संचित सम्पद बार के, सम्पद साधन जोए ।
तासों सम मह मूरखा, अगजग लग ना होए ।१६६१।
भावार्थ : -- अपनी संचित सम्पदा में आग लगा के फिर जो उसी सम्पदा को प्राप्त करने के साधन संजोता हो । संसार में ढूंढ आओ उसके जैसा महा मूर्ख कहीं नहीं मिलेगा ॥
अगन सँवारत लौह जस, लौह सँवारत हेम ।
हेम सँवारत सुभग तस, सुभग सँवारत प्रेम ।१६६२।
भावार्थ : -- जिस प्रकार अग्नि लोहे को, लोहा स्वर्ण को सवर्ण सोहाग को संवारता है उसी प्रकार सौभाग्य जनक कर्म प्रेम को संवारते है ॥
प्रियतम आपनि संग किए, तू तू मैं मैं काहि ।
आप को खोए हमहि गए, रहे कौन जग माहि ।१६६३।
भावार्थ : -- प्रियतम आप के संग हम ने तू तू मैं मैं काहे की । आप ( संग) को भी खो दिया, हम ( प्रसंग ) भी नहीं रहे अब कहो जग में कौन रह गया ॥
बिरवा पुहुप पुहुप रंग, पवन गंध प्रसंग ।
नयन सपन सपन साजन, फिर तू काहु एकंग ।१६६४।
भावार्थ : -- बिरवा फूल के संग है फूल रंग के संग है , पवन के संग गंध है । नयन संग सपन, सपन संग साजन है फिर तू क्यों एकंग है ॥
राम नाम मुख जाप के, बर आसन तो पाए ।
कहत सुबुधी निपते तब, आहहु निकसत नाए ।१६६५।
भावार्थ : -- ईश्वर का जाप करने से ऊंचा सिंहासन तो मिल जाता है । सुबुद्धि जन कहते हैं जब वहां से गिरते हैं न तब मुख से हाय हाय भी नहीं निकलती । भैया इतने ऊंचा बैठो कि गिरे तो हाय हाय कर सके ॥
डोले माहि डोल रहा, पहन पंच परिधान ।
ऐसो भगत देख कहत भगवनहु हे भगवान ।१६६५।
भावार्थ : -- तुम्हारे परम भक्त जन सेवक पंच परिधान पहन के डोलों में ही डोलते रहते हैं ॥ ऐसे भगत सेवको को देखकर भगवान भी हे भगवान ! कहता है ।
जल कन सुबचन धर्म धन, जोई रखे सँजोए ।
पुनि जलावन जोग धरे, निर्धन कबहु न होइ ।१६६७।
भावाथ : -- जो राष्ट्र जल अन्न सुभाषितम् सहित धर्म एवं ईंधन का संग्रह करता हो, वह राष्ट कभी निर्धन नहीं होता ॥
स्पष्टीकरण : -- एक राष्ट हेतु धर्म का तात्पर्य है : -- सत्य, अहिंसा, शौच एवं दान
" अहिंसा से शान्ति एवं पशुधन की वृद्धि होती है ॥"
धन अपव्ययन जस कृपन पसु धन नसे सँभार ।
बाताबरन दुषन नसे, आसा धीरज हार ।१६६८।
भावार्थ : -- धन अपव्ययं से नष्ट होता है, यश कृपणता से नष्ट होता है । पशु धन सार-सम्भार से नष्ट होता है । हवा-पानी प्रदुषण से नष्ट होते है । धैर्य आशान्वित होने से नष्ट हो जाता है ॥
तासों सम मह मूरखा, अगजग लग ना होए ।१६६१।
भावार्थ : -- अपनी संचित सम्पदा में आग लगा के फिर जो उसी सम्पदा को प्राप्त करने के साधन संजोता हो । संसार में ढूंढ आओ उसके जैसा महा मूर्ख कहीं नहीं मिलेगा ॥
अगन सँवारत लौह जस, लौह सँवारत हेम ।
हेम सँवारत सुभग तस, सुभग सँवारत प्रेम ।१६६२।
भावार्थ : -- जिस प्रकार अग्नि लोहे को, लोहा स्वर्ण को सवर्ण सोहाग को संवारता है उसी प्रकार सौभाग्य जनक कर्म प्रेम को संवारते है ॥
प्रियतम आपनि संग किए, तू तू मैं मैं काहि ।
आप को खोए हमहि गए, रहे कौन जग माहि ।१६६३।
भावार्थ : -- प्रियतम आप के संग हम ने तू तू मैं मैं काहे की । आप ( संग) को भी खो दिया, हम ( प्रसंग ) भी नहीं रहे अब कहो जग में कौन रह गया ॥
बिरवा पुहुप पुहुप रंग, पवन गंध प्रसंग ।
नयन सपन सपन साजन, फिर तू काहु एकंग ।१६६४।
भावार्थ : -- बिरवा फूल के संग है फूल रंग के संग है , पवन के संग गंध है । नयन संग सपन, सपन संग साजन है फिर तू क्यों एकंग है ॥
राम नाम मुख जाप के, बर आसन तो पाए ।
कहत सुबुधी निपते तब, आहहु निकसत नाए ।१६६५।
भावार्थ : -- ईश्वर का जाप करने से ऊंचा सिंहासन तो मिल जाता है । सुबुद्धि जन कहते हैं जब वहां से गिरते हैं न तब मुख से हाय हाय भी नहीं निकलती । भैया इतने ऊंचा बैठो कि गिरे तो हाय हाय कर सके ॥
डोले माहि डोल रहा, पहन पंच परिधान ।
ऐसो भगत देख कहत भगवनहु हे भगवान ।१६६५।
भावार्थ : -- तुम्हारे परम भक्त जन सेवक पंच परिधान पहन के डोलों में ही डोलते रहते हैं ॥ ऐसे भगत सेवको को देखकर भगवान भी हे भगवान ! कहता है ।
जल कन सुबचन धर्म धन, जोई रखे सँजोए ।
पुनि जलावन जोग धरे, निर्धन कबहु न होइ ।१६६७।
भावाथ : -- जो राष्ट्र जल अन्न सुभाषितम् सहित धर्म एवं ईंधन का संग्रह करता हो, वह राष्ट कभी निर्धन नहीं होता ॥
स्पष्टीकरण : -- एक राष्ट हेतु धर्म का तात्पर्य है : -- सत्य, अहिंसा, शौच एवं दान
" अहिंसा से शान्ति एवं पशुधन की वृद्धि होती है ॥"
धन अपव्ययन जस कृपन पसु धन नसे सँभार ।
बाताबरन दुषन नसे, आसा धीरज हार ।१६६८।
भावार्थ : -- धन अपव्ययं से नष्ट होता है, यश कृपणता से नष्ट होता है । पशु धन सार-सम्भार से नष्ट होता है । हवा-पानी प्रदुषण से नष्ट होते है । धैर्य आशान्वित होने से नष्ट हो जाता है ॥
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