक, नक्सल के पश्चात तृतीय श्रेणी का वाद है । खेद है ! कि हमने अपने  राष्ट्र को इन विप्लव-वादियों के अधीन कर रखा है ॥

स्पष्टीकरण : -- विप्लव वाद क्या है ? : -- झूठ बोलने की प्रवृत्ति का प्रसार करना,  समाज में व्याप्त शांति भंग कर अपना स्वार्थ सिद्ध करना, स्वार्थ साधने में हिंसा का भी प्रयोग करना  विप्लव-वाद है  । यह वितथ-मर्याद होता है अर्थात इसका आचरण निश्चित नहीं होता ( गिरगिट के जैसे आचरण करने वाले को वितथ-मर्याद बोलते  हैं).....

समुझाए समझे नहि जब  बारि बारि समुझाए । 
बिपलव बादि चुन चुन के, सिर पर देइ बिठाए । १७८७। 
भावार्थ : -- समझाने पर भी जब नहीं समझे तब बार बार समझाया । बैठा दिए न विप्लव-वादियों को सिर पर ॥ 
                           
चिकनाहट अरु उलट घट, नीर नहीं ठहराए । 
मूढ़ कहँ उपदेस जोग, कहबत माहि कहाए ।१७८८। 
भावार्थ : -- कहावतों में कहा गया है कि : --  चिकनाहट के ऊपर एवं उलटे घड़े पर पानी नहीं ठहरता, क्योंकि वह उसके योग्य नहीं होता, ऐसे ही मूर्ख भी उपदेश के योग्य नहीं होते ॥  

लाग लगाए देख जोख, लाभ हानि अनुमान । 
बिचारत ब्यबहार किए, सोई बनिक सियान ।१७८९। 
भावार्थ : -- जो देखभाल कर लाभ हानि का अनुमान  कर फिर लागत लगाता हो । और सोच-विचार कर व्यवहार करता हो, वह चतुर-बाणिया है ॥  

सुह्रदय निधि के नीति अस, खग मृगहु मित मिताइ  । 
रावण बालि कुनीति कस, बैरि बने निज भाइ ।१७९० । 
भावार्थग : -- सौहर्दय निधान की नीतियां ऐसी थीं कि मनुष्य क्या पशु-पक्षी भी उनके मित्र हो गए । और इनको देखो रावण और बालि की सी नीति वाले इनके तो अपने भाई भी इनके बैरी हो गए ॥ 

 " कोई सिखाए इनको राजनीति.....!!" 




शनिवार, 23 अगस्त 2014

----- मिनिस्टर राजू १३३ -----

राजू ! इस अमरीक्की राष्ट्रपति के तो नाम में ही बम है..,

राजू : -- हां मास्टर जी ! और उसके में मसाईल.....

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

----- ॥ दोहा-दशम १७७ ॥ -----

पल हीन होके पीपल तुलसी उपजे मोरि । 
अजहुँ सङ्कृत अवगुन भए, सदगुन  डाका चोरि ।१७७१। 
भावार्थ : --  पलहीन होकर पीपल एवं तुलसी नालियों में उगने लगे हैं । समय ऐसा अ गया है अब कृतकर्म अवगुण हो गए हैं चोरी डाका सद्गुण हो गए हैं

चोरी- डाका किए बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता, इनके किए बिना न कहीं कोई टिकने देता ॥

पलहीन होके पीपल तुलसी उपजे मोरि । 
पद पद सुरास्पद मिले, मिले पयस पय पोरि ।१७७२। 
भावार्थ : -- पलहीन होकर पीपल एवं तुलसी,  नालियों में उपजने लगे हैं । समय ऐसा ला दिया गया \कि देवालय नहीं अपितु पग-पग पर मदिरा आलय में मिलने लगी और अमृत उसकी सीढ़ियों में ( चरण त्राण के सदृश्य) मिलने लगा है ॥

पलहीन होके पीपल तुलसी उपजे मोरि । 
पद पद सुरास्पद मिले, बरजत किए बरजोरि । १७७३। 
भावार्थ : -- पलहीन होकर पीपल एवं तुलसी,  नालियों में उपजने लगे हैं । समय ऐसा ला दिया गया \कि देवालय नहीं अपितु पग-पग पर मदिरा आलय में मिलने लगी यदि इसका विरोध करो तो यह भ्रष्ट शासन बल का प्रयोग करता है ॥

दोषि के गुन  गान किए गुनोपेत कह दोषि । 
सोए सासन ब्यवस्था, दंड कर्म की पोषि ।१७७४। 


भावार्थ : -- गुणोपेत को दूषित कहकर जो दोषियों का गुणगान करती हो, ऐसी शासन व्यवस्था अपराधों को पोषित करती है । 

 "जहां जघन्य अपराधों को सामान्य घटना की श्रेणी में रखा जाए, फिर वह शासन प्रणाली ही दोष पूर्ण है.…." 

