बटमारु के नत नीरत, चोरन की चतुराइ ।
पाखनी के परमारथ , जन जन के मन भाइ ।१६५१ ।
भावार्थ : -- अब तो जनता जनार्दन के मन को दूसरों का स्वत्व हरण करने वाले भाते हैं और लुटेरों की कला और नृत्य एवं पाखंडियों का परमार्थ ही भाता है ॥
कहत दुर्मूल दुरमूल, आँखि देखावहिं डाँटि ।
सबद पाती सासक किए, हम केहि ते कहुँ घाटि ।१६५२।
भावार्थ : -- मँहगाई को महगाई कह दो तो अपने चाटुकारों को आँख दे दे के डँटवाता है । धूत बुडबग कहीं के ये महंगाई थोड़े ही छे.....ऐसा बोल के । जब शब्द पाती को शासक नियुक्त करना था तो 'हम ' क्या किसी से घाट थे ॥
रामायन अग जग सुना, किया परस्पर प्रीति ।
रे भारती सठ तेरी , भई बिपरीत रीति ।१६५३।
भावार्थ : -- रामायण को सारे संसार ने श्रवण किया । और श्रवण कर सौहार्दयता एवं परस्पर प्रीति करते हुवे सौहार्द का व्यवहार सीखा । रे दुष्ट भारतीयों तुम्हारी बुद्धि विपरीत हो गई ॥
" अरे सठ भारतीय ! तू वर्ण से विवर्ण हो गया किन्तु गोरे अभी तक गोरे हैं यह स्मरण रहे "
बढ़नी तेतकहि अनुकूल, जाके जेतक मूल ।
प्रतिकूल एक दिन निपतत, किए निज नास समूल ।१६५४।
भावार्थ : -- समृद्धि योग्यता के अनुकूल होनी चाहिए । अनुचित साधनों से प्राप्त की गई प्रतिकूल समृद्धि पतन का कारण बनती है और एक दिन पूर्णत: नष्ट कर देती है ॥
सम्पद जल धनपत कमल, चेरे रबि समतूल ।
तब लग नैन फूरित किए, जब लग जल गह मूल ।१६५५।
भावार्थ : -- सम्पदा/प्रतिष्ठा यदि जल है तो धनपति कमल है, चाटुकार उस रवि के समतुल्य हैं जो तब तक प्रसन्नता भरते हैं जब तक जड़ को जल प्राप्त रहता है ॥
मुरझाए मुख सिक्त करे, बड़हर क़तर ब्योँत ।
निर्बल पौध सहार दे, अस जन सेवक जोत ।१६५६।
भावार्थ :-- मुरझाए हुवे मुख को जो सिक्त करे, बढे चढ़े की काँट-छाँट करे । निर्बल पौधे को सहार दे, ऐसा जन सेवक नियुक्त करना चाहिए ॥
पात पल बरन फूल फल, बलकल कल संवाद ।
अर्थ कनक मुख धार के, लाहे सार स्वाद ।१६५७ ।
भावार्थ : -- पत्र पल्लव है, वर्ण समूह फले हुवे फूल है । सुमधुर संवाद छिलका है । अर्थ के कणों को ही मुख में आधारित कर उसके सार का स्वाद लेना चाहिए ॥
प्रीति सोषइ रोष को लोभइ को संतोष ।
दिनकर ओस सोषइ तस अपब्ययन धन कोष ।१६५८।
भावाथ : -- रोष की शोषक प्रीति है ,जैसे लोभ की शोषक संतोष है । जैसे ओस बिनु का शोषक दिनकर है वैसे ही अपव्यय धन के कोष को शोषित करता है ॥
जहां सिंहासनहु मिले, गाइ राम के नाम ।
सोइ जुग मिले परम गति, करत जग हित काम ।१६५९।
भावार्थ : -- जिस युग में ईश्वर का नाम जपने भर से सिंहासन मिल जाता हो । उस युग में परमार्थ करते जाओ, परम गति अवश्य ही मिलेगी ॥
मन रंजन कि जीवन धन, साधन को संजोग।
यह होतब बिनु भला जब किए जग दुर उपजोग ।१६६० ।
भावार्थ : -- किसी साधन का आविष्कार चाहे मनोरंजन हेतु हो चाहे जीवन की आधार भूत आवश्यकताओं हेतु हो । यदि संसार द्वारा उसका दुरपयोग किया जाता हो तो ऐसे आविष्कार अविष्कृत न होना ही श्रेष्ठ है ॥
