करषक कन की आस में, भू के कंठ प्यास ।
चातक नैन तरस रहे, धनबन भयउ उदास ।१६८१।
भावार्थ : -- कृषक कणों की आशा में है, धरती का कंठ प्यासा है । चातक स्वरूप नैन तरस रहे हैं, गगन देव हैं की बैरागी हो गए ॥
दान बिनु सद्चारी धनि, परिश्रम के बिनु रंक ।
सेवा बिनु जनसेवक, यह सब देस कलंक ।१६८२।
भावार्थ : -- सदाचारी अदानी धनी, परिश्रम हीन निर्धन, सेवाविमुख जन-सेवक ये सब राष्ट्र के कलंक स्वरूप हैं ॥
करषक खेह कमाई के, बोवै एक ही सार ।
सीचत सरिस सकल अंग, भरे कनक भंडार ।१६८३।
भावार्थ : - कृषक खेत कमा कर जब उस की एकसार बुआई करता है । सभी अंगों को समान स्वरूप में सींचता है तभी उपज से उसका भण्डार भरता है ॥
" एक उत्तम: शासक कृषक का अनुकरण कर राजस्व से भंडार भरता है"
तन तो लास भवन बसा, मन धन का अनुरागि ।
कपटि साधौ भेस धरा, कहता मैं बेरागि ।१६८४ ।
भावार्थ :-- जिसका तन विलास भवन में बसा है और मन धन में अनुरक्त है । वह कपटी साधुओं वेश धारण कर कहते फिरते हैं हम तो वैरागी हैं ॥
चाहे लौहु आलबाल, चाहे कंचन थाल ।
भोजन रूप भोजन है, काल रूप है काल ।१६८५।
भावार्थ : -- चाहे लोहे का थाल हो कि कंचन का थाल हो भोजन तो भोजन ही रहेगा । कंचन के थाल में जिम लेने से अमरत्व प्राप्त नहीं होगा मृत्यु तो फिर भी अपने सवरूप में ही रहेगी ।
पैह परस भगवान चरन, भयो सील उद्धार ।
तोर परस को उद्धरे, आगिन बाधत कार ।१६८६।
भावार्थ : -- भगवान श्रीराम के चरण राज का स्पर्श प्राप्तकर सील हुई अहिल्या का उद्धरण प्रसंग यही उपदेश देता यदि तुम्हारे स्पर्श मात्र से किसी उद्धरण होता हो तो उसे आगे बढ़ कर करना चाहिए ॥ अस्पृश्यता की बुद्धि जाने कहाँ से आई ॥
भरे भेस तन राजसी, चले हंस की चाल ।
राजा है कि जन सेवक हैं, बिपनी हैं कि ब्याल ।१६८७ ।
भावार्थ : -- देह राजसी भेस से सुसज्जित है, मराली चाल चलते हैं ॥ ये राजा हैं कि जनता जनार्दन के सेवक हैं कि धंधेबाज है कि हिंसक जंतु हैं ॥ कृपया संविधान स्पष्ट करे ॥
कामि बृत तन तरु कोटर, ब्यसन अहि के भेस ।
बरबस निज अधिकार कर , कारे सकल कलेस ।१६८८।
भावार्थ : -- इच्छा, आकांक्षा, कुत्सित काम में प्रवृत्त देह तरु कोटर के सदृश्य है , व्यसन सर्प के भेष में है । जो उस कोटर में बलपूर्वक अपना अधिकार स्थापित कर समस्त क्लेशों को जन्म देता है ॥
मारे जंतु जिहवा हुँत, दयाहीन भए लोग ।
पसु चाम तजत पलावन , चरन त्रान मैं जोग ।१६८९।
भावार्थ : -- कलयुग छाया हुवा है लोग दया से विहीन हो गए है ये अपनी जिह्वा के स्वाद हेतु जीवों पर अत्याचार कर रहे हैं । हमें भी पशु चर्म को त्याग कर प्लाव ( प्लास्टिक ) को अपने चरणों की रक्षा हेतु नियुक्त करना चाहिए ॥
नाउ बाचत निजी लषन, जात लषन उपनाउ ।
बरन बाचत करम लषन, धरम बाँचे सुभाउ ।१६९०।
भावार्थ : -- नाम आपकी निजता का परिचायक है अर्थात नाम यह बताता है कि आप कौन हैं, उपनाम यह बताता है कि आप कहाँ से आये हैं । वर्ण यह बताता है कि आप क्या करते थे या करते हैं, धर्म यह बताता है कि आपका स्वभाव आपका आचरण कैसा था अथवा है॥