रचिइता रचनाएँ रचे, स्याम मनिसर खाँच । 
काक बकुले हिय भरओ, आए कहौ का आँच ।१७७५। 
भावाथ : -- रचना कार श्याम मणि सर खचित कर  रचनाएँ रचता है । कौवे बकुले जैसे बिना मसलहत के परिंदे उसमें बीट  कर देते हैं, कहो तो उसकी महिमा कहीं घटती है ? नहीं ॥

सेवा ऐसी कीजिये, सेवक हो जो कोइ । 
जासु सेवा सो स्वयं, स्वामि उपकृत होइ ।१७७६। 
भावार्थ : -- सेवक फिर जो कोई भी हो, उसे ऐसी सेवा करनी चाहिए । स्वामि उसे क्या दे  उसकी सुश्रुता से अभिभूत होकर वह स्वयं उसका ऋणी हो जाए ॥

जब लग सुबरन सों रहे, मोल गहे सोहाग । 
वा संग सुबरनहु  गलै, लगे आपनी लाग ।१७७७। 
भावार्थ : -- आभूषण स्वरूप में सुहागा तबतक मूल्यवान  होता है जबतक उसे स्वर्ण का संग प्राप्त  होता है त्याग किये जाने पर उसका कोई मूल्य नहीं होता । यदि  वह अपने ही लगन में रहे अर्थात क्षारद्रव के रूप में रहे तो स्वर्ण को भी गला दे ॥ उसे उसकी वास्तविकता ज्ञात करा दे कि तू स्वर्ण है की विवर्ण है ॥  

जन जन मुख पाहन सोइ, कहिलावै जल जान । 
स्वयं तो बूड़े रहे, पारगमन किए आन ।१७७८। 
भावार्थ : -- लोगों के मुख से वही  पत्थर जलयान कहलाता है  जो स्वयं तो जल में डूबा रहे और दूसरों को पार लगा दे । वो कहाँ का जलजान है जो स्वयं तीर जाए और दूसरे को डूबा दे ॥ 

हिम संग जो प्रगसि अनल, पाहन  पूछिहि कौन । 
हो मधुराई लावनी, पूछिहि जग को लौन ।१७७९। 
भावार्थ : -- यदि हिम से अग्नि प्रकट हो जाए तो पत्थर को कौन पूछेगा । मिष्ठान्न यदि लवण का स्वाद देने लगे तो संसार में लवण को कौन पूछेगा  । 

" तात्पर्य यह है कि  : -- प्रत्येक व्यक्ति,वस्तु अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है" 

का करिहौ का न करिहौं  कहलाइ सोइ  ज्ञान । 
मैं जस कहुँ तसहि करिहौ, कहत तिन्ह सँविधान ।१७८०। 
भावार्थ : -- "क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए  " किससे करना चाहिए किससे नहीं करना चाहिए,  कैसे करना चाहिए एक करना चाहिए की बहुंत सारे करना चाहिए, करना चाहिए कि ? नहीं नहीं  करना चाहे । यह ज्ञान  कहलाता है । मैं जो कहूँ तुम्हे वैसा ही करना चाहिए  इसे संविधान कहते हैं ॥ 







बुधवार, 20 अगस्त 2014

----- मिनिस्टर राजू १३२ -----

" राजू ! घी असली-नकली होता है, सपने भी कहीं असली-नकली होते हैं.., ?

राजू : -- मास्टर जी ! इटली में तो होते हैं, भारत का पता नहीं 

सोमवार, 18 अगस्त 2014

----- ॥ दोहा-दशम १७६ ॥ -----

दूर होत लमाए चरन, सिरु पर सीधौ होए ।
सेबक स्वामि छाए रबि, अंतर अहे न कोए ।१७६१। 
भावार्थ : -- सेवक -स्वामी एवं छाया-रवि में कोई अंतर नहीं । रवि एवं स्वामी की दृष्टि से दूर होकर दोनों ही के सेवक-छाया दोनों के चरण लम्बे हो जाते हैं । सिर पर खड़े रहे तभी वह सीधे होते हैं  । थोड़ा इधर-उधर हुवे नहीं की दोनों चंपत ।।

जो किए सो सब जिहा किए, किए कर श्रम कछु नाह । 
गगन सीस उपबरन करे, नख छादन की चाह ।१७६२। 
भावार्थ : -- जो श्रम किया वो सब जिह्वा करे,  बाहुदल कुछ भी नहीं करें । निकम्मे जिह्वा के बल पर गगन को सिर  का उपबरण बना कर नक्षत्रों को छादन  करने की अभिलाषा करते हैं अर्थात असंभव कार्य करने की चेष्टा करते हैं ॥ असंभव को संभव करने के लिए परिश्रम करना पड़ता है ।

रूपकार एक रूप दिए दीप कहे सब कोइ । 
जबलग जग अलोके नहि, तबलग दीप न होए ।१७६३। 
भावार्थ : --  रचनाकार ने एक रचना रची, सभी ने उसे दीपक कहा ।  जबतक वह संसार को आलोकित नहीं करता, तबतक दीपक नहीं होता॥

जग लग के रस चाख लिए, पाप करम किए लाख ।
सुजन तब का लाह भयो, जब तिन आई आँख ।१७६४। 
भावार्थ  : -- सभी लौकीक सुखों को उपभोग कर लिया लाखो लाख पाप  कर्म कर लिए । हे सज्जनों ! फिर कुछ समझ में आया, अब ऐसी समझ का क्या लाभ ॥

जग लग के रस स्वादन, बिषयन भोगन भाव । 
हो न जोइ छुधा सहिंष्नु, सोइ स्वान सुभाव ।१७६५। 
भावार्थ : -- संसार भर के  सुखों का रसास्वादन कर विषय-भोग के प्रति आसक्ति एवं क्षुधा की असहिष्णुता, स्वान - स्वभाव को दर्शाता है । स्वयं क्षुधा सहन नहीं होती वह मल भी खा लेता है । स्वाद के लिए मनुष्य को भी खा जाता है ॥

