गुरुवार, 5 जून 2014

----- ॥ दोहा-दशम १५ ८ ॥ -----,

लाकुटिक लिये लकुटिया, हेरे दूषनहार । 
रे दुजन ते पाहिले, अपने सिर पर मार ।१५८१।
भावार्थ : -- शासक,सेवक,चौकीदार; डंडा लिए दोषियों के खोज करे । रे चौक्किदार ! दूसरे का फोड़ने से पहले अपना सिर फोड़ ॥ 

अर्थात : - कोई विधेयक अन्य पर लागू करने से पूर्व शासन-प्रशासन उसे स्वयं पर लागू करे अन्यथा विधेयक निरर्थक हैं एवं दूषित विधृति में इनका निर्माण समय का अपव्यय है ॥   

मैं स्वामि मैं लाकुडिक, मैं ही साधु सुजान । 
जाका मुख मैं मैं करे, छाग सम तेहि जान ।१५८२। 
भावार्थ : -- मैं स्वामी हूँ, मैं सेवक भी हूँ मैं चौकीदार हूँ मैं दण्डधारी भी हूँ मैं उत्तम पुरुष हूँ मैं ही विद्वान हूँ मैं ये हूँ मैं वो हूँ । जिस आसन धारी का मुख मैं मैं करता है उसे बकरा के समान समझना चाहिए ॥  

पहिले गन ले दन्त तब दाए गउ दानवंत । 
दान पैहि गउ जो गाहि, गिने न वाके दन्त ।१५८३। 
भावाथ : -- दानदाता को गौदान करने से पहले उसके दन्त की गणना कर लेनी चाहिए । ग्राही को यदि दान में गौ प्राप्त हो तो उसके दांतों की गणना नहीं करनी चाहिए । 

अर्थात : -- दानदाता द्वारा गन-दोष की परीक्षा कर केवल उपयोगी पदार्थों का ही दान करना चाहिए । दानग्रहीता को गुण -दोष का विचार किए बिना प्राप्य अनुपयोगी पदार्थ को उपयोगी बनाना चाहिए ॥ 

हितकारी को कृत करे पूर्ण लगन लगाए । 
अन्तररहित रीत बरे, लगन आप लग जाए ।१५८४। 
भावार्थ : -- यदि कोई हितकारी कृत्य करें तो मनोयोग सहित पूर्ण लगन से करे । यदि कार्य निर्विध्न हो अबाध एवं निरंतर स्वरूप में हो तो लगन स्वयं ही लग जाती है ॥ 

करिहउँ अँधुआ भगति तो, होहू बंधुआ दास । 
दोष जुगित जे श्रीबिग्रह, बँधत सोइ के पास ।१५८५। 
भावार्थ : -- अंधभक्ति किसी की भी नहीं करनी चाहिए,  यह श्रीविग्रह ईश्वर का ही क्यों न हो उसमें कुछ न कुछ दोष अवश्य होता है वही दोष बंधुआ भक्त के बंधन का कारण बनते है और अंधा भक्त बंधुआ दास हो जाता है  फिर वह ईश्वरीय गुणों के सह अनीश्वरीय अवगुणों का भी अनुशरण करने लगता है ॥ 

नर नारी जोग जुगाए दोउ रचत परिबारु  । 
समुदाय पुनि समाज भए, परिबारु समाहार ।१५८६।  
भावार्थ : -- " स्त्री-पुरुष के सम्यक एवं पारस्परिक सु-सम्बन्ध पारिवारिक इकाई का निर्माण करते है.."परिवारों के समाहार से समुदाय एवं समाज  निर्मित होता है ॥

धर्म कदाचित सुबिचिता विचारिन्हि संचाइ  । 

देस जाति कौटुमिक जन, जाके कृत अनुयाइ ।१५८७। 
भावार्थ : --   धर्म कदाचित सुविचित सुविचारों का संग्रह है कोई व्यक्ति कौटुम्ब जाति समाज जिसका अनुशरण  करता है ॥

कलाकृति हो कि को भनिति, ऐतक  हो अवतंस । 
रचनाकार नाउ बिना, पावै आप प्रसंस ।१५७८। 
भावार्थ : -- कोई कलाकृति अथवा भणिति इतनी उत्कृष्ट होनी चाहिए कि उसे प्रशंसा प्राप्त करने हेतु रचनाकार के नाम की आवश्यकता न पड़े ॥

साधन चहे जो को हो , पहि दुर्जन के हाथ । 
दुर्दसा निहचित  लहि जौ  गहि खल माया साथ ।१५८९। 
भावार्थ : --  ऐहिक सुख के द्रव्यों का साधन हो, ज्ञान का साधन हो सुचना एवं संचार साधन हो,  अथवा कोई भी क्यों न हो  यदि वह आसुरी माया की संगती कर दुर्जनों के  हाथ लग गया तब उसका सत्यानाश होना  निश्चित है ॥ 

गन तंत्र  भीत गठित दल, निज हेतु गयउ भूल । 
जेइ दलगत रीति बने, प्रगति पंथ के सूल ।१५९०। 
भावार्थ : -- गणतंत्र  के अंतर्गत गठित निर्वाचन दलों को अपने  उद्देश्य विस्मृत हो गए, परिणाम स्वरूप निर्वाचन प्रणाली की यह दलगत रीति राष्ट्र के प्रगति-पंथ का कंटक बनी हुई है ॥








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