शनिवार, 5 जुलाई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १६९ ॥ -----

भरमन अरु संदेह के, जग मैं नाहि उपाए । 
जनमन अरु अमरता के, औषध नहि सोधाए ।१६९१। 
भावार्थ : -- भ्रम एवं संदेह का जग में कोई उपचार नहीं है । जन्म एवं अमृत्यु की अभतक कोई औषधि नहीं बनी है, अर्थात औषधि देकर किसी का जन्म नहीं हो सकता औषधि से मृत्यु नहीं रोकी नहीं जा सकती रुकती तो यह जग बड़े-बूढ़ों से भरा रहता ॥

 कबिबर ब्यास परस मनि, रत्नाकर एक लौह । 
 महा भारत रामकथा ,  लौह परस मनि सौह ।१६९२। 
भावार्थ : -- कदाचित कविवर व्यास पारस मणि है कविवर रत्नाकर लौह के सदृश्य थे । महा भारत कथा यदि लौह थी तो श्री राम कथा एक पारसमणि है ॥

कहुँ गहनई लगे बिटप, जब समूल उपराए । 
तनि जलकन दाने तबहि, अबर थरी हरियाए । १६९३।  
भावाथ : - कहीं गहरे लगा विटप जब समूल उखड़ता है,  अन्य स्थल पर  तब वह किंचित जल कण (एवं किंचित समय )  प्राप्त कर ही हरा- भरा होता है ॥


दिनभर के किए सदकृत् संग, रयनइ सुखकर होए । 
बीते जब सुखकर रयन, दिनभर सदकृत जोए ।१६९४। 
भावार्थ : -- दिनभर के किए सद्कार्यों से रात्र सुखपूर्वक व्यतीत होती है । सुखपूर्वक व्यतीत हुई रात्रि दिनभर सद्कर्मों को संजोती है ॥

ऊँच पहुँच के जलधिहू, सरुबर देत दिखाए । 
नीचक उतरत सरबरहु, जलधिहि सम डोबाए ।१६९५। 
भावार्थ : -- ऊँचे पहुंचकर सिंधु भी सरोवर के सदृश्य दिखाई देता है । निचे उतरो तो सरोवर भी जलधि के सदृश्य डूबा  देता है ॥

दया हीनता मलिनए मन, अदेयन धन मलिनाए । 
अकर्मनता मलिनए तन, बुद्धि बिरथा सुभाए ।१६९६। 
भावार्थ : -- निष्ठुरता मन को मलिन का देती है अदायन धन को मलिन कर देता है । अकर्मण्यता तन को मलिन का देती है, मृषावादी स्वभाव बुद्धि को मलिन कर देता है ।।

बानी अहइँ  तिरजक गुन, साँच मधुर हितबादि । 
होए तिनहु गुन बिपरीत, आपस मह जब बादि ।१६९७। 
भावार्थ : -- वाणी के तीन गुण होते हैं  : -- सत्य, मधुर  एवं हितवादी । ये तीनों गुण तब विपरीत हो जाते हैं जब परस्पर विवाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है ।।

खनिज सम्पदा दाव सम, बृथा करम सम दाह । 
डाह दाव मैं जा लगे, सरबस करे स्वाह ।१६९८। 
भावार्थ : -- खनिज संपदा दाव के सदृश्य है। निष्प्रयोजन अथावा मनोरंजन हेति अथवा भोग विलास हेतु किये जाने वाले कार्य आसुरी अग्नि के सदृश्य हैं । जब यह अग्नि उस दाव में जा लगती है, तब सर्वस्व भस्मीभूत कर देती है ॥

होवनि का होवनिहार, फल तरु सब हुँत लाग । 
साजन तब का पाइये, काटी दिए जब आग ।१६९९। 
भावार्थ : -- क्या हुवे हुए क्या होने वाले, तरु इन फल सभी के लिए लगते हैं ।  तब क्या प्राप्त होगा जब उसे काट कर आग में झोंक दिया जाए  ॥

साँचे बचन अगनी सम, झूठे तृण के तूल ।
अगनी तृण को जा लगे, कारे भस्म समूल ।१७००।
भावार्थ : -- सत्यवचन अग्नि के एवं असत्य तृण के समतूल्य होते हैं । यदि अग्नि तृण को जा आगे तो उस तृण का सामूल नाश कर देती है ||






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