रज रजत जो बुझाए तिस, पूछिहि को मरु पानि । 
असत सन जो कार सधे, पूछिहि को सदबानि ।१७६६। 
भावार्थ : -- यदि चमकती हुई रेत प्यास बुझा दे, तो मरुस्थल में पानी को कौन पूछे । यदि असत्य से सब कार्य सिद्ध हो जाते तो सत्य-वचनों को कौन पूछता ॥

खेह खन खेट पसुधन, बन जीवन किए हास । 
अस बृद्धि होतब माहि होत निहोर बिनास ।१७६७। 
भावार्थ : -- यदि कोई विकास कृषि-भूमि  पशु धन वन्य जीवन का क्षीणता पर आधारित हो  तब ऐसा विकास भविष्य में विनास का कारण बनता है ॥

जननी ने सौ पुत जने, गुनोपेत को नाहि । 
जने जनित सो एक बहुँत, जो गुन गाँउ गहाहि ।१७६८। 
भावार्थ : -- जननी ने सौ पुत्र जने । किन्तु गुणवंत कोई नहीं है । वह संतान एक ही अतिसय है जो गुणग्राम से युक्त हो ॥

"उत्पादन यदि हो तो गुणवत्ता पूर्ण हो....."

कृषकबंधु रासायनिक तथा  गोमय, जैविक आदि नैसर्गिक उर्वरा से उत्पादित उपज के मूल्य में अंतर रखें तो उन्हें अधिक लाभ होगा,  वर्त्तमान में यह एक ही मूल्य में उपलब्ध है ॥

कौड़ी कौड़ी जोड़ कै, भयौ अरबी करोड़ि । 
जीअत जी एकहु कौड़ी, जावे नाहि छोड़ि ।१७६९। 
भावार्थ : -- कौड़ी कौड़ी जोड़ के, रोडीमल मल  अरबी करोड़ी हो गए । जीते जी उनसे एक कौड़ी छोड़ी नहीं जाती । छोड़ भी दें तो पहले चार पकड़ते हैं फिर एक छोड़ते हैं ॥ भैया जहां से उठाई है वहीँ पहुंचा दो अन्यथा मृत्यु जाने कहाँ ले जाएगी ।।


धिंग  धरम ध्वज धंधा , जो किए सो सब बाप । 
बाप के आप मुख धरे,कहलावै पुत आप ।१७८०। 
भावार्थ : -- बाबूजियों ने धींगाधींगी करने वाले धर्म की झूठी ध्वजा फहराने वाले कपट धंधे किए  और चल दिए । सपूत जी बाबूजियों का पानी मुख पर मला और आप आप कहलाने लगे बाप के बिना इन्हें कोई तू तू भी न कहता ॥ 

इनके धिंग धंधे का क्या कहना ! पहले प्रदूषण  कर कर के कमाते हैं प्रदुषण से बीमारी फैलाते हैं और फिर इलाज का धंधा करते हैं भारत में कुछ देखने लायक है तो इनका शिक्षा का धंधा देखने लायक है इसके आगे ताज-फाज भी फीके हैं ॥ 



रविवार, 17 अगस्त 2014

----- मिनिस्टर राजू १३१ -----

राजू : -- मास्टर जी ! मास्टर जी ! ये ड्रामा क्या होता है ?

  "अरे वही नाटक"

राजू : -- मास्टर जी ! कर-नाटक वाला नाटक ?

 "और कर-नाटक..... वाला नाटक....." 

शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

----- ॥ दोहा-दशम १७५ ॥ -----

राम राम जग राम कहि कंठ रसन कस तालु । 
जो कृपनी पर कृपा किए, तासुइ नाउ कृपालु । १७५१। 
भावार्थ : --  राम-राम जगतराम..... कंठ ने रसना कस के तालु से तो कह दिया ॥ किन्तु जो दीन-दुखियों  के ऊपर कृपा करे उसका ही नाम कृपालु ॥

ग्रहन जोग सद्गुन अहैं, ताजन जोग ब्याज । 
करन जोग सदकृत् अहैं, खादन जोग अनाज ।१७५२। 
भावार्थ : -- संसार में ग्रहण करने योग्य यदि कुछ है तो वो सद्गुण हैं, त्याग करने योग्य यदि कुछ है तो वो छल-कपट, धूर्तता, दुष्टता, दुराचरण हैं। करने योग्य यदि कुछ है तो वो सद्कर्म हैं, और खाने योग्य अनाज हैं, मांस- मट्टी थोड़े ही है ॥


राम राम जग राम कहि कंठ रसन कस तालु । 
जो कृपनी पर कृपा किए, तासुइ नाउ कृपालु । १७५३ । 
भावार्थ : --  राम-राम जगतराम..... कंठ ने रसना कस के तालु से तो कह दिया ॥ किन्तु जो दीन-दुखियों  के ऊपर कृपा करे उसका ही नाम कृपालु ॥ 

बाहिर जग को सोच किए, धरे पंच परिधान । 
अंतर जगत सोधित कर जहां बसें भगवान ।१७५४ । 
भावार्थ : --बाह्य जगत की तो शुद्धि कर ली शौच किए स्नान किए फिर पंच परिधान धारण कर लिए  । हे मनुष्य ! जो तेरा अंतर जगत है उसे भी शुद्ध करने का उपाय कर कारण की भगवान का निवास वहीँ है ॥ 

