काम सधै जब एकै मैं, काहें लाहें दोए ।
लल जिहा सोइ बावरा, जो तीनन को रोए ।१७०१।
भावार्थ : -- जब एक में काम सध रहा हो तब दो का लोभ क्यों करें.....हैं न..... जो लल जिह्वा है वह तो बावरा है.....तीसरी के लिए भी रोता है.....
होवनिहार नयन पंथ चाहे केतक जोए ।
घन का अन्न का जनिमन, समउ सीर सब होए ।१७०२।
भावार्थ : -- होने वाले की चाहे कितनी ही प्रतीक्षा कर लो, घन हो कि अन्न हो कि संतान हो कि व्याह हो यह सब समय पर ही होते हैं ॥
साँच जग उजियार करे, झूठ करे अँधकार ।
अँधकार भए दीर्घायु, अलप भया उजियार।१७०३।
भावार्थ : -- सत्य संसार को सदैव उज्जवलित करता है असत्य उसे अंधकारमयी करता है । विद्यमान समय में अन्धकार की आयु दीर्घ हो गई है एवं उजियारा अल्पायु हो गया है ॥
बड़ी बड़ी किए जुगति अरु करै बहुंत बिश्राम ।
ताते बर श्रमकरत कर, छोटे छोटे काम ।१७०४।
भावार्थ : -- ( विश्राम पूर्वक) बड़ी बड़ी युक्तियाँ करने से श्रमपूर्वक छोटे छोटे कार्य करना अधिक श्रेयस्कर है ॥
अंतर्मन कंचन करौ, देहि करउ सोहाग ।
कंचनात्मन कुंदन भए, चिता देइ जब आग ।१७०५ ।
भावार्थ : -- अंतरमन को कंचन कर लेना चाहिए एवं देह को सुहागा । चिता में जब यह देह अग्नि को सौंप दी जाए तब यह कंचन स्वरूप अंतर्मन कुंदन बन के निकले ॥
पाछे किए दूषित करम, तसहि त्याजत जाउ ।
खेवनहारा तजत जस, पारगमन कर नाउ ।१७०६।
भावार्थ : -- पूर्व व्यतीत जीवन में पश्चाताप करते हुवे किए गए दूषित कर्मों को वैसे ही त्याग करते जाना चाहिए जैसे पार जाने के पश्चात यात्री नौका को त्याग देता है ॥
खाएँ पिएँ आनद करें, रहें बहूँत सुपास ।
ऐसे भोगी अजहुँ सन, बिरथा कल की आस ।१७०७।
भावार्थ : -- बहुंत ही सुख पूर्वक रहते हुवे 'खाएं पियें और मौज करें' । ऐसे भोगवादी वर्त्तमान से भविष्य की आस करना व्यर्थ है ॥
क्योंकि : -- "भोगवादी वर्त्तमान के भविष्य का कोई भविष्य नहीं होता....."
भली बानि बनाई के, गुन लहे न लउ लेस ।
आवन रावण ही रहा, भरे साधू के भेस ।१७०८।
भावार्थ : -- सुन्दर वेशभूषा धारण कर लेने से भी कहीं सज्जनता आती है भला ? रावण ने भी सज्जनों का वेश भरा था, रहा वो दुष्ट का दुष्ट ही ॥
दुर्गुन को परिहार के, सद्गुण के कर कोष ।
जीवनक कुंचित कारि कर, किंचित मैं संतोष ।१७०९।
भावार्थ : -- दुर्गुणों को छोड़ कर सद्गुणों के भंडार भर लेने चाहिए । अपनी आवश्यकताएँ सिमित कर थोड़े में ही संतुष्ट रहना चाहिए ॥ तभी भविष्य का भविष्य बनेगा.....
चित्रपट के नायक सोंह, उतरे पराए देस ।
नीति ने नेम जान बिनु, कह मैं जगत नरेस ।१७१०।
भावार्थ : -- देखो उस जगत नरेस को जिसे शासन संचालित करने की न तो वैश्विक नीतियों का पता है न ने का न नियमों का । पराए देस में ऐसे उतरता है जैसे किसी चलचित्र का नायक हो ॥
लल जिहा सोइ बावरा, जो तीनन को रोए ।१७०१।
भावार्थ : -- जब एक में काम सध रहा हो तब दो का लोभ क्यों करें.....हैं न..... जो लल जिह्वा है वह तो बावरा है.....तीसरी के लिए भी रोता है.....
