शनिवार, 7 जून 2014

----- ॥ दोहा-दशम १५९ ॥ -----,

अधुनावधि नव चहत नहि, नव जुग के कृतकार  । 
करत नवल परिहार कर, जीर्न के उद्धार ।१५९१। 
भावार्थ : --हे नव युग के रचनाकार अद्यावधि को नवल कृति  की आवश्यकता नहीं है  कारण कि  प्राग कृतियाँ ही पर्याप्त है अत: तू नवकृति का विचार त्याग, जीर्ण का  उद्धार कर ॥  

रचना सबहि बिधि सम्मत, रीति असम्मत होए । 
रीतिलिप्त को दंड दए ,  रचना करतल जोए ।१५९२। 
भावार्थ : -- निर्माण कोई भी हो वह विधि विरुद्ध नहीं होता, उस निर्माण की प्रक्रिया विधि विरुद्ध होती है । अत: निर्माण को राजसात करते हुवे, प्रक्रिया में संलिप्त कर्त्ता को दण्डित करना चाहिए ॥ 

कर्म उद्यम संग जुगे, धरम संग आचार । 
पाप कुकरम संग जुगे, पुन जग सत्कृत कार ।१५९३।  
भावार्थ : -- कर्म उद्यम पर ही आधरित होता है, धरम आचरण पर । पाप कुकर्मों पर आधारित होता है, पुण्य जगत के हितकारी कार्यों पर ॥ 

जग मह राजन सोइ है, जो दै बहुस उदार । 
रंक साधन भूत हेतु, धन का संचयकार ।१५९४। 
 भावार्थ  : -- संसार में  राजा वही है जो न्यायोचित लाभ को संयम पूर्वक अर्जन एवं व्ययन करते हुवे शेष का उदार होकर दान करे,  जो पूर्णकामी हो जाए वह राजाओं का राजा है । रंक वह है जो अपनी आधार भूत आवश्यकता हेतु ऐहिक सुखों  के साधन भूत द्रव्यों का संचयन करता हो ॥ 

मैं पंच भूति पूतरा, कहत तेहि बिग्यान । 
मैं अन्तर्मन चिदगगन, कहत  दरसन ग्यान  ।१५९५ । 
भावार्थ : -  मैं पंच -तत्त्व ( अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल, आकाश ) से निर्मित देह हूँ , इसे विज्ञान कहते हैं । मैं अंतर में अवस्थित जीवात्मा हूँ ब्रह्म हूँ प्रकृति पुरुष ( आत्मा ) जीव,जगत ,माया, संघटन-विघटन  आदि विषयों के  निरूपण को दर्शन कहते हैं और ज्ञान कहते । 

अर्थात : -- पदार्थ के बाह्य स्वरूप के अध्ययन को विज्ञान कहते हैं एवं उसके आतंरिक गूढ़ विषयों के अध्ययन को ज्ञान अथवा  अध्यात्म कहते हैं ॥ 

बाहरी रूप दरस के, हेत राखियो नाह । 
लीला नाउ रखे राम, करत रंग रिल्लाह ।१५९६ । 
भावार्थ : -- केवल बाहरी स्वरूप को दर्श कर उससे प्रभावित नहीं  चाहिए । एक लीला ने अपना नाम राम रख लिया, पता चला उसके अंतर में तो रंग रिल्लाह हो रही थी ॥ 

काया धारे जनम लिए होहिहि अवसि बिहान । 
सतायुज हो कि सहसायु, चाहे हो भगवान ।१५९७ । 
भावार्थ : -- यदि काया धारण कर जन्म लिया तो उस काया का अवसान होना निश्चत है । वह चाहे शतायुज हो चाहे सहस्त्रायुज हो अथवा शाश्वत स्वरूप स्वयं ईश्वर ही क्यों न हो ॥ 

चिंत इहि लोक के चिंतन कर, चिन्ताकुल परलोक । 
ते जन चित ब्यापत नहि, भोग बिषय के सोक ।१५९८। 
भावार्थ : -- जो इहलोक की चिंता करते हुवे परलोक के चिंतन से व्याकुल रहते हैं । ऐसे पुरुष के चित्त को भोग विषयों की वियोग जनित पीड़ा व्यथित नहीं करती ॥ 

झूठ अनख जगाई के,गहे जग मृषा वाद । 
बेर बिरोध बिप्लव तहँ, लहे पूरन  प्रमाद ।१५९९ । 
भावार्थ : -- असत्य में परस्पर दुरस्पर्धा उत्प्रेरित कर, जब संसार ने मृषावाद को अंगीकार किया हो । तब वहां वैर-विरोध, संकट, दुराचरण आदि काल के कर्मकल्प पूर्ण प्रमाद को प्राप्त होते हैं ॥ 

सार सँजोत जौं बाढ़त, केसिनि के कल केस । 
मृषावाद गहत तौं जग ,  बाढ़त कपटी बेस । १६००।   
भावाथ : -- सार संजो कर जिस प्रकार केशिनी के केश वर्द्धित होते  हैं । उसी प्रकार मृषावाद से अंगीकृत संसार में  कपट व्यवहार का वर्द्धन होता है ॥ 






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