लंका सैन अगन सरिस, राम जी की तृन तूल । 
धर्म हीन  दनुपत सहित, किए कपि नास समूल ।१७५५ । 
भावार्थ : -- रावण की सेना कैसी थी अग्नि  के सदृश्य और राम  की कैसी थी तृण के समतुल्य । तब भी अधर्मी रावण सहित बंदरों ने उसकी सेना को समूल नष्ट कर दिया । जो बल पर बुद्धि की, एवं बुराई पर अच्छाई की
विजय का प्रतीक है ॥ 

पाप करम छाँड़े नहीँ, धावत तीरथ जाएँ । 
एक तो करकट कूर किए, तापर भीड़ बढ़ाए ।१७५६। 
भावार्थ : -- दूषित कर्म को त्यागे बिन दौड़ दौड़ के तीरथ जा रहे हैं । एक तो वहां कूड़ा करकट की ढेरी लगा दी उसपर भीड़ बढ़ा दी ॥ पाप की कमाई दान दे रहे हैं, पहले कुछ त्यागो फिर तीरथ जाओ ॥ 

जेतक ऊँची अम्बारि तेतक ऊंची तान । 
साईँ बैठे धूरि मैं, सेबक ऊँच मचान ।१७५७। 
भावार्थ : -- अम्बारी ( मंडप ) जितनी महंगी होती है  उसकी तान भी उतनी ही ऊंची होती है ॥ स्वामी धूलधक्कड में विराजित है सेबक वर आसन में । ऐसा देखा है कहीं ?

अबसित बसन छुधा असन, थकित नयन किए आस । 
देन भाव जहँ नहीं तहँ, धन साधन के दास ।१७५८। 
भावार्थ : -- वसन एवं असन की प्रत्यासा में निर्वसन एवं क्षुधा के नैन थक गए हैं । जहां दान भाव न हो वहां जीवन के आधार भूत द्रव्य अर्थात धन फिर साधन का दास हो जाता है ।।

दानि सतजुग हेर फिरे, मिले सो सब कुपात । 
कलिजन के सुभाग बड़े, पग पग कहि दे मात ।१७५९। 
भावार्थ : -- सतयुग में दानियों  अपात्र ही मिले सुपात्र उन्हें ढूंडने स भी नहीं मिले । कलियुग में दानियों के बड़े सौभाग्य है जो उन्हें सद्पात्र पग पग पर मिलते हैं एवं माँग मांग के लेते हैं, किन्तु यह कलयुग का दुर्भाग्य है  ।। 

देन सुपात बहुँत मिले, मिले न को सददानि । 
चारि बरन लै पूर भइ, कलिजुग दान कहानि ।१७६०। 
भावार्थ : --  दान को सुपात्र बहुंत मिले किन्तु कोई सददानी नहीं मिला । इन चार शब्दों से कलयुग में दान की कहानी पूर्ण हो जाती है ॥

टिप्पणी : -- "कुपात्र को दान भी अदान की श्रेणी में आता है....."




मंगलवार, 12 अगस्त 2014

----- मिनिस्टर राजू १३० -----

राजू : -- मास्टर जी ! मास्टर जी !! जापान के समर्थक आपसे रुष्ट हो गए हैं.....कह रहे थे कि आपने उसके भाग्य में 'भूकम्प' 'बाड़' 'जलजला' एवं 'सूखा' काहे लिख दिया..,

  लै बित्ता भर का देश और गज भर लम्बे परमाणु बम-उपक्रम.....जब वे सारे रुख़ों को मुंड देंगे तो का 'जंगल बुक' लिखेंगे.....पर्बतों को चुंड देंगे तो का 'गीत गया पत्थरों ने' लिखेंगे.....खेतन को खोद खोद के हवाई अड्डा बनाएंगे, तो का 'हरियाली और रास्ता' लिखेंगे.....नदियों को सुखा दिए फिर का  'नदिया के पार' लिखंगे.....बात करते हैं..... 

सोमवार, 11 अगस्त 2014

----- ॥ दोहा-दशम १७४ ॥ -----

बानि बान मुख लौह किए  ऐसे सान सँवार । 
एक सूल बन घाव करे, दूज करे उपचार ।१७४१ । 
भावार्थ : -- वाणी हो कि वाण हो उसके मुख को  लोहा किए सान पर ऐसे सँवारना चाहिए कि वह दुर्जनों  का निरादर करे एवं सज्जनों का आदर करे ॥  

कबहु आपन बनिक कहे कबहु कहे भूथियार । 
राजासन राजा बसन, राजा के सिंगार ।१७४२। 
भावार्थ : -- जिसका राजसी संहासन है राजसी वेश हैं और उसपर राजसी श्रृंगार है । वह कभी स्वयं को चाय विक्रेता कहता है, कभी श्रमिक  ॥ 

करनन परिश्रम हीन किए अरु रसना लिए बहु काम । 
करतल माल अधीन किए, तासु निकर्मन नाम ।१७४३। 
भावार्थ : --कान को जिसने परिश्रम  से विहीन किया हुवा है और जिह्वा को कोल्हू का बैल बना रखा हो ॥ जो करतल को कर 'माल' के अधीन किये हुवे हो वह व्यक्ति निकम्मा कहलाता है ॥ 

बारहि बार बिचार कै, ले पुनि मुख को नाम । 
ररत कहे सो मरा है, भजत कहे सो राम ।१७४४। 
भावार्थ : -- वारम्वार विचार करने के पश्चात ही कोई बात कहनी चाहिए । रट्टा मारने से राम का मरा हो जाता है, भाव पूर्वक स्मरण करने से 'मरा' का भी 'राम' हो जाता है ॥ 

मानस आपनि भाग के, आपहि लेखन हार । 
करम खरी कर काल दिए, सोई लिपे लिलार ।१७४५। 
भावार्थ : -- मनुष्य अपने भाग्य का आपही लेखक है । उसके कर्म लिखनी है जो समय के हस्तगत है और वही मस्तक को लिपिबद्ध करता है ॥ 

दूसरे शब्दों में : -- "मनुष्य के कर्म ही उसके भाग्य का निर्धारण करते हैं....."

