मंगलवार, 1 जुलाई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १६७॥ -----

को एकपति को सत सहस, को लख कोउ  करोड़ ।
जगत  माहि सबहि जीबित, बहुरि लोभ को छोड़ ।१६७१। 
 ----- ॥ विदुर-नीति ॥ -----
भावार्थ : -- कोई एक पति है कोई सौपति है कोई सहस्त्र लाख कोई कोई तो करोड़पति है ॥ जब जगत में एक वाला भी जीवित है फिर तो लोभ का त्याग कर देना चाहिए ॥

तात्पर्य : -- साधन कोई भी क्यों न हो एक ही होना चाहिए : -- एक घर, एक वाहन, एक पति( नर) , एकपत्नी ( नारी) ,  एक ही संतान (एक माता की एक पिता की) होनी चाहिए । भले ही हाथ-पैर टूट जाएं तथापि एक ही संतान होनी चाहिए ॥

बिरध बयस सुखप्रद रहे, मरनि परतस बिश्राम । 
प्रथम बय सों जीवन भर, कारौ सोई काम ।१६७२। 
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- वृद्धावस्था में हम सुखपूर्वक रहे, मरणोपरांत जिससे हमारी आत्मा को शान्ति मिले । बाल्य अवस्था से लेकर जीवन भर तक हमें वही कार्य करने चाहिए ॥

कदाचारी धनि सोंहि  बर, सदाचारी धनहीन । 
कुल बंस के तोल करे त, सद्गुनि होत कुलीन । १६७३ । 
 ----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- कदाचारी धनवंत से सदाचारी निर्धन श्रेष्ठ  होता है । यदि  कुल-वंश की तुलना करें तो दुर्गुणी धनवंत से सद्गुणी निर्धन कुलीन होता है ॥

करता दूषित करम कर रहा दूज को पोष । 
पोषित को सब छूट है, तेरे पेटे दोष ।१६७३। 

----- ॥ विदुर नीति ॥ -----भावार्थ : --  रे कर्ता ! तू दूषित कर्म करके दूसरों का पोषण क्यूँ कर रहा है ।पोषित को सब कुछ की छूट है,  दोष और दंड तेरे भाग में लिखे जाएंगे ॥  

अधमी आए बिनु बुलाए , पूछे बिनु ही भास । 
अबिसबासी मानस पर, करत बहुंत बिसबास ।१६७४ । 
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- मूढ़ चित्त वाला अधम मनुष्य बिना बुलाए ही चला आता है,बिना पूछे ही बहुंत बोलता है । तथा  अविश्वासी मनुष्यों पर अतिशय विश्वास करता है ॥ 

मान लहत प्रफूर उठे, अपमान लह मुरझाए । 
महमति के मंडली मैं, सोइ मूढ़ कहलाए ।१६७४ । 
 ----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ  : -- जो मान प्राप्तकर फूला नहीं समाता तथा अपमानित होने पर संतापित हो जाता है । वह बुद्धिमानों की मंडली में मूर्ख कहलाता है  ॥ 

धनुधर के सर कदाचित, करे न एकहु हास । 
बुद्धमान के बुद्धि सन, सर्वस् करै बिनास ।१६७५। 
 ------ ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- शस्त्र धारी का शस्त्र चले तो कदाचित एक भी न मरे । यदि बुद्धिमान की बुद्धि चल गई तो वह सर्वस्व का नाश  कर देती है ॥

सस्त्र एक ही घात करे, बिष करे एकहि हास । 
मर्म भेद परजा संग, करात देस के नास ।१६७६। 
 ----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- शस्त्र एक को ही मारता है, विष रास एक ही प्राण ले सकता है । किसी राष्ट के रहस्य यदि उद्घाटित हो जाएं तो वह  निवासियों सहित उस राष्ट्र का विनाश करने में सक्षम है ॥

अश्रुत गुरु मह जुगति किए श्रम बिनु धन ललिहाए । 
महमति के मंडली मैं, निपट मूढ़ कहलाए ।१६७७ । 
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- विद्याहीन गुरु, बड़ी बड़ी युक्तियाँ करके परिश्रम के बिना ही धन की लालसा करने वाला,  बुद्धिमानों की मंडली में नीरा मूर्ख कहलाता है ॥

एक संग दुइ के निहचय, करत बस त्रि सन चार । 
पाँच जित के छ गुन जान, सुखि भव सत परिहार ।१६७८। 
          ----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- एक बुद्धि के संग कर्तव्य एवं अकर्त्तव्य ( अर्थात बुद्धि के संग इस बात का निश्चय करते हुवे कि क्या करना चाहिए क्या नहीं ) इन दो का निश्चय कर चार ( साम,दाम,दंड, भेद ) से तीन ( शत्रु, मित्र तथा तटस्थ ) को वश में करो । पांच ( पंचेन्द्रिय शब्द स्पर्श गंध रूप रस ) को जीतकर, छ: ( संधि,विग्रह, यान,आसान,द्वैधीभाव, वाम समाश्रयरूप ) को जानकर,  सात  ( स्त्री, द्यूत,आखेट, मद्य, कठोर वचन, दंड की कठोरता एवं अन्याय से धनोपार्जन ) का त्याग कर सुखी हो जाओ ॥

पाए गए राज अस लेख , किए अनुच्गित बरताउ । 
सो सासक तैइसिहु बुड़े, छिद्र गहे जस नाउ ।१६७९। 
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- 'अब तो राज पा गए' ऐसा समझ कर जो शासक अनुचित व्यवहार करता है वह छिद्रित नाव के सदृश्य डूब जाता है ॥

इरखालु घृनालु अतृप्त, क्रोही संसय हारि । 
पराए भाग्य आसरे, रहे सदा दुःख धारि ।१६९०। 
 ----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- ईर्ष्यालु, घृणा करने वाला, असंतोषी, क्रोधी, पराए भाग्य पर जीवन निर्वाह करने वाला, सदैव दुखी रहता है ॥ 








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