पाखनी के परमारथ , जन जन के मन भाइ ।१६५१ ।
भावार्थ : -- अब तो जनता जनार्दन के मन को दूसरों का स्वत्व हरण करने वाले भाते हैं और लुटेरों की कला और नृत्य एवं पाखंडियों का परमार्थ ही भाता है ॥
कहत दुर्मूल दुरमूल, आँखि देखावहिं डाँटि ।
सबद पाती सासक किए, हम केहि ते कहुँ घाटि ।१६५२।
भावार्थ : -- मँहगाई को महगाई कह दो तो अपने चाटुकारों को आँख दे दे के डँटवाता है । धूत बुडबग कहीं के ये महंगाई थोड़े ही छे.....ऐसा बोल के । जब शब्द पाती को शासक नियुक्त करना था तो 'हम ' क्या किसी से घाट थे ॥
रामायन अग जग सुना, किया परस्पर प्रीति ।
रे भारती सठ तेरी , भई बिपरीत रीति ।१६५३।
भावार्थ : -- रामायण को सारे संसार ने श्रवण किया । और श्रवण कर सौहार्दयता एवं परस्पर प्रीति करते हुवे सौहार्द का व्यवहार सीखा । रे दुष्ट भारतीयों तुम्हारी बुद्धि विपरीत हो गई ॥
" अरे सठ भारतीय ! तू वर्ण से विवर्ण हो गया किन्तु गोरे अभी तक गोरे हैं यह स्मरण रहे "
बढ़नी तेतकहि अनुकूल, जाके जेतक मूल ।
प्रतिकूल एक दिन निपतत, किए निज नास समूल ।१६५४।
भावार्थ : -- समृद्धि योग्यता के अनुकूल होनी चाहिए । अनुचित साधनों से प्राप्त की गई प्रतिकूल समृद्धि पतन का कारण बनती है और एक दिन पूर्णत: नष्ट कर देती है ॥
सम्पद जल धनपत कमल, चेरे रबि समतूल ।
तब लग नैन फूरित किए, जब लग जल गह मूल ।१६५५।
भावार्थ : -- सम्पदा/प्रतिष्ठा यदि जल है तो धनपति कमल है, चाटुकार उस रवि के समतुल्य हैं जो तब तक प्रसन्नता भरते हैं जब तक जड़ को जल प्राप्त रहता है ॥
मुरझाए मुख सिक्त करे, बड़हर क़तर ब्योँत ।
निर्बल पौध सहार दे, अस जन सेवक जोत ।१६५६।
भावार्थ :-- मुरझाए हुवे मुख को जो सिक्त करे, बढे चढ़े की काँट-छाँट करे । निर्बल पौधे को सहार दे, ऐसा जन सेवक नियुक्त करना चाहिए ॥
पात पल बरन फूल फल, बलकल कल संवाद ।
अर्थ कनक मुख धार के, लाहे सार स्वाद ।१६५७ ।
भावार्थ : -- पत्र पल्लव है, वर्ण समूह फले हुवे फूल है । सुमधुर संवाद छिलका है । अर्थ के कणों को ही मुख में आधारित कर उसके सार का स्वाद लेना चाहिए ॥
प्रीति सोषइ रोष को लोभइ को संतोष ।
दिनकर ओस सोषइ तस अपब्ययन धन कोष ।१६५८।
भावाथ : -- रोष की शोषक प्रीति है ,जैसे लोभ की शोषक संतोष है । जैसे ओस बिनु का शोषक दिनकर है वैसे ही अपव्यय धन के कोष को शोषित करता है ॥
जहां सिंहासनहु मिले, गाइ राम के नाम ।
सोइ जुग मिले परम गति, करत जग हित काम ।१६५९।
भावार्थ : -- जिस युग में ईश्वर का नाम जपने भर से सिंहासन मिल जाता हो । उस युग में परमार्थ करते जाओ, परम गति अवश्य ही मिलेगी ॥
मन रंजन कि जीवन धन, साधन को संजोग।
यह होतब बिनु भला जब किए जग दुर उपजोग ।१६६० ।
भावार्थ : -- किसी साधन का आविष्कार चाहे मनोरंजन हेतु हो चाहे जीवन की आधार भूत आवश्यकताओं हेतु हो । यदि संसार द्वारा उसका दुरपयोग किया जाता हो तो ऐसे आविष्कार अविष्कृत न होना ही श्रेष्ठ है ॥
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