मत गहन कह रन किए रच सिंहासन बत्तीस । 
जान सेवक निज नाउ दिए, बन बैठे आधीस ।१७४६। 
भावाथ : -- जिसे 'स्वतंत्रता संग्राम' कहा जाता है वास्तव में वह 'सत्ता संग्राम' था । मत संग्रह कहकर लड़े-भिड़े,  सिंहासन बत्तीस रचा । स्वयं को जन सेवक कहा उसपर स्वामी बनकर बैठ गए ॥ 

नयनवान समुह  जस तम, अँधरे समुह प्रकास । 
अभिमानी के समूह तस, ज्ञान बचन की भास् ।१७४७ । 
भावार्थ : -- जैसे नयनवान को अन्धेरा समझ नहीं आता । अंधे को प्रकाश समझ नहीं आता । वैसे ही अभिमानी व्यक्ति ज्ञान पूरित वचन की भाषा समझ नहीं आती ॥ 
     
सूई की चोरितक को कहे चोर रे चोर । 
चोरि किए जल जान आप , करे बिन कोइ सोर ।१७४८ । 
भावार्थ : -- स्वयं बिना शोर किए जलयान की चोरी करते हैं और सुई की छोटी-मोटी चोरी करने वाले को चोर-चोर कहते हैं ॥ वो देखो समंदर के सदरे आइल का चोट्टा ..... कैसे मोबाइल-चोर, मोबाइल-चोर चिल्ला रहा है  ॥ 
                                   
बिपन्न हो संपन्न सुख को देइ हँकार । 
साधारन सबते भला, रहे जो सुखाधार ।१७४९ । 
भावार्थ : -- सुख के साधनभूत द्रव्यों से कोई संपन्न हो चाहे विपन्न हो, सुख के अभलाषी दोनों ही हैं । सबसे भला बीच का है, जो स्वर्ग में निवास रत है ॥ तो.....सबसे उत्तम मध्यम वर्ग है.....

चोरी किए छल छंद किए किए ब्याज बिनु लाज । 
ऐसे मुखिआ जोइ किए, निपते सोइ समाज ।१७५०। 
भावाथ : -- जो चोरी करता हो, छल-कपट करता हो, धिंग धंधे करता हो, बिना लज्जा के दुराचार करता हो । जो देश/समाज/कुटुंब ऐसे प्रधान को नियुक्त करता है, उसका निपतन अवश्यभावी है ॥ 
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                       


----- मिनिस्टर राजू १२९ -----

" राजू !   वो भी क्या दिन थे जब एक 'उठ' लिखते ही दो दो उठ जाते थे, 'बाड़' लिखते तो 'जलजला' आ जाता जाने कितने को उठा ले जाता "

राजू : --मास्टर जी ! और वो सुखा .... वो भी आप ही का लिखा हुवा लगता है, सुख के ऐसे पीछे पड़े की बेचारा  पड़ते पड़ते रह गया वो तो आपको को भी..... 

बुधवार, 6 अगस्त 2014

----- मिनिस्टर राजू १२८ -----

राजू : -- मासटर जी ! अवकाश चाहिए !!!

" क्यों चाहिए ? "

राजू : -- मास्टर जी ! मुझे भी "मंदिर-मंदिर" देखने जाना है..,

" नहीं मिलेगा !!!"

राजू : -- अच्छा तो वो बुढ़िया मर जाए तब तो मिल जाएगा न मास्टर जी!

 उस बुढ़िया के मरने से कौन अवकाश देगा, उनके पहले ही दो डोकरे कतार में है पहले उन्हें तो मरने दे.…. 

----- ॥ दोहा-दशम १७३॥ -----

पुत भया घर नाउ धरे, माई मोहन लाल । 
कुकृत ने नाउ संग किए, कुल कज्जल सम काल ।१७३१। 
भावार्थ : -- घर में पुत्र हो गया चलो अच्छी बात है, माई ने नाम मोहन लाल रखा । किन्तु ये क्या उसके कुकृत्यों नाम को गंदा किया ही कुल और धर्म को भी काजल के जैसे कलुषित कर दिया ॥ 

बहु समुझाए समझे नहि ग्यान की जो बात । 
ऐसे दुइ रेतस हुँत बने, भाखा के दुइ लात ।१७३२ । 
भावार्थ : -- बहुंत समझाने पर भी जो ज्ञान की वाणी को नहीं समझते । ऐसे गधे,खच्चरों के लिए फिर भाषा की दुलत्ती बनी ॥ 

मुकुति को ही हेत करे, परिहरे सबहि सीप । 
ग्यान रहित भाखा जस, बिना जोति के दीप ।१७३३। 
भावार्थ : -- मुक्ता से ही प्रीत होती है, सीप को सभी त्याग देते हैं । ज्ञान रहित व्यक्ति की भाषा ऐसे है जैसे ज्योत रहित दीप ॥

टिप्पणी : -- अभी अमरीक्की रक्षा मंत्री आएगा न उससे पूछना : -- वार्त्तालाप करने में तुम्हें कौन रुचिकर लगता है ज्ञानी या आङ्गलभाषी में .....?

