मंगलवार, 29 जुलाई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १७०॥ -----

काम सधै जब एकै मैं, काहें लाहें दोए । 
लल जिहा सोइ बावरा, जो तीनन को रोए ।१७०१। 
भावार्थ : -- जब एक में काम सध रहा हो तब दो का लोभ क्यों करें.....हैं न..... जो लल जिह्वा है वह तो बावरा है.....तीसरी के लिए भी रोता है.....

होवनिहार नयन पंथ चाहे केतक जोए । 

घन का अन्न का जनिमन, समउ सीर सब होए ।१७०२। 
भावार्थ : -- होने वाले की चाहे कितनी ही प्रतीक्षा कर लो, घन हो कि अन्न हो कि संतान हो कि व्याह हो यह सब समय पर ही होते हैं ॥

साँच जग उजियार करे, झूठ करे अँधकार । 
अँधकार भए दीर्घायु, अलप भया उजियार।१७०३। 
भावार्थ : -- सत्य संसार को सदैव उज्जवलित करता है असत्य उसे अंधकारमयी करता है । विद्यमान समय में अन्धकार की आयु दीर्घ हो गई है एवं उजियारा अल्पायु  हो गया है ॥

बड़ी बड़ी किए जुगति अरु  करै बहुंत बिश्राम । 
ताते बर श्रमकरत कर, छोटे छोटे काम ।१७०४। 

भावार्थ : --  ( विश्राम पूर्वक) बड़ी बड़ी युक्तियाँ करने से श्रमपूर्वक छोटे छोटे कार्य करना अधिक श्रेयस्कर है ॥ 

अंतर्मन कंचन करौ, देहि करउ सोहाग । 
कंचनात्मन कुंदन भए, चिता देइ जब आग ।१७०५ । 

भावार्थ : -- अंतरमन को कंचन कर लेना चाहिए एवं देह को सुहागा । चिता में जब यह देह अग्नि को सौंप दी जाए तब यह कंचन स्वरूप अंतर्मन कुंदन बन के निकले ॥ 

पाछे किए दूषित करम, तसहि त्याजत जाउ । 
खेवनहारा तजत जस, पारगमन कर नाउ ।१७०६। 
भावार्थ : -- पूर्व व्यतीत जीवन में पश्चाताप करते हुवे किए गए दूषित कर्मों को वैसे ही त्याग करते जाना चाहिए जैसे पार जाने के पश्चात यात्री नौका को त्याग देता है ॥ 


खाएँ पिएँ आनद करें, रहें बहूँत सुपास । 
ऐसे भोगी अजहुँ सन, बिरथा कल की आस ।१७०७। 
भावार्थ : -- बहुंत ही सुख पूर्वक रहते हुवे 'खाएं पियें और मौज करें' । ऐसे भोगवादी वर्त्तमान से भविष्य की आस करना व्यर्थ है ॥ 

क्योंकि : -- "भोगवादी वर्त्तमान के भविष्य का कोई भविष्य नहीं होता....." 

भली बानि बनाई के, गुन  लहे न लउ लेस । 
आवन रावण ही रहा, भरे साधू के भेस ।१७०८। 
भावार्थ : -- सुन्दर वेशभूषा धारण कर लेने से भी कहीं सज्जनता आती है भला  ? रावण ने भी सज्जनों का वेश भरा था, रहा वो दुष्ट का दुष्ट ही  ॥ 

दुर्गुन को परिहार के, सद्गुण के कर कोष । 
जीवनक कुंचित कारि कर, किंचित मैं संतोष ।१७०९। 
भावार्थ : -- दुर्गुणों को छोड़ कर सद्गुणों के भंडार भर लेने चाहिए । अपनी आवश्यकताएँ सिमित कर थोड़े में ही संतुष्ट रहना चाहिए ॥ तभी भविष्य का भविष्य बनेगा..... 