होवनिहार नयन पंथ चाहे केतक जोए ।
घन का अन्न का जनिमन, समउ सीर सब होए ।१७०२।
भावार्थ : -- होने वाले की चाहे कितनी ही प्रतीक्षा कर लो, घन हो कि अन्न हो कि संतान हो कि व्याह हो यह सब समय पर ही होते हैं ॥
साँच जग उजियार करे, झूठ करे अँधकार ।
अँधकार भए दीर्घायु, अलप भया उजियार।१७०३।
भावार्थ : -- सत्य संसार को सदैव उज्जवलित करता है असत्य उसे अंधकारमयी करता है । विद्यमान समय में अन्धकार की आयु दीर्घ हो गई है एवं उजियारा अल्पायु हो गया है ॥
बड़ी बड़ी किए जुगति अरु करै बहुंत बिश्राम ।
ताते बर श्रमकरत कर, छोटे छोटे काम ।१७०४।
भावार्थ : -- ( विश्राम पूर्वक) बड़ी बड़ी युक्तियाँ करने से श्रमपूर्वक छोटे छोटे कार्य करना अधिक श्रेयस्कर है ॥
अंतर्मन कंचन करौ, देहि करउ सोहाग ।
कंचनात्मन कुंदन भए, चिता देइ जब आग ।१७०५ ।
भावार्थ : -- अंतरमन को कंचन कर लेना चाहिए एवं देह को सुहागा । चिता में जब यह देह अग्नि को सौंप दी जाए तब यह कंचन स्वरूप अंतर्मन कुंदन बन के निकले ॥
पाछे किए दूषित करम, तसहि त्याजत जाउ ।
खेवनहारा तजत जस, पारगमन कर नाउ ।१७०६।
भावार्थ : -- पूर्व व्यतीत जीवन में पश्चाताप करते हुवे किए गए दूषित कर्मों को वैसे ही त्याग करते जाना चाहिए जैसे पार जाने के पश्चात यात्री नौका को त्याग देता है ॥
खाएँ पिएँ आनद करें, रहें बहूँत सुपास ।
ऐसे भोगी अजहुँ सन, बिरथा कल की आस ।१७०७।
भावार्थ : -- बहुंत ही सुख पूर्वक रहते हुवे 'खाएं पियें और मौज करें' । ऐसे भोगवादी वर्त्तमान से भविष्य की आस करना व्यर्थ है ॥
क्योंकि : -- "भोगवादी वर्त्तमान के भविष्य का कोई भविष्य नहीं होता....."
भली बानि बनाई के, गुन लहे न लउ लेस ।
आवन रावण ही रहा, भरे साधू के भेस ।१७०८।
भावार्थ : -- सुन्दर वेशभूषा धारण कर लेने से भी कहीं सज्जनता आती है भला ? रावण ने भी सज्जनों का वेश भरा था, रहा वो दुष्ट का दुष्ट ही ॥
दुर्गुन को परिहार के, सद्गुण के कर कोष ।
जीवनक कुंचित कारि कर, किंचित मैं संतोष ।१७०९।
भावार्थ : -- दुर्गुणों को छोड़ कर सद्गुणों के भंडार भर लेने चाहिए । अपनी आवश्यकताएँ सिमित कर थोड़े में ही संतुष्ट रहना चाहिए ॥ तभी भविष्य का भविष्य बनेगा.....
चित्रपट के नायक सोंह, उतरे पराए देस ।
नीति ने नेम जान बिनु, कह मैं जगत नरेस ।१७१०।
भावार्थ : -- देखो उस जगत नरेस को जिसे शासन संचालित करने की न तो वैश्विक नीतियों का पता है न ने का न नियमों का । पराए देस में ऐसे उतरता है जैसे किसी चलचित्र का नायक हो ॥