जाति जुगति भाख कि ज्ञान,  तामें कौन प्रबेक । 
अवगुन छाँडत गुन गहे, सोई हंस बिबेक ।१७३४। 
भावार्थ : -- जाति श्रेष्ठ है कि योग्यता ?  भाषा श्रेष्ठ है कि ज्ञान । जो अवगुणों को छोड़ कर गुण  ग्रहण करे वही हंस विवेक है ॥

टिप्पणी : -- जाति के संग आप वैश्विक ज्ञान से स्पर्धा कैसे  करेंगे । ज्ञान रहित अंग्रेज किस काम का । कोई भी तंत्र हो वह कौशल एवं योग्यता से चलता है ज्ञान से चलता है जाति एवं अंग्रेजी से नहीं चलता, चलता तो अंग्रेज क्या किसी से कम थे.....? कितनी अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं, क्यूँ भगाया.....उत्तर दे भारत शासन....

अधम उत्तम जीवन की, सैली एकै समान । 
एक अति दिन दारिद है, एक अतिसय धनवान ।१७३६। 
भावार्थ  : -- ध्यान से देखिए तो आर्थिक आधार पर अधम एवं उत्तम वर्ग की जीवन शैली एक समान है । इनमें अंतर केवल यही है कि एक अत्यधिक निर्धन एवं अभावो से भरा तो दुसरा अत्यधिक धनवान है ॥

समानता यह है कि दोनों को भक्ष अभक्ष का ज्ञान नहीं है ।  अधम इस हेतु  नग्न है कि उसके पास वस्त्र नहीं है धनवान के पास बुद्धि नहीं है । एक, दो, तीन ब्याह किए फिर भी लुगाई नहीं..... अरे अपने शषि जी और वो भूथियार पलटू..... मार के गढ़िया दिया था तीसरी को .….दोनों ही पहले दिन पकड़ाते हैं दूसरे दिन छूट जाते हैं । क्वारें घूमे  तो लोग  बोलने लगते हैं अब तो ब्याह कर ले  ? , और कितने ब्याह करेगा ये ? और भी बहुंत कुछ..... बोलते हैं.....

 भगति भाउ चितवन भए, अजहुँ समउ धनहीन । 
ज्ञान बचन कानन परे, होहिहि सोई पीन ।१७३५। 
भावार्थ  : -- विद्यमान समय के निर्धन का चित्त भक्ति के भाव से युक्त एवं दानी हो चला है। यदि इस वर्ग के कानों तक ज्ञान की दो बातें पहुंचे तब यह वर्ग परिपुष्ट हो सकता है ।।  

चितवन भगति भाउ हरे, अजहुँ समउ धनवान । 
धरम अधरम ग्यान बिनु, रहे आपनी मान ।१७३६ । 
भावार्थ : -- विद्यमान समय का आर्थिक वर्गीकरण पर आधारित श्रेष्ठि वर्ग के चित्त में भक्ति का भाव शनै: शनै: विलुप्त हो चला है, जो दूरदर्शन पर दिखावे वाला भाव में परिणित हो गया है ये एक पैसे दान के बदले दस लाख चाहते हैं । िनहन धर्म-अधरम, कर्त्तव्य -अकर्त्तव्य, भक्ष्य -अभक्ष्य  आदि के ज्ञान से रहित होकर ये अपने ही अहंकार में रहते हैं ॥ नको सुबचन, भगवद् आदि कथा सुनाना भैंस के आगे बीन बजाना जैसा है.....

दान मान सम्मान के, भरे रहे जहँ पात । 
तेरा दिया रे मूरख, तहँ बिरथा ही जात ।१७३७ । 
भावार्थ : --  जहाँ दान के मान-सम्मान के पात्र भरे हों । रे मूर्ख फिर वहां तेरा दिया व्यर्थ ही जाता है ॥ 

करन रखे श्रबितबय नहि, आँख रखे नहि आँख । 
बदन रखे बदितबय नहि, उरै रखे बिनु पाँख ।१७३८ । 
भावार्थ : -- आर्थिक  वर्गीकरण पर आधारित  स्वर्णों  ने कान तो लगा रखे हैं पर वे श्रवितव्य नहीं हैं आँख हैं पर वह द्रष्टव्य नहीं है । वदन है तो वह वदितव्य नहीं हैं पंख तो है ही नहीं फिर भी ये उड्डितव्य हैँ ॥ 

 प्रधान मंत्री को देखो ऐसा लगता है जब देखो उड़ते ही रहते हैं  ये सेवन  रेस कोर्स है की कबूतर का घोसला । कबूतर की हिंदी तो देखो लक्ष्यवेधी को 'लक्ष्यावधि' कहते हैं,खाने-पीने' के बाद ऐसा ही होता है । हे भगवान ! अबकी बार लाल कीले की लाज रख लेना.....