चित्रपट के नायक सोंह, उतरे पराए देस । 
नीति ने नेम जान बिनु, कह मैं जगत नरेस ।१७१०। 
भावार्थ : -- देखो उस जगत नरेस को जिसे शासन संचालित करने की न तो वैश्विक नीतियों का पता है न ने का न नियमों का । पराए देस में ऐसे उतरता है जैसे किसी चलचित्र का नायक हो ॥ 





शनिवार, 5 जुलाई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १६९ ॥ -----

भरमन अरु संदेह के, जग मैं नाहि उपाए । 
जनमन अरु अमरता के, औषध नहि सोधाए ।१६९१। 
भावार्थ : -- भ्रम एवं संदेह का जग में कोई उपचार नहीं है । जन्म एवं अमृत्यु की अभतक कोई औषधि नहीं बनी है, अर्थात औषधि देकर किसी का जन्म नहीं हो सकता औषधि से मृत्यु नहीं रोकी नहीं जा सकती रुकती तो यह जग बड़े-बूढ़ों से भरा रहता ॥

 कबिबर ब्यास परस मनि, रत्नाकर एक लौह । 
 महा भारत रामकथा ,  लौह परस मनि सौह ।१६९२। 
भावार्थ : -- कदाचित कविवर व्यास पारस मणि है कविवर रत्नाकर लौह के सदृश्य थे । महा भारत कथा यदि लौह थी तो श्री राम कथा एक पारसमणि है ॥

कहुँ गहनई लगे बिटप, जब समूल उपराए । 
तनि जलकन दाने तबहि, अबर थरी हरियाए । १६९३।  
भावाथ : - कहीं गहरे लगा विटप जब समूल उखड़ता है,  अन्य स्थल पर  तब वह किंचित जल कण (एवं किंचित समय )  प्राप्त कर ही हरा- भरा होता है ॥


दिनभर के किए सदकृत् संग, रयनइ सुखकर होए । 
बीते जब सुखकर रयन, दिनभर सदकृत जोए ।१६९४। 
भावार्थ : -- दिनभर के किए सद्कार्यों से रात्र सुखपूर्वक व्यतीत होती है । सुखपूर्वक व्यतीत हुई रात्रि दिनभर सद्कर्मों को संजोती है ॥

ऊँच पहुँच के जलधिहू, सरुबर देत दिखाए । 
नीचक उतरत सरबरहु, जलधिहि सम डोबाए ।१६९५। 
भावार्थ : -- ऊँचे पहुंचकर सिंधु भी सरोवर के सदृश्य दिखाई देता है । निचे उतरो तो सरोवर भी जलधि के सदृश्य डूबा  देता है ॥

दया हीनता मलिनए मन, अदेयन धन मलिनाए । 
अकर्मनता मलिनए तन, बुद्धि बिरथा सुभाए ।१६९६। 
भावार्थ : -- निष्ठुरता मन को मलिन का देती है अदायन धन को मलिन कर देता है । अकर्मण्यता तन को मलिन का देती है, मृषावादी स्वभाव बुद्धि को मलिन कर देता है ।।

बानी अहइँ  तिरजक गुन, साँच मधुर हितबादि । 
होए तिनहु गुन बिपरीत, आपस मह जब बादि ।१६९७। 
भावार्थ : -- वाणी के तीन गुण होते हैं  : -- सत्य, मधुर  एवं हितवादी । ये तीनों गुण तब विपरीत हो जाते हैं जब परस्पर विवाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है ।।

खनिज सम्पदा दाव सम, बृथा करम सम दाह । 
डाह दाव मैं जा लगे, सरबस करे स्वाह ।१६९८। 
भावार्थ : -- खनिज संपदा दाव के सदृश्य है। निष्प्रयोजन अथावा मनोरंजन हेति अथवा भोग विलास हेतु किये जाने वाले कार्य आसुरी अग्नि के सदृश्य हैं । जब यह अग्नि उस दाव में जा लगती है, तब सर्वस्व भस्मीभूत कर देती है ॥