चातक नैन तरस रहे, धनबन भयउ उदास ।१६८१।
भावार्थ : -- कृषक कणों की आशा में है, धरती का कंठ प्यासा है । चातक स्वरूप नैन तरस रहे हैं, गगन देव हैं की बैरागी हो गए ॥
दान बिनु सद्चारी धनि, परिश्रम के बिनु रंक ।
सेवा बिनु जनसेवक, यह सब देस कलंक ।१६८२।
भावार्थ : -- सदाचारी अदानी धनी, परिश्रम हीन निर्धन, सेवाविमुख जन-सेवक ये सब राष्ट्र के कलंक स्वरूप हैं ॥
करषक खेह कमाई के, बोवै एक ही सार ।
सीचत सरिस सकल अंग, भरे कनक भंडार ।१६८३।
भावार्थ : - कृषक खेत कमा कर जब उस की एकसार बुआई करता है । सभी अंगों को समान स्वरूप में सींचता है तभी उपज से उसका भण्डार भरता है ॥
" एक उत्तम: शासक कृषक का अनुकरण कर राजस्व से भंडार भरता है"
तन तो लास भवन बसा, मन धन का अनुरागि ।
कपटि साधौ भेस धरा, कहता मैं बेरागि ।१६८४ ।
भावार्थ :-- जिसका तन विलास भवन में बसा है और मन धन में अनुरक्त है । वह कपटी साधुओं वेश धारण कर कहते फिरते हैं हम तो वैरागी हैं ॥
चाहे लौहु आलबाल, चाहे कंचन थाल ।
भोजन रूप भोजन है, काल रूप है काल ।१६८५।
भावार्थ : -- चाहे लोहे का थाल हो कि कंचन का थाल हो भोजन तो भोजन ही रहेगा । कंचन के थाल में जिम लेने से अमरत्व प्राप्त नहीं होगा मृत्यु तो फिर भी अपने सवरूप में ही रहेगी ।
पैह परस भगवान चरन, भयो सील उद्धार ।
तोर परस को उद्धरे, आगिन बाधत कार ।१६८६।
भावार्थ : -- भगवान श्रीराम के चरण राज का स्पर्श प्राप्तकर सील हुई अहिल्या का उद्धरण प्रसंग यही उपदेश देता यदि तुम्हारे स्पर्श मात्र से किसी उद्धरण होता हो तो उसे आगे बढ़ कर करना चाहिए ॥ अस्पृश्यता की बुद्धि जाने कहाँ से आई ॥
भरे भेस तन राजसी, चले हंस की चाल ।
राजा है कि जन सेवक हैं, बिपनी हैं कि ब्याल ।१६८७ ।
भावार्थ : -- देह राजसी भेस से सुसज्जित है, मराली चाल चलते हैं ॥ ये राजा हैं कि जनता जनार्दन के सेवक हैं कि धंधेबाज है कि हिंसक जंतु हैं ॥ कृपया संविधान स्पष्ट करे ॥
कामि बृत तन तरु कोटर, ब्यसन अहि के भेस ।
बरबस निज अधिकार कर , कारे सकल कलेस ।१६८८।
भावार्थ : -- इच्छा, आकांक्षा, कुत्सित काम में प्रवृत्त देह तरु कोटर के सदृश्य है , व्यसन सर्प के भेष में है । जो उस कोटर में बलपूर्वक अपना अधिकार स्थापित कर समस्त क्लेशों को जन्म देता है ॥
मारे जंतु जिहवा हुँत, दयाहीन भए लोग ।
पसु चाम तजत पलावन , चरन त्रान मैं जोग ।१६८९।
भावार्थ : -- कलयुग छाया हुवा है लोग दया से विहीन हो गए है ये अपनी जिह्वा के स्वाद हेतु जीवों पर अत्याचार कर रहे हैं । हमें भी पशु चर्म को त्याग कर प्लाव ( प्लास्टिक ) को अपने चरणों की रक्षा हेतु नियुक्त करना चाहिए ॥
नाउ बाचत निजी लषन, जात लषन उपनाउ ।
बरन बाचत करम लषन, धरम बाँचे सुभाउ ।१६९०।
भावार्थ : -- नाम आपकी निजता का परिचायक है अर्थात नाम यह बताता है कि आप कौन हैं, उपनाम यह बताता है कि आप कहाँ से आये हैं । वर्ण यह बताता है कि आप क्या करते थे या करते हैं, धर्म यह बताता है कि आपका स्वभाव आपका आचरण कैसा था अथवा है॥
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