भँवर भँवर रे चाकरी, बधी रही  कर संग । 
तेरी डोरी धारि कै, उरि फिरि गगन पतंग ।१७३९। 
भावार्थ : -- रे चाकरी तू घन चक्कर होकर चाकर संग हाथ बांधे खडी रही । तेरी डोरी धार के देख ये पतंग उड़ती फिर रही है । 

भँवर भँवर रे चाकरी, बधी रही कर संग । 
तेरी डोरी धारि कै, उरि फिरि गगन पतंग ।१७३९। 
भावार्थ : -- रे चाकरी तू घन चक्कर होकर हाथ बांधे खडी रही । तेरी डोरी धार के देख ये पतंग उड़ती फिर रही है । 

सद्गुन सील सूत्र संग, ऐसो साख सँजोए । 
चाहे केतक छींट दे, दाग लगे ना कोए ।१७८०। 
सूत्र शाख = शरीर 
भावार्थ : -- सद्गुणों, सद्व्यवहार, एवं नैतिक आचरण के सूत्रों से शरीर को इस प्रकार सजा लें । कि कोई कितना भी छींटाकसी करे तो उसपर कलंक न लगे ॥  



मंगलवार, 5 अगस्त 2014

----- ॥ दोहा-दशम १७२ ॥ -----

तीन गति के मानस की जथानुपूरब बानि । 
लिखि लीक जोग रखे जस, पाहन सिकता पानि ।१७२१ । 
 ----- गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ : -- तीन प्रकार के मनुष्य होते हैं उसकी वाणी भी यथानुरूप होती है । उत्तम मध्यम एवं अधम । उत्तम पुरुष की वाणी पत्थर की लकीर होती है, अर्थात वह कभी परिवर्तित नहीं होाती । मध्यम की वाणी, रेत पर की गई लकीर होती है जो एक तरंग में मीट जाती है अर्थात मध्यम पुरुष केवल कुछ समय तक ही अपने वचन पर अडिग रहता है । अधम पुरुष की वाणी पानी में की गई लकीर होती है जो कहते ही परिवर्तित हो जाती है अर्थात उसे अपनी कहे पर फिरते देर नहीं लगती ॥ 

पातक  पत पानी तजे, तजे लोभ अरु लाह । 
जो कुपंथ सज्जन तजे, कुजन लें ललियाह ।१७२२ । 
 ----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावाथ : -- पापों को त्याग देते है, पद प्रतिष्ठा को त्याग देते लोभ-लाभ को त्याग देते हैं जिस कुमार्ग को सज्जन त्याग देते है कुजाण उसे पाने के लिए ललचाते हैं ॥  

निर्धनी उदर की अगन , निरस करे रसवादि । 
धनवान के जिहा संग , दुर्लभ रहे सुवाद ।१७२३। 
      ----- । विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ  : -- निर्धन के  उदर की अग्नि निरस  को भी सरस कर देती है  ।धनवानों की जिह्वा से स्वाद सदैव दुर्लभ रहता है ॥ 

बृद्धि बल बिक्रम दृढ़ चेत, भाव जतन जो जोइ । 
तिन्हन्हि निज जीवत के, नसवन भय कस होइ।१७२४। 
 ----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : --  जिसमें वृद्धि करने का बल हो, पराक्रम हो, जो दृढ़ निश्चयी हो, जो प्रभावी हो, जो परिश्रमी भी हो । कहो तो उन्हें  फिर अपनी जीविका के नष्ट होने का भय क्योंकर होगा ॥

बर आभूषन बर बसन मह बड़प्पन नाहि । 
जोइ अहइँ पवितात्मन्, सोइ बड़ा कहलाहि ।१७२५ । 
 ----- ॥ मुंशी प्रेमचंद ॥ -----  

भावार्थ : -- " बड़प्पन सूट-बूट और ठाट-बाट में नहीं है,  जिसकी आत्मा पवित्र है वही बड़ा होता है "

अब ये आत्मा कौन है.....? जिसे शस्त्र नहीं काट सकते अग्नि नहीं जला सकती वैगेरह वैगेरह वही है 


बल मत्ता कू चाहिये निर्बल दे छम दान । 
छिमा हितकारि जासु हुँत अर्थानरथ समान ।१७२६। 
 ----- ॥ विदुर ॥ -----
भावार्थ : -- बलशील  को चाहिए कि वह निर्बल को क्षमा दान दे ॥ क्योंकि जिसके लिए अर्थ -अनर्थ समान होंता है  उसके लिए क्षमा कल्याण कारी होती है ॥

बिद्या लवन बल का मन, पावन पुन का पाप । 
मापै धनिमन हरिदैहु, कर धर धन के माप ।१७२७।  
 ----- । जयशंकर प्रसाद ॥ -----
भावार्थ : -- क्या विद्या क्या सुंदरता बल बुद्धि पवित्रता क्या पुण्य क्या पाप । धनवाले हृदय को भी धन के मानदंड से ही मापते हैं ॥

कोट कर संतोख के, आपनि परिगत जोइ ।
बहोरि परिगत कोट कू, भेद सके ना कोइ ।१७२८। 
 ----- ॥ इपिक्टीटस ॥ -----
भावार्थ : -- अपने चारों ओर संतोष का दुर्ग बना लीजिए फिर उस दुर्ग को  कोई ( अभिलाषा  ) भेद नहीं पाएगा ॥

सोचे कारे अरु पाए, जो किछु मानउ जाति । 
सो सब रच्छित मायाबि, पुस्त पीठ बध पाँति ।१७२९ । 
 ----- ॥ क्लाइव ॥ -----
भावार्थ : --  मानव जाति ने जो कुछ किया, सोचा  और पाया है, वह पुसतको के मायावी पृष्ठों में पंक्तिबद्ध होकर सुरक्षित है ॥