होवनि का होवनिहार, फल तरु सब हुँत लाग । 
साजन तब का पाइये, काटी दिए जब आग ।१६९९। 
भावार्थ : -- क्या हुवे हुए क्या होने वाले, तरु इन फल सभी के लिए लगते हैं ।  तब क्या प्राप्त होगा जब उसे काट कर आग में झोंक दिया जाए  ॥

साँचे बचन अगनी सम, झूठे तृण के तूल ।
अगनी तृण को जा लगे, कारे भस्म समूल ।१७००।
भावार्थ : -- सत्यवचन अग्नि के एवं असत्य तृण के समतूल्य होते हैं । यदि अग्नि तृण को जा आगे तो उस तृण का सामूल नाश कर देती है ||






बुधवार, 2 जुलाई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १६८ ॥ -----

करषक कन की आस में, भू के कंठ प्यास । 
चातक नैन तरस रहे, धनबन भयउ उदास ।१६८१।  
भावार्थ : -- कृषक कणों की आशा में है, धरती का कंठ प्यासा है ।  चातक स्वरूप नैन तरस रहे हैं, गगन देव हैं की बैरागी हो गए  ॥

दान बिनु सद्चारी धनि, परिश्रम के बिनु रंक । 
सेवा बिनु जनसेवक, यह सब देस कलंक ।१६८२। 
भावार्थ : -- सदाचारी अदानी धनी,  परिश्रम हीन निर्धन, सेवाविमुख जन-सेवक ये सब राष्ट्र के कलंक  स्वरूप हैं ॥

करषक खेह कमाई के, बोवै एक ही सार । 
सीचत सरिस सकल अंग, भरे कनक भंडार ।१६८३। 
भावार्थ : - कृषक खेत कमा कर जब उस की एकसार बुआई करता है ।  सभी अंगों को समान स्वरूप में सींचता है  तभी उपज से उसका भण्डार भरता है ॥

" एक उत्तम: शासक कृषक का अनुकरण कर राजस्व से भंडार भरता है"

तन तो लास भवन बसा, मन धन का अनुरागि । 
कपटि साधौ भेस धरा, कहता मैं बेरागि  ।१६८४ । 
भावार्थ :-- जिसका तन विलास भवन में बसा है और मन धन में अनुरक्त है । वह कपटी साधुओं वेश धारण कर कहते फिरते हैं हम तो वैरागी हैं ॥ 

चाहे लौहु आलबाल, चाहे कंचन थाल । 
भोजन रूप भोजन है, काल रूप है काल ।१६८५। 
भावार्थ : -- चाहे लोहे का थाल हो कि कंचन का थाल हो भोजन तो भोजन ही रहेगा । कंचन के थाल में जिम लेने से अमरत्व प्राप्त नहीं होगा मृत्यु तो फिर भी अपने सवरूप में ही रहेगी ।  

पैह परस भगवान चरन, भयो सील उद्धार । 
तोर परस को उद्धरे, आगिन  बाधत कार ।१६८६। 
भावार्थ : -- भगवान श्रीराम के चरण राज का स्पर्श प्राप्तकर सील हुई अहिल्या का उद्धरण प्रसंग यही उपदेश देता यदि तुम्हारे स्पर्श मात्र से किसी उद्धरण होता हो तो उसे आगे बढ़ कर करना चाहिए ॥ अस्पृश्यता की बुद्धि जाने कहाँ से आई ॥ 

भरे भेस तन राजसी, चले हंस की चाल । 
राजा है कि जन सेवक हैं, बिपनी हैं कि ब्याल ।१६८७ । 
भावार्थ : -- देह  राजसी भेस से सुसज्जित है, मराली  चाल चलते हैं ॥ ये  राजा हैं कि जनता जनार्दन के सेवक हैं कि धंधेबाज है कि हिंसक जंतु हैं ॥ कृपया संविधान स्पष्ट करे ॥ 

कामि बृत तन तरु कोटर, ब्यसन अहि के भेस । 
बरबस निज अधिकार कर ,  कारे सकल  कलेस ।१६८८। 
 भावार्थ : -- इच्छा, आकांक्षा, कुत्सित काम में प्रवृत्त  देह तरु कोटर के सदृश्य है , व्यसन सर्प के भेष में है । जो उस कोटर में बलपूर्वक अपना अधिकार स्थापित कर समस्त क्लेशों को जन्म देता है ॥ 

मारे जंतु जिहवा हुँत,  दयाहीन भए  लोग । 
पसु चाम तजत पलावन  , चरन त्रान मैं जोग ।१६८९। 
भावार्थ : -- कलयुग छाया हुवा है  लोग दया से विहीन हो गए है ये अपनी जिह्वा के  स्वाद हेतु जीवों पर अत्याचार कर रहे हैं । हमें भी पशु चर्म को त्याग कर प्लाव ( प्लास्टिक ) को अपने चरणों की रक्षा हेतु नियुक्त करना चाहिए ॥ 

नाउ बाचत निजी लषन, जात लषन उपनाउ । 
बरन बाचत करम लषन, धरम बाँचे सुभाउ  ।१६९०। 
भावार्थ : -- नाम आपकी निजता का परिचायक है अर्थात नाम यह बताता है कि आप कौन हैं, उपनाम यह बताता है कि आप कहाँ से आये हैं । वर्ण यह बताता है कि आप क्या करते थे या करते हैं, धर्म यह बताता है कि आपका स्वभाव आपका आचरण कैसा था अथवा है॥ 



मंगलवार, 1 जुलाई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १६७॥ -----

को एकपति को सत सहस, को लख कोउ  करोड़ ।
जगत  माहि सबहि जीबित, बहुरि लोभ को छोड़ ।१६७१। 
 ----- ॥ विदुर-नीति ॥ -----
भावार्थ : -- कोई एक पति है कोई सौपति है कोई सहस्त्र लाख कोई कोई तो करोड़पति है ॥ जब जगत में एक वाला भी जीवित है फिर तो लोभ का त्याग कर देना चाहिए ॥

तात्पर्य : -- साधन कोई भी क्यों न हो एक ही होना चाहिए : -- एक घर, एक वाहन, एक पति( नर) , एकपत्नी ( नारी) ,  एक ही संतान (एक माता की एक पिता की) होनी चाहिए । भले ही हाथ-पैर टूट जाएं तथापि एक ही संतान होनी चाहिए ॥

बिरध बयस सुखप्रद रहे, मरनि परतस बिश्राम । 
प्रथम बय सों जीवन भर, कारौ सोई काम ।१६७२। 
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- वृद्धावस्था में हम सुखपूर्वक रहे, मरणोपरांत जिससे हमारी आत्मा को शान्ति मिले । बाल्य अवस्था से लेकर जीवन भर तक हमें वही कार्य करने चाहिए ॥

कदाचारी धनि सोंहि  बर, सदाचारी धनहीन । 
कुल बंस के तोल करे त, सद्गुनि होत कुलीन । १६७३ । 
 ----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- कदाचारी धनवंत से सदाचारी निर्धन श्रेष्ठ  होता है । यदि  कुल-वंश की तुलना करें तो दुर्गुणी धनवंत से सद्गुणी निर्धन कुलीन होता है ॥

करता दूषित करम कर रहा दूज को पोष । 
पोषित को सब छूट है, तेरे पेटे दोष ।१६७३। 

----- ॥ विदुर नीति ॥ -----भावार्थ : --  रे कर्ता ! तू दूषित कर्म करके दूसरों का पोषण क्यूँ कर रहा है ।पोषित को सब कुछ की छूट है,  दोष और दंड तेरे भाग में लिखे जाएंगे ॥  

अधमी आए बिनु बुलाए , पूछे बिनु ही भास । 
अबिसबासी मानस पर, करत बहुंत बिसबास ।१६७४ । 
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- मूढ़ चित्त वाला अधम मनुष्य बिना बुलाए ही चला आता है,बिना पूछे ही बहुंत बोलता है । तथा  अविश्वासी मनुष्यों पर अतिशय विश्वास करता है ॥ 