जहाँ दीप प्रजुरे तहाँ, होत अवसि उजियार । 
जहाँ सोत फूटे तहाँ, बहत अवसि जलधार ।१७३०। 
 ----- ॥ दान की महिमा से साभार ॥ -----

भावार्थ : -- जहाँ दीपक प्रज्वलित होता है वहां प्रकाश अवश्य ही होता है ॥ जहाँ कोई स्त्रोत प्रस्फुटित होता है वहां से जल  -धार अवश्य ही प्रवाहित होती है ॥ 





रविवार, 3 अगस्त 2014

----- ॥ दोहा-दशम १७१॥ -----,

बैरि सरन को देस दिए, मांगे पठावत दूत । 
न कहत चहुँ पुर घेर के, लहे बजावत जूत ।१७११। 
भावार्थ : --  किसी राष्ट्र के शत्रु को यदि किसी अन्य राष्ट्र ने शरण दी हो । तब उस राष्ट्र के प्रमुख का कर्त्तव्य है वह शरणदातृ राष्ट्र से उस शत्रु की शान्ति पूर्वक मांग करे ।  ना  करने पर उसे  चारों ओर से घेर ले तत्पश्चात दूत भेजकर पून: उस शत्रु की शान्ति पूर्वक मांग करे । तथापि  ना करने पर अड़ोस- पड़ोस को सूचना देते हुवे उसके संग युद्ध कर शत्रु को प्राप्त करे ॥

बोधहीन को बोधना, काज बहुंत कठनाए । 
बहरे सुने नहि चाहे केतक ढोल बजाए ।१७१२। 
भावार्थ : - बुद्धि हीं को बुद्धि देना बहुंत कठिन कार्य है । चाहे कितने ढोल बजा लो बहरे को सुनाई नहीं देगा चाहे कितना पीट लो गधा घोड़ा नहीं बन सकता ॥ 

मंदर मंदर भँवर प्रभु ढूंडा देस पराए । 
कही गया सो बावरा, भगवन जन जन पाए ।१७१४। 
भावार्थ : -- मंदिर मंदिर धक्के खा के इस प्रधान मंत्री जी को पराए देश में भगवान मिले । भगवान जन जन में मिलेजो  यह कह गया वह तो पागल था ॥ 

जो मैं होता आन पद, करता काज महान । 
कारे का रे मूरखा, बैठे निज अस्थान ।१७१५। 
भावार्थ : -- यदि मैं -----खालिस्थान----- होता अथवा होऊँ  तो बड़े महान कार्य करता या करूंगा  । रे मूर्ख ये बता तू अभी जिस स्थान पर विराजित  है वहां क्या क्या किया ॥  

त्याग सोइ त्याग है, खावै ना जो आम । 
एक चखे दूजा रखे, अस त्याग किस काम ।१७१६। 
भावार्थ : --  त्याग वही है जो आम खाए ही नहीं । एक चख कर त्याग दे, दुसरा त्याग के रख ले और कहे इसे जिसे कहूँ वही खाए, जैसे कहूँ वैसे खाए, जहां कहूँ वहां खाए, फिर ऐसा त्याग किस काम का ॥ 

टिप्पणी : -- खा के गुठली त्यागने वाले बहुंत मिलेंगे.....

मेरा पिया मेरा पुत, मैं अरु मेरी मात । 
मेरे में ही संकुचित रहे, नेता की यह जात ।१७१७। 
भावार्थ : -- मेरा पति मेरा पुत्र, मैं और मेरी माता । केवल मैं और मेरे तक ही सिमित रहना नेताओं की यही जात है ॥ 

" कितना घृणित होता है इन नेताओं का व्यक्तित्व । इन्हें यदि मरुस्थल में छोड़ दिया जाए, एक पात्र में जल दूसरे में सत्ता रखी हो तो ये सत्ता लेकर ही मरेंगे, जल पान कर जीवित नहीं रहेंगे । क्या ऐसे 'लोग' किसी जन संचालन तंत्र के संचालन हेतु सम्मति के पात्र हो सकते हैं ॥ 
मुख मंडल छल छबि बरे, भरे ह्रदय सुबार्थ । 

सेबा धरम का जाने, किए न जो परमार्थ ।१७१८। 
भावार्थ : -- जिसका मुख मंडल ने  छद्म छवि वरण किए हो जिसके ह्रदय में स्वार्थ भरा हो । जो कभी परमार्थ न करता हो वह सेवा धर्म तो क्या उसे कोई भी धर्म ज्ञात नहीं है ॥ 

अ आ इ ई जोग के रे, जगा बरतनी दीप । 
पीठ पीठ तौं लेख धर, मुकुति धरे जूँ सीप ।१७१९।   
भावार्थ : - अ आ इ  ई जोड़ के रे फिर मार्ग में दीप प्रज्ज्वलित कर दूसरे वर्ण क्रम तथा उच्चारण विधि का ज्ञान कर । फिर पृष्ठ पृष्ठ लिखकर तू उन्हें ऐसे संजो  जैसे सीप में मुक्ता संजोए रहते हैं ॥  

मेरा मेरा सब कहे, तेरा कहे न कोए । 
जो मुख तेरा दुःख कहे, वा सम मुख ना होए ।१७२० ।   
भावार्थ : -- मेरा मेरा तो सब कहते हैं तेरा कोई नहीं कहता । जो मुख तेरे दुखों का वर्णन करे उसके सदृश्य फिर कोई मुख नहीं है ॥ 




----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...