मान लहत प्रफूर उठे, अपमान लह मुरझाए । 
महमति के मंडली मैं, सोइ मूढ़ कहलाए ।१६७४ । 
 ----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ  : -- जो मान प्राप्तकर फूला नहीं समाता तथा अपमानित होने पर संतापित हो जाता है । वह बुद्धिमानों की मंडली में मूर्ख कहलाता है  ॥ 

धनुधर के सर कदाचित, करे न एकहु हास । 
बुद्धमान के बुद्धि सन, सर्वस् करै बिनास ।१६७५। 
 ------ ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- शस्त्र धारी का शस्त्र चले तो कदाचित एक भी न मरे । यदि बुद्धिमान की बुद्धि चल गई तो वह सर्वस्व का नाश  कर देती है ॥

सस्त्र एक ही घात करे, बिष करे एकहि हास । 
मर्म भेद परजा संग, करात देस के नास ।१६७६। 
 ----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- शस्त्र एक को ही मारता है, विष रास एक ही प्राण ले सकता है । किसी राष्ट के रहस्य यदि उद्घाटित हो जाएं तो वह  निवासियों सहित उस राष्ट्र का विनाश करने में सक्षम है ॥

अश्रुत गुरु मह जुगति किए श्रम बिनु धन ललिहाए । 
महमति के मंडली मैं, निपट मूढ़ कहलाए ।१६७७ । 
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- विद्याहीन गुरु, बड़ी बड़ी युक्तियाँ करके परिश्रम के बिना ही धन की लालसा करने वाला,  बुद्धिमानों की मंडली में नीरा मूर्ख कहलाता है ॥

एक संग दुइ के निहचय, करत बस त्रि सन चार । 
पाँच जित के छ गुन जान, सुखि भव सत परिहार ।१६७८। 
          ----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- एक बुद्धि के संग कर्तव्य एवं अकर्त्तव्य ( अर्थात बुद्धि के संग इस बात का निश्चय करते हुवे कि क्या करना चाहिए क्या नहीं ) इन दो का निश्चय कर चार ( साम,दाम,दंड, भेद ) से तीन ( शत्रु, मित्र तथा तटस्थ ) को वश में करो । पांच ( पंचेन्द्रिय शब्द स्पर्श गंध रूप रस ) को जीतकर, छ: ( संधि,विग्रह, यान,आसान,द्वैधीभाव, वाम समाश्रयरूप ) को जानकर,  सात  ( स्त्री, द्यूत,आखेट, मद्य, कठोर वचन, दंड की कठोरता एवं अन्याय से धनोपार्जन ) का त्याग कर सुखी हो जाओ ॥

पाए गए राज अस लेख , किए अनुच्गित बरताउ । 
सो सासक तैइसिहु बुड़े, छिद्र गहे जस नाउ ।१६७९। 
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- 'अब तो राज पा गए' ऐसा समझ कर जो शासक अनुचित व्यवहार करता है वह छिद्रित नाव के सदृश्य डूब जाता है ॥

इरखालु घृनालु अतृप्त, क्रोही संसय हारि । 
पराए भाग्य आसरे, रहे सदा दुःख धारि ।१६९०। 
 ----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- ईर्ष्यालु, घृणा करने वाला, असंतोषी, क्रोधी, पराए भाग्य पर जीवन निर्वाह करने वाला, सदैव दुखी रहता है ॥ 








----- मिनिस्टर राजू १३६ -----

राजू : -- मास्टर जी ! प्रधानमंत्री जी! कहते हैं 'ई हमरी मैया का हनीमून पीरियड था..,'

 " हाँ तो "

राजू : -- तो का मास्टर जी ! अब पंद्रह अगस्त को कोन्हू 'गुड न्यूज़' भी आ ही जाएगी..,

" राजू ! हमें ये समझ नहीं आता ऐसे 'मास्टर माइंड' लोग बिना मास्टरनी के रहते कैसे